Friday, 2 January 2026

माता लक्ष्मी ने सुनाई देवी सुमति की कहानी Deblina Vighnaharta Ganesh Episode 765 Pen Bhakti

सर्वथा अद्भुत है माता अरुंधती और सर्वथा अद्भुत है उनके पावन व्यक्तित्व का प्रभाव हां पुत्र जिस महानता का अनुभव और अनुपम दिव्यता का आभास तुम्हें देवी अरुंधति के साथ हुआ वैसा ही देवी सुमति के दर्शन पाकर होगा क्योंकि उनका पति प्रेम अनुपम है और उनकी धर्म निष्ठा और दृढ़ संकल्प भी अतुलनीय है माता सुमति अपने पति के प्राणों की रक्षा के लिए वो किया जो और किसी ने नहीं किया अपने पति व्रत धर्म की शक्ति से उन्होंने स्वयं समय चक्र को थाम लिया सूर्यदेव को उदित होने से ही रोक दिया समय चक्र को रोक दिया किंतु क्या कारण था जो उन्हें ऐसा करना पड़ा उन्होंने अनेकों कष्टों का सामना करते हुए प्रेम त्याग और समर्पण का ऐसा उदाहरण स्थापित किया जो अनूठा ही नहीं अपितु अविश्वसनीय है जब देवी अनुसिया के आश्रम में पहुंचे श्री राम और देवी सीता देवी सुमती की कथा सुनी तब वह भी अत्यंत भावुक हो उठे थे मां ऐसी कौन सी पीड़ा थी उन्हें जिन पति के प्रति उन्होंने अपना जीवन समर्पित किया था वही उनके कष्ट का कारण भी थे देवी सुमती का विवाह उग्र शव से हुआ था जो बहुत रूपवान थे और बहुत समृद्ध भी किंतु उग्र शव बाहर से जितने दिव्य थे अंतर से उतने ही मलिन थे बस बंद करो यह सब मैं नृत्य का आनंद लेने जा रहा था व्यर्थ विलंब करवा दिया स्वामी रुकिए अब क्या हुआ यह दीप आपको आहत कर सकता था जाइए अब मैं नहीं रोकूंगी आपको उग्र शव जितने समृद्ध थे उतने ही विकारों से ग्रस्त भी थे इसी प्रकार अपनी पत्नी के अहल ना कर रात्रि होते ही तैयार होकर नृत्यांगना के पास जाते थे और भोर में ही मदिरा के प्रभाव में मदहोश होकर घर लौटते थे स्वामी स्वामी स्वामी संभालिए स्वामी विश्राम [संगीत] कीजिए स्वामी जल लीजिए [संगीत] ल नहीं लेता [संगीत] [संगीत] मैं उनके पति उग्र शव ना उनका सम्मान कर रहे थे ना उन्हें अपनी पत्नी की कोई चिंता थी फिर भी वह अपने पति की ऐसी सेवा क्यों कर रही थी क्योंकि मां ऐसा मनुष्य तो पाप का भागी होता है सेवा का नहीं पुत्र पाप का भागी तो उन्हें बनना ही था और वह समय भी आ गया जब वह अपने पापों के कारण अपना धन पद समृद्धि ही नहीं अपनी सुंदर काया अपना मनोहर रूप भी खो बैठे उन्हें भयंकर रोग लग गया किंतु दुख की बात तो यह थी कि अपने पति के पापों का फल देवी सुमति को भी भोगना पड़ रहा था स्वामी स्वामी आराम से स्वामी आ शदी [संगीत] लीजिए स्वामी धैर्य रखिए [संगीत] क्यों कश दे रही हो मुझे चली जाओ यहां से नहीं स्वामी मुझे अपनी सेवा से वंचित मत [संगीत] कीजिए बस बंद करो अपना य स्वा स्वामी बीमारी ने आपको तन से ही नहीं मन से भी दुर्बल कर दिया है मैं आपके लिए भोजन लाती हूं [संगीत] मां जिनके मन में उनके प्रति तनिक भी कृतज्ञता नहीं थी उनकी सेवा क्यों कर रही थी माता यह समझ पाना सरल नहीं है पुत्र उग्र श्र वस उन्हें जितना दूध काटते थे वो उतनी ही सेवा करती थी और इसका तो एक ही अर्थ हो सकता कि घृणा बुराई से मत करो इसलिए वह अपने पति को बुराई के मार्ग से अच्छाई के मार्ग पर लाने के लिए सभी कष्टों को सह रही थी अपने शब्दों से अपने व्यवहार से मैं बारबार तुम्हें आहत करता हूं मैं तुम्हारे योग्य तो क्या अपने योग्य भी नहीं हर प्रकार से मैं तुम्हें चोट पहुंचाता हूं मरी तनिक भी देखभाल नहीं कर सकता फिर भी तुम इतनी निष्ठा से मेरा ध्यान क्यों रखती हो स्वामी आपके प्रश्न के उत्तर के भीतर मेरे प्रश्न का उत्तर छिपा है यदि हमारे अपने भवन का कोई भाग क्षतिग्रस्त हो जाए तो हम क्या करेंगे बताइए उसका पुनर्निर्माण कदाचित आपको आपके प्रश्न का उत्तर मिल गया होगा ना स्वामी अच्छा तो मैं तुम्हारे लिए जीर शीर्ण भवन के समान हूं जिसका किसी को कोई लाभ नहीं नहीं नहीं स्वामी मेरे यह कहने का आशय नहीं था कर्तव्य तो मेरा कर्म है मेरा धर्म है ना कोई शर्त ना कोई मांग है मैं तो आपकी अर्धांगिनी हूं और अर्धांगिनी का अर्थ आधा अंग होती है आपकी सेवा ना करना ही मेरा पाप है स्वामी मैं भोजन लेकर आती [प्रशंसा] [संगीत] हूं अच्छा तो धन कर्म और पाप यही है तुम्हारी सेवा के कारण ना स्नेह है ना निष्ठा है महान बनने का बहुत ही उचित उपाय किया है तुमने किंतु मैं तुम्हारी दया का पात्र नहीं बनूंगा मुझे तुमसे कुछ नहीं चाहिए जाओ मुझे अकेला छोड़ दो और चली जाओ यहां से स्वामी यह आप क्या कह रहे हैं स्वामी यह मेरा प्यार है आपके लिए और मैं इसी प्रकार प्रेम पूर्वक अपना कर्म करती रहूंगी किसे पता कब मुझे अपने अच्छे कर्मों की आवश्यकता पड़ जाए मैं ऐसे ही तुम्हारे साथ दुर्व्यवहार करूंगा तब भी हां स्वामी मुझे अपने धर्म कर्तव्य और अपने पति धर्म परायणता पर पूर्ण विश्वास है जिस प्रकार आज आपने मेरे प्रति अपने सभी दुर्व्यवहार को स्वीकार किया उसी प्रकार एक दिन आप मेरे प्रति सभी त्रुटियों को स्वीकार करेंगे मूर्ख तुम क्या कल्पना कर रही हो मैं बदल जाऊंगा कदापि नहीं तो मैं भी नहीं बदलने वाली स्वामी मैं भी अपने धर्म पर अडिग रहूंगी अपने पति के प्रसन्नता के लिए मैं सब कुछ करूंगी मधीरा पान से प्रसन्न होता हूं मैं तुम्हारे साथ नहीं नृत्य अंग नाओं के साथ अपना समय बिताने से प्रसन्नता पाता हूं मैं कहो यह सब कर सकोगी तुम ले जाओगी मुझे ंगना के पास उनके नृत्य से मुझे प्रसन्नता दिलवाने स्वामी मार साथ नहीं तंग नाओ के साथ अपना समय बिताने से प्रसन्नता पाता हूं मैं ले जाओगी मुझे अंगना के पास अब बोल नहीं फूट रहे तुम्हारे मुख से मेरी प्रसन्नता किसम है ज्ञात हो गया ना तुम्हे तो करोगी ना मेरी प्रसन्नता का उपाय मुझे ज्ञात था तुम ऐसा कदा भी नहीं कर सकती तो त्याग की देवी बनने का स्वांग करना छोड़ दो [संगीत] सर्वप्रथम आप भोजन कीजिए स्वामी तत्पश्चात आप जिस नृत्यांगना के पास जाना चाहेंगे मैं स्वयं आपको ले जाऊंगी पुत्र मैंने कहा था ना देवी सुमती के मनोभाव को समझना सरल नहीं इतना कुछ होने पर भी देवी सुमति को अपने कर्मों अपने कर्तव्य और अपने पति के प्रति अपने निस्वार्थ प्रेम पर अटूट विश्वास था जिसके लिए वह कुछ भी करने के लिए तैयार [संगीत] थी [संगीत] विश्वास नहीं होता क्या यह सत्य है तुम ही हो जो मुझे तैयार कर रही हो कदाचित यह क्रीड़ा है तुम्हारी मेरे साथ स्वामी मैं अभी आई [संगीत] स्वामी [संगीत] अरे कितनी असुविधा हो रही है [संगीत] [संगीत] मुझे [संगीत] स्वप्न नहीं सत्य है ये तो तु वास्तव में मुझे उन अप्सराओं समान नृत्यांगना के पास ले जा रही हो वही नृत्यशाला जहां मैं जाया करता था हां स्वामी मैं भी तो देखू आपको अधिक प्रसन्नता कहा प्राप्त होती है मेरी सेवा में या उसके नृत्य में कितनी धीमी गति है तुम्हारी गति बढ़ाओ अन्यथा आज रात्र नहीं कल भ में बेंगे हम और हां तुम्हारी दाहिनी और एक छोटा सा मार्ग है वहां से [संगीत] [संगीत] चलो [संगीत] मैंने कहा अपनी बढ़ाओ अरे वहां नृत्य आरंभ होता ही [संगीत] [संगीत] [संगीत] होगा मैंने तुमसे कहा था ना मुझे नृत्य आरंभ होने से पहले नृत्यशाला पहुंचना है तुमने इतना विलंब कर दिया नृत्य आरंभ भी हो गया है खड़ी खड़ी क्या देख रही हो अरे भीतर जाने में मेरी सहायता [संगीत] करो यह कैसा कुटिल स्वभाव है उग्र सवर का उसकी पत्नी सुनती कितना बड़ा त्याग कर रही है उसके लिए और उसे आभास तक नहीं और ना ही उसके त्याग का कोई [संगीत] सम्मान कोई इतना निष्ठुर इतना कठोर कैसे हो सकता है विलंब तो हुआ किंतु आनंद आएगा [संगीत] अब [संगीत] अद्भुत अद्भुत सुंदरी अद्भुत सुंदरी सुंद अति [संगीत] सुंदर [संगीत] आ [संगीत] [संगीत] [संगीत] आ इस रात्रि का अंधकार कभी तो छटेगा अद्भुत सुंदरी अदभुत निकलो यहां से निकलो निकलो बाहर य से स्वामी स्वामी स्वामी आज तो इसे यहां ले आई हो किंतु ध्यान रहे आज के बाद ऐसा ना हो ले जाओ अपने रोगी पति को यहां से स्वामी यह तुम्हारा नहीं मेरा कहा सुनेगी मैं आऊंगा फिर आऊंगा और यही लेके आएगी मुझे क्योंकि यह मेरे लिए कुछ भी कर सकती है तो इसी के साथ प्रसन्न क्यों नहीं रहते यहां क्यों आते हो हमारे पास [संगीत] हस स्वामी उठिए चलिए [संगीत] हासी स्वामी स्वामी बैठे स्वामी कैसी मनोहर काया है कितनी उत्तम भाव भंगिमा है और इतने माधक नयन नसरा स तंग नाओ के आनंद आ गया तृप्त हो गया मैं हा हाहा [संगीत] हाहा मां कितना कष्ट था उन्हें कितना [संगीत] अपमान अभी लौटने का समय नहीं हुआ है नित्य अभी कहां समाप्त हुआ मुझे लौटना है मुझे वापस नृत्यशाला ले चलो वही लौटना है मुझे चलो मैंने कहा ना मुझे नृत्यशाला लौटना है चलो पीछे मुड़ो पीछे मुड़ो स्वामी सूर्योदय होने वाला है नृत्य कब का समाप्त हो चुका है आप चिंता मत कीजिए मैं कल संध्या में फिर आपको वहां ले चलूंगी कल नहीं आज मुझे अभी वहां ले चलो मुझे वहीं लौटना [संगीत] है अरे मेरी हत्या करना चाहती हो क्या तो मुझे विश दे दो ना इस प्रकार असावधानी से मत चलो अरे अभी चींटिया मुझे अपना आहार बना लेती कौन है दुष्ट कौन है ू कौन है न है जिसने मेरा ऋषि मांध का तप भंग करने का दुस्साहस किया है देखा क्या करवा दिया तुमने कहा था कहा था कि मुड़ चलो ले जाओ नृत्यशाला वो करती तो इनसे मेरा पांव नहीं टकराता अकार मेरा तप भम करने वाले तुम्हें जीवित रहने का कोई अधिकार नहीं अत मैं तुम्हें शाप देता हूं सूर की प्रथम क्र जब धरती को स्पर्श करेगी तो तुम्हारे प्राण यमलोक प्रस्थान करेंगे तुम्हारे प्राण यमलोक प्र स्थान करेंगे ऋषिवर ने क्रोध में ये कैसा शाप दे दिया अब स्वामी के प्राणों की रक्षा कैसे करूं मैं ही चाहती थी तुम इसीलिए मुझे यहां लेकर आई ताकि मुझसे छुटकारा पा सको उग्र श्रस को उनके पापों का फल मिल रहा था और व उसका दोष भी माता सुम पर म रहे थे हां पुत्र कृतज्ञता का तो लेश मात्र भी नहीं था उग्र श्र वस में किंतु उसके विपरीत के बाद देवी सुमति निष्ठा की पराकाष्ठा थी और अब वह अपने पति के लिए जो करने जा रही थी वह उनके अब तक के सभी त्याग में से कहीं अधिक था मेरा अंत देखने की इतनी लालसा थी तुम्हें तो मुझे उसी शया पर पड़े रहने देती ना वहीं प पड़े पड़े मेरा अंत हो जाता कम से कम जितना जीवन शेष है उतना तो जी लेता अब तो किसी भी पल सूर्योदय हो जाएगा और मेरे प्राण पखेरू उड़ जाएंगे फिर तुम्हें छुटकारा मिल ही जाएगा क्षमा ऋषिवर शमा मेरे पति से भूल हुई उन्हें क्षमा करने की कृपा कीजिए अपना श्राप लौटा लीजिए मेरे अंत की व्यवस्था करने के बाद अब य स्वांग रचने की कोई आवश्यकता नहीं है यह अपने स्वामी के प्राणों की भिक्षा मांग रही है और वह इसके लिए मात्र घृणा से भरे वचन बोल रहा है भूल तो मुझसे हुई रे शिवर मैं ही इन्ह उठाकर ला रही थी इसलिए जो भी दंड देना चाहिए मुझे दीजिए परंतु मेरे सुहाग को मत उजड़ने दीजिए असंभव मेरा दिया हुआ श्राप वापस नहीं आ सकता यह भूल अगर तुमसे हुई है तो यह दंड सर्वता उचित है एक विवाहिता के लिए इससे बड़ा दंड और क्या हो सकता है यह शाप नहीं वरदान है इनके लिए ऋषिवर आप कोई भी और द दे देंगे मैं सह लूंगी किंतु इस श्राप को लौटा लीजिए योद्धा के धनु से निकला हुआ बाण मुख से निकला हुआ शाप कभी वापस नहीं आ सकते वैसे भी ऐसे पति का क्या लाभ जिसे अपनी पत्नी के प्रति ना तो कोई सम्मान है ना स्नेह ऐसे पुरुष तो समाज के लिए किसी बोझ से कम नहीं ऋषिवर बस अब कुछ मत कहिए मैं अपने पति के बारे में एक भी अपमानजनक शब्द नहीं सुन सकती तो फिर उचित है मेरा श्राप अकाट्य है जैसे ही सूर्योदय होगा तुम्हारे पति का अंत हो जाएगा तुम्हारे पति का अंत हो जाएगा मेरी बर्सों की कठोर तपस्या से अर्जित तपोबल के कारण मैं तो क्या स्वयं तरदेव भी उपस्थित हो जाए तो भी मेरे श्राप को नहीं काट सकते ऋषिवन आपने अपने तपोबल से तो मेरे पति को श्राप दिया है परंतु मुझे नहीं किंतु आपके श्राप का प्रभाव तो मुझ पर भी पड़ेगा वो कैसे वामांगी यानी बाया अक अर्थांग या आधा अंग हो अपने पति की अब यह तो संभव नहीं कि आपके श्राप का प्रभाव आधे अंग पर हो और आधे पर नहीं पति पर आया ना हो मेरे पति मेरे लिए देवता समान है इसलिए उनके कष्ट उनके सुख दुख और उनके पाप कर्म सभी की आधी भागीदार हूं मैं एक पत्नी का सच्चा धर्म और कर्तव्य किसी तप से कम नहीं और मेरे पतिव्रत धर्म का त ना कभी खंडित हुआ है और ना ही कभी दुर्बल होगा मैं सुमति अपने पति के प्रति कर्तव्य परायणता के तपोबल को आधार बनाकर सूर्यदेव से यह प्रार्थना करती हूं मेरे पति के प्राणों की रक्षा के लिए आज उदित ही ना [संगीत] हू हे सूर्यदेव मेरी पुकार सुनी इस पति धर्म परायण स्त्री के पति धर्म की सौगंध है आपको [प्रशंसा] अपने पति के प्रति कर्तव्य परायणता के तपोबल को आधार बनाकर सूर्यदेव से यह प्रार्थना करती हूं मेरे पति के प्राणों की रक्षा के लिए आज उदित ही ना हो अपने पति के साथ रहकर उनके प्रति अपना धर्म निभाकर मैं भविष्य के लिए अच्छे कर्म तो एकत्रित कर सकूंगी क्या पता कब मुझे उनकी आवश्यकता पड़ जाए विश्वास नहीं होता मेरा श्राप अधूरा कैसे रह सकता है मुझे दृष्टि रखनी [संगीत] होगी और इसी स्थिति में बहुत समय व्यतीत हो गया सूर्यदेव के ना निकलने से सृष्टि चक्र थम गया तपोबल के शक्ति के आगे सब विवश हो जाते हैं अब एक विचित्र स्थिति उत्पन्न हो गई एक और ऋषिवर के शब्द थे और दूसरी ओर देवी सुमति की सौगं सूर्योदय के समय सूर्यदेव आकाश में प्रकट नहीं हुए सृष्टि का समस्त क्रियाकलाप थम गया और मात्र सूर्यदेव ही नहीं संपूर्ण सृष्टि थम गई [संगीत] सृष्टि में ऐसी विकट स्थिति देखकर देवताओं की चिंता बढ़ गई व सृष्टि को इस प्रकार शिथिल पड़ते हुए ऐसी अंधकारमय शीतलता को देख अत्यंत विचलित हुए तब देवराज इंद्र ने यह निर्णय लिया कि वह स्वयं देवी सुमति के पास जाकर उनसे अपने वचन लौटाने की विनती करेंगे हे देवी सुमति मैं देवराज कर बध होकर आपके द्वार पर खड़ा हू कृपया बाहर आइए और मुझे मुझे दर्शन देने की कृपा की यह कैसे संभव है एक नारी के शब्दों में इतनी शक्ति सूर्यदेव को रोक दिया उसने आप विश्राम कीजिए स्वामी मैं हूं ना स्वामी आपको कुछ नहीं होगा आप निश्चिंत रहिए सुमती अब क्या होगा मैं जीवित रहना चाहता हूं मैं जीवन की कामना रखता हूं तब तो मृत्यु भी आपको स्पर्श नहीं कर सकेगी स्वामी हे देवी मैं देवराज स्वयं आपके द्वार पर आया हूं कृपया बाहर आईए और मेरी विनती सुनिए आप तनिक भी चिंता मत कीजिए स्वामी मैं आपको इस अवस्था में छोड़कर कहीं नहीं [संगीत] जाऊंगी [संगीत] तेरी इस सृष्टि पर महा संकट छाया है यदि आप बाहर नहीं आई तो घोर अनर्थ हो जाएगा कृपा कर बाहर आइए बाहर आ जाइए देवी सुभूति दर्शन दीजिए मुझे स्वामी निश्चिंत रहिए आप जब निरंतर निवेदन करने पर भी माता ने उनकी एक ना सुनी तब निराश हताश होकर देवराज त्रिदेव के पास गया और उनसे इस समस्या का समाधान करने की विनती की फिर फिर क्या हुआ मां वो त्रिदेव जो सभी में सर्वोच्च है जो अनंत है अनादि है जिनके दर्शन करने के लिए ऋषि मुनि वर्षों का कठोर तप करते हैं उन्हें भी माता के पति धर्म परायणता की तपोबल के आगे समर्पण करना पड़ा और वह याच कों के समान देवी सुमति के द्वार पर गुहार लगाने लगे हे देवी हम त्रिदेव आपके द्वार पर आए हैं इसीलिए आपसे निवेदन है हमें दर्शन दीजिए जो व्यक्ति दूसरों द्वारा किए गए अनुचित व्यवहार की उपेक्षा कर सदैव सत्कर्म करते हुए पुण्यं का संचय करते हैं वे निश्चय ही उत्तम फल के भागी बनते हैं

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