महाभारत इच्छा है तुम्हारी बस इसने तो एक ही रट लगा रखी है केशव इसे तो आपको गुरु बनाना है वस इस देश में गुरुजनों की क्या कमी है तुम हमें ही गुरु क्यों बनाना चाहते हो इसलिए कि दादी श्री कहती हैं कि आप ज्ञान के भंडार हैं आपसे जिसे मार्गदर्शन मिलेगा उसे सब कुछ मिल जाएगा क्योंकि आप मार्ग दर्शकों के मार्गदर्शक हैं आप मेरा भी मार्गदर्शन कीजिए मैं आपका पौत्र हूं और एक पौत्र होने के नाते क्या आप पर मेरा कोई अधिकार नहीं अवश्य है पत्र अवश्य है किंतु कुल और परिवार अपने स्थान पर होते हैं और गुरु शिष्य का नाता अपने स्थान पर पर यदि तुम्हें हमारा शिष्य बनने का अधिकार है तो हमें भी यह देखने का अधिकार है कि तुम हमारे शिष्य बनने की योग्य हो भी या नहीं आप मेरी योग्यता की परीक्षा ले सकते हैं दादा [संगीत] श्री ठीक है वत्स हम तुमसे कुछ प्रश्न पूछते हैं यदि तुमने उनका ठीक-ठीक उत्तर दिया तो हम तुम्हारा मार्गदर्शन अवश्य करेंगे मैं आपके हर प्रश्न का उत्तर देने के लिए तैयार अच्छा तो सबसे पहले यह बताओ वत्स कि गुरु और भगवान में कौन अधिक श्रेष्ठ होता है गुरु [संगीत] गुरु क्यों वो इसलिए दादा श्री क्योंकि कि गुरु ही तो भगवान को पाने की राह दिखाता है गुरु ना हो तो भगवान का ज्ञान कौन दे गुरु ही तो बताता है भगवान कौन है क्या है और कहां है बहुत ठीक उत्तर दिया तुमने वत अब यह बताओ कि संसार में सबसे तीव्र गति किसकी होती है मन के विचा की ददा श्री जो क्षण भर में कहीं से कहीं पहुंचा देते हैं धन्य होव अब अंतिम प्रश्न वह कौन सी वस्तु है जो एक बार चली जाए तो कभी नहीं आती और वह कौन सी वस्तु है जो एक बार आ जाए तो फिर कभी नहीं जाती युवावस्था दादा श्री जो एक बार चली जाए तो फिर कभी नहीं आती और वृद्ध अवस्था जो एक बार आ जाए तो फिर कभी नहीं जाती हम प्रसन्न हुए तुम परीक्षा में सफल हुए ब आपका यह पौत्र बहुत होनहार और बुद्धिमान है अवश्य ही से यह बुद्धि माया वनी दादी मां यानी भाभी श्री हिडिंबा से मिली है तो आप हमें अपना शिष्य बना लेंगे दादा श्री किंतु तुमने अभी तक हमें यह तो बताया ही नहीं कि तुम बनना क्या चाहते हो मैं दादा श्री भीमसेन के भाती महावीर और पिता श्री घड़ो के भाती महाबली बनना चाहता हूं दादा श्री मैं ऐसा महाबली व्यक्ति बनना चाहता हूं जिसे कोई सेना भी परास्त ना कर सके शारीरिक बल मनुष्य के लिए अनिवार्य व आवश्यक है वत्स किंतु ना तो वह अपने आप में संपूर्ण होता है और ना ही किसी को संपूर्ण बनाता है संपूर्ण तो मनुष्य केवल उसी समय होता है जब उसके पास शारीरिक बल के साथ-साथ मनोबल भी हो क्योंकि शारीरिक बल तो उसे केवल अपने जैसे व्यक्ति से लड़ने की शक्ति देता है किंतु मनोबल उसे परिस्थितियों से लड़ने वह उन्हें बदल देने तक की शक्ति देता है वत्स दादा श्री आपके पास किस चीज की कमी है आप चाहे तो किसी को भी बल और मनोबल दे सकते हैं इसीलिए तो मैं आपके पास शीष नवाने आया हूं तुम्हारे जैसा पराक्रमी और बुद्धिमान शिष्य पाकर मैं भी अति प्रसन्न होता वत्स किंतु यह समय बड़ा दुर्लभ है क्यों दादा श्री तुम्हारा कुल इन दिनों बहुत पीड़ित है व देश बंटवारे की कगार पर खड़ा है दुर्योधन अपने ही भाइयों को उनके अधिकारों से वंचित कर देना चाहता है दादा श्री हम आपस में मिलकर क्यों नहीं रह सकते बहुत अच्छा प्रश्न किया तुमने व यह प्रश्न हर युग में हर पीढ़ी अपने पूर्वजों से पूछेगी कि लोग आपस में मिलकर क्यों नहीं रह सकते क्योंकि हर युग में एक ना एक दुर्योधन अवश्य होगा जो अपने अहम और अपनी हट धर्मी को ही अपना धर्म समझने [संगीत] लगेगा परंतु उन्हे इस बात का ज्ञान नहीं कि अंत में वि धर्म की होती है ज्ञान है वत्स किंतु व आरंभ को ही अंत समझता है पर यह भ्रम तो एक दिन टूट जाएगा दादा श्री जब दादा श्री दुर्योधन को इस बात का ज्ञान हो जाएगा कि धर्म उनकी हट नहीं धर्म तो न्याय है और अंत में विजय धर्म की होती है जब तक धर्म की विजय नहीं हो जाती वत्स तब तक उसे अधर्म से लड़ना ही पड़ता है उसकी शक्ति को झेलना ही पड़ता है और तुम्हारा कुल अभी वही सब झेल रहा है दाद श्री भी यही कहती है कि दाद श्री दुर्योधन की महत्वाकांक्षाओं का कोई अंत नहीं महत्वाकांक्षा अश्व की भाती होती है वत यदि उसके मुंह में सहनशीलता की लगाम ना डाली जाए तो व नियंत्रण से बाहर हो जाती है दुर्योधन की महत्वाकांक्षा भी उसके नियंत्रण से बाहर हो चुकी है और उसे नियंत्रण मिलाने के सिवा हमारे पास कुछ और सोचने के लिए समय ही नहीं है क्या आप यह कह रहे दादा श्री कि समय के अभाव के कारण आप हमें अपना शीशे नहीं बना सकते समय का अभाव केवल एक कारण है ब दूसरा कारण कुछ और है वो क्या ददा श्री जिस बल और शक्ति की तुम्हें कामना है वत्स वह तुम्हारे कुल और समाज के काम भी आ सकती है किंतु उस बल और शक्ति का स्रोत कहीं और है कहां दादा श्री वह शक्ति और बल तुम्हें हमारे सिवा केवल ब्राह्मण गुरु विजय सिद्ध सेही दे सकते मैं उनके पास जाऊंगा दादा श्री मुझे बताइए वो कहां रहते हैं यहां से दूर पूर्व देश के गुप्त क्षेत्र में विराजते हैं व उनके पास जाओ उनसे हमारा प्रणाम कहना और उन्हें बताना कि हमने तुम्हें किस आवश्यक कार्य से उनके पास भेजा है वे तुम्हें वह सब कुछ प्रदान कर सकते हैं जिसकी तुम्हें मनोकामना है मैं अवश्य उनके पास जाऊंगा दादा श्री इस मार्ग दर्शन के लिए मैं आपका आभारी हूं मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है किंतु एक बात याद रखना वत अपनी मनोकामना को किसी के लिए संकट ना बनने देना और अब रही गुरु दक्षिणा की बात तो वो ऋण समय आने पर महाभारत महाभारत महाभारत महाभारत हो महाभारत
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
ॐ जय शिव ओंकारा आरती Sawan Special Om Jai Shiv Omkara हर हर महादेव Pen Bhakti
[संगीत] [प्रशंसा] ओम जय शिवा ओंकार स्वामी जय शिवा प्रभु जय शिवा ओमकारा [संगीत] ओम जय शिवा ओंकार [संगीत] [संगीत] हंसते गरुड़ तन हर...
-
[संगीत] महाभारत प्रता श्री आपने सु शर्मा को ऐसा वचन क्यों दिया मेरे वचन पालन करने का तो प्रश्न ही नहीं उठता अनुज तुम क्या समझते हो कि स...
-
[संगीत] यहां पूजा हो रही है किंतु प्रसाद कहां [संगीत] है रुक रुक [संगीत] रुक हरि हरि तो लिखा है यहां किंतु हरि भोजन तक कहां पहुंचा रहे...
-
महाभारत इच्छा है तुम्हारी बस इसने तो एक ही रट लगा रखी है केशव इसे तो आपको गुरु बनाना है वस इस देश में गुरुजनों की क्या कमी है तुम हमें ह...
No comments:
Post a Comment