Friday, 2 January 2026

माता पार्वती को घोर तपस्या क्यों करनी पड़ी Malkhan S AkankshaPuri VighnahartaGanesh Episode 665

भ्राता मां और पिता श्री के साथ में चिदंबरम आकाश थिल्लाई मंदिर में दर्शन प्राप्त करना कितना सुखदाई था कितना अटल प्रेम है दोनों में जहां जाते हैं साथ जाते हैं और इसलिए सभी कहते हैं मां पार्वती और पिता श्री महादेव के मध्य पति-पत्नी के संबंध तक ही सीमित नहीं उनके संबंध के तो अनेकों रूप हैं मां और पिता श्री के संबंध के इन भिन्न रूपों का ज्ञान है आपको हां हां अवश्य है उनमें सर्वोच्च है मित्रता का संबंध है और और और आपसी समझ का किसी भी परिस्थिति में सदा एक दूसरे के साथ रहने का हां हां वो भी है भ्राता किंतु उनके संबंध का सबसे महत्त्वपूर्ण भाग तो आप भूल रहे हैं [संगीत] अच्छा तो यदि मैं भूल रहा हूं तो तुम मुझे स्मरण करा दो गणेश उचित है भ्राता यदि आप आग्रह कर रहे हैं तो मैं बता ही देता हूं परंतु इससे कहीं आपकी यात्रा में विलंब ना हो जाए अत अभी हमें चलना चाहिए वैसे भी अब तो मात्र एक धाम ही शेष है उसके उपरांत आपको पाशुपतास्त्र प्राप्त हो जाएगा जीवन जिसका भी हो कोई ना कोई गुरु ही उसे दिशा दिखाता है तुम्हें ज्ञात है मेरे गुरु का नाम अब तो बता दो व कौन सा संबंध है मां और पिता श्री के मध्य जिसका ज्ञान मुझे नहीं है गुरु और शिष्य का संबंध मेरे गुरु है प्रभु महादेव प्रभु महादेव वो कैसे वो आपके गुरु कैसे बने वो कथा आपके अगले पंचभूत स्थल जल स्थल अर्थात रुवान के तिरुचिरापल्ली अप्पू अथवा जल जमु केश्वर मंदिर धाम से संबंधित है महादेव की अर्धांगिनी देवी पार्वती को ज्ञान की प्राप्ति की इच्छा हुई जिसके लिए ऋषि मुनि एवं कैलाश में वास करने वाले सभी भक्त गण तत्पर रहते हैं किंतु मां जब जब पिता श्री से शिव ज्ञान प्राप्ति की इच्छा प्रकट करती तब पिता श्री प्रत्येक बार कोई ना कोई कारण बताकर उनके इस अनुरोध को देते स्वामी आप बताइए मुझे आप मेरी शिव ज्ञान प्राप्ति की इच्छा कब पूर्ण करेंगे जब उचित समय होगा अभी मुझे भक्त के पास जाना है जो दीर्घ समय से ज्ञान प्राप्त करने के लिए मेरा कठोर तप का रहा है किंतु स्वामी स्वामी प्रभु ने मां को एक संकेत दिया था किंतु वह तो प्रभु से क्रोधित थी इसलिए उनके किसी भी संकेत को पढ़ पाने में असमर्थ थी और ऐसा एक से अधिक बार होता रहा प्रभु स्वामी स्वामी जिस शिव ज्ञान को आप अपने भक्त को प्रदान करके आ रहे हैं स्वामी वो शिव ज्ञान प्राप्त करने के लिए मैं कितने समय से आतु बताइए ना स्वामी खश ज्ञान आप मुझे कब प्रदान करेंगे श्र जब उसका उचित समय [प्रशंसा] [संगीत] होगा जो ज्ञान प्रभु के भक्तों को प्राप्त हो सकता है तो उनकी अर्धांगिनी का अधिकार है फिर प्रभु मेरे साथ ऐसा क्यों कर रहे हैं समय के साथ शिव ज्ञान प्राप्त करने की देवी पार्वती की आतुरता बढ़ती जा रही थी किंतु प्रभु के अनुसार देवी पार्वती को और प्रतीक्षा करने की आवश्यकता थी फिर एक दिन शिव ज्ञान उन सभी सीख हो और ज्ञान का सार है जो आगे चलकर शिव सूत्र और विज्ञान भैरव तंत्र संहिता में पाया जाएगा [संगीत] प्रभु हम सभी गणों को शुव ज्ञान प्रदान करने के लिए कोटि कोटि धन्यवाद इस ज्ञान को पाकर हम धन्य हो [संगीत] गए प्रणाम मा य क्या स्वामी आपने अपने इन ग को जिस ज्ञान का अधिकारी समझा मैं उससे वंचित क्यों बताइए ना स्वामी मुझे शिव ज्ञान ना देने के पीछे क्या कारण है क्या आपकी दृष्टि में इसके योग्य नहीं ह देवी पार्वती य सभी गण मेरे शिष्य है आज तक जिन्ह भी यह सौभाग्य प्राप्त हुआ है वो या तो मेरे शिष्य हैं अथवा भक्त जिन्होंने उसे पाने के लिए कठोर तपस्या की है य ज्ञान में किसी को भी इतनी सहजता से प्रदान नहीं कर सकता आप जो चाहते हैं उसके लिए आपको या तो मेरा शिष्य बनना होगा या तपस्या करनी होगी उसके लिए आपको या तो मेरा शिष्य बनना होगा या तपस्या करनी होगी [संगीत] प्रभु ने सभी के सामने मुझे अयोग्य घोषित कर मेरा अपमान क्यों किया यदि उन्हें यही बताना था तो एकांत में मुझे क्यों नहीं बताया [संगीत] आप जो चाहती है उसके लिए आपको या तो मेरा शिष्य बनना होगा या तपस्या करनी [संगीत] होगी [प्रशंसा] क्या हुआ देवी पार्वती आप इतनी दुखी क्यों है अवश्य भ्राता महादेव से कोई नोक झोक हुई है नोक झोक तो तब होती है जब पति और पत्नी के बीच किंतु प्रभु ने तो मुझे सबके सामने अपमानित कर दिया किंतु प्रभु ऐसा कहे इसके लिए विवश तो आप ही ने किया था ना समझ गई देवी सरस्वती बहन तो सदा भ्राता की ही ओर से बोलेगी ना नहीं नहीं देवी पार्वती हम दोनों आपकी सखी है और सच्ची सखिया कभी सत्य कहने में संकोच नहीं करती आपको समझाना तो हमारा दायित्व है उचित है फिर यदि स्वामी मुझसे अपनी तपस्या करवाना चाहते हैं तो मैं अवश्य कर जिस प्रकार उन्हें पति रूप में पाने के लिए मैंने खोर तप किया था उसी प्रकार उन्हें गुरु रूप में पाने के लिए भी करूंगी किंतु कैलाश में नहीं यहां से कहीं दूर और मैं यह प्रण लेती कि जब तक मेरी तपस्या पूर्ण नहीं हो जाती मेरे चरण कैलाश में नहीं पड़ेंगे मेरे चरण कैलाश में नहीं पड़ेंगे मेरे चरण कैलाश में नहीं पड़ और इस प्रकार माता ने ठान लिया कि व पिता श्री प्रभु महादेव से शिव ज्ञान प्राप्त करके ही रहेंगी किंतु एक अर्धांगिनी बनकर नहीं अपितु एक शिष्य बनकर और इसलिए वह प्रभु से बहुत दूर यहां दक्षिण में आ गई और फिर कावेरी के तट पर पहुंचकर कावेरी के शीतल जल ने जब देवी पार्वती के पांव का स्पर्श किया तब उनका क्रोध शांत हुआ और उन्होंने उसी स्थान को अपना तप स्थल बना लिया और एक नवीन रूप धारण कर तपस्या करने [प्रशंसा] [संगीत] लगी नागेंद्रहाराय त्रिलोचना भस्मांग रागा महेवा निय शुद्ध दिगंबराय तस्म नाराय नमः [संगीत] शिवाय मंदा कीनी सलील चंदन चर्चय नंदीश्वर प्रम नाथ महेश्वराय मंदार पुष्प बहु पुष्प सु पूजिता तस्म कारा नमः शिवाय नागेंद्रहाराय त्रिलोचनाय भस्मांग रागा महेश्वराय नित्या शुद्ध दिगंबराय तस्मै नाकारा नमः शिवाय मंदा कीनी सलिल चंदन चर्चिता नंदीश्वर प्रम नाथ महेश्वराय पुष्प बहु पुष्प सु पूजिता तस्म मराय नम शिवाय उठिए [संगीत] [प्रशंसा] देवी प्रणाम प्रभु आप जो चाहते उसके लिए आपको या तो मेरा श्य बना हो [संगीत] कर मेरे प्रभु मेरे स्वामी बताइए मुझे क्या अब मैं शिव ज्ञान प्राप्त करने के योग्य हूं जो ज्ञान मेरा है उस पर आपका भी अधिकार है और आप सदैव उसके योग्य भी थी और है भी फिर आपके स् तप का तो एक महान उद्देश्य भी था देवी पांच भूतों में से एक मेरे जल भूत शिवलिंग की स्थापना का जो जगत की सर्वोच्च दे अर्थात आपके हाथों से ही होना संभव था इसलिए आज से यहां आपकी पूजा अखिलंदेश्वरी रूप में होगी अखिल अर्थात समस्त ब्रह्मांड और ईश्वरी अर्थात सर्वोच्च देवी और यहां मेरे शिवलिंग की पूजा जमु केश्वर रूप में होगी आपकी कृपा के लिए अनेको धन्यवाद स्वामी किंतु मैं तो सर्वोच्च ज्ञान अर्थात शिव ज्ञान प्राप्त करने के लिए लला [संगीत] शिव ज्ञान उन सभी सीख हो और ज्ञान का सार है जो आगे चलकर शिव पुराण शिव संहिता शिव सूत्र महेश्वर सूत्र और विज्ञान भैरव तंत्र सहि में पाया जाएगा चनों को आगम ग्रंथ में संगत किया जाएगा अ जनन में आगम [संगीत] उद के रूप में प्रदान करा सेतु बंधे चरा में शम घु में शम च शिवालय हे गुरुवर स्वामी मुझे अपनी शिष्य के रूप में स्वीकार करने के लिए और मुझे यह शिव ज्ञान प्रदान करने के लिए आपको कोटि कोटि नमन मैं आपका गुरु हूं प्रिय तो आप भी मेरी गुरु है आपने भी मुझे एक बहुत बड़ी सीख दी है सीख दी मैंने स्वामी कौन सी सीख आपके द्वारा कैलाश का त्याग कर वहां से इतनी दूर आने पर मैं समझ सका कि मुझे जो भी कुछ आपसे कहना था वो एकांत में कहना चाहिए था उस प्रकार सबके सामने नहीं मैं वचन देता हूं ऐसा फिर कभी नहीं होगा नहीं स्वामी दोष तो बझ से भी हुआ था मैं आपको वचन देती हूं कि पुन अन्य जनों के सामने आपको उत्तर देने के लिए मैं कभी विवश नहीं [संगीत] करूंगी अर्थात गणेश जी जिस शिवलिंग की स्थापना माता ने इतने प्रेम और भक्ति भाव से की व जल तत्वों से बना शिवलिंग यहां स्थित है हां किंतु जैसा मां ने कहा था प्रभु अप्पू लिंगम साधारण भक्तों को अपने सामान्य रूप में ही दिखाई देंगे उनके भीतर समाहित जल भूत के दर्शन कुछ श्रेष्ठ भक्त ही कर सकेंगे इस घटना के पश्चात प्रभु महादेव ना केवल मेरे गुरु बने अपे तु अपने गुरु की उपाधि उन्होंने मुझे भी दी जो वचन प्रभु महादेव ने देवी पार्वती को दिया वो विवाह का एक और वचन बना न मेप मानम सविद सखना दूतम नवा दुर्व्स [संगीत] भंजन एक दूसरे का अपमान ना करना ना ही पति पत्नी के सम्मान को भंग होने देना जिसके लिए यह अनिवार्य है कि पति और पत्नी दोनों ही कोई भी अनुचित कर्म ना करें मां मेरी इच्छा है कि मैं इस पावन काशी विश्वनाथ मंदिर में प्रवेश कर प्रभु के दर्शन कर सक अवश्य पुत्री तुम कुमार कार्तिकेय का अनुसरण करते हुए वहां अवश्य पहुंचो गी और उसके बाद तुम्हारी उनसे भेंट होगी और यह मेरा आशीष है कि तुम्हारी भेट का परिणाम अत्यंत शुभ हो [संगीत] जगत के सामने अपू लिंगम बहुत समय पश्चात प्रकट हुए किंतु उनकी स्थापना के उपरांत एक भी दिन ऐसा नहीं बीता जब उनकी पूजा आराधना ना हुई हो किंतु गणेश जी जिन शिवलिंग के स्थान से उनके अस्तित्व से सभी अपरिचित थे उनकी निरंतर पूजा होना भला कैसे संभव है क्योंकि यह शिवलिंग वन में स्थापित हुए थे इसलिए मनुष्यों द्वारा इनकी पूजा से पू यहां गज अपने झुंड में प्रतिदिन प्रभु का अभिषेक करने आते थे और इसी कारण इस स्थान का नाम पड़ा रवाने का थिरु अर्थात [संगीत] पवन आन अर्थात गज और का अर्थात वन जिसका अर्थ है वन में वह पावन स्थान जहां गज पूजा करते हैं अब तो मैं भी प्रभु अप्पू लिंगम के दर्शन के लिए तत्पर हो उठाऊं गणेश अवश्य भ्राता समस्त असुर जाति के सामने देवताओं और इस जयंत का मान धूल दसत होगा ओम गौरी शंकराय लोक सारे [संगीत] सकल पूण ब्रह्म स्वरूप हरि चरण रज हार स्वर्ग [संगीत] मार्गे ब्रहम हत्याद पापे कमम समर्थ स्त्रीय जगग देवी गंगे प्रस ओम गौरी शंकराय नम ओ गौरी शंकराय नम महारा पदम की की क्या हुआ बालक तुम्हारा उत्साह कहां खो गया या तुम्हे उस कार्तिके पर विश्वास नहीं रहा वैसे उचित भी है इतने असुरों के मध्य कहा सकेगा वो [संगीत] भला ना विश्वास ख है और ना प्रभु में आस्था किंतु निराश तो मैं फिर भी हूं इसलिए नहीं कि मेरे प्रभु सुब्रमण्यम कार्तिके स्वामी मुझे असुरक्षित रहने देंगे क्योंकि ऐसा कदा भी नहीं होगा मुझे निराशा तो इस बात की है ये असुर जन समुदाय जिसम असंख्य असुर है ये सभी इतने अज्ञानी है कि प्रभु के जय जयकार के स्थान पर सूर और सूर पद्मन के जय जयकार कर रहे हैं आज तुम्हारा अहंकार अवश्य भंग होगा तुम्हारी अज्ञानता मिटेगी और पूरे संसार को ज्ञात हो जाएगा कि उन्हें किस वास्तविक भगवान की जय जयकार करनी चाहिए और किसका नाम जपना चाहिए [संगीत] प्रणाम पिता से प्रणाम [संगीत] प्रभु ओम नमः शिवाय ओम पुत्र मैं तुम्हारे पंचम पंचभूत तक सफलता पूर्वक पहुंचने से अत्यंत प्रभावित हूं किंतु यह तो तुम्हें भली भाति ज्ञात है कि सर्वप्रथम तुम्हें जल के गुण और प्रकार का रहस्य उजागर करना होगा तभी तुम जल तत्व की ऊर्जा को अपने भीतर गतिशील कर [संगीत] सकोगे महाराज सुरा पदम की जय महारा सु पदम की जय महाराज सु पदम की जय महारा सु पदम की जय महाराज सुरा पमन की जय महाराज सुरा पदम की जय महाराज सुरा पमन की जय महाराज सुरा पमन की जय महाराज सु पन की जय सुन की मैंने उचित ही समझा था मां अवश्य किसी काली माया का ही प्रयोग कर रही ह यह काली माया तो पुत्र जयंत के लिए घातक सिद्ध हो सकती है ओ नमः [संगीत] शिवाय प्रभु जल की प्रकृति शीतल है गुण है द्रव्य और संकुचन महाराज सुरा पतन की जय महाराज सुरा पतन की जय महाराज सुरा पतन की जय महाराज सुरा पतन की जय इस से अ कीय की महाराज की महाराज की ओम सुब्रमण्यम कार्तिके स्वामी हे प्रभु शीघ्रता कीजिए सुनिए अपने भक्त को सुनिए अपने भक्त के पुकार सुनिए शीघ्रता कीजिए सुनिए अपने भक्त की पुकार रक्षा कीजिए प्रभु रक्षा कीजिए महाराजन की की पति पत्नी के संबंध की गरिमा में है कि वह अपने मन की बात सार्वजनिक रूप से ना कहते हुए एक दूसरे के समक्ष ही कहे

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