[संगीत] किंतु मेरे परिवार पर से किस पर संकट आने वाला है ऋषिवर बताइए ना ऋषिवर संकट किस पर होगा यह सोचने के स्थान पर तुम्हें यह सोचना चाहिए इस संकट के अंध का उपाय क्या [संगीत] है हनुमान इस जमू द्वीप में स्थित भारतवर्ष की भूमि पर अनेक ऐसे देवस्थान हैं जो तीर्थों के रूप में स्थित है जिनके पूर्ण प्रताप से बड़ी बड़ी आधि व्याधि ही नहीं आस्य मृत्यु भी टल जाती है ऐसा ही एक तीर्थ स्थल है मखंड तीर्थ जहां मृत्युंजय महादेव तिलिंग के रूप में साक्षात वास करते हैं वहा स परिवार जाकर उनके दर्शन एवं पूजन करने से तुम्हारे परिवार पर आया हुआ यह संकट टल सकता है पुत्र अच्छा तो ऐसा प्रताप है उस ज्योतिर्लिंग के दर्शन और पूजन में हा हनुमान असाध्य रोग आधि व्याधि अकाल मृत्यु हर प्रकार के संकट हर लेते हैं मृत्युंजय महादेव अच्छा मृत्युंजय महादेव कैलाश स महादेव से भिन्न है है तो वही महादेव पुत्र किंतु कैलाश धाम हर वक्त तो नहीं जा सकता ना पुत्र इसलिए उस स्थान पर महादेव अपनी सभी शक्तियों के साथ ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थित इसी प्रकार अनेक देवी देवता विभिन्न स्थानों पर किसी ना किसी लीला के द्वारा अपने अपने अंश के रूप में भक्तों के कल्याण के लिए स्थित हुए तो क्या उस स्थान पर भी भगवान शिव जी की लीला हुई थी हां पुत्र उनका यह मृत्युंजय महादेव नाम एक बालक के कारण पड़ा एक बालक के कारण एक बालक बालक ऋषिवर आप मुझे उस बालक की कथा सुनाइए कदाचित वो सुनने से मुझे कोई उचित मार्ग मिल जाए अच्छा सुनाता सुनाता हूं आओ उस वृक्ष की ओर चलते हैं [संगीत] बालकों आदि काल में एक बहुत बड़े तेजस्वी ऋषि थे मृक उनकी कोई संतान नहीं थी एक समय की बात है जब वे अपनी कुटिया के प्रांगण में ध्यान लगाए हुए बैठे थे तो उनकी पत्नी मरुद मती पौधों को जल दे रही जहां ऋषि पत्नी पौधों को पानी दे रही थी वहीं कुछ बालक क्रीड़ा कर रहे थे जि देखकर ऋषि पत्नी को अपनी संतान हीनता का दुख होने लगा अरे य [संगीत] दो य मरुद [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] मती मरुद मती क्या हुआ प्रिय यह जल तो यूं ही व्यर्थ में बह रहा है तुम्हारी पीड़ा मैं समझ सकता हूं [संगीत] ममती हे प्रभु उस व्यर्थ बहते हुए जल की भाती ही मेरा जीवन भी व्यर्थ ही निकला जा रहा है हे देवेश्वर व्यर्थ होता है व पौधा जिस [संगीत] कोई मोल नहीं ऐसे वृक्ष का जिसम फल ना लगे क्यों दिया आपने मुझे ऐसा व्यर्थ जीवन प्रभु इससे तो अच्छा होता कि आपने मुझे यह जीवन ही नहीं दिया [संगीत] होता मरदम उठो प्रिय मरुद मती दुखी मत हो प्रिय देखना उन क्रीड़ा कर रहे बालकों की भाती एक दिन हमारा भी बालक होगा जो तुम्हारे सोने आंचल को अपनी किलकारियां से भर देगा कैसे होगा कब होगा स्वामी इतने वर्ष तीत हो गए यही सुनते सुनते अब तो आयु भी पार हो चली है प्रिय तुम देखना यह महादेव भी हमारी बिगड़ी बनाएंगे यदि यह चाहे तो मरुथल से भी जल निकाल दे चट्टानों में भी पुष्प खिला दे मुझे महादेव पर पूरा भरोसा है और तुमने भी तो पूर्ण श्रद्धा और भक्ति से इनकी पूजा की अब मैं इनकी प्रसन्नता के लिए घोर तप [संगीत] [प्रशंसा] करूंगा यह भोलेनाथ अवश्य ही अपने प्रसाद से तुम्हारा आचल भर देंगे हां मेरी मां भी मुझे कभी-कभी कहती है कि मैं भी भोले बाबा का ही प्रसाद हूं और फिर क्या हुआ क्या भोले बाबा ने उन्हें संतान का वरदान दिया हनुमान तुम्हारे भोले बाबा तो सबकी मनोकामना पूर्ण करते हैं उन्होंने ऋषि म कंडू को भी वरदान दिया किंतु वरदान सहजता से नहीं मिलता उसके लिए उन्होंने वर्षों तक कठिन तपस्या की वो भी बहती हुई झिल में एक पाव पर खड़े रह ग एक पाव पर हां वर्षा धूप शीत कुछ भी हो उनकी तपस्या अनवरत चलती र शिवाय ओम नमः शिवाय ओम नमः शिवाय ओम नमः शि दिन निकले मास व्यतीत हुए ऋतुए परिवर्तित हुई वर्षों की घोर तपस्या के पश्चात अंतत वो दिन भी आ गया जब उनकी तपस्या अपने चरम कोष पर पहुंच गए ओ नम शिवाय ओम नमः शिवाय ओम नमः शिवाय खोलिए ऋषिव मृ [संगीत] [हंसी] [संगीत] कंडू [संगीत] हे प्रभु भोलेनाथ हे शिवशंकर आज आपने सुन ही ली इस दन की पुकार प्रभु आपकी जय जयकार हो आपकी जय जयकार हो दीनानाथ आपकी जय जयकार हो ऋषिवर कंडू आपकी तपस्या सफल हुई कहिए क्या अभिलाषा है हे देवेश्वर आप तो अंतर्यामी है प्रभु आप तो सबके हृदय में वास करते हैं आपसे कुछ भी नहीं छिपा है प्रभु किंतु इच्छित व तो आपको प्रकट करना ही होगा ऋषिवर हे प्रभु ना तो मुझे धन संपदा की इच्छा है और ना ही राज पाठ की अभिलाषा मात्र एक संतान का वरदान दे दीजिए प्रभु श्वर मृ कंडू आप संसार का कोई भी अन्य सुख मांग लीजिए आपको प्राप्त हो जाएगा किंतु आपके भाग्य में संतान का सुख नहीं [संगीत] है आप तो सर्व समर्थ है प्रभु किंतु यदि भाग्य की ही बात है तो उसे अपने कर्म और तपस्या से परिवर्तित किया जा सकता है प्रभु मैं और घोर तप करूंगा भगवन मुझे तपो फल के रूप में मातृ संतान की अभिलाषा है आपको और तपस्या करने की आवश्यकता नहीं है आप तपो फल के अधिकारी है मैं आपको पुत्र प्राप्ति का वरदान भी दूंगा किंतु किंतु किंतु क्या प्रभु ऋषिवर आपको दीर्घायु पुत्र एवं तेजस्वी पुत्र में से एक विकल्प का चुनाव करना होगा दीर्घायु पुत्र चुनेंगे तो वो कदाचित तेज हीन हो दुर्बल हो तेजस्वी पुत्र चुनेंगे तो उसकी आयु कम होगी अच्छा फिर क्या चुना ऋषिवर म कंडू ने दीर्घायु पुत्र या तेजस्वी पुत्र अच्छा तुम सब बताओ उन्होंने क्या चुना होगा तेजस्वी पुत्र जो विद्वान और अपने कर्मों से अपनी एवं अपने कुल की कीर्ति को बढ़ाए जिस पर माता-पिता को गर्व हो या दीर्घायु पुत्र जो बहुत लंबे समय तक जीवित तो रहे किंतु अयोग्य हो दुर्बल हो मैं बताता हूं ऋषिवर हर माता-पिता अपने पुत्र को चिरंजीवी भव का आशीर्वाद देते हैं इसलिए उसने मुखडु ऋषि ने उन्हें दीर्घायु पुत्र का ही आशीर्वाद दिया होगा हां आवा आशीर्वाद देते हैं तुम क्या सोच रहे हो हनुमान मेरी मां ने मुझे सदैव सीख दी है कि सत्कर्म और सद्गुणों से बड़ा और कुछ नहीं होता है अपनी तेज और अपनी ऊर्जा से सबकी सहायता करो मेरे पिताश्री ने भी मुझे सीख द है कि भले ही पुष्प केवल एक दिन के लिए ही खेलता हो किंतु व अपनी सुगंध से सबको आनंदित कर देता है अतः मुझे प्रतीत होता है कि स्वयं खंडू जी ने अवश्य तेजस्वी पुत्र की ही कामना की होगी हनुमान तुम्हारा कथन सत्य है ऋषि मखंड ने भी गहरे विचार और मंथन के पश्चात यही विकल्प चुना था प्रभु तेजस्विता की आयु अनंत होती है पुत्र यदि तेजस्वी होगा तो अल्प जीवन में ही उन्नति के चर्म को स्पर्श कर लेगा अपनी कीर्ति से जगत के लिए स्मरणीय बन जाएगा प्रभु दीर्घायु पुत्र यदि तेज हीन है तो उसका जीवन व्यर्थ है प्रभु उसके जीवन काल में ही जगत उसे विस्मृत कर देगा हे प्रभु मुझे तेजस्वी पुत्र की ही कामना है तथास्तु हा तेजस्विता ही सार्थक होती है मैं भी अपने माता-पिता का तेजस्वी पुत्र बनूंगा मैं भी बनूंगा मैं भी बनूंगा मैं भी बनूंगा तुम सब अपने माता पिता के तेजस्वी पुत्र बनना किंतु पहले पूरी कथा तो सुन लो [संगीत] मित्रों फिर क्या हुआ ऋषिवर फिर कुछ समय के पश्चात मरकू ऋषि एक पुत्र के पिता बन गए उनकी पत्नी पुत्र को पाकर सारा दुख भुला बैठे बड़े प्रेम से उन्होंने अपने पुत्र का नाम रखा मारकंडे मारकंडे हां तेजस्वी पुत्र मारकंडे जिसकी कुंडली बनाने के लिए स्वयं देवर्षी नारद पधारे [संगीत] थे बालक मारकंडे तुम बहुत भाग्यवान हो स्वयं देवऋषि तुम्हारी कुंडली बना रहे [संगीत] [संगीत] हैं [संगीत] ये हो गए शिशु के गृह गोचर नारायण नारायण ऋषि वर्म कंडू सूर्यदेव के समान तेजस्वी है आपका पुत्र मार् खंड सं कातिक मुनियों की भाति ही विद्वान [संगीत] होगाय हां देवर्षी इसका चौड़ा ललाट इसकी उभरी हुई यह नासिका इसके तेजस्वी होने का प्रमाण है ईश्वर इसे दीर्घायु प्रदान करें देवर्षी आपके मस्तक पर यह चिंता की रेखाएं पूरे को अनायास गहन लग जाए तो चिंता तो होती है ऋषि पर कुंडली के अनुसार मारकंडे अल्पा आयु का पालक है अल्पायु ठीक से देखिए देवशी कहीं आपकी गणना में कोई त्रुटि कोई त्रुटि नहीं है देवी मारकंडे की आयु मात्र 10 वर्ष की नहीं महादेव ने स्वयं मुझे मात का सुख प्रदान किया है वो इतने शीघ्र मेरा आचल सुना नहीं कर सकते मेरे प्रभु इतने निष्ठुर नहीं हो सकते महादेव इतने निष्ठुर नहीं है मरुद मती हमारे भाग में तो संतान का सुख था ही [संगीत] नहीं वो तो ईश्वर की कृपा है जो हमें यह आशीर्वाद प्रदान हुआ किंतु किंतु क्या स्वामी महादेव ने मुझसे कहा था दीर्घायु अथवा तेजस्वी पुत्र में से मुझे किसी एक को चुनना होगा और मैंने मैंने तेजस्वी पुत्र को चुना किंतु मुझे यह ज्ञात नहीं था कि आयु इतनी अधिक अल्प होगी मात्र 10 वर्ष मात्र 10 वर्ष एक एक दिन गिनते हुए बिताने होंगे ये 10 वर्ष मात के सुख के साथ हर क्षण अपने पुत्र से बिछड़ने का आभास ये वरदान है या अभिशाप रा यह कैसा वरदान हुआ ऋषिवर इतनी अल्पा आयु मात्र 10 वर्ष 10 वर्ष तो बाल्यावस्था में ही निकल जाते हैं 10 वर्ष की अल्पायु में कोई कैसे हो सकता है तेजस्वी बालक क्या सेवा कर पाए होंगे व अपने माता-पिता की बालकों मारकंडे वास्तव में ही बहुत तेजस्वी बालक था तीन से पाच वर्ष की आयु में ही उसने अपने पिता से समस्त वेद पुराणों का ज्ञान प्राप्त कर लिया था माता के आंचल का सुना पन मिट गया था पिता को भी एक धे मिल गया [संगीत] था उनके जीवन को जैसे एक नई दिशा मिल गई थी एक बालक के आने [संगीत] से एक और मारकंडे का ज्ञान दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा था तो वहीं दूसरी और उनकी माता मरुद मती की ममता भी पुत्र के लिए बढ़ती जा रही [संगीत] थी मन और पवन खिल उठे थे ऋषि मरकू और उनकी पत्नी के पाच वर्ष का मारकंडे अपने माता-पिता की सेवा लगा हुआ दौड़कर पुष्प लेकर आता पूजा के लिए यज्ञ की वेदी सजाता मां से पहले ही भागकर जल लेकर आता अपनी माता पिता की सेवा में उसे बहुत आनंद आ रहा [संगीत] था ममती ममती शीघ्र बाहर आइए सत्य है ऋषिवर अपने माता-पिता की सेवा करने में तो मुझे भी बहुत आनंद आता है हां ऋषिवर फिर क्या किया उन्होंने किंतु अब मारकंडे जी के पास तो केवल पाच वर्ष बचे थे ऋषिवर फिर क्या हुआ
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