Monday, 5 January 2026

श्री कृष्ण ने युद्ध को उचित क्यों नहीं समझा था Mahabharat Best Scene B R Chopra Pen Bhakti

[संगीत] महाभारत अब तो वासुदेव कृष्ण भी पधार चुके हैं इसलिए यदि मतस्य नरेश आज्ञा दे तो हम लोग कौरवों के विरुद्ध होने वाले युद्ध की योजना पर परामर्श आरंभ करें युद्ध अभी से युद्ध के प्रश्न पर विचार करना तो उचित नहीं लगता यह आप क्या कह रहे मधुसूदन अभी तो मैंने कुछ कहा ही नहीं दृष्ट दम हां कुछ कहने जा अवश्य रहा हूं मैं भी कौरवों और पांडवों का इतिहास जानता हूं जानता हूं कि गंधार नरेश शकुनी ने द्यूत में कैसा और कितना कपट किया और यह भी जानता हूं कि उस कपट के कारण धर्मराज युधिष्ठिर क्याक हारे बनवास की कथा भी जानता हूं और अज्ञातवास का इतिहास भी वे पांडव जो यदि चाहे तो पृथ्वी और स्वर्ग दोनों ही को जीत ले केवल अपने पण की मर्यादा को संभाले चुपचाप वन वन भटकते रहे और 13वां वर्ष तो उन्होंने स्वयं मत्स नरेश के राज भवन में दासो जैसा व्यतीत किया मैं यह सब कुछ जानता हूं दृष्ट दम और आप फिर भी युद्ध को उचित नहीं समझते वासुदेव युद्ध तो अंतिम चयन होता है राजकुमार अंतिम विकल्प होता और अभी महाराज युधिष्ठिर ने हस्तिनापुर नरेश से यह भी नहीं कहा कि उन्होंने पण पूरा कर दिया है और इसलिए उन्हें इंद्र प्रस मिल जाना चाहिए क्या आप यह समझते हैं कि राष्ट इनके स्वर्गीय पिता के सिंहासन पर बैठे इनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं कि कब धर्मराज युधिष्ठिर अपना राज्य मांगे और वे इन्ह लौटा दे मैं महाराज धृतराष्ट्र का अभिभाषक नहीं हूं नरेश मैं तो केवल यह प्रस्ताव कर रहा हूं कि पहले महाराज युधिष्ठिर का कोई दूत वहां जाए मैं अनुज कृष्ण से सहमत हूं युद्ध का क्या प्रश्न है जो कुछ भी हुआ है महाराज युधिष्ठिर के द्यूत व्यसन के कारण हुआ है तो हम गंधार नरे शकुनी अंगराज कर्ण और दुर्योधन को कैसे उत्तरदाई ठहरा सकते हैं इसलिए यही उचित है कि कोई ऐसा व्यक्ति दूध बनकर हस्तिनापुर जाए जो महाराज को युधिष्ठिर का दृष्टिकोण समझा सके वह भी आक्रमक स्वरों में नहीं वरन नम्रता के साथ यह रक्त संबंधियों की बात है व्यर्थ जल बहाना भी जल का अपमान है और आप लोग तो रक्त बहाने की बात कर रहे हैं इसलिए जो जाए वह शांति दूध बनकर जाए क्योंकि शांति द्वारा पाई हुई विजय ही शुभ विजय होती है और शुद्ध भी मैं तो आपको कायर भी नहीं कह सकता हलधर बलराम किंतु आप बातें उन्ही जैसी कर रहे हैं यह आलोचना नहीं है मुझे तो इस पर आश्चर्य है आश्चर्य है कि य एकत्र वीर महावीर आपकी ये बातें चुपचाप सुन कैसे रहे हैं सहन कैसे कर रहे हैं मुझे कृपया ये भी बताइए कि महाराज युधिष्ठिर अपना हाथ पसार वहां क्यों जाए वो भिक्षा नहीं मांग रहे अपना अधिकार मांग रहे हैं कृपया अधिकार को भिक्षा मत बनाइए मैं शब्दों का दुरुपयोग करना नहीं चाहता मैं दुर्योधन के साथ नम्र बनकर नम्रता का अपमान नहीं कर सकता मैं उसे शब्दों द्वारा नहीं अपने बानों द्वारा ठोकू यदि उन्होंने धर्मात्मा युधिष्ठिर के चरण स्पर्श करके क्षमा नहीं मांगी तो मैं दुर्योधन को उसके मित्रों और शुभ चिंतकों समेत यमलोक भेज दूंगा हे बलराम यह मेरा अभिमान नहीं बोल रहा है परंतु आप ही बताइए कि गांडीवधारी अर्जुन का सामना उधर से कौन कर सकता है चक्रधारी कृष्ण के चक्र का उत्तर किसके पास है सर्वश्रेष्ठ गदाधर भीम को रणभूमि में किसका पित्ता पानी नहीं हो जाएगा टम और महारानी द्रौपदी के पांच महारथी पुत्रों के सामने कन टिक सकता है अभिमन्यु के प्रताप से कौन बच सकता है उससे कौन आख मिला सकता है और आप यह चाहते हैं कि ऐसे महारथियों का दूत भिकारी बनकर हस्तिनापुर जाए मैं तो कभी य सोच भी नहीं सकता था कि महारथियों की किसी भी सभा में इस प्रकार की बातें भी हो सकती है [संगीत] और हे हलधर क्या आप ऐसा ही सोचते हैं कि दुर्योधन महाराज धत राष्ट्र को इंद्र प्रस्त लौटाने देगा क्यों नहीं लौटाने देगा महाराज के आदेश पर द्यूत में जीती हुई सारी पांडव संपत्ति क्या उसने एक बार लौटा नहीं दी थी और फिर वहां गंगापुत्र भीष्म द्रोणाचार्य और कृपाचार्य जैसे आदरणीय महापुरुष भी उपस्थित है वे न्याय करेंगे उन महापुरुषों के न्याय की गाथा तो मेरी पुत्री द्रौपदी से सुनिए हे मधुसूदन आपको यह सब बतला की आवश्यकता नहीं कि गंगापुत्र भीष्म आचार्य द्रोण कृपाचार्य और महात्मा विदुर के होते हुए भी पांडवों पर कैसे कैसे अत्याचार हुए जब मैं अपनी पुत्री द्रौपदी के अपमान के विषय में सोचता हूं तो मेरी नसों में लहू यूं खोलने लगता है जैसे मेरे अंदर का ज्वालामुखी फट ने वाला हो पांडवों ने किसी मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया उन्होंने धर्म के मार्ग का आदर किया और दुख भोगा परंतु अब अब पांडवों और हस्तिनापुर की भ्रष्ट राजनीति के बीच केवल एक रणभूमि ही रह गई है बस एक रणभूमि ना कोई मर्यादा है ना कोई पन तो हे चक्रधारी बतलाइए कि आक्रमण में विलंब का कारण क्या है विलंब का कारण केवल एक है महाराज द्रुपद अपने निहित स्वार्थ के लिए आक्रमण करना मानवता के मूल्यों के विपरीत है क्या अपनी बहन के अपमान का प्रतिशोध मानव मूल्यों के विरुद्ध है देवकी नंदन क्या कपटी चरियां के कपट को दंड देना निहित स्वार्थ है क्या एक सती को क्या एक सती को वेश्या कहने वाले को इस का दंड देना हर कुलीन व्यक्ति का कर्तव्य नहीं है है अवश्य है किंतु वह सैनिक जो उधर से युद्ध करेंगे उन्होंने तो द्रौपदी का अपमान नहीं ना किया राजकुमार दृष्टि यहां किसी साधारण युद्ध की चर्चा नहीं हो रही है इस युद्ध में तो इतने शव गिरेंगे कि उन्हें गिनना असंभव हो जाएगा गिद्धों को महाभोज के लिए आमंत्रित करने से पहले हमें यह भी सोचना आवश्यक है यह अनगिनत शव अपने कंधों पर उठाने के लिए आप तैयार हैं महाराज द्रुपद मैं तो तैयार नहीं हूं इसलिए पहले संधि की भाषा बोलनी चाहिए पांडवों को पहले उनसे अपने अधिकारों की मांग करनी चाहिए युद्ध की भाषा तो उन्हें बोलने दीजिए क्या संधि प्रस्ताव को वह हमारी दुर्बलता नहीं समझेंगे मधुसूदन वहां सभी लोग दुर्योधन की भांति नासमझ नहीं है विराट नरेश क्षत्रिय समाज भी दुर्योधन पर अपने वचन का पालन करने के लिए दबाव डाल सकता है और ऐसे लोगों को एक अवसर तो देना ही चाहिए एक अवसर हे महाराज द्रुपद आप यहां आयु में सबसे बड़े हैं इसलिए आप ही बताइए कि हमें वहां क्या संदेश भेजना चाहिए शांति सदैव युद्ध से अच्छी होती है फिर मेरी प्रतिज्ञा क्या क्या होगा मधुसूदन पंचाली के खुले हुए केशों का क्या होगा अब हम संधी करके इंद्र पस लौट जाए और द्रौपदी से यह कहे कि जीवन भर अपने केश खुले रखो क्या तुम्हारी प्रतिज्ञा मानव कल्याण से अधिक मूल्यवान है कुंती पुत्र भीम यदि आपकी प्रतिज्ञा के दामों शांति मिले तो समझिए शांति बहुत सस्ती [संगीत] मिली भारत महाभारत महाभारत महाभारत हो महाभारत

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