[संगीत] महाभारत अभी तक गुप्तचर भी नहीं लौटे कुमार को अकेले नहीं जाना चाहिए था तुमने जाने ही क्यों दिया उसे क्या तुम नहीं जानती थी कि क्रस सेना के साथ किसकिस के ध्वज आएंगे भीष्म द्रोणाचार्य कृपाचार्य इनमें से किसी एक को भी इंद्र तक नहीं ललकार सकते और उस सेना के साथ तो कदाचित तीनों ही आए होंगे आप युवराज की ओर से चिंतित ना हो महाराज कुमार के विजय लौटने के शुभ समाचार की प्रतीक्षा कीजिए बनला वह हराए गी गंगापुत्र भीष्म को द्रोणाचार्य को कृपाचार्य को दुर्योधन को तुम विक्षिप्त तो नहीं हो गए कंक बहला कोई धारण व्यक्ति नहीं है महाराज व क्लीफ नपुंसक वह तो पूरा व्यक्ति भी नहीं वह अधूरा व्यक्ति मेरे पुत्र की क्या रक्षा करेगा राज भवन के सारे दीप बझा दिए जाए कि हम अपने पुत्र की चिंता में हैं बधाई हो महाराज बधाई हो मैं तो मूंगे पन्ने की माला लूंगी किस बात की बधाई मूर्ख क्या समाचार लेकर आई है क्या यह समाचार कि मेरा पुत्र वीरगति को प्राप्त हुआ युवराज रण जीत करर लौट रहे हैं महाराज रण जीत कर क्या कह रही हो तुम यह ठीक ही कह रही होगी महाराज बृह नला जो साथ है युवराज के फिर वही बृह नला तुम्हें यह समाचार किसने दिया सारा नगर इस शुभ समाचार के वसंती रंग से होली खेल रहा है महाराज महाराज की ज सुना तुमने कुमार ने कुरु सेना कुरु सेना को पराजित कर दिया बहला तो विजय का ध्वज है ही महाराज राज भवन की ओर आने वाले मार्ग पर झंडे लगाए जाए देवी देवताओं की मूर्तियों को फूलों की माला से सुसज्जित किया जाए मत से देश के योद्धा राज परिवार के सारे सदस्य गायक और नर्तक कुमार के स्वागत के लिए जाएं और उसे सीधे मेरे पास लाएं ताकि मैं अपने विजय पुत्र के माथे पर चुंबन दे सकूं पुत्रा से कहा जाए कि वह अपने प्रिय अनुज के स्वागत के लिए राज भवन के द्वार पर प्रतीक्षा करें सररी पा से लाओ जो आज्ञा महाराज उत्तर के आने तक हम कंग के साथ चौसर खेलेंगे मादकता और द्यूत का कोई मेल नहीं है महाराज मादकता आनंद का अपना एक विशेष मद होता है महाराज तुम यही सोच रहे हो ना कि आज तुम मुझे हरा लोगे मैं आज तुमसे हारने के लिए ही खेलना चाहता हूं कं क्योंकि युद्ध में जो तुमने मेरी सहायता की थी उसका तुमने पारितोषिक नहीं लिया आज चौसर में मेरी पराजय ही तुम्हारा पारितोषिक होगा जो आज्ञा महाराज बैठो कं [संगीत] मैं यह सोच सोच कर फूला नहीं समारा कंग कि मेरे पुत्र ने भीष्म पितामह की सेना को पराजित कर दिया प्रीहन नला जैसा सारथी हो तो विजय पर आश्चर्य नहीं करना चाहिए महाराज दुष्ट ब्राह्मण उस नपुंसक से मेरे पुत्र की तुलना करता है भी द्रोणाचार्य कृपाचार्य अश्वथामा और कण जैसे योद्धा को व शन व क्लीव पराजित करेगा बहला से तो राजकुमार की तुलना हो ही नहीं सकती महाराज यह क्या कर रही हो महाराज की जय हो युवराज ने राज भवन में प्रवेश किया राजकुमारी उनकी आरती उतार रही है सुनो इसका प्रयत्न करो कि कुमार के साथ अर्जुन यहां ना आए क्योंकि तुम तो जानती हो वो मेरा बहता हुआ लन नहीं देख सकता वो महाराज को मार डालेगा जाओ चले जाओ [संगीत] उत्तरा दीदी आरती तो युवराज के विजय के पीछे पीछे राजकुमारी की गुड़ियों के लिए कुरु योद्धाओं के वस्त्र भी आए हैं सच हा बनला यह सुनाक तो तुमने मुझे बहुत प्रसन्न कर दिया धन्यवाद [संगीत] आप कैसे हैं तुम कैसी हो [संगीत] सर्री आओ पुत्र आओ आयुष्मान भव [संगीत] पिता श्री इन्हे क्या हुआ इस दुष्ट को मैंने मारा है पुत्र आपने मैं महाराज की ओर से क्षमा चाहता हूं मैंने तो उन्हें चोट लगने से पहले क्षमा कर दिया था युवराज किंतु यदि मेरे रक्त की एक बूंद भी इस भूमि पर टपक गई होती तो इस राज्य की सीमा रेखा मिट गई होती और मैं यह नहीं चाहता था क्योंकि इस राज्य ने मुझे तब आश्रय दिया था जब मुझे इसकी आवश्यकता थी लहू धर्म का जब गिरे करे धरा का ना सर्री आगे बढ़ी लिए धर्म विश्वास लिए धर्म [संगीत] विश्वास प्रणाम महारानी प्रणाम महाराज हे पुत यहां और मेरे निकट बैठो कि मैं तुम्हारे मुखड़े का तेज देख सकू मुझे विस्तार से बताओ कि भीष्म पितामह द्रोणाचार्य कृपाचार्य जैसे मारती तुम्हारे बाणों की बरखा से कैसे भागते हुए दिख रहे थे और वह कण जो एक सा सैकड़ों बाण चला सकता है तुमसे कैसे लड़ा युद्ध मैंने नहीं जीता है पिता श्री मैं तो शरद ऋतु में झड़ी हुई किसी पति की भाति रणभूमि से पवन के पंख लगाकर भाग खड़ा हुआ था फिर एक देवपुत्र ने मुझे रथ पर बिठाया मुझे अपना सारथी बनाया और मेरे स्थान पर उसने कुरु सेना से युद्ध किया हे पिता श्री यह उसके धनुष से निकले थे जिन्होंने भीष्म द्रोणाचार्य कृपाचार्य अश्वथामा और कर्ण जैसे योद्धाओं के छके छुड़ा दिए यह विजय उसी की है पिता श्री मेरी नहीं और यही सत्य है संपूर्ण सत्य तो महायोद्धा कहां है पुत्र जिसने तुम्हारी और मेरे राज्य की रक्षा की उसके प्रति आभार प्रकट करना मेरा कर्तव्य है [संगीत] वह तो युद्ध के समाप्त होते ही लुप्त हो गए थे ब्रह नला हम तुमसे अति प्रसन्न है तुमने बड़े जोखिम में हमारे पुत्र का साथ दिया यह तो मेरा कर्तव्य था महाराज और यह तो राजकुमार की नम्रता है जो ऐसा कह रहे हैं इस विजय में यह बराबर के भागीदार हैं माना कि वो योद्धा भी युद्ध विद्या जान था परंतु यदि सारथी निपुण ना हो तो कोई महारथी युद्ध नहीं जीत सकता महाराज किंतु तुमने तो उसे युद्ध करते देखा होगा कौन था वह योद्धा पिता [संगीत] श्री पिता श्री यह देखिए गुरु योद्धाओं के वस्त्र यह लाल वस्त्र दुर्योधन के हैं यह नीले वस्त्र अश्वथामा के हैं और यह गुलाबी वस्त्र अंगराज कर्म के हैं उत्तरा अभी बालपन के खेल छोड़ो पुत्री गुड़ियों के खेल में लगी हुई हो यह तो स्वयं तुम्हारे ब्याह के दिन है मेरी पुत्री मुझ पर कोई बोझ नहीं है कि सदैव तुम उसे भगाने की योजना बनाती रहती हो आ तो क्या इसे बहाना ही नहीं है पुत्री तो पराया धन होती है आर्य पुत्र उसके प्रति इतना मुह ठीक नहीं पुत्री पराया धन होती है तो क्या किसी की झोली में डाल दूं पहले उसके योग्य कोई वर तो मिल जाए पुत्र पुत्री अपनी माता श्री को कहने दे पुत्री उस दिन बड़ी होती है जिस दिन उसके योग्य कोई वर मिल जाए आज से अपने जाने के दिन गिनना आरंभ कर लो दीदी महाभारत महाभारत महाभारत महाभारत महाभारत i
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