Sunday, 28 December 2025

देवी अदिति के घर आये वामन देवता Nishkarsh Dixit Vighnaharta Ganesh Episode 730 Pen Bhakti

[संगीत] आओ बालको सभी लड्डू खा [संगीत] [संगीत] लो मैं तुम्हें भूल कर भी नहीं बुला सकती पुत्र किंतु इन बच्चों ने तुम्हारी चब देखकर अपने मन को संतुष्ट कर लेती [संगीत] [प्रशंसा] हूं और साथ ही यह आशा करती हूं कि तुम एक दिन अवश्य आओगे और मेरे हाथ से लड्डू खाओगे [संगीत] [संगीत] प्रिय संबंध का बंधन तो बंधनों से मुक्त होकर ही बल पाता है इसलिए आप अपने मातृत्व पर विश्वास रखिए और निशंक होकर गणेश को जाने की अनुमति दे अटूट है एक माता और पुत्र का स्नेह संबंध स्वामी यह जानती हूं मैं किंतु यही मेरी शंका का कारण भी है स्वामी एक मां ने इतने समय तक पुत्र गणेश से दूर रहकर पीड़ा सही है अब कहीं उसके वहां जाने पर मैं भी उसी पीड़ा की भागी ना बन जाऊ किंतु यदि पुत्र गणेश देवी अदिति की ममता में रम गया तो मैं कहीं टूट ना जाऊ नहीं प्रि नहीं चंदन की सुगंध दूर जाकर भी चंदन से बिलग नहीं होती और कभी-कभी तो स्नेह दूर जाने पर और फलता है गणेश आपका पुत्र है भला वह आपको कहां भुला सकता [संगीत] है ममता के आंगन में स्वार्थ और शंका का कोई स्थान नहीं है प्रिय वहां तो केवल विश्वास का वास है और यही विश्वास की स्वास तो देवी अदिति भी ले रही है मैं जानती हूं पुत्र हम दोनों ही अपनी नियती से बंधे हैं एक तरफ यह मां है जो अपनी ममता से विवश है और दूसरी और तुम हो जो अपने कर्तव्य और दायित्व से विव इसीलिए नहीं आ सकते इसीलिए नहीं आ सकते आप समझ गई माता मैं विवश हूं अन्यथा मैं अवश्य आता माता उनके मुख पर इतनी प्रसन्नता का भाव इतने दिनों बाद अपनी माता से भेंट करने क्या खाली हाथ जाओगे पुत्र तो मैं जा सकता हूं ना माता आपकी अनुमति है हां पुत्र तुमने सत्य ही कहा था एक मां की व्यथा तो एक मां ही समझ सकती है तुम मुझसे दूर रहोगे इस कल्पना से ही मुझे इतना कष्ट हो रहा है तो फिर देवी अदिति के कष्ट का अनुमान लगाना भी कठिन है उनके कष्ट को तो तुम ही दूर कर सकते हो पुत्र जाओ और एक संतान होने का कर्तव्य निभाओ गणेश किंतु खाली हाथ नहीं यह लो पुत्र यह पुष्प कंगन तुम माता आदिति को भेंट करना यह उन्हें अवश्य ही भाए धन्यवाद माता किंतु माता एक समस्या तो अभी भी है क्या पुत्र अब क्या समस्या है अपने पूर्व अवतार की मुझे कोई स्मृति ही नहीं है मैं माता आदिति के पास कैसे [संगीत] पहुंच मैं तुम्हें आशीष देती हूं पुत्र कि तुम्हें अपने पूर्व अवतार की सभी स्मृतियां धीरे धीरे स्मरण होती जाएंगी धन्यवाद माता अब मुझे आज्ञा दीजिए [संगीत] विदा है त गजानन खड़े मां के आगे मां के मन को उलझा अंदेश के धागे गजानन को सजन नैन माता निहारे वि सममित ना कर दे पुत्र मन में विचारी जय गणेश जय गण गणेश जय गणेश देवा माता जानी पार्वती पिता [संगीत] [प्रशंसा] महादेवा विदा ले के मास चल देखो गणेशा पूर्व जन्म की जन्मी के दूर देशा थाम देखे माता गणपति को जाते शिव शंभु माता को डाड बंधा जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा [संगीत] माता किसी भी मां के लिए अपने पुत्र के प्रति ममता सर्वोपरि है किंतु आपने अपनी ममता पर स्वार्थ की छाया तक नहीं पड़ने दी यह इतना सरल नहीं है देवी आपने ना केवल अपनी ममता का सम्मान किया अभी तो संसार की समस्त माताओं की ममता का सम्मान किया है आपने श्रेष्ठ उदाहरण प्रस्तुत किया है इसलिए तो आप जगत जन्नी है पुत्र मेरी ममता की लाज रखना अपने पूर्व अवतार की माता को अपनी सेवा से तृप्त [संगीत] करना [प्रशंसा] [संगीत] [संगीत] [संगीत] मूषक जी दाहिने [संगीत] मुड़िए अनायास मैंने मूषक जी को दाहिने मुड़ने को क्यों कहा मैं तुम्हें आशीष देती हूं पुत्र कि तुम्हें अपने पूर्व अवतार की सभी स्मृतियां धीरे-धीरे स्मरण होती [संगीत] जाएगी प्रभु हम सही दिशा में जा रहे हैं ना आगे मार्ग नहीं दिखाई दे रहा है मार्ग है मशक जी जी आगे आम का एक वृक्ष है उससे दाहिने जाकर सामने के चौरस्था के बीचोंबीच एक शिला दिखाई देगी फिर आगे चलेंगे तो सामने ही हमारा आश्रम है इस वन में आम का वृक्ष [संगीत] कहां आम का वृक्ष तो है [संगीत] यहां यहां से दाहिने जाना [प्रशंसा] है प्रभु आपने जो कहा सब सत्य हो रहा है किंतु कैसे आप तो यहां पहले कभी नहीं आए बस मूषक जी यही रुक जाइए पहले मुझे इस धरती को छू लेने दीजिए जहां से मेरा जन्मों का संबंध है [संगीत] इस अवतार में नहीं मशक जी किंतु अपने पूर्व अवतार में यही मेरा निवास था प्रभु अब आप उस शिला पर क्यों चढ़ने लगे माता मुझे यहां से आगे जाने को मना करती थी किंतु मैं कहां रुकने वाला था अपने बाल हट में यहां से भी आगे बढ़ जाता था माता को बहुत सताता था और फिर उनकी ममता भरी फटकार भी सुनता [संगीत] था हमारा आश्रम उसके निकट सब कुछ वैसा ही है वह अश्वत वृक्ष देख रहे हैं मशक जी वहां पिताजी महर्षि कश्यप ध्यान करते थे और यह जलाशय यह तो वही है जहां से माता प्रतिदिन जल भर कर लाती [संगीत] थी चलिए प्रभु मैं आपको आश्रम पहुंचा दूं नहीं मशक जी मेरे पांव इस धरा पर चलना चाहते हैं जिससे मैं इतने समय तक वंचित रहा आगे की यात्रा पद यात्रा होगी क्योंकि वैसे भी माता-पिता के चरणों में सभी तीर्थों का वास होता है इसलिए उनके निकट जाना तीर्थ यात्रा के समान ही होता है उचित है प्रभु मैं यही आपकी प्रतीक्षा करूंगा किंतु जब आपको अपने पूर्व अवतार की इतनी स्मृतियां स्मरण हो आई है तो क्या आपको यह भी ज्ञात हुआ है कि आपके उस अवतार का आरंभ क्यों और कैसे हुआ [प्रशंसा] आरंभ कैसे [संगीत] हुआ प्रभु जब आपको अपने पूर्व अवतार की इतनी स्मृतियां स्मरण हो आई है तो क्या आपको यह भी ज्ञात हुआ है कि आपके उस अवतार का आरंभ क्यों और कैसे हुआ आरंभ कैसे [संगीत] हुआ इसका आरंभ हुआ एक स्वप्न से वह स्वप्न जो सत्य बन [संगीत] गया क्या हुआ देवी आपने कोई दू स्वपन देखा क्या नहीं स्वामी अत्यंत सुखद कल्पना तीत अद्भुत था मेरा स् [संगीत] स्वपन जानते हैं स्वामी ऐसा स्वप्न आज मैंने चौथी बार देखा है अच्छा तो बताइए उस स्वप्न में आपको क्या दिखाई दिया मैंने देखा कि मैं एक निर्जन स्थान पर हूं जहां अंधकार ही अंधकार है किंतु कहीं दूर प्रकाश की एक झलक है आगे बढ़ते ही प्रकाश बढ़ता जा रहा [संगीत] है फिर उस निर्मल प्रकाश में परम प्रभु महा गनाधिपति के दर्शन हुए किंतु फिर वह अंतरध्यान हो गए फिर उस दिव्य प्रकाश से निकले नन्हे बालक के छोटे-छोटे हाथों ने मेरे आंचल को पकड़ [संगीत] लिया स्वामी मुझे एक नन्हे बालक के दर्शन तो हुए किंतु प्रकाश के कारण मैं उसकी छवि स्पष्ट रूप से देख नहीं पाई बस उस नन्हे शिशु के छोटे हाथों ने मुझे अपनी और खींच लिया जैसे एक बालक अपनी मां को खींचता है फ मेरे भीतर मेरे भीतर ममता का सागर उ बड़ाया संभव है आपका यह स्वप्न मकर संक्रांति के बोध से संबंधित है जिसमें आपने अपनी सभी संतानों को निमंत्रित किया है तभी आपको ऐसी अपार ममता का बोध हो रहा है देवी अच्छा हुआ स्वामी आपने मुझे स्मरण करा दिया मैं तो भूल ही गई थी हमारे सभी पुत्र आते ही होंगे और सभी आते ही अपना प्रिय भोजन भी मांगेंगे मुझे जाकर उसकी तैयारी करनी [संगीत] चाहिए माता शीघ्रता कीजिए ना शुधा सतार आपने मेरे लिए खीर बनाई है ना और माता मेरा प्रिय चूरमा और मां मेरे लिए शीरा तुम्हारी माता किसी का भी प्रिय भोजन नहीं भूल है सब बना [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] है माता ये भोजन के दो अधिक पात्र किसके लिए क्या कोई आने वाला [संगीत] है ओ क साया विद महि महा बलाय धीमहि तनु कुर्मा [संगीत] प्रोया ओ नमो भगवते महाकुर माया [संगीत] नम प्रणाम माता आओ पुत्र स्वागत है तुम्हारा प्रणाम भ्राता वामन कल्याण हो देवराज इंद्र आशा है सब कुशल मंगल है आप सभी चिंताओं से मुक्त है हां भ्राता वामन जब से आपने राजा बली को पाताल लोक में बाधित किया आपके कृपा से और माता के आशीर्वाद से समस्त सृष्टि अपनी नियमित धूरी पर स्थिर हम सभी अपने निर्धारित कार्यों को करने के लिए मुक्त जहां वर्षा की आवश्यकता है वहां वर्षा है जहां धूप की आवश्यकता है वहां उचित मात्रा में धूप भी चारों ओर धन धान्य और समृद्धि हम सभी अपने भक्तों का ध्यान रखने में सक्षम है सत्य कहू तो अब कोई बाधा ही शेष नहीं बस अब सब कुछ ऐसे ही रहना चाहिए कहीं पर भी संकट की कोई छाया भी नहीं पड़नी चाहिए माता जिस प्रकार भ्राता वामन ने राजा बली को पाताल लोक में पाठ सिखाया उसके बाद संकट तो दूर कोई देवताओं की ओर देखने का साहस तक नहीं कर [संगीत] सकता [संगीत] अन्य बातें बंद यह भोजन का समय है हमें भोजन का आनंद लेना चाहिए आसन ग्रहण करो [संगीत] पुत्र माता अभी तो आपकी सभी पुत्र यहां है तो फिर यह अतिरिक्त भोजन पात्र यहां क्यों है क्योंकि मुझे आभास हो रहा है जैसे जैसे मेरा एक और पुत्र है जिसका आगमन होने वाला [संगीत] है [संगीत] मुझे जिसकी प्रतीक्षा है वो अभी तक नहीं [संगीत] आया [संगीत] [संगीत] आ माता प्रत्येक मकर संक्रांति के शुभ अवसर पर आप अपने पुत्रों को उनका प्रिय भोजन करवा के आनंदित होती हैं किंतु आज मैं आपको उतना आनंदित नहीं देख रहा हूं क्या बात है सत्य कहा पुत्र आज मुझे पूर्णता का आभास ही नहीं हो रहा ऐसा लग रहा है जैसे मेरा एक पुत्र तो आया ही नहीं उसे भोजन कराना तो शेष रह गया है मां वह अभी तक नहीं आ सके किंतु आएंगे अवश्य वह आपको निराश नहीं करेंगे कौन आएंगे वही जिसे माता ने अपने स्वप्न में देखा था किंतु मैंने तो स्वप्न में प्रभु महा गनाधिपति जी को देखा था फिर एक नन्हे शिशु के न ने हाथों ने मेरा आचल पकड़ लिया तो क्या प्रभु महा गनाधिपति जी जो वाक्य आपने अधूरा छोड़ा है माता उसे मैं पूरा कर देता हूं परम ब्रह्म महा गनाधिपति जी आपके पुत्र के रूप में अपना प्रथम अवतार [संगीत] ले पर ब्रह्म महा गनाधिपति जी अवतार लेंगे मेरे पुत्र बनेंगे ईश्वर के प्रत्येक अवतार के पीछे कोई ना कोई उद्देश्य अवश्य होता है जैसे बलि के उद्धार के लिए आपका अवतार हुआ था जैसे तारकासुर के वध के लिए महादेव पुत्र कार्तिके का अवतार हुआ था और अब परम ब्रह्म श्री महा गणाधीश [संगीत] क्या होगा नरान तक और देवान तक सरल सहज ब्राह्मण दंपति रुद्र केतु और देवी शारदा के जुड़वा पुत्र मां पिता श्री हमें अपना आशीष दीजिए हमारा तप सफल हो हमारी कामना है कि तुम तप करके ऐसा तेज प्राप्त करो कि संसार तुम्हें एक साधारण ब्राह्मण रुद्र केतु और उसकी पत्नी शारदा की संतान के रूप में नहीं अपितु तुम्हारे तप और तेज से प्रभावित होकर रांत और देवांतक के नामों से जाने हम वचन देते हैं पिताजी आपकी कामना पूर्ण किए बिना हम नहीं मानेंगे भगवान शिव को प्रसन्न करके ही रहेंगे अन्यथा तपस्या करते रहेंगे अब हमारे जीवन का बस एक यही उद्देश्य है उद्देश्य चाहे जो भी हो मेरे प्रभु मेरे पुत्र के रूप में अवतार लेंगे यह मेरे लिए परम सौभाग्य की बात है अर्थात आपने अपना प्रथम अवतार तभी लिया था प्रभु है ना मूषक जी जैसा पिता श्री प्रभु महादेव ने कहा था प्रत्येक अवतार के आविर्भाव का एक समय होता है और वह समय अब निकट [संगीत] था ओम नम शिम शिवाय ओम नमः शिवाय ओम नमः [संगीत] शिवाय ओम नमः शिवाय ओम नमः शिवाय ओम नमः शिवाय ओम नमः शिवाय ओम नमः शिवाय प्रभु महादेव रांत और वितक का प्रणाम स्वीकार की कल्याण हो मैं तुम दोनों के तप से प्रसन्न हुआ कहो क्या वरदान चाहते हो हमें यह वरदान दीजिए प्रभु कि देवता यक्ष गंधर्व मनुष्य नाग पशु कोई भी हमारा वध ना कर सके हम इन सभी पर अजय रहे तथास्तु तथास्तु तथास्तु [प्रशंसा] [संगीत] प्रिय भ्राता नारा तक हम अजय हो गए हा भ्राता देवांतक अब इस भूलोक का अधिपति बनने से हमें कोई नहीं रोक सकता ना कोई रोक ना कोई टोक केवल लगेगा भोग केवल भोग हां भ्राता देवांतक अब राजा चाहे कैसा भी हो तेजस्वी हो पराक्रमी हो या हो बलशाली लेकिन ना हमें वो रोक सकता है और ना टोक सकता है अब केवल दो ही नाम गूंज नारा तक और [संगीत] देवा भूलोक ही क्या हमारी सत्ता तो स्वर्ग और पाताल लोक में भी होगी वो भी बिना किसी रोकटो हम बने त्रिलोक पति वीरू देवताओ जाओ चले जाओ यहां से अपने प्राणों की सुरक्षा चाहते हो तो हमारे अधीन त्रिलोक में कहीं दिखाई मत देना अन्यथा आजीवन कारागार में बंदी बना [संगीत] देंगे देवराज शीष झुका के रखना झुका के और भूलकर भी हमसे नेत्र मिलाकर बात करने का ू साहस मत करना जा चले जाओ यहां से जब जब धरती पर अत्याचार बढ़ता है पाप और अधर्म का राज होता है तो धर्म की सत्ता स्थापित करने हेतु एक अवतार जन्म लेता है यह समय रांत और देवांतक के सत्ता सुख भोगने का ही नहीं वरन एक नए अध्याय के आरंभ होने का भी [संगीत] था फिर क्या हुआ प्रभु देवता फिर कहां [संगीत] गए मैंने मां को विश्वास दिलाया था क्या हुआ देवराज इंद्र आप यहां रुक क्यों गए भीतर जाने का धैर्य मुझ में नहीं है हमने मां को आश्वासन दिया था कि किसी भी स्थिति में कोई भी असुर हम पर आक्रमण नहीं करेगा किंतु दुर्भाग्यवश हमें ऐसी अवस्था में य आना पड़ा यदि माता हमें ऐसी अवस्था में देखेगी तो उनका हृदय आहात होगा हमारा लौट जाना ही उचित होगा मां का हृदय तो तब भी आहत होगा पुत्र यदि उसकी संताने अपनी मां से अपना दुख बांटे बिना ही लौट जाए संकोच में अपनी मां से अपना दुख बांटने में वह स्वयं को असमर्थ समझे क्या हुआ है पुत्रों ऐसा कौन सा संकट आया है जो तुम सब ऐसी अवस्था में यहां हो [संगीत] सभी देवता यहां इस अवस्था में क्या हुआ आप सभी को स्वर्गलोक अब हमारे आधीन नहीं रहा हम देवताओं का वहां रहना वर्जित है स्वर्ग लोक की नहीं अब तीनों लोको में हमारे लिए कोई स्थान नहीं बचा माता पिता की स्थान का द्वार तो अपनी संतान के लिए सदैव खुला रहता है फिर सोच कैसा यहां से तुम्हें कोई निष्कासित नहीं कर सकता पुत्रों यह आश्रम तुम सबका भी तो है आओ भीतर आओ नहीं माता यदि उन दोनों दुष्टों को ज्ञात हो गया कि हम यहां है तो केवल हमें बंदी ही नहीं बनाएंगे वो आपको भी कष्ट देंगे और हम ऐसा नहीं कर सकते हम यहां शरण लेने नहीं हम तो केवल आपका आशीर्वाद लेने आए हैं माता कौन है वोह दु साहसी जिन्होंने तुम्हें इस प्रकार विवश किया है रांत और देवांतक रांत और देवांतक वही दोनों तो प्रभु श्री महा गधिचि परम ब्रह्म महा गनाधिपति जी आपके पुत्र के रूप में अपना प्रथम अवतार लेंगे देवी अर्थात उनके अवतार का समय आ गया है वो शीघ्र ही हमारे पुत्र बनकर अवतार [संगीत] लेंगे माता अब आप ही हमारी रक्षा कर सकते इस कष्ट से अब आप ही हमें मुक्त करा सकते हैं माता जिस प्रकार आपने प्रभु श्री विष्णु के अवतार को पुत्र रूप पाकर हमें राजा बलि से छुड़ाया था अब समय आ गया है माता अब इस संकट से आप ही हमें मुक्ति दिलाए माता प्रार्थना कीजिए परम ब्र महा गनाधिपति जी शीघ्र अवतार ले जब से पुत्र वामन ने मुझे प्रभु के बारे में बताया है तब से मैं प्रभु की प्रार्थना कर रही हूं उन्हे पुकार भी रही हूं उनसे गुहार भी लगा रही हूं कि वो ही मेरे पुत्र बने किंतु प्रभु की कृपा तो उनकी इच्छा अनुसार ही होती [संगीत] है एक मां के होते हुए उसकी संतान को किसी भी बात की चिंता नहीं होनी चाहिए अपनी संतान की रक्षा करने के लिए यह मां असंभव को भी संभव बनाने का प्रयास करेगी मैं अभी से प्रार्थना आरंभ करूंगी और जब तक प्रभु की आशीष मुझ पर नहीं होगी मैं उनकी प्रार्थना करना नहीं छोड़ूंगी धनवाद अब हम अनुमति [संगीत] दीजिए ये कैसी प्रार्थना आरंभ करने जा रही है आप देवी मैं इस संसार की सबसे सौभाग्यशाली नि माता बनूंगी जब महा गनाधिपति जी स्वयं मेरे पुत्र रूप में अवतार लेंगे [संगीत] कोई भी संबंध मात्र स्नेह और अधिकार से दृढ़ नहीं बनता वरन त्याग और कर्तव्य पालन ही इसे दृढ़ बनाता है

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