ब्राह्मण देवता आसन ग्रहण [संगीत] कीजिए मैं यह पुष्प आपको अर्पित करता [प्रशंसा] [संगीत] [संगीत] हूं [संगीत] पुत्र अतिथि ईश्वर का रूप होते हैं उनका सम्मान सहित सत्कार करना चाहिए अतिथि की प्रत्येक इच्छा को पूर्ण करने से ही उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है उचित है पिता श्री आपका स्वागत है हम तो मात्र सामान्य नारायण भक्त के रूप में यहां आए हैं किंतु यह कितनी निष्ठा से हमारी सेवा कर रहे हैं किंतु माधव यह आपके महानतम भक्त है उसका प्रमाण अभी कहां मिला इनकी परीक्षा तो अभी शेष है मेरे परिवार को आशीर्वाद देने की कृपा [संगीत] कीजिए स्वामी मुझे अनुमति दीजिए मैं इनके भोजन की व्यवस्था करती हूं अवश्य देवी मुझे भी अनुमति दीजिए मैं माता के साथ भोजन परोसने में सहायता करूंगा अवश्य [संगीत] पुत्र मेरी पत्नी के हाथों का भोजन आपको अवश्य स्वादिष्ट लगेगा हे राजन हमें तो साधारण भोजन भी स्वीकार है कंद मूल से रूखे सुखे भोजन से हम अपना पेट भर लेते हैं हमारे लिए तो उतना ही पर्याप्त है जिससे हमारा तन सुरक्षित रहे ऊर्जावान रहे और हम प्रभु की भक्ति कर सके किंतु हमारा सीन यह तो मात्र मान सिखाता है तो तो मैं मैं कुछ करता हूं आपके सिंह के लिए भोजन की व्यवस्था करता हूं मैं वन जाकर आखेट कर लाता हूं नहीं राजन यह तो केवल मनुष्य का ही मांस खाता है हम बड़ी आशा के साथ आए थे किंतु यदि आपके पास इसके भोजन का कोई प्रबंध नहीं तो कोई बात नहीं हम भूखे पेट ही लौट जाएंगे किंतु प्रश्न यह है कि क्या आप अपने अतिथि के सत्कार की मर्यादा को भंग कर हमें यूं ही जाने दे फिर आपके वचन का क्या होगा मैं आपको वचन देता हूं मैं आपको और आपके किसी भी साथी को अपने द्वार से भूखा नहीं लौटने दूंगा नहीं नहीं ब्राह्मण देवता मैं मर्यादा कदा भी भंग नहीं होने दूंगा मैंने आपको वचन दिया है कि कोई भी मेरे द्वार से भूखे पेट नहीं जाएगा तो मैं स्वयं प्रस्तुत हूं मैं बनूंगा आपके सेह का [संगीत] भजन महाराज हमने आपका आतिथ्य स्वीकार किया है आप यहां के गृह स्वामी इसीलिए हमारा सीह आपको अपने भोजन के रूप में स्वीकार नहीं करेगा वह तो उसका ही दाहिना भाग स्वीकार करेगा जो अब भी सांसारिक बंधनों से मुक्त हो भक्ति भाव से परिपूर्ण हो पवित्र हो और जो आपको प्राणों से भी प्रिय हो इस समस्त संसार में वो तुम ही तो हो जो हमें हमारे प्राणों से भी कई गुना अधिक प्रिय है तो कहिए महाराज कर सकेंगे उसका त्याग जो आपको प्राणों से भी अधिक प्रिय है प्रिय है भी अ प्रि है क्या आप अपने पुत्र को हमारे सीन के भोजन के लिए प्रस्तुत कर सकेंगे क्या आप अपने पुत्र को हमारे सीन के भोजन के लिए प्रस्तुत कर [संगीत] सकेंगे मेरा पुत्र [प्रशंसा] [संगीत] प्रभु मुझे नहीं लगता कि यह इतनी कठिन परीक्षा दे पाएंगे निश्चय ही यह अपने निर्णय से पीछे हट जाएंगे मैं प्रस्तुत हूं स्वामी मैं बनूंगी इनका [संगीत] भोजन नहीं हमारे सीम की भूक तो तभी मिटेगी जब आप अपने पुत्र का दाहिना भाग भोजन के रूप में इनके सामने प्रस्तुत करेंगे के साम स्तुत [संगीत] करें अन्यथा आपका वचन भंग हो जाएगा महाराज हे प्रभु ये कैसी परीक्षा ले रहे हैं आप आपकी कठिनाई हम समझते हैं यदि आप ऐसा नहीं कर सकते तो कोई बात नहीं आपका निर्णय हमें स्वीकार है किंतु आपकी भक्ति आपकी निष्ठा आपके शब्दों की मर्यादा क्या आप उन सभी का अपमान होने [संगीत] देंगे आपने कहा था कि आप समान भाव से हम तीनों का सत्कार और सेवा करेंगे ये जो सिंह आप दोनों के साथ आया है अवश्य हीय आप दोनों के समान दिव्य होगा इसलिए मेरा धर्म बनता है कि मैं आप तीनों का पूरे तन मन और धन से समान रूप से सत्कार करो इसलिए भोजन करेंगे तो हम तीनों एक साथ करेंगे अन्यथा हम तीनों भूखे पेट [संगीत] लौटेंगे अतिथि ईश्वर का रूप होते हैं उनका सम्मान सहित सत्कार करना चाहिए अतिथि की प्रत्येक इच्छा को पूर्ण करने से ही उनका आशी प्राप्त होता है अब आप स्वयं चुनाव कीजिए अपना धर्म अपना वचन उसका पालन करेंगे या उसको भंग [संगीत] करेंगे यह हमारे पुत्र के लिए हमारा प्रेम है और हमारे पुत्र की हर इच्छा पूर्ण करना पिता के रूप में हमारा धर्म है पिता श्री पिता श्री संकोच मत कीजिए पिता का धर्म पुत्र की इच्छा पूर्ण करने का होता है तो पुत्र भी तो उसी धर्म से बंदे है ना पिता श्री अपने पिता का वचन ना टूटने दू यह मेरा भी तो धर्म है पिता श्री मुझे धर्म का ज्ञान आपने स्वयं दिया था अतिथि की प्रत्येक इच्छा को पूर्ण करना हमारा धर्म है तो मुझे उस धर्म को करने से वंचित मत कीजिए यदि प्रभु के आशीर्वाद से मुझे सिं का भोजन बनना है तो मैं उसके लिए तैयार हूं पिता श्री नहीं नहीं मेरा पुत्र अपने प्राण नहीं त्या सकता पुत्र [संगीत] पुत्र मैं क्या कहूं पुत्र कि मुझे गर्व है कि मुझे तुम जैसा पुत्र प्राप्त हुआ या यह कि मेरा दुर्भाग्य है कि ऐसी दुविधा में होहा हम खोए बिना रा त्याग किए बिना अपना धर्म पूरा करने का मेरे पास अन्य कोई उपाय नहीं है पुत्र [संगीत] पता [संगीत] [प्रशंसा] श्री फिर फिर आपने क्या किया हां महाराज मोरध्वज हमें बताइए ना आपने क्या निर्णय [संगीत] लिया वही जो उचित था जब मुझे और मेरे परिवार को लेना चाहिए [संगीत] था ब्राह्मण देवता आप दोनों भोजन आरंभ करें धा धा धा अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय अपने पुत्र के दाहिने भाग को अपने [संगीत] अतिथि आपके सिंह के भोजन के रूप में प्रस्तुत करने के लिए मैं तैयार हूं सिह महाराज आइए मेरे साथ चलने की कृपा [संगीत] कीजिए [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] हमारा पुत्र सदैव हमारे साथ रहेगा हम अपने नेत्रों से कभी नहीं होने देंगे हे माधव परीक्षा तो संपन्न हुई अब तो इन्ह रोक लीजिए [प्रशंसा] [संगीत] तुम्हारे मुख पर मुस्कान देखने के लिए हम अपने प्राण भी नहीं छावर कर [संगीत] सकते [प्रशंसा] स्वामी [संगीत] देवी प्रभु यदि परीक्षा लेते तो उस परीक्षा में सफल होने का साधन भी ही देते हैं ये तो हमारी भक्ति की परीक्षा है आप निश्चिंत रहे प्रभु श्री सत्यनारायण कुछ भी अनुचित नहीं होने [संगीत] द मेरा [संगीत] पुत्र विश्वास नहीं होता जिस पुत्र को यह पलको पर बैठा कर रखते थे उसे ही प्रभु के लिए समर्पित कर दिया अद्भुत है इनकी [हंसी] भक्ति तेरा [संगीत] धनी धनी धर [संगीत] सा [संगीत] [संगीत] आ क्या हुआ महाराज कहीं आप इस शोक में तो नहीं ये आपने अपने पुत्र को हमें भोजन रूप में प्रस्तुत किया तब तो आपका त्याग व्यर्थ हो जाएगा पिता है वह माधव अपने पुत्र को खोकर दुख तो होगा उन्हें नहीं ब्राह्मण देवता नहीं मेरे पुत्र के नेत्रों में एक भी अश्रु नहीं था इस बात का शौक नहीं है मुझे किंतु एक दुख अवश्य है इस बात का है कि उसकी अंतिम इा अप रह [संगीत] गई व वो चाहता था कि उसके शरीर का दूसरा भाग भी आपके सि के भोजन के लिए उपयोग में [संगीत] आए ताकि वो व ना होता उससे भी प्रभु का कार्य हो [संगीत] जाता बस यही दुख है मुझे ब्राह्मण देवता यही दुख है मैं रो रहा हूं क्योंकि मेरे प्रिय पुत्र की अंतिम इच्छा अपूर्ण रह [संगीत] गई पुत्र की अंतिम इच्छा पूर्ण हो जाती यदि मेरे पुत्र को पूर्ण रूप से खा लिया जाता तो मेरा पुत्र तमर ध्वज संतुष्ट हो जाता अब मैं भी संतुष्ट होता मता मैं भी संतुष्ट हों हे दानवीर महाराज मोरध्वज आप महान है सर्वता महान मुझे क्षमा कर दीजिए ब्राह्मण देवता ये य आप क्या कर रहे हैं है इसकी योग्यता ही आपको तो कदाचित अपनी योग्यता का अनुमान भी नहीं हे महान महाराज आप तो प्रभु के महानतम भक्त कहलाए जाने योग्य [संगीत] हैं प्रभु मेरे सभी प्रश्न सभी संशय मिट गए हैं अब कोई भ्रम नहीं है मुझे मैं मानता हूं प्रभु कि महाराज मोरध्वज ही आपके महानतम भक्त है प्रभु अब आप इनकी और परीक्षा मत [संगीत] लीजिए [संगीत] परमात्मा सर्वेश्वर प्राण पति मेरे स्वामी प्राण पति [संगीत] अपने हस्त बढ़ाओ आस में हूं तेरे ओम जय नाराय [संगीत] हरे प्रणाम प्रभु आपके दर्शन पाकर मैं धन्य हो गया प्रभु धन्य हो गया [संगीत] मैं यमदेव रामयम [संगीत] दे अपने पुत्र को नहीं बुलाओगे मां पिता श्री [संगीत] [संगीत] पुत्र मेरा पुत्र जीवित है स्वामी हमारा पुत्र जीवित [संगीत] है प्रभु आपका कोटि कोटि धन्यवाद कोटि कोटि धन्यवाद हो [संगीत] पुत्र [संगीत] महाराज मोरज आपके और आपके परिवार ने त्याग की जो परीक्षा दी है उससे मैं भी भाव विभोर हो गया हूं कहिए मैं आपको क्या वरदान दूं जिस भक्त को प्रभु के साक्षात दर्शन प्राप्त हो जाए उसे भला उसके अलावा और क्या चाहिए बस एक वरदान कि उस भक्त को प्रभु के दर्शन बारबार प्राप्त हो बार बार प्राप्त हो हे प्रभु हमें अपने विराट स्वरूप के दर्शन देने की कृपा प्रदान करें अचिता अनंत गोविंद नामो चारण भ जा नंती सकला रोगा सत्यम सत्यम बदाम हम शांताकारम भुजंग शयम पदमाना भम सुरेशम विश्वा दारम गगन सदृश मेघ वर्णम शुभम लक्ष्मीकांतम कमल नयनम योगी [संगीत] विद्यानम प्रभु के विराट स्वरूप के दर्शन अब भी मेरे मन मंदिर में बसे हुए हैं और ये प्रभु श्री सत्यनारायण की पूजा का ही फल है कि पहले एक व्यापारी साधु का जन्म लेने के पश्चात मुझे राजा मोर ध्वज के रूप में जन्म लेने का अवसर प्राप्त हुआ और फिर प्रभु के आशीर्वाद से उनके साक्षात दर्शन का सुख भी प्राप्त हुआ प्रभु श्री सत्यनारायण की कथा के प्रत्येक अध्याय से हमें सीख मिलती जो हमारे जीवन के लिए बहु उपयोगी है इस अध्याय की सीख भी अनुपम है कि भक्ति में अहंकार का कोई स्थान नहीं होता भक्त का अपने प्रभु पर विश्वास और कर्तव्य पद पर अधिक रहना ही सबसे सच्ची भक्ति है चाहे मार्ग में कठिनाई आए चाहे कड़ी परीक्षा जो इन सब से ऊपर उठ जाता है उन्हें भगवान का आशीर्वाद प्राप्त होता है जैसे राजा मोरध्वज को प्राप्त हुआ है इसके साथ ही कथा का चौथा अध्याय भी समाप्त [संगीत] हुआ इति श्री रेवा खंडे श्री सत्यनारायण व्रत कथा नाम चतुर्थ अध्याय समाप्त बोलो सत्यनारायण भगवान की [प्रशंसा] [संगीत] [संगीत] जय ओम जय नारायण हरि स्वामी जय दीनानाथ हरे नर मुनि सब ध्यावे सकल कल्याण करे ओम जय नारायण हरि मेघ वर्ण तुम सुंदर पीतांबर राजे स्वामी [संगीत] पीतांबर यह कैसी दिव्य ऊर्जा है जो प्रतिपल निकट आती जा रही है और कौन है यह जिनका क्रोध अब और स्पष्ट हो रहा है अब हम प्रभु श्री सत्यनारायण कथा का पांचवा अध्याय सुनेंगे पाच अध्याय को मुझे ध्यान से सुनना चाहिए किंतु इस अवांछित स्थिति के कारण कठिनाई हो रही है प्रभु पर अटूट विश्वास रखते हुए कर्तव्य को पूर्ण करने वाले भक्तों की प्रभु सदैव सहायता करते हैं
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