Friday, 2 January 2026

माता पार्वती ने महादेव की तपस्या क्यों की थी Akanksha Vighnaharta Ganesh Episode 656 PenBhakti

अरुणाचलेश्वर की कथा मां और पिता श्री के बीच की एक क्रीड़ा से जुड़ी है यह सहज क्रीड़ा सृष्टि में इतना भयंकर संकट उत्पन्न कर देगी यह उन्होंने सोचा नहीं था मां की उस क्रीड़ा के कारण जो अंधकार उत्पन्न हुआ उसके लिए मां ने स्वयं को दोषी मान लिया और गलानी से भर गई प्रिय मुझे ज्ञात है आपका य आशय कदापि ना था किंतु आपके द्वारा क्षणिक रूप से मेरे नेत्र बंद करने के कारण समस्त सृष्टि प्रकाश हीन हुई है इस ना के कारण समस्त ब्रह्मांड और पृथ्वी भी वर्षों तक अंधकार में डूबी रही मां अत्यंत दुखी और गलानी में थी और वह प्रकाश को लौटाना चाहती थी इसीलिए उन्होंने यहां अरुणाचल गिरी पर आकर प्रभु महादेव की तपस्या आरंभ की ओम नमः शिवाय ओम नमः शिवाय ओम नमः शिवाय ओ नमः शिवाय वर्षों के कठोर तप के पश्चात मां की तपस्या पूर्ण हुई और प्रभु महादेव ने अपने अग्नि मूर्ति रूप में प्रकट होकर उन्हें अपने दर्शन प्रदान किए प्रणाम प्रभु क्या वरदान चाहती हैं आप प्रभु मेरी जिस सहज भूल के कारण समस्त संसार अंधकार में मेरी वो ूल सुधारने में मेरी सहायता कीजिए प्रभु और सृष्टि को पुनः प्रकाशित करने की कृपा कीजिए प्रभु ऐसा अवश्य होगा धन्यवाद प्रभु मैं आपके द्वारा आपकी भूल को स्वीकार करने से और आपके तप से अत्यंत प्रभावित हूं मैं दिव्य प्रकाश का स्रोत अवश्य हूं किंतु उसी सृष्टि में लौटाने का दायित्व तो आप ही ने निभाया है हमारी भागीदारी से ही सृष्टि का हित संभव है इसलिए मैं घोषणा करता हूं कि यहां आपके मंदिर की स्थापना होगी और यहां स्थापित आपके रूप को अन्ना मलाई अम्मा के नाम से जाना जाएगा अर्थात वो माता जिन्होंने सृष्टि को पुन प्रकाशित किया अर्थात जहां प्रभु वहां माता तो दोनों एक दूसरे के श्रेष्ठतम सहभागी हुए ना कुटुंब संपादन सर्व कार्य करत प्रतिज्ञा यदि काम कुरिया अर्थात परिवार की समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति का पूर्ण दायित्व पति और पत्नी दोनों का होगा जैसे माता अन्ना मलाई ने महादेव की तपस्या की और प्रभु महादेव ने भी अग्नि लिंग से प्रकाश लाकर सृष्टि को उज्जवल किया उसी प्रकार पति-पत्नी जब साथ होते हैं तो सभी कार्य सरल हो जाते हैं इसी प्रकार दोनों ही परिवार के पालन रक्षा और समृद्धि को बांट लेते हैं तो परिवार फलता फूलता है और यदि किसी से कोई भूल हो भी जाए तो दोनों मिलकर ही उसे सुधार भी लेते हैं अभी के लिए भ्राता को विवाह का महत्व समझाने के लिए इतना संदेश ही पर्याप्त है और भ्राता मां की तपस्या के परिणाम स्वरूप पिता श्री के अग्नि लिंगम के प्रकट होने और प्रकाश के विस्तार होने के कारण यहां प्रत्येक वर्ष कार्तिक मास में उत्सव मनाया जाता है जिसे कार्थी गई ब्रह्मोत्सवम के शीर्ष पर एक विशाल दीपक प्रज्वलित होता है जिससे उत्पन्न प्रकाश उन साधारण जीवों को प्रभु के अग्नि लिंगम के दर्शन कराता है जो पृथ्वी से दिव्य अग्नि लिंगम के अनंत विस्तार को देखने में असमर्थ होते हैं अवश्य गणेश यह कैसा प्रिय प्रकाश है य माता प्रकाश बात का सूचक है कि प्रभु कार्तिके मेरे भ्राता की रक्षा कर रहे हैं और वहां हो रहे असुरों के अत्याचार को सहने की शक्ति दे रहे होंगे प्रभु स्वामी की जय पुत्र जयंत बड़ी प्रसन्नता की बात है कि तुम कारा ग्रह से मुक्त हो गए किंतु तुम जा कहा रहे हो और क्या अग्निदेव सर पमन को समझाने नहीं पुत्र उस दुष्ट को फिर से कोई अवसर मत दो कोई अहित कर सके मेरे रक्षक स्वयं प्रभु कार्तिक हैं तो मुझे किस बात का भय मेरे प्रभु सदा मेरे साथ है इसलिए मेरी चिंता मत कीजिए किंतु जो सत्य मैंने समझाए उसे सूर पद्मन को समझाने का प्रयास करना मेरा धर्म है ओम सुब्रमण्यम कार्तिके स्वामी ओम सुब्रमण्यम कार्तिके स्वामी अनुज गणेश एक बार पुन तुम्हारे मुख से प्रभु कथा सुनकर मन अत्यंत आनंदित हुआ किंतु अब हमें शीघ्र अतिशीघ्र अग्नि लिंगम पूजा संपन्न करनी चाहिए रुकिए भ्राता पहले यहां की उचित पूजा विधि तो जान लीजिए क्योंकि पादुका धारण किए बिना अपने ध्यान को भंग होने दिए बिना और किसी भी अवस्था में अस्त्र उठाए बिना अरुणाचल गिरि की प्रदक्षिणा से ही यहां की पूजा पूर्ण होती है उचित है गणेश मैं प्रदक्षिणा के लिए तैयार हूं चलो आओ अब तैयार तो मैं भी हूं तुम्हें रोकने के लिए बालक कार्तिके मुझे चुनौती दे कोई यह कदापि स्वीकार नहीं तुम यहां मेरे कारागार से कैसे मुक्त हुए तुम और बिना मेरे अनुमति के यहां पर प्रवेश कैसे किया इतना साहस कहां से आया तुम में यही तो समझाने आया हूं तुम्हे सुरा पद्मन जि सुरा पद्मन के बल का डंका धरती से लेकर स्वर्ग तक गूंजता हो उसे तुम ज्ञान देने आए हो बालक तुम आश्चर्य है बलशाली सम्राट इसमें ना कोई आश्चर्य होना चाहिए और ना ही कोई संकोच होना चाहिए ज्ञान प्राप्ति में छोटा या बड़ा नहीं देखना चाहिए बस उसे सहस स्वीकार करना चाहिए यह बालक जेष्ठ के साथ इतनी बात कहने का दु साहस कर रहा है तु बालक अब तु तुम मुझे भलाई और बुराई का ज्ञान दोगे क्यों नहीं दे सकता किसी को साहस करना ही पड़ेगा यदि मैंने तुम्हें सत्य से परिचित नहीं कराया तो तुम स्वयं ही सर्वनाश के पद पर चलकर अपना विनाश सुनिश्चित कर अपना अंत कर लो बस यही सत्य समझाने आया हूं भ्राता श्री आप इस बालक को मुझे सौंप दीजिए ऐसा समझाऊ इसे कि जन्म जन्मांतर तक आपका सम्मान करना सीख जाएगा अच्छा तो आज वो मेरे सम्मान की बात कर रही है जो मेरे शत्रु के सामने अपने सम्मान की रक्षा नहीं कर पाएगी मेरी उस भूल के लिए मुझे क्षमा कर दीजिए जेष्ठ और अब मुझे उस भूल को सुधारने का आपकी सेवा करने का एक अवसर प्रदान कीजिए सेवा करना चाहती हो मेरी तुम मेरे सामने आने की भूल मत करो मत भूलो कि मात्र एक नारी हो तुम मेरे दया की पात्र तुम ना तब मेरे लिए कुछ कर सकती थी ना अब कर सकती हो जाओ दूर हो जाओ मेरी दृष्टि से और वैसे भी मैं इसके बड़े बोल सुनके मनोरंजन करना चाहता हूं सुनना चाहता हूं कि यह बालक जिसे मैं क्षण भर में मसल सकता हूं मुझे क्या समझाना चाहता है मेरे कारण आपके अपमान का कलंक मैं मिटा कर ही रहूंगी जेष्ठ यह धूम्र का वातावरण क्यों है भ्राता नहीं नहीं अनुज गणेश निश्चिंत रहो अब तुम्हें मुझे कुछ भी समझाने की आवश्यकता नहीं है सब स्मरण है मुझे पादुका हों के बिना ही यह प्रदक्षिणा पूरी करनी है किसी भी कारण से ध्यान में भटकाव नहीं आना चाहिए परिस्थिति चाहे कैसी भी क्यों ना हो प्रदक्षिणा पूरी होने से पूर्व अस्त्र नहीं उठाने जब संपूर्ण एकाग्रता पूर्ण निष्ठा और भक्ति के साथ य प्रदक्षिणा पूरी की जाएगी तभी इसका उचित फल प्राप्त होगा क्यों उचित है तो आओ प्रभु ओ अरुणाचल रा नम ओम अरुणाचलेश्वरा नमः ओम अरुणाचलेश्वरा नम ओम अरुणाचलेश्वरा नम ओ अरुणाचलेश्वरा नम हाथों में अस्त्र नहीं तो युद्ध नहीं प्रहार नहीं यही उचित अवसर है इन पर आक्रमण करने का तो यह कार्य मुझे करने दीजिए मां मैं करूंगी इन पर आक्रमण मां मुझे आज्ञा दीजिए महेंद्र पुरी के प्रति मेरे भी तो कुछ दायित्व है मुझे भी प्रमाणित करना है कि एक असुरी नारी किसी असुर से कम नहीं है तुम्हें ज्ञात भी है कि मैं किस पर आक्रमण करने की योजना बना रही हूं हां वो बालक कार्तिके वही कार्तिके जिसके एक साधारण योद्धा ने तुम्हारा हाथ विलक कर दिया था अब तुम स्वयं उससे युद्ध करोगी हां मां पिछले बार मुझे उसकी शक्ति का अनुमान नहीं था मैं तैयार नहीं थी किंतु मेरा विश्वास कीजिए इस बार मैं पूरी तैयारी के साथ जाऊंगी और पराजित होकर कदापि नहीं लौटू उचित तैयारी अर्थात अर्थात मां इस बार मैं उसके दुर्बलता को ज्ञात करूंगी फिर उस पर वार करूंगी उसके भेद कौन बता सकता है वो ज्ञात है मुझे उचित है किंतु स्मरण रहे यह तुम्हारा अंतिम अवसर है इसे व्यर्थ मत गवाना ॐ सुब्रमण्यम कार्तिके स्वामी ॐ सुब्रमण्यम कार्तिके स्वामी कार्तिके स्वामी सुब्रमण्यम कार्तिके स्वामी सुब्रमण्यम कार्तिके स्वामी प्रभु की भक्ति का अमृत जिसे मिल जाता है उसे फिर और किसी भी वस्तु की आवश्यकता नहीं रहती प्रभु मैं रजत कीठ तो धन्य हो गई मुझे आपकी भक्ति भी मिली और आपके दर्शन भी अब तो मात्र एक इच्छा शेष है आप मुझे इस जीवन से मुक्ति प्रदान करें जो चाहिए वो मिलेगा तुम्हें मैं दूंगी तुम्हें मुक्ति इस भयंकर कारागृह में अपने जीवन के प्रकाश को अंधकार में नहीं बदलना चाहती तो बालक कार्तिकेय को लेकर जो भी जानती हो उसे अंधकार में रखे बिना सब बता दो मुझे जिनके मन में सभी को लेकर प्रेम है जो समझ संसार के हित को लेकर चिंता करते हैं वो तुम्हारे शत्रु कैसे हो सकते हैं असुर सम्राट क्या किसी के भ्राता का वत करने वाला उसका मित्र हो सकता है वह मेरा मित्र कदा भी नहीं हो सकता मित्र से भी कहीं बढ़कर वह तो सर्वोच्च मार्गदर्शक है भगवान है वह जो दुष्ट पापियों को भी उचित मार्ग पर ले आते हैं जिनके हाथों मिली मृत्यु भी प्रसाद के समान है वाह वाह जयंत वाह मेरा भ्राता दुष्ट और जिसने मेरे भ्राता का अंत किया वो भला है वो भगवान है भगवान ही नहीं परम ब्रह्म है वो महादेव पुत्र ही नहीं वो तो देवाधिदेव महादेव के ही प्रतिबिंब है महादेव कौन है कैसे हैं ये तो सर्व ज्ञात है और क्या बताऊं मैं तुम्हें इनके बारे में बस बात को घुमाओ मत जो भी जानती हो सब बता दो मुझे ये अद्भुत है अत्यंत बलशाली अनंत ज्ञान सागर तुम इन्ह देखोगी ना तुम मंत्र मुग्ध हो जाओगी सहस्त्र सूर्य के समान तेजोमय है ये उनकी नहीं मात्र उनके दिव्य तेज की दर्शन ही पर्याप्त है किसी के भी पापों को धोने के लिए ओम अरुणाचलेश्वरा नमः बस बहुत सुन चुका मैं उसका गुणगान उसके बारे में सब जानते हो तो बताओ उसकी दुर्बलता क्या है दुर्बलता तो हम प्राणियों में होती है व तो सभी दुर्बलता के परे है भगवान है वो उनमें दुर्बलता को ढूंढने का प्रयास मूर्खता है तुम्हारा क्रोध तुम्हारी बहुत बड़ी दुर्बल बस बहुत हुआ तुम्हारा यह अनर्गल प्रलाप प्रभु प्रभु का अपमान मुझे स्वीकार नहीं तुम्हारे केशों में ही तुम्हारा जीवन है है ना तो जैसे तुम्हारे केश तुम्हारी दुर्बलता है वैसे उस बालक की भी कोई दुर्बलता अवश्य होगी वो बताओ मुझे समय नहीं है मेरे पास मेरे पांच अंक गिनने तक यदि तुमने नहीं बताया तो मैं तुम्हारे केश काट दूंगी यही कारागृह में तुम्हारी भयंकर मृत्यु होगी तुम पांच गिनो मैं तुम्हारी गिनती के साथ प्रभु के बारे में पांच बातें बताऊंगी एक बोलो शीघ्र बोलो उनका प्रथम परिचय प्रभु कार्तिकेय स्वामी सर्व शक्तिशाली है जिनकी यदि कोई दुर्बलता है तो उनके भक्त ही है और उनका बल भी और उनके भक्त और उनके प्रति उनके भक्तों की भक्ति है मुझे तुमसे यह उत्तर नहीं चाहिए मेरे धीरज की और परीक्षा लेने का दु साहस मत करो अन्यथा यह कष्ट तुम्हारे मृत्यु के साथ ही समाप्त होगा दो दो तो सुनो प्रभु कार्तिक सर्वव्यापी है अर्थात वह सर्वत्र है हम जो भी कर रहे हैं व सब उनकी दृष्टि के सामने है इसलिए इस क्रोध को त्याग कर उनकी भक्ति करो तब उनकी कृपा से तुम्हें उसका लाभ मिलेगा शेष सभी प्रयास सर्वथा व्यर्थ है व्यर्थ है तुम्हारा इस प्रकार मुझे कष्ट देना इससे कुछ प्राप्त नहीं होगा तुम्हे भक्ति करो उसी में तुम्हारी मुक्ति है बस मुझे क्या करना है यह मत बताओ अपनी रक्षा के लिए तुम्हें क्या करना है उसका विचार करो न प्रभु कार्तिके सर्वज्ञ है संसार का कोई भी ज्ञान उनसे छिपा नहीं नहीं है संसार में ही क्यों समस्त ब्रह्मांड में जो भी है उसका संपूर्ण ज्ञान है प्रभु को उचित अनुचित का भेद भी और किसके मन में क्या योजना है वह सब जानते हैं इसलिए अभी भी समय है सम याचना कर लो इनसे करुणा सागर है वो वो तुम्हें अवश्य शमा कर देंगे जैसे मुझ जैसी असुरी को कर दिया था नहीं यह उत्तर भी नहीं चाहिए मुझे तुमसे जो मैं सुनना चाहती हूं वो बताओ मैं अगली गिनती गिन रही हूं शीघ्र बताओ चार चार प्रभु कार्ति के प्राण दाता है जीवन और मृत्यु दोनों के दाता है वो इसलिए मेरा क्या किसी का भी अंत उनकी इच्छा के बिना नहीं हो सकता इसलिए मैं तो अपनी मृत्यु पर व्यर्थ विचार कर उनकी भक्ति का एक भी पल व्यर्थ नहीं कर सकता वैसे भी मृत्यु के बाद तुम मुझे उनकी शरण में जाना है इसीलिए तुम मेरा अंत करने का प्रयास कर लो किंतु मेरे प्राण तभी ही जाएंगे जब प्रभु की इच्छा होगी उसकी इच्छा से नहीं मेरी इच्छा से मृत्यु मिलेगी तुम्हे यदि इस अंतिम गिनती पर भी तुमने मुझे कार्तिके की दुर्बलता नहीं बताई तो इसलिए अब जो करना शीघ्र करना सावधानी से करना यह अंतिम अवसर है तुम्हारा पांच पांच तो सुनो प्रभु कार्ति के विश्वेश्वर है अर्थात विश्व के ईश्वर संपूर्ण विश्व में जो भी घटित होता है उन्हीं के ा से होता है जो भी हम देख रहे हैं सुन रहे हैं यह सब उन्हीं के अनुसार है इसलिए उत्तम तो यही होगा उनके शरणागत बन जाओ भक्त बन जाओ उनके ईश्वर के सत्य स्वरूप को पहचानने में सभी की सहायता करनी चाहिए फिर वह शत्रु हो या मित्र

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