Sunday, 28 December 2025

देवी मनसा को कैसे मिली देवी की उपाधि Ishita Vighnaharta Ganesh Episode 817 Pen Bhakti

[संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [संगीत] ओ [संगीत] [संगीत] देव गुरु बृहस्पति जी यज्ञ आरंभ कीजिए मां मंसा देवी की जय [संगीत] ओम भूर भुव स्व अमृता गाय विद महे कला रूपाय धीमहि तन्नो सोमो प्रचोदयात दद शंख तुषारा ॐ शाम श्रीम श्रम सह चंद्र मसे [संगीत] नमः [संगीत] ओम जय मंसा नेवी मैया जय मंसा देवी तुमको निश दिन ध्यावत तुमको निश दिन ध्यावत सुर मुनि ऋषि गणरी ओम जय मंसा देवी ओम जय मनसा देवी मैया जय मनसा [संगीत] देवी तुमको निश दिन जावत तुमको निश दिन जावत सुर मुनि ऋषि गणरी ओम जय मनसा देरी कनक मान कलेवर रता धारी मैया रता [संगीत] धारी नाग पुष्प गल माला नाग पुष्प गल माला चूड़ा मणि धारिणी ओम जय मंसा [संगीत] देवी ओ जय मंसा देवी मैयो जय मंसा देवी तुमको निश दिन ध्यावत तुमको निश दिन ध्यावत सुर मुनि ऋषि गण री ओम जय मंसा देवी ओम जय मंसा देवी मैया ज सा देरी तुमको निश दिन जावत तुमको नि दिन जावत रमुनि ऋषि गणरी ओम जय म मसा देवी की जय मा मंसा देवी की [संगीत] [प्रशंसा] जय [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [संगीत] मंगल मंग मा मंसा देवी यही समझाना चाहती है ना आप कि मैं शिव भक्ति छोड़कर आपका मैं आपकी पूजा कभी नहीं करूंगा हे मा देवी मंसा मैं तो क्षमा मांगने के योग्य भी नहीं जिस मुख से मैंने बारबार आपका अपमान करने की मूर्ख खी उस मुख से मैं मैं क्षमा कैसे मांगूं मां अपनी भक्ति के अहंकार में मैं इतना डूब गया था कि आपके आपके देवी स्वरूप को देखने में असमर्थ था मैं देवी नहीं मां के रूप में अनेकों बार आपने मुझे उचित मार्ग पर लाने का प्रयास किया किंतु मैं सदा भटकता सदा भटकता [संगीत] [संगीत] [संगीत] आ हे देवी मा मंसा आप तो मां है और मां का हृदय तो विशाल होता है संभव हो तो मेरी सभी भूलों के लिए मुझे क्षमा कर दीजिए मां क्षमा कर दीजिए मुझे चंद्रधर अपनी भूल को समझकर यदि कोई उससे सीख ले उसे सुधार कर ले तो इससे अच्छा क्या हो सकता है और भोर का भोला यदि संध्या को घर लौट आए तो उसे भोला नहीं कहते चंद्रधर मैंने तुम्हें बहुत पहले ही क्षमा कर दिया था कोटि कोटि धन्यवाद आपके इस क्षमा रूपी उपकार के लिए और आपके दिव्य दर्शन की कृपा के लिए मुझे मेरी भूल सुधारने का अवसर प्रदान करने के लिए आपको कोटि कोटि धन्यवाद मां कोटि कोटि धन्यवाद धन्यवाद मेरा चंद्रधर बेहुला का करो जो तुम्हारे जीवन में वह प्रकाश की किरण बनी जिसने तुम्हारे अहंकार के अंधकार को दूर कर दिया जिसने तुम्हें निर्मल भक्ति के पथ पर लौटने के लिए प्रेरित किया बेहुला ने जो किया उसके लिए मैं उसे आशीर्वाद दे चुकी हूं भविष्य में उसके नाम पर उत्सव मनाया जाएगा आज देवी पद पाने के पश्चात मैं घोषणा करती हूं बेहुला के उत्सव में जो भी श्रद्धा से मेरी पूजा कर व्रत रखेगा मेरे मंदिर की यात्रा करेगा उसे सौभाग्य की प्राप्ति होगी सुहागन के सुहाग की आयु में वृद्धि होगी अन्य सभी भक्तों को किसी भी प्रकार के विष और सर्पों और नागों के प्रभाव से अभयदान मिलेगा विवाह और जीवन में कठिनाइयों को लाने वाले महा पातक काल सर्प योग के प्रभाव से मुक्ति मिलेगी मा आपकी कृपा तो आरम से ही मेरे ऊपर बनी रही है उसके लिए आपको कोटि कोटी धन्यवाद मैंने जो किया उसका श्रेय मुझे नहीं ही मेरे माता-पिता को जाता है मुझे सफल बनाया उनके विश्वास में आपके आशीर्वाद में और गजानन महाराज के मार्गदर्शन में हां पुत्री गजानंद महाराज को तो हर शुभ कार्य का शे जाता है उन्होंने केवल तुम्हारी ही नहीं पुत्री मेरी भी सहायता की है क्योंकि तुम्हारे गजानंद महाराज मेरे भ्राता है प्रथम पूज्य विघ्न हरता गणेश [संगीत] है आपकी देवी मंसा को देखने की इच्छा अवश्य पूर्ण होगी गणपति मैं आपके मार्ग के विघ्न को दूर कर दूंगा बिहुला प्रणाम प्रभु अहो भाग्य हमारे जो स्वयं विघ्न हरता हमारे सहायक बने प्रभु आपकी कृपा दृष्टि से ही हम सभी विघ्नों को दूर कर पाए अब जब आप स्वयं हमारे मध्य है तो आपका आशीर्वाद हमें प्राप्त तो भ में भी हमारे जीवन में सुख और समृद्धि रहेगी आपके आशीर्वाद के लिए आपको कोटि कोटि नमन [संगीत] [संगीत] प्रभुता गणेश की क के बिना कोई कार्य कहां पूर्ण होता है विघ्नहर्ता यदि आप मेरे मार्ग की विघ्न को दूर नहीं करते तो मेरे कार्य भी संपन्न नहीं होते भ्राता गणेश के कारण ही आज मुझे यह उपाधि प्राप्त हुई है मैं आपको वचन देता हूं दीदी आपके देवी पद की प्राप्ति में मैं आपकी सहायता करूंगा इसलिए जो गणेश के करेगा वो मेरी भी कृपा का भागी बनेगा और गणेश के भोग के पश्चात ही मुझे भोग चढ़ाया जाएगा विघ्न हर्ता श्री गणेश की जय विघ्न हर्ता श्री गणेश की जय मां मंसा देवी की जय मां मंसा देवी की जय मां मंसा देवी की जय मा मंसा देवी की जय अनुज गणेश तुमने मेरे लिए जो कुछ भी किया उसके लिए कोटि कोटि धन्यवाद धन्यवाद तो मुझे करना चाहिए दीदी मंसा आपको अनेकों धन्यवाद क्योंकि जब भी आपको भोग चढ़ेगा मुझे भी भोग मिलेगा और अभी तो मुझे बहुत भूख लगी है अनुज तो चिंता किस बात की भोग तो तैयार है मैं सभी के लिए आसन लगा देता हूं आसन तो लग चुके हैं पुष्पदंत जी आप अपने कार्य पर ध्यान देते आप निश्चिंत रहिए भिंगे जी महादेव जी के मुख्य द्वारपाल से कभी कोई चूक नहीं होती अच्छा तो हमसे कौन स चूक होती है आइए विगनहर्ता गणेश भोजन के लिए स्थान ग्रहण कीजिए हां दीदी यह लीजिए गणेश जी यह क्या है मौसी सदा के समान मैंने आज भी आपके लिए कुछ विशेष बनाया है आप इसी पर बैठ के भोग ग्रहण कीजिए अद्भुत है सुंदर है किंतु छोटा है मौसी आपका गणेश अब थोड़ा बड़ा हो गया है आप सदा मुझे छोटे आकार के उपहार क्यों देती हैं मौसी क्षमा करो पुत्र मैं क्या करूं आप तो मुझे बाल रूप में ही दिखाई देते हैं मैं कुछ भी बनाने जाती हूं तो आपके बाल अवस्था की छवि मेरे ध्यान में आती है और आकार छोटा ही रह जाता है फिर यह मुझ मुझे लौटा दीजिए मैं बड़ा बनाकर ले आती हूं इस बार कोई भूल नहीं करूंगी नहीं मौसी यह तो आपको कभी नहीं लौटा उंग मैं यह मुझे मेरी मां जैसी मांसी ने जो दिया है और जो मां देती है वह छोटा बड़ा कैसा भी हो पुत्र को तो सदा प्रिय होता है इसलिए आज मैं इसी पर बैठकर अपना भोजन ग्रहण करूंगा किंतु मौसी मुझे एक और उपहार देना होगा आपको उपहार कैसा उपहार अपने हाथों से भोजन कराने [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] का दीदी प्रतीक्षा मत कीजिए यह आपका प्रिय भोजन है मैंने कहा था ना अनुज प्रथम भोग मेरे प्रिय भ्राता विघ्नहर्ता गणेश को ही चढ़ेगा भोजन ग्रहण [संगीत] करो [संगीत] थोड़ा और चाहिए [संगीत] मुझे यह लो [संगीत] पुत्र किंतु जया यह तो प्रसाद का तुम्हारा आग है तुमने गणेश को क्यों दे दिया आप चिंता ना करें देवी पार्वती गणेश को भोग लगाते देख मेरा पेड़ तो स्वयं भर जाएगा और वैसे भी स्वयं से अधिक आनंद तो मुझे गणेश को खिलाने में आता है मां का पेट तो पुत्र को खाते देखकर ही भर जाता [संगीत] है आप खाइए ना सत्य कहा आपने दोस्तों के साथ बांटने से आनंद का अनुभव और बढ़ जाता है सुख बांटने से बढ़ता है तो दुख बांटने से घटता भी है मौसी जिस प्रकार आज आपने अपना भोजन मुझे देकर अपना आनंद बांटा है वैसे ही एक दिन मैं आपसे आपका दुख बाटूंगी आपका हृदय बहुत विशाल है जया मौसी आप क्यों प्रसन्न हो पुष्पदंत जी य प्रशंसा आपकी धर्म पत्नी की हो रही है आपकी नहीं हो रही है और इनकी प्रशंसा होगी भी नहीं उनका दात पलेग दात उदल देखिए प जल तो सब बह गया अब मैं क्या करू आप अपने कार्य से अधिक दूसर के कार्य पर ध्यान देते हैं हा तो उसका तो यही परिणाम होगा अब तो पानी पानी होना पड़ेगा आपको किंतु पानी किसी को नहीं दे सकेंगे स्वामी का ऐसा अपमान उचित [संगीत] नहीं [संगीत] जया अरे हम शिव गढ़ों के बीच में तो हास परिहास होता ही रहता [संगीत] है अरे अब यह भोजन किसके लिए बना रही हो जया [प्रशंसा] [संगीत] अब देखो जया अब मैं क्या करता हूं आप हमेशा ऐसा कार्य क्यों करते हैं जिससे दूसरों को आप पर हंसने का अवसर मिले देखा [संगीत] जाओ आपको तो चोट लगी [संगीत] है ये छोटी मोटी चोट शिव गण के लिए कुछ भी नहीं है यह तो बिल्कुल ठीक हो जाएगी बस तुम एक बार हसतो [संगीत] तो मुस्कुरा दो तो हम ठीक हो जाएंगे पिता श्री माता अब मुझे भी जाने की आज्ञा [संगीत] दीजिए [संगीत] तुम जाना चाहती हो पुत्री अपनी मां के पास कुछ दिन कैलाश में रुकोगी नहीं माता रुकना तो मैं भी चाहती हूं किंतु देवी पद के दायित्व तो मुझे निभाने ही होंगे जाना तो मुझे होगा ही ना माता उचित है किंतु भ भाती मुझे अपने आपको को विदा करने का अवसर तो [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] दो [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [संगीत] [संगीत] हो [संगीत] माता दीदी कैलाश में चावल के दाने क्यों फेंक रही है पुत्री जब माइके से विदा होती है तो उस विधि का अर्थ है कि वो माइके का धन माइके में ही छोड़कर जा रही है जिससे वहां पर सुख और समृद्धि सदैव बनी [संगीत] रहे प्रिय मां मंसा देवी विदा हो [संगीत] गई उनके जाने से पहले मुझे उनके दर्शन भी नहीं मिले उचित समय पर उचित कार्य नहीं करेंगे तो यही होगा बस उपहास के पात्र बनेंगे आप ऐसा नहीं है प्रिय तुम्हारे लिए यह बनाने को पुष्प चुनने गया था मैं इसलिए आने में विलंब हुआ प्रिय अपने प्रिय पत्नी के केसों में यह गजरा लगाने की अनुमति तो दे [संगीत] दो [संगीत] अच्छा हुआ जो तुमने अपना क्रोध त्याग दिया नहीं तो तुम्हें मनाने में मुझे अपने कार्य पर जाने में विलंब हो जाता जो उचित नहीं है महादेव के मुख्य द्वारपाल को यह शोभा नहीं देता ये क्या कुछ नहीं बस हल्की सी खरोच है हां पुष्प चुनते समय काटों में हाथ डाल दिए होंगे आगे से ध्यान रखूंगा ध्यान तो रखिए ही किंतु मैं क्या चाहती हूं वो भी सुनिए मैं चाहती हूं आप सबसे श्रेष्ठ बने सबसे बुद्धिमान बने प्रिय मैं सबसे श्रेष्ठ हूं सबसे बुद्धिमान हूं तभी तो इतना बड़ा दायित्व मिला है मुझे महादेव जी के द्वार का मुख्य द्वारपाल हूं मैं अब ऐसे मुंह फेर लोगी तो हम तो बात ही नहीं कर सकेंगे और हमें अपने कार्य में जाने में विलंब हो जाएगा अधिक नहीं एक दो बोल प्रेम के ही बोल दो किसी भी पत्नी को अपने पति का उपहास होते देखना अच्छा नहीं लगता अब आप जब तक अपनी योग्यता और श्रेष्ठता प्रमाणित नहीं करते मैं आपसे बात नहीं करूंगी श्रेष्ठ हू योग्य भी हूं प्रमाणित कैसे करूं प्रथम पूज्य गणेश जी के पास इसका उत्तर अवश्य होगा प्रभु प्रभु आपसे एक प्रश्न पूछना है मेरी सहायता करेंगे ना आप परंतु अधिक समय नहीं है मेरे पास बोलिए पुष्पदंत जी मैं अपने को श्रेष्ठ प्रमाणित करूंगा तभी मेरी पत्नी जया मुझसे वार्तालाप करेगी इसके लिए मुझे बहुत बल की आवश्यकता है आपके सुझाव से ये संभव हो सकेगा श्रेष्ठ होने के लिए बल नहीं बुद्धि आवश्यक है ज्ञान ही श्रेष्ठता प्रदान करता है उचित है पार्वती नंदन आपको अनेकों धन्यवाद [संगीत] जो ज्ञानी है वही श्रेष्ठ है मुझे सभी शिव गणों से अधिक ज्ञान प्राप्त करना होगा किंतु कैसे कैसे करूंगा मैं ज्ञान अर्चित कहां से मिलेगा मुझे ज्ञान ये लो ज्ञान के भंडार हैं जगतपिता महादेव और माता पार्वती और मैं मैं उनके द्वार का मुख्य द्वारपाल हूं तो व्यर्थ विचार क्यों कर रहा हूं मैं उनके तो हर शब्द में ज्ञान होता है तो मैं यहां खड़ा होकर क्या कर रहा हूं थोड़ा और उनके निकट जा करर के सुनता हूं ज्ञान के भंडार अपने आप ही खुल जाएंगे यह उचित नहीं है अरे यह कैसा पाप करने जा रहा था पुष्पदंत प्रभु और माता एकांत में है मुझे ताक झाक नहीं करनी चाहिए किंतु सुनने में तो कोई दोष [संगीत] नहीं स्वामी आज मैं बहुत प्रसन्न ह इतने कष्टों संघर्षों और परीक्षाओं के पश्चात हमारी पुत्री मनसा को देवी पद प्राप्त हुआ है और किसी देवी को इतने कष्टों का सामना नहीं करना पड़ा होगा प्रिय संघर्ष और कष्ट तो आपने भी देखे हैं इस जीवन में भी और इससे पहले भी जब देवी सती के रूप में आपका आविर्भाव हुआ [संगीत] था किंतु इस सबका सार है शत सुखे शु कालेश त्यागो अमृत निर्झरा अर्थात सुख अल्पकालिक होते हैं कुछ ही समय में मिट जाते हैं किंतु निस्वार्थ भाव से किए ग तद अमृत की अनंत धारा के समान होते हैं जो व्यक्ति को श्रेष्ठ नहीं पूजनीय भी बनाते हैं प्रिय प्रिय कल गणेश जी ने मुझे श्रेष्ठ होने का रहस्य बताया पता है वो क्या है वो ज्ञान है ज्ञान से ही कोई इंसान श्रेष्ठ बनता है देखिए अब समय व्यर्थ मत कीजिए अब जब तक आप अपनी श्रेष्ठता प्रमाणित नहीं करते हमारे पास मत आइएगा इसमें प्रमाणित क्या करना है प्रिय मैं श्रेष्ठ हूं पता है क्यों क्योंकि मुझे वो रहस्य ज्ञात है जो किसी को भी ज्ञात नहीं ना भृंगी ना तोतला और यहां तक के नंदी जी को भी नहीं पता और प्रिय अरे आप यहां क्या कर रहे हैं मुख्य द्वारपाल जी जाके सो जाइए रात्रि भर द्वार रक्षा जो की आपने उलूक समान आंखे लग रही है आपकी उलूक तो है तभी तो उलूक समान वाला है बस बहुत हुआ आप सभी के उपहास के पात्र नहीं है यह आप सभी से अधिक ज्ञानी है अच्छा तो हम भी तो ने ऐसा क्या ध्यान पिलाते इने जो हमारे पास नहीं है इन्हें ज्ञात है कि स्वामी आप स्वयं ही बताइए है इस बार ऐसी बात ना कहिए स्वामी जिससे फिर आप उपहास के पात्र बने मुझे ज्ञात है मुझे ज्ञात है माता पार्वती अपने पूर्व स्वरूप में माता सती प्रजापति दक्ष की पुत्री थी वो इसमें नवीन क्या है यह तो सर्व ज्ञात है नवीन वो ज्ञान है जो सभी से गुप्त है सुष्य सुखे शु कालेश त्यागो अमृत निर्झरा सुख अल्पकालीन होते हैं जो कुछ ही समय में नष्ट हो जाते हैं किंतु स्वार्थ भाव से किया हुआ त्याग अमृत की धारा के समान होते हैं जो व्यक्ति को श्रेष्ठ ही नहीं पूजनीय बनाते [संगीत] हैं यह तो प्रभु के शब्द है जो कल रात्र उन्होंने मुझसे कहे [संगीत] थे क्या हुआ प्रिय प्रभु कल रात्र जो निस्वार्थ त्याग की महिमा आपने मुझसे जो कही थी क्या वो कभी आपने पुष्प दन से भी कही अन्यथा आपके शब्द उसके मुख से कैसे सुने मैंने कोष दन शुद्ध ज्ञान की प्राप्ति अध्ययन और उसके प्रति समर्पण से ही संभव है

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