[संगीत] महाभारत प्रणाम महारानी प्रणाम महाराज हे पुत यहां और मेरे निकट बैठो कि मैं तुम्हारे मुखड़े का तेज देख सकूं मुझे विस्तार से बताओ कि भीष्म पितामह द्रोणाचार्य कृपाचार्य जैसे मारती तुम्हारे बाणों की बरखा से कैसे भागते हुए दिख रहे थे और वह कण जो एक साथ सैकड़ों बाण चला सकता है तुमसे कैसे लड़ा युद्ध मैंने नहीं जीता है पिता श्री मैं तो शरद ऋतु में झड़ी हुई किसी पति की भांति रणभूमि से पवन के पंख लगाकर भाग खड़ा हुआ था फिर एक देवपुत्र ने मुझे रथ पर बिठाया मुझे अपना सारथी बनाया और मेरे स्थान पर उसने कुरु सेना से युद्ध किया हे पिता श्री यह उसके धनुष से निकले हु वाण थे जिन्होंने भीष्म द्रोणाचार्य कृपाचार्य अश्वथामा और कर्ण जैसे योद्धाओं के छके छुड़ा दिए यह विजय उसी की है पिता श्री मेरी नहीं और यही सत्य है संपूर्ण सत्य तो महायोद्धा कहां है पुत्र जिसने तुम्हारी और मेरे राज्य की रक्षा की उसके प्रति आभार प्रकट करना मेरा कर्तव्य है वह तो युद्ध के समाप्त होते ही लुप्त हो गए थे ब्रह नला हम तुमसे अति प्रसन्न है तुमने बड़े जोखिम में हमारे पुत्र का साथ दिया यह तो मेरा कर्तव्य था महाराज और यह तो राजकुमार की नम्रता है जो ऐसा कह रहे हैं इस विजय में यह बराबर के भागीदार हैं माना कि वह योद्धा भी युद्ध विद्या जानता था परंतु यदि सारथी निपुण ना हो तो कोई महारथी युद्ध नहीं जीत सकता महाराज किंतु तुमने तो उसे युद्ध करते देखा होगा कौन था वोह योद्धा पिता श्री पिता श्री यह देखिए गुरु योद्धाओं के वस्त्र यह लाल वस्त्र दुर्योधन के हैं यह नीले वस्त्र अश्वथामा के हैं और यह गुलाबी वस्त्र अंगराज कर्म के हैं उत्तरा अबे बालपन के खेल छोड़ो पुत्री गुड़ियों की खेल में लगी हुई हो यह तो स्वयं तुम्हारे ब्याह के दिन है मेरी पुत्री मुझ पर कोई बोझ नहीं है कि सदैव तुम उसे भगाने की योजना बनाती रहती हो आ तो क्या इसे बहाना ही नहीं है पुत्री तो पराया धन होती है आर्य पुत्र उसके प्रति इतना मोह ठीक नहीं पुत्री पराया धन होती है तो क्या किसी की झोली में डाल दूं पहले उसके योग्य कोई वर तो मिल जाए पुत्री अपनी माता श्री को कहने दे पुत्री उस दिन बड़ी होती है जिस दिन उसके योग्य कोई वर मिल जाए आज से अपने जाने के दिन गिनना आरंभ कर लो दीदी महाभारत महाभारत महाभारत महाभारत हो महाभारत [संगीत]
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