सुरास के हृदय में बस एक ही स्वर था एक ही लक्ष्य था प्रतिशोध और देवताओं का विनाश पिता की चीता ने उसके क्रोध की ज्वाला को और भड़का दिया था फिर क्या हुआ पिताश्री क्या असुर कुमारी सुरास माया के उस चर्म तक पहुंच सकी हां पुत्र असुर गुरु शुक्राचार्य ने उसे प्रशिक्षित किया और स्वयं सुरा साई ने भी अथक प्रयत्न किए और फिर शीघ्र [संगीत] ही क्या मैं इतने समय से ध्यान में हूं कि रात्रि सब दोपहर हो गई है प्यास लगी है जल [संगीत] चाहिए [संगीत] इसमें तो एक बंद भी जल नहीं है अब इस पर्वत पर कहां जल मिलेगा [संगीत] मुझे य ने की आवाज यहां इस नदी को पहले तो कभी नहीं देखा मैंने [संगीत] जल नहीं इसमें तो मात्र कंकड़ पत्थर [संगीत] [संगीत] है यह सब क्या हो रहा है मगोर य सुरा [संगीत] सही प्रणाम गुरुदेव गुरुदेव यह लीजिए जल मेरी प्यास तो तुम्हारी सफलता से ही बुझ गई तुमने श्रेष्ठतम आसुई माया का रूप लेकर मुझे आनंदित कर दिया ऐसी माया जिसे मैं भी नहीं पहचान सका जल की धारा रात्रि का दिन बनना अद्भुत सर्वथा अद्भुत है यह गुरुदेव यह सब तो आपके प्रशिक्षण का ही परिणाम है सुरा सई यदि मैं तुम्हारा गुरु तुम्हें पहचानने में असमर्थ रहा तो फिर तुम्हें कोई भी नहीं पहचान सकेगा इसलिए इस मायावी कौशल की पराकाष्ठा को छूने के पुरस्कार स्वरूप तुम्हें नया नाम देता हूं मैं आसुरी माया गुरुवर आसुरी माया की प्यास तो तब तक नहीं बुझेगी जब तक वो अपने प्रतिशोध की अग्नि को शांत नहीं कर लेती मुझे आपके अगले आदेश की प्रतीक्षा है अब तुम्ह उस असुरी वंश को जन्म देना है ऐसी संतान के लिए तैयार हो जिसके स्वरूप के आगे सभी पद मुरझा जाए ऐसी संतान जिसकी दहाड़ के आगे सहस्त्र सिंघ की दहाड़ भी शून्य लगे ऐसी संतान जिसके आगे सहस्त्र गजों का बल भी व्यर्थ हो जाए ऐसी संतान जो जंगली अज के समान हटी हो जिसके उसके पद से कोई भटका ना सके हां गुरुदेव यही तो मेरी भी कल्पना है क्या करना होगा मुझे महान ऋषि जिन्होने तब से अपार तपो शक्ति अर्जित की हो वही तुम्हें ऐसी संतान दे सकते हैं कौन है ये ऋषि महा ऋषि कश मषि कश मषि कश ऋषि कश्यप किंतु पिताश्री ऋषि कश्यप को आसुरी कन्या ने अपनी सहायता के लिए मनाया कैसे उसने ऋषिवर को मनाया नहीं अभी तो उनके साथ भी मायावी झल किया जब वो वन में विच ध्यान का स्थान ढूंढ रहे थे सुरास को उनकी उपस्थिति का आभास हो गया और उस मायावी ने एक मायावी लावे का निर्माण [संगीत] किया यह सुरा सई के लिए उचित अवसर था जब उसने अपनी माया से ऋषिवर को अपने मायावी आश्रम की ओर आकषित [संगीत] किया [संगीत] ओ यहां इस वन में ओम के उच्चारण का स्वर कहां से आ रहा है [संगीत] ओ अद्भुत दिव्य अति सुंदर मेरे ध्यान के लिए यह स्थान सर्वथा उचित [संगीत] है हे ऋषिव स्वागत है आपके आगमन से मेरी सभी प्रार्थनाएं आज पूर्ण हो गई आप जैसे महान दिव्य महर्षि की सेवा करने की इच्छा आज पूर्ण हो गई देवी आपके आश्रम की स्वच्छता एवं शांति देखकर हम अत्यधिक प्रभावित हुए हैं इस तपस्विनी के पास इस आश्रम की देखरेख के सिवाय और कार्य ही क्या है प्रभु मेरी तो एक ही इच्छा थी ऋषि कि किसी दिन दिव्य ऋषि मेरे इस आश्रम का लाभ उठाए अब आप कृपा कर मेरे इस आश्रम को अपना लीजिए गुरुदेव आइए गुरुदेव स्थान ग्रहण [संगीत] करें अपने ध्यान के लिए उ स्थान ढूंढ रहे ऋषि कश्यप ने अन मायावी सुरा साई के आमंत्रण को स्वीकार कर लिया इधर ऋषि कश्यप उसके माया जाल में उे और उधर सुरा सई उनके साथ ल करना आरंभ कर दिया उस आसुरी राजकुमारी ने ऋषिवर की सेवा के लिए उस गीत का प्रयोग किया और स्वयं ऋषिवर की सेवा से मुक्त हो [संगीत] [संगीत] गई [संगीत] और फिर एक दिन रिसीवर के नेत्र [संगीत] [संगीत] खुले देवी लंबे समय तक मैं ध्यान में रहा आपने निस्वार्थ भाव एवं निष्ठा के साथ मेरी सेवा की है आपकी सेवा से प्रसन्न होकर मैं आपको वरदान देना चाहता हूं कहिए देवी क्या इच्छा है आपकी आपके तप की सफलता और प्रसन्नता ही मेरा सुख है मेरी और कोई अन्य कामना नहीं है सेवा का फल ना मिले तो वह अनुचित होगा आप मुझसे अवश्य कुछ मांगिए मुझे अत्यंत प्रसन्नता होगी आपकी जो भी इच्छा हो वो निसंकोच कहिए मैं आपको वचन देता हूं कि मैं उसे अवश्य पूर्ण करूंगा मैं आपकी इच्छा को कैसे टाल सकती हूं ऋषिवर तो यदि आप मुझ पर कोई कृपा करने के इच्छुक है ऋषिवर तो मुझे अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार कर मेरी संतानों के पिता उचित है देवी मैंने आपको वचन दिया है जैसी आपकी इच्छा वैसा ही होगा महर्षि कश्यप को अपने माया जाल में उलझाने वाली यह तो महा माया भी नहीं थी हां पुत्र असल गुरु शुक्र चारी ने मु से आसुरी माया में ऐसा प्रवीण बना दिया था और फिर उसके तुरंत बाद ऋषिक कश्यप ने उसे विवाह कर उसकी प्रथम इच्छा पूर्ण कर दी और जब उसकी दूसरी इच्छा पूर्ण करने का समय आया तो सुरा सई ने एक और वचन ले लिया हमारे पुत्र असाधारण होने चाहिए इसीलिए वचन दीजिए स्वामी हमारे दिव्य मिलन के समय आप मेरे रूप अनुसार रूप धारण करेंगे विचित्र बात है इसकी क्या आवश्यकता है किंतु जो मेरे प्रति समर्पित रही है उसकी इच्छा पूर्ण करने का वचन मैं दे चुका हूं उचित है देवी जैसी आपकी [संगीत] इच्छा ऐसी संतान के लिए तैयार हो जिसके स्वरूप के आगे सभी पद मुरझा [संगीत] जाए सहस्त्र पद्म के समान तेजोमय है मेरा पुत्र मैं इसका नाम सुरा पद्मन रखना चाहती हूं रखना चाहती हूं रखना चाहती मन रखना [संगीत] चाह ऐसी संतान जिसकी दहाड़ के आगे सहस्त्र सिंघ की दहाड़ भी शून्य लगे अब इसने सहनी का रूप क्यों धारण किया [प्रशंसा] मेरे पुत्र सिंह का मुख है तुम्हारा इसीलिए तुम्हारा नाम होगा सिंह मुखन और यह तुम्हारी सेना होगी मेरा संशय बढ़ता जा रहा है यह इतने असाधारण पुत्र और उनकी सेनाओं को क्यों उत्पन्न कर रही [संगीत] है ऐसी संतान जिसके आगे सह स गजों का बल भी व्यर्थ हो जाए उचित समय आने पर इसका सत्य उजागर अवश्य हो [संगीत] जाएगा गज शीष धारी गज मुखन हो तुम पुत्र और यह तुम्हारी गज [संगीत] सेना ऐसी संतान जो जंगली अज के समान हटी हो जिसके उसके पद से कोई भटका ना सके एक ऋषि होने के नाते मुझे अपने वचन का मान रखना ही होगा पर स्थिति चाहे जो भी हो उचित समय आने पर इसका सत्य उजागर अवश्य हो जाएगा [संगीत] पुत्री अज मुखी सिंह मुखन गज मुखन सुरा पद्मन अज [संगीत] मुखी कोई अनिष्ट तो नहीं करना चाहती है ये प्रणाम पिता श्री प्रणाम माता कल्याण हो पुत्रों सदा विजय भव सदा विजय भव भ अब मेरे महाबली पुत्र है सेनाएं है में देवताओं से प्रतिशोध लेने में सफल [संगीत] [संगीत] होंगी ऋषि कश्यप जैसे धर्मात्मा की संतान होकर भी वह सभी अधर्म के मार्ग पर क्यों चलने लगे पिता श्री ऋषि कश्यप ने तो प्रयत्न किया था कि उनकी संतान धर्म के मार्ग पर चले परंतु उसकी माता के मन में इतना विष था कि वह भी इससे अछूते नहीं रह पाए धर्म का मार्ग कठिन हो सकता है किंतु वह हमें अपने लक्ष्य तक सफलता पूर्वक ले जाता है हम धर्म का साथ छोड़ देते हैं उसी दिन हम अपने सर्वनाश का मार्ग प्रशस्त कर अपने विनाश को निमंत्रण देते हैं इसीलिए हमें सदैव धर्म का पालन करना चाहिए व्यर्थ है यह सब मेरी संतानों को धर्म नहीं माया का ज्ञान चाहिए माया ही इन्हे सफल बनाएगी अनेक ब्रह्मांड पर विजय दिलवाए [संगीत] गी तुम आसुरी तुमने किया है मेरे [संगीत] [संगीत] साथ तो यह सब इसकी माया थी यह तो सुरेंद्र की पुत्री है जिसे मात्र प्रतिशोध [संगीत] चाहिए मैं सुरेंद्र पुत्री य प्रण लेती हूं 108 वर्षों तक दंडित करूंगी मैं जिसके मन में मात्र प्रतिशोध की भावना है तुमने मुझे छला अवश्य है किंतु यह मेरी भी संताने हैं इन पर मेरा भी अधिकार है अच्छाई और बुराई के भेद को यह भी समझते हैं अब निर्णय इनको करना है कि इनको अपने जीवन में किसका चुनाव करना है सत्य या धर्म के पद का या माया के ज्ञान [संगीत] का [संगीत] हा ऋषिवर चुनाव स्पष्ट है अब बस मुझे इन्हे इनके लक्ष तक पहुंचने का मार्ग दिखाना है और यदि ये तुम्हारे बताए मार्ग पर चलेंगे तो इनका एक मात्र परिणाम होगा भयंकर सर्वनाश अवश्य दुष्ट देवताओं का सर्वनाश अपनी संतान के मन में उसी प्रतिशोध की बीज का रोपण करने के लिए उनकी मां ने अपनी संतानों को वह स्थान और उनके नामा की मृत्यु के दृश्य दिखाए मैंर पुत्री सुरास यह प्रण लेती हूं 108 वर्षों तक दंडित करूंगी मैं एक सहस्त्र आठ ब्रह्मांड को रिक्त कर दूंगी तुम देवताओ से पूण करेंगे किंतु इसके पूर्व इन्ह एक सुरक्षा कवच की आवश्यक्ता है जो इन्ह महादेव के वरदान से प्राप्त होगा उसकी संतानों ने मेरा तप आरंभ करने में तनिक भी विलंब नहीं [संगीत] किया कदाचित प्रभु महादेव विशेष आहुति से ही प्रसन्न होंगे [संगीत] यह भी पर्याप्त नहीं है प्रभु कोई बात नहीं मैं इससे भी बड़ी आहुति के लिए तैयार हूं [संगीत] हमारे अग्रज के समान हम भी आहुति [संगीत] देंगे [संगीत] प्रणाम प्रभु कहो क्या चाहते हो तुम आप हमें अमृत्व तो प्रदान नहीं कर सकते हैं महादेव किंतु हमें ऐसी असीम शक्ति दे कि हमें कोई भी अस्त्र शस्त्र पराजित नहीं कर सके आपका पुत्र जिसका जन्म केवल आपके ही अंश से हुआ हो और उसमें उसकी माता का कोई भी भूमिका ना हो वही हमें पराजित कर सके और प्रभु हमें वरदान दे इस देवलोक के साथ समस्त आठ ब्रह्मांड हमारे आधीन हो और इस ब्रह्मांड में सबसे तीव्र गति से चलने वाले रथ का स्वामी मैं बन मेरा शरीर इतना अभेद और शक्तिशाली हो कि अगर उसके दो भाग भी हो जाए तो वो स्वतः संपूर्ण बन जाए तथास्तु तथास्तु तथास्तु [संगीत] अर्थात भैया कार्तिकेय ही सुरा पदम का वध कर सकते हैं हां शुद्ध चित्त सात्विक व्यक्ति के साथ किया गया छल प्रपंच अक्षम्य अपराध है
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