Sunday, 28 December 2025

देवी अदिति को कौनसा आशीष प्राप्त हुआ Akanksha Puri Vighnaharta Ganesh Episode 741 Pen Bhakti

[संगीत] [संगीत] पुत्र आज कई युगों के बाद निश्चिंत होकर सोई है मध्यम स्वर में बोलिए कहीं निद्रा भंग ना हो जाए मैं तो इसीलिए हिल भी नहीं [संगीत] रहा यह कैसी भूल कर रही हूं मैं एक माता से उसकी ममता का सुख छीनने का प्रयास कर रही हूं नहीं नहीं यह अनुचित है मैं गणेश की माता हूं और रहूंगी भी किंतु देवी अदिति भी तो उसकी माता है [संगीत] ना प्रेम की यही रीत है त्याग और समर्पण जहां यह दोनों है वहीं प्रेम पनपता और बढ़ता है पुत्र तुम्हारी पूर्व जन्म की माता बहुत त्याग बहुत प्रतीक्षा कर चुकी है अब त्याग और प्रतीक्षा करने का समय मेरा है [प्रशंसा] [संगीत] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] माता माता माता [संगीत] माता माता माता माता माता [संगीत] [संगीत] [प्रशंसा] माता देवी पार्वती य और विनायक ने उन्हें मां क्यों बुलाया मैं वचन देता हूं देवी विनायक अपने भविष्य के एक अवतार में आपसे भेंट करने अवश्य आएगा ओ तो देवी पार्वती विनायक के इस अवतार की मां है और कदाचित अपने पुत्र को यहां देखकर उनसे रहा नहीं गया यह मुझसे अधिक और कौन समझ सकता है एक मां ही दूसरी मां का कष्ट समझती है [संगीत] पुत्र तुम में मैं अपने पुत्र विनायक की झलक देख रही हूं तुम्हे पाकर मैं अपने वात्सल्य में इतना खो गई थी कि मैं तो भूल ही गई थी कि मेरे विनायक होने के साथ-साथ तुम देवी पार्वती के गणेश भी हो पुत्र तुमने तो अपना वचन निभा दिया है मेरी प्रतीक्षा का फल मुझे मिल गया है किंतु पुत्र यदि मेरे सुख से दूसरी मां दुखी हो तो यह उचित नहीं है और ना ही मुझे इसका कोई तुम तो देवी पार्वती के नंदन हो इसलिए तुम्हारा कर्तव्य है देवी पार्वती को प्रसन्न रखना देवी पार्वती को यूं यहां से इस प्रकार विचलित होकर मत जाने दो एक मां की पीड़ा में भली भाती समझ सकती हूं इसलिए मैं तुम्हें अनुमति देती जाओ पुत्र [संगीत] जाओ माता पार्वती के गणेश मेरा पुत्र ममता मां की गोद में आए वि घन हरता [संगीत] पार्वती के मन में उमड़ी ममता मां की गोद में आए वि घन हरता बालक अपनी माता को और प्रतीक्षा मत करवाता जग में उसे बना [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] मां तो त्याग की मूर्ति होती है ऐसा निस्वार्थ प्रेम तो एक मां ही कर सकती है एक मां के मन की पीड़ा आप नहीं समझ सकती देवी लक्ष्मी मेरा पुत्र मेरा [संगीत] गणेश मुझे क्षमा कर दीजिए देवी अतिथ मैं स्वयं को रोक ही नहीं सकी मेरा मन इतना व्याकुल था इस विचार से नहीं देवी पार्वती आपको क्षमा मांगने की कोई आवश्यकता नहीं है मैं समझती हूं कि आपको आपकी ममता यहां ले आई है आप तो जगत जननी है ममता का सागर है आपके भीतर फिर आप उस सागर को कैसे रोक सकती थी ममता का सागर जो आपके भीतर है वो तो संपूर्ण जगत के लिए उदाहरण है सतयुग से द्वापर युग तक आपने अपने पुत्र की प्रतीक्षा की और मैं मैं तो दोपहर भी स्वयं को रोक नहीं सकी इसलिए मैं गणेश की माता आपको यह आशीष देती हूं प्रत्येक संकष्टि जो गणेश की पूजा और व्रत के लिए विशेष दिवस है जिस दिवस मेरे पुत्र ने प्रथम पूज्य का स्थान प्राप्त किया उस संकष्ट के दिवस गणेश आप से मिलने इस आश्रम में अवश्य [प्रशंसा] [संगीत] आएगा और पुत्र गणेश तुमने भी अपनी माता की ममता का जैसा मान रखा है वो भी अनूठा है अद्भुत है इसलिए पुत्र मैं तुम्हें भी आशीष देती हूं जो भी नारी संकष्टी व्रत संपूर्ण निष्ठा से करेगी उसे संतान सुख अवश्य प्राप्त [संगीत] होगा पुत्र अभी तो हमें यहां से प्रस्थान करना होगा [संगीत] जाओ पुत्र देवी पार्वती तो तुम्हारे इस अवतार की माता है इनका पूरा अधिकार है तुम पर और फिर जगत जननी ने तो मुझ पर एक विशेष कृपा की है प्रत्येक संकष्ट तुम्हारा साथ मिलने का आशीष देकर मैं बड़े ही उत्साह के साथ तुम्हारे लिए व्रत रखूंगी पुत्र और तुम्हारे आने की प्रतीक्षा करूंगी [संगीत] [संगीत] मैं [संगीत] प्रणाम माता प्रणाम पिता [संगीत] श्री [संगीत] आ [संगीत] क्या हुआ प्रिय आप इतनी उदास क्यों है भाग्यशाली होती है वो मां जिनके आचल की छाव में संतान पलती है देवी अदिति और देवी पार्वती दोनों को यह सुख प्राप्त है देखिए ना स्वामी किस प्रकार मां और पुत्र एक दूसरे का हाथ था जा र और अब तो संसार की सभी नारियों को जगत जननी ने आशीर्वाद भी दिया है जो संकष्टी व्रत करेंगी उन्हें गणेश के समान आज्ञाकारी और स्नेही संतान का सुख मिलेगा परंतु हम देवियों का क्या प्रभु जिन्हें उन्होंने आशीष नहीं मां बनने के सुख से वंचित रहने का अभिशाप दिया तो क्या वो उस श्राप को लौटा करर मुझे संतान सुख का वरदान देंगे मैं सभी देवताओ को य श्राप देती हूं कि देया भी अपनी संतान को जन्म नहीं दे सकेगी बताइए ना स्वामी मेरे प्रश्न का कोई उत्तर नहीं है ना आपके [संगीत] पास तो उचित है जिन्हे इसका उत्तर देना चाहिए अब यह प्रश्न भी मैं उन्हीं से पूछूंगी प्रिय पुत्र तुम्हें देवी अदिति के हाथों के बने लड्डू बहुत स्वादिष्ट लगे थे ना तो पुत्र मैं सोच रही हूं अब मैं तुम्हारे लिए मोदक बनाना बंद ही कर देती हू नहीं माता यह क्या कह रही है आप लड्डू तो विनायक को भाते थे किंतु मुझे तो आपके हाथ के मोदक ही सबसे स्वादिष्ट लगते पुत्र मैं तो परिहास कर रही थी मैं तुम्हारे लिए मोदक अवश्य [संगीत] बनाऊंगी ये यह क्या हो रहा है माता सब निस्तेज क्यों हो रहा है [संगीत] प्रकृति का सौंदर्य फीका क्यों हो रहा है ऐसा इसलिए है देवी क्योंकि संसार में जो शोभा की स्रोत है जो ऐश्वर्य और समृद्धि की देवी है वह अत्यंत दुखी है जब एक स्त्री के भीतर ममता का सुख पाने की इच्छा जाग जाए और से प्राप्त ना हो तो विचलित होना तो स्वाभाविक है देवी ऐसा ही देवी लक्ष्मी के साथ हुआ है एक मां के मन की पीड़ा आप नहीं समझ सकती देवी लक्षमी यह तो यह तो मेरी ही भूल का परिणाम है ममता के बहाव में मैं इतना बह गई कि अपने शब्दों से देवी लक्ष्मी को आहत करती रही अब मैं उन्हें कैसे समझाऊं क्या भूलकर मनाऊंगी मैं देवी लक्ष्मी को यह तो आपको भी याद है कि संसार में कुछ भी आकार नहीं होता इसके पीछे भी अवश्य कोई बड़ा कारण छिपा है ओम नमस्ते गणपते प्रत्यक्ष तत्वम बंदम ब्रह कारण जो भी हो स्वामी किंतु अभी तो मुझे देवी लक्ष्मी का सामना करने से भी संकोच हो रहा है और य गणेश की मां गणेश की मां सुनती है गणेश की मां कहां है आप यहां आइए गणेश की मा मुझे आपसे कुछ कहना है गणेश की मां प्रिय सत्य कहा आपने ना मुझे मातृत्व का अनुभव है और ना ज्ञान मैं नहीं समझ सकती एक मां की ममता तो उचित है मुझे भी मातृत्व का अनुभव प्राप्त करना है मुझे भी मां बनना है क्या आप मुझे मां बनने का आशीर्वाद दे सकती है महादेव से ऐसा अनुचित वरदान मांगने का दु साहस कैसे किया मैं सभी देवताओं को यह श्राप देती हूं कि देवियां भी अपनी संतान को जन्म नहीं दे सकेंगी किंतु आप कैसे दे सकती है आशीष आपने ही तो हमें शराफत किया कहिए क्या आप अपना श्राप लौट आएंगे ये मैं कर सकती तो अवश्य करती तो आप नहीं [संगीत] [संगीत] करेंगी दुखी नहीं मुझे सुखी होना है देवी पार्वती मुझे मातृत्व का सुख प्राप्त करना है मैं उससे क्यों रहू वंचित बताइए [संगीत] आप हे जगत जननी आज सखी बनकर नहीं जगत जननी के रूप में मुझे भी आशीष दीजिए जिस प्रकार आप ने गणेश की संकष्टि व्रत और पूजा करने वाली संसार की प्रत्येक नारी को आशीष दिया है उसी प्रकार मुझे भी कृपा कर आशीष दीजिए [संगीत] माता कहिए ना महेश्वरी आप मुझे भी आशीष देंगी ना जिस प्रकार दिया हुआ वरदान वापस नहीं लिया जा सकता उसी प्रकार दिया हुआ श्राप वापस नहीं लिया जा सकता यह तो आप भी जानती है देवी श्राप से सभी देवया प्रभावित हुई केवल आप नहीं किंतु जब हृदय में आशा के दीप चलते हैं उसके भाग्य के दीप भी जल उठते हैं जब एक स्त्री के भीतर ममता का सुख पाने की इच्छा जाग जाए और उसे प्राप्त ना हो तो ऐसे विचलित होना स्वाभाविक है देवी लक्ष्मी के साथ भी यही हो रहा है जिससे संसार प्रभावित हुए बिना कहां रह सकता है किंतु जब हृदय में आशा के दीप जलते हैं तो भाग्य के दीप भी जल उठते हैं उसके श्रेष्ठ उदाहरण है कार्तिकेय और [प्रशंसा] [संगीत] गणेश हमारे हृदय में आशा का दीप तो आपने जला दिया महादेव किंतु इस दीप को आपके मार्गदर्शन रूपी घृत की आवश्यक है गणेश ही तो है वो आशा का साकार रूप परम ब्रह्म महा [संगीत] गधिचि वही प्रदान करेंगे विद्यार्थी लाभ दे विद्याम धना अथी लाभ दे धनमंडी परम महा गनाधिपति जी की उपासना करता है उस विद्यार्थी को विद्या धन की इच्छा रखने वाले को धन मोक्ष की इच्छा रखने वाले को गति और संतान की इच्छा रखने वाले को संतान प्राप्ति का मार्ग खुल जाता है उचित है महादेव हम दोनों महा गनाधिपति जी की उपासना करेंगे ज श्री गणराज विद्या सुखदाता न दर्शन रा मन नमता जय देव जय [संगीत] देव प्रणम्य शिरसा देव गौरी पुत्रम विनायकम भक्ता वासम स्मर नित्यम माय कामा सिद्ध प्रथमं वक्रतुंड एकदंत द्वितीय कम तृतीय कृष्णम पिंगा क्म गज भत्र चतुर्थ कम लंबोदरम पंचम च शम विकट मेव च सप्तम विघ्न राजेंद्रम भूम्र वर्ण तथा स्कम नवम भाल चंद्र च दशम विनायकम एकादश गणपति द्वादश तु गजाननम द्वादश नामानि त्रिस नचा विन भयम तस सर्वा [संगीत] प्रभु प्रभु हमें दर्शन प्रदान करने के लिए आपको कोटि कोटि धन्यवाद कल्याण हे प्रभु हे देवव्रत हे सिद्धि दता जो सभी को ज्ञान सफलता और समृद्धि प्रदान करते हैं हे वरदान देने वाले वरा गणपति मुझे भी माता बनने का वरदान प्रदान कीजिए हे देवी लक्ष्मी आपकी ये मनोकामना अवश्य पूर्ण होगी किंतु उसके लिए आपको विधिवत अष्टविनायक की परिक्रमा यात्रा पूर्ण करनी होगी क्योंकि जो भी भक्त ऐसा करता है मैं उनकी इच्छा अवश्य पूर्ण करता हूं प्रभु अष्टविनायक की यात्रा करना तो मेरे लिए परम सौभाग्य होगा परंतु आप अष्टविनायक यात्रा की विधि का मार्ग दर्शन कीजिए अष्टविनायक यात्रा की विधि तो अत्यंत सरल है इस यात्रा में पूर्ण श्रद्धा से बना और बिना कहीं और जाए यथा शक्ति से दान पुण्य करते हुए अष्टविनायक कथा का वाचन और श्रवण के साथ सदाचार और सात्विक जीवन के नियमों पर स्थर रहकर जहां से यात्रा आरंभ हो वही उसका अंत करना होता है यात्रा के आरंभ और अंत में गुरुओ और ब्राह्मणों को भोज कराना भी अनिवार्य है अब आप निष्ठा से इस यात्रा को पूर्ण कीजिए तब आपका मनरस अवश्य सिद्ध होगा और अष्टविनायक यात्रा का आरंभ मयूरेश्वर से होता है फिर सिद्धि टेक के सिद्धि विनायक बलेश्वर वरद विनायक चिंतामणि गिरिजात्मज और अंत में महा गणपति मंदिर इस यात्रा का अंतिम पड़ाव है सभी अष्टविनायक दर्शन के उपरांत मयुरेश्वर लौटकर आप अपनी यात्रा संपन्न करेंगे और आपकी मनोवांछित कामना अवश्य पूर्ण होगी आपका कोटि कोटि धन्यवाद प्रभु आज से हम विधि विधान से अपनी यात्रा आरंभ [संगीत] करेंगे सप्त ऋषियों को भोजन और दान के बाद हमारी यात्रा आरंभ [संगीत] होगी [संगीत] गरुड़ [संगीत] जी चलिए गरुर [संगीत] जी [संगीत] देवी हम मयूरेश्वर धाम के निकट हैं यहां से हमें प्रभु महा गणाधीश [संगीत] अवश्य स्वामी सभी भक्तों के समान इस भक्ति यात्रा में जाना तो मेरा परम सौभाग्य [संगीत] होगा प्रभु मयुरेश्वर की जय मेरी भी यही कामना है कि देवी लक्ष्मी की यह यात्रा सफलता पूर्वक संपन्न हो और उन्हें भी पुत्र गणेश के समान संतान का सौभाग्य प्राप्त [संगीत] हो विधि का विधान तो अटल [संगीत] है स्वामी हम मयुरेश्वर धाम पहुंच गए अब यहां से हमारी यात्रा आरंभ [संगीत] होगी [संगीत] [संगीत] स्वामी प्रभु श्री मयुरेश्वर के अद्भुत रूप के बारे में मुझे बताने की कृपा [संगीत] कीजिए उचित है देवी मैं आपको प्रभु मयूरेश्वर श्री गणेश की कथा सुनाता हूं ओ गजानना नमः ओ लंबोदराय नमः आइए देवी आसन ग्रहण [संगीत] कीजिए श्री गणेशाय नमः मयुरेश्वर भगवान की कथा इस प्रकार है सतयुग में ऋषि कश्यप और देवी अदिति के पुत्र के रूप में मौत कट विनायक अवतार लेने के बाद प्रभु महा गनाधिपति जी त्रेता युग में ऋषि गौतम और देवी अहिल्या के आश्रम में महादेव और पार्वती के पुत्र के रूप में अपने मयूरेश्वर श्री गणेश अवतार में अवतरित हुए ओम नमः शिवाय ओम नमः शिवाय ओम नमः [संगीत] शिवाय ओम नमः [संगीत] शिवाय प्रणाम ऋषि कश्यप और देवी अहलिया सभी शिष्यों को किसी भी प्रकार के भेदभाव के बिना ज्ञान प्रदान करने के साथ धर्म का प्रचार करते थे किंतु धर्म और अच्छाई का संतुलन बिगाड़ने अधर्म और दुष्टता का जन्म होने वाला था भगवान अधर्म को मिटाने अच्छाई और बुराई में संतुलन स्थापित करने के लिए ही अवतार लेते हैं देवी और अब ऐसा समय था जब संसार में बुराई फिर अपना शीष उठाने वाली थी शौनक ऋषि के सुझाव पर असुर राज चक्र पाणी और उनकी पत्नी उग्र पुत्र प्राप्ति की कामना में सूर्यदेव की तपस्या आरंभ कर चुके थे सूय नम ओम सूर्याय नमः किंतु जब उनकी तपस्या उनके चरम पर पहुंची तो महारानी उग्रा से एक भूल हो गई जब दोनों पति पत्नी को सूर्यदेव के दर्शन प्राप्त होने लगे तो उनकी पत्नी सूर्यदेव के तेज से इतनी प्रभावित हुई कि एक पल के लिए उन्हें सूर्यदेव उनके पति के रूप में दिखने लगे ओम सूर्याय नमः ओ सूर्याय [संगीत] नम क्या हुआ [संगीत] प्रिय क्षमा महाराज क्षमा तपस्या करते-करते अचानक मुझे क्षणिक आभास हुआ जैसे आपके स्थान पर स्वयं सूर्यदेव हो किंतु ये ये उचित नहीं है रानी उग्रा सूर्यदेव के तेज से प्रभावित थी और सूर्यदेव की कृपा भी उन पर हुई किंतु रानी उग्र की इस भूल के कारण उनका पुत्र सिंधु क्रूरता का अभिप्राय बनने जा रहा था एव सिंधु के आतंक का अंत करने महा गनाधिपति अपना मयूरेश्वर अवतार लेने जा रहे थे आशावादी व्यक्तियों का हृदय आशा के प्रकाश से सदा प्रकाशित रहता है और यही प्रकाश व्यक्ति के भाग्य को प्रकाशित करता है

No comments:

Post a Comment

ॐ जय शिव ओंकारा आरती Sawan Special Om Jai Shiv Omkara हर हर महादेव Pen Bhakti

[संगीत] [प्रशंसा] ओम जय शिवा ओंकार स्वामी जय शिवा प्रभु जय शिवा ओमकारा [संगीत] ओम जय शिवा ओंकार [संगीत] [संगीत] हंसते गरुड़ तन हर...