Sunday, 28 December 2025

देवी मनसा के विवाह का उद्देश्य क्या था Ishita Malkhan Vighnaharta Ganesh Ep 790 Pen Bhakti

[संगीत] धा [संगीत] सबसे [संगीत] अद्भुत है मनसा का यह रूप अवश्य उसके पीछे कोई उद्देश्य छुपाए समय के अनुसार ही घटती है और व्यक्ति के उद्देश्य को पूर्ण करती [संगीत] है असंभव को संभव किया है मनसा ने हलाल के विषैले प्रभाव को दूर कर मंसा ने उसे महादेव के लिए सहनी बना दिया [संगीत] है पुत्री पुत्री मंसा पुत्री मंसा तुमने ये क्या किया स्वयं को इतने कष्ट में क्यों डाला पिता श्री संतान कोई भी हो उसका परम कर्तव्य और धर्म माता पिता का कष्ट दूर करना होता है मुझे जो करना चाहिए था मैंने ही किया पिता श मैंने अपना [संगीत] ध और कर्तव्य निभाया कर्तव्य नि संतान अपने माता पिता का मान बढ़ाती है अपने सुखों का भी त्याग कर उनके जीवन के सभी दुख दूर करती है उन्हे हर समय हर प्रकार के सुख देती है ऐसी संतान प्रशंसा के ही नहीं अतु वरदान की योग्य है पुत्री मंसा मैं तुम्हें वरदान देता हूं कि तुम पर कभी भी किसी प्रकार के विष का कोई प्रभाव नहीं होगा कि तुम पर कभी भी किसी प्रकार के विष का कोई प्रभार नहीं [संगीत] होगा जो सभी की पीड़ा हर हैं तुमने उनकी पीड़ा हर संसार के सामने अत्यंत श्रेष्ठ उदाहरण प्रस्तुत किया है पुत्री ऐसे विष को ग्रहण किया है आपने जिसे समस्त संसार में एकमात्र देवाधि देव महादेव ही ग्रहण कर सके हैं इसलिए आज से आप विष हरि के नाम से भी जानी जाएंगे जिस पर आपकी कृपा दृष्टि होगी वह सभी प्रकार के विष के प्रभाव से मुक्त होगा हे ब्रह्मदेव हे श्री हरि नारायण आपके वरदान के लिए कोटि कोटि धन्यवाद किंतु मैंने तो केवल अपना कर्तव्य निभाया है जिसके लिए मैंने कोई भी वरदान पाने की अपेक्षा नहीं की थी पुत्री अपने पिता के प्रति ऐसा अपार प्रेम ऐसी निष्ठा अत्यंत दुर्लभ है निस्वार्थ भाव से अपना सर्वस्व यहां तक कि अपने प्राणों को त्याग करने को तत्प रहने वाली पुत्री तो सभी वरदान के अधिकारी है किंतु तुम्हे एक अधिकार से वंचित रहना होगा तुम्हें कैलाश में वास करने के अधिकार का त्याग करना होगा तुम्हें यहां से जाना होगा होगा जा पुत्री मंसा को कैलाश से जाना [संगीत] होगा मैं तो बस यही कामना करती हूं माता कि मैं इसी प्रकार आप दोनों की छत्र छाया में [संगीत] रहो मुझे जाना होगा किंतु क्यों पिताश्री इतने समय के पश्चात मुझे आप दोनों के साथ रहने का सुख प्राप्त हुआ था उससे आप मुझे वंचित कर रहे हैं बताइए ना पिताश्री अब तुम यहां पहुंच गई हो अब तुम सदैव यही रहोगी हमारे साथ माता माता आप ही बताइए ना आपने तो कहा था ना कि मैं सदैव आप दोनों के छत्रछाया में रहूंगी मुझसे कोई भूल हुई है [संगीत] माता तो मुझे क्षमा कर दीजिए मुझे क्षमा कर दीजिए माता किंतु कृपया मुझे आप दोनों से दूर जाने का आदेश मत दीजिए नहीं पुत्री अब तुम्हारा यहां रुकना असंभव है रा यहां से जाना तुम्हारी निय किंतु माता यह पिता श्री का कैसा न्याय था जिस कार्य के लिए दीदी को वरदान मिले सभी की सराहना की पात्र बनी वो उसके परिणाम स्वरूप पिता श्री उन्हें यह कैसा दंड दे रहे थे ऐसा क्या किया था उन्होंने समय और संघर्ष के अनुसार शब्दों का अर्थ बदल जाता है पुत्र उस समय स्वामी के वो शब्द मुझे भी के समान चुबे थे मुझे भी कुछ उचित नहीं लगा था किंतु वो एक पिता है और संतान का उचित मार्गदर्शन पिता का परम धर्म होता है तो स्वामी भी अपना धर्म निभा रहे थे नहीं पुत्री ना ही तुम्हारा दोष है ना हीय कोई दंड हम यह जानते हैं कि पुत्री की निष्ठा और सेवा पुत्र से कहीं अधिक होती है विवाह के उपरांत भी वो अपने माता-पिता की कुशलता के लिए कामना करती ही रहती है किंतु किसी भी माता-पिता को अपनी संतान के उद्देश्य में बाधा नहीं बनना चाहिए यदि तुम यहां रहोगी तो अपने उद्देश्य के प्रति जागरूक नहीं रह सकोगी इसीलिए तुम्हें जाकर अपना तप पुनः आरंभ करना होगा तभी तुम्हें तुम्हारे जीवन के अगले उद्देश्य का मार्ग दिखाई देगा जिस प्रकार पिछली बार तुम्हारे तप के संपन्न होने के समय तुम्हारी भेंट मुझसे हुई थी उसी प्रकार इस बार भी तुम्हारे किसी से भेट का संयोग बनेगा जो तुम्हारे जीवन के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण होगा विशेष [संगीत] होगा यदि यही आपका आदेश है पिताश्री [संगीत] तो आपकी पुत्री आपके आदेश का पालन अवश्य ही करेगी मैं यहां से प्रस्थान कर पूर्ण निष्ठा के साथ अपना तप संपन्न करूंगी पिताश्री मुझ पर एक और कृपा करें मैं किसका नाम लेके तप करो मुझे मार्गदर्शन दीजिए पिताश्री [संगीत] पुत्री मेरे आराध्या तो स्वयं श्री हरि नारायण है मैं उनके तारक नाम राम का जाप करता हूं तुम उनके श्री कृष्ण नाम का जाप करो उससे तुम्हारा कर्तव्य तुम्हारा उद्देश्य और उसके लिए उचित कर्म तुम्ह स्पष्ट होते जाएंगे और तुम भली भाति अपने कर्तव्यों को निभाने का सामर्थ्य प्राप्त कर सकोगी तुम्हारे तप के लिए मैं तुम्हें उचित मंत्र भी दूंगा जिसे कल तरू कृष्ण मंत्र पुकारा जाएगा ओ श्रीम ह्रीम क्म कृष्णाय [संगीत] नमः अपने पिता श्री प्रभु महादेव से कलत परू कृष्ण मंत्र प्राप्त कर पुत्री मनसा ने तनक भी विलंब नहीं किया वो उसी क्षण अपने तप के लिए पुष्कर चली गई और अपना तप आरंभ किया ओ श्रीम रीम क्लीम कृष्णाय नमः माता हलाहल विष के प्रभाव से पिता श्री को मुक्त करने से अधिक बड़ा उद्देश्य और क्या हो सकता है जिसके लिए दीदी मंसा को तप करने जाने पर विवश होना पड़ा पुत्र स्मरण करो महर्षि कश्यप ने क्या कहा था पुत्री मंसा का जन्म एक नहीं अनेकों उद्देश्य की पूर्ति के लिए हुआ था और उसके जीवन का अगला उद्देश्य था नागों का उद्धार समुद्र मंथन से एक दिव्य अश्व भी निकले थे वो स्मरण है ना तुम्हें पुत्र हां माता उच्च शरवा उसी उच्चे शरवा को लेकर एक विचित्र घटना हुई पुत्र महर्षि कश्यप की दोनों पत्नियां सर्पों की माता कदरू और गरुड़ की माता विनीता दोनों में शर्त लगी देवी कदरू का मानना था कि उच्च शरवा अश्व की पूंछ काली थी और देवी विनीता के अनुसार उजली और इस विवाद के कारण उन दोनों ने एक शर्त लगा ली देवी विनेता उच्च शवा अश्व को लौटने दीजिए फिर आपको मेरी सेविका बनने पर विवश होना ही पड़ेगा सेविका तो आपको बनना होगा क्योंकि जो मुझे ज्ञात है वही सत्य प्रमाणित होगा किंतु शीघ्र देवी कदरू को आभास हुआ कि उनकी दृष्टि से भूल हुई कि अश्व उच्च शरवा की पूंछ उजली ही थी तो स्वयं को देवी विनीता की सेविका बनने के अपमान से बचाने के लिए उन्होंने अपने सभी पुत्रों यानी नागों को एकत्रित कर एक अनोखा आदेश दिया [संगीत] प्रणाम मा प्रणाम माद अब इस शर्ट पर विजय पाने के लिए तुम सबकी सहायता की आवश्यकता है मुझे उच्च शवा अश्व जब फिर यहां से जाएंगे तो तुम सब उनकी पूछ पर लिपट जाना जिससे उसका रंग काला दिखाई दे किंतु मां क्या यह उचित होगा तो क्या यह उचित होगा कि तुम्हारी मां शर्त में पराजित होकर देवी विनीता के सामने सदा के लिए उनकी सेविका बनकर रहे क्या यही चाहते हो तुम लोग नहीं मां यह धर्म की विरुद्ध है हम यह पाप नहीं कर सकते शांत हो जाओ तुम सब अपनी मां का आदेश मानने के स्थान पर उनसे प्रश्न कर रहे हो ऐसे पुत्रों से तो पुत्र ना ही हो तो ही अच्छा है मैं तुम्हें श्राप देती हूं पांडवों के वंशज महाराज परीक्षित के पुत्र महाराज जन्म जय सर्प यज्ञ करेंगे उस यज्ञ अग्नि में गिरकर तुम सबका अंत होगा देवी कदरू यह क्या कर दिया आपने देवी क्रोध एक ऐसा श्राप है जो मनुष्य स्वयं को देता है और आपने अपने क्रोध के आवेश में अपने पुत्रों के वंश के नष्ट होने का ही श्राप दे दिया मैं तुम्ह श्राप देती हूं तुम सब का अंत होगा मां मैं अपने सभी भ्राता हों की ओर से आपसे क्षमा मांगता हूं हम आपका अपमान नहीं करना चाहते थे मां बस आपको अनुचित मार्ग पर जाने से रोकने के लिए सचेत कर रहे थे यह तो माता कदरू से बहुत बड़ी त्रुटि हो गई श्राप को लौटाने का तो कोई उपाय नहीं होता और यदि यह श्राप फलित हो जाता तब तो सभी सर्प मारे जाते तो फिर इस परि स्थिति से बचने का क्या उपाय था माता एक उपाय है क्या उपाय है माता महाराज जन्म जय का यज्ञ अत्यंत शक्तिशाली होगा जिसके प्रभाव से नागों की रक्षा कोई तपो शक्ति ही कर सकती है इसके लिए कोई तपस्वी कन्या जिस पर किसी भी प्रकार के विष का कोई प्रभाव ना हो वो ब्रह्मचारी ऋषि से विवाह कर एक दिव्य संतान प्राप्त करें तो वही दिव्य संतान महाराज जन्म जय के यज्ञ के प्रभाव से मेरे पुत्रों नागों की रक्षा कर सकेंगे अर्थात माता कदरू के नाग पुत्रों को इस श्राप से दीदी मंसा का पुत्र ही बचा सकता था हां पुत्र ऋषि कश्यप की मानसिक कल्पना से मंसा की उत्पत्ति का यह भी एक प्रमुख कारण था किंतु अभी किसी योग्य ब्रह्मचारी ऋषि से उनका विवाह होना शेष था किंतु उसके लिए दीदी मंसा को तप पर जाने की क्या आवश्यकता थी क्योंकि जैसे स्वामी ने कहा था इसी तप के परिणाम स्वरूप पुत्री मनसा की भेंट उसके योग्य वर से होने वाली [संगीत] थी [संगीत] ॐ श्रीम रीम क्लीम कृष्णाय नमः ओ श्रीम ह्रीम क्लीम कृष्णाय नमः ॐ श्रीम रीम क्रीम कृष्णाय नमः ॐ श्रीम रीम कृष्णाय नमः ओ श्रीम ह्रीम क्रीम कृष्णाय [संगीत] नमः [संगीत] पिछली बार तुम्हारे तप के संपन्न होने के समय तुम्हारी भेंट मुझसे हुई थी उसी प्रकार इस भी तुम्हारे किसी से भेट का संयोग बनेगा जो तुम्हारे जीवन के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण [संगीत] होगा स्वामी क्या यही वो ब्रह्मचारी ऋषि है जिनसे पुत्री मंसा का विवाह होगा हां प्रिय ऋषि जरत का ही हमारी पुत्री के लिए योग्य भन उनसे विवाह के उपरांत हमारी पुत्री नागों की रक्षा में समर्थ [संगीत] [संगीत] होगी प्रणाम प्रभु महादेव कल्याण हो प्रभु नागवंश के उद्धार हेतु मुझे देवी मंसा का विवाह प्रस्ताव लेकर ऋषि के पास जाने की अनुमति दीजिए वह आपकी पुत्री है यह ज्ञात होने पर ऋषिवर इस प्रस्ताव को सहर स्वीकार कर लेंगे यह तो सर्वथा उचित होगा पुत्री मंसा के जेष्ठ के रूप में आप उसके विवाह का प्रस्ताव लेकर अवश्य जाए मां स्वयं नागराज वासुकी दीदी मनसा का विवाह प्रस्ताव लेकर गए तब तो प्रस्ताव सुनते ही ऋषिवर ने विवाह के लिए अपनी सहमति दे दी होगी ना हे ऋषिवर मेरी बहन मनसा एक श्रेष्ठ तपस्विनी है महादेव एवं देवी पार्वती की पुत्री हैं उन्होंने महादेव की पीड़ा हरी है जिसके लिए ब्रह्मदेव ने विष हरि का नाम दिया है उन्हें अत आप हमारी बहन मंसा का विवाह प्रस्ताव स्वीकार कर हमें कृतार्थ करें [संगीत] हे नागराज वासुकी जी मैं ऋषि हूं प्रभु का नाम ही मेरा सर्वस्व है तप मेरा धर्म है और मैं अपने धर्म से कदापि भटकना नहीं चाहता इसीलिए सभी सांसारिक बंधनों से मुक्त रहना चाहता हूं मुझे क्षमा कीजिए परंतु मैं यह विवाह प्रस्ताव स्वीकार कदापि नहीं कर सकता ऋषिवर ने यह क्या किया माता महादेव जिनके पिता है ऐसी स्त्री के साथ को अस्वीकार कर दिया और पिताश्री ने तो यह स्पष्ट कहा था कि यदि ऋषि जगत कारु ने दीदी मनसा से विवाह किया तो ही नागों को उनके विनाश से बचाया जा सकेगा हां पुत्र ऋषि जरत का ने यह जानते हुए भी विवाह का प्रस्ताव स्वीकार कर दिया और पुत्री मंसा को यह ज्ञात हो गया [संगीत] था ऋषिवर के आभा में अद्भुत एक आकर्षण [संगीत] है मुझे विश्वास है उन्होंने भी मुझे देखते ही स्वीकार कर लिया था अस्वीकार कर रहे हैं आप जिसे स्वयं प्रभु महादेव की पीड़ा हरने का गौरव प्राप्त है प्रभु महादेव एवं माता पार्वती की पुत्री मेरी बहन मंसा उनसे आप विवाह का प्रस्ताव अस्वीकार कर रहे हैं [संगीत] रिश्वत क्या यह सत्य नहीं जब आपने उन्हें प्रभु श्री कृष्ण की आराधना करते हुए देखा था तो आप उनसे आकर्षित हुए [संगीत] थे हां आकर्षित हुआ [संगीत] था उनकी भक्ति से उनकी आध्यात्मिक शक्ति से उनके मधुर मंत्र उच्चारण से पर देवी मंसा से नहीं तो क्या ऋषिवर के मन के भाव को समझने में मुझसे ही कोई भूल [संगीत] हुई [संगीत] हां आकर्षित हुआ था उनकी भक्ति से उनकी आध्यात्मिक शक्ति से उनके मधुर मंत्र उच्चारण से पर देवी वसा से [संगीत] नहीं नहीं मैं कदापि दुखी नहीं [संगीत] होंगी [संगीत] ओम रीम क्लीम कृष्णाय नमः ओ ह्रीम श्रीम क्लीम कृष्णाय नमः आप पुनः विचार कर लीजिए ऋषिवर कहीं यह प्रस्ताव ठुकरा करर आप कोई बड़ी भूल तो नहीं कर रहे हैं जो अपने निर्णय पर स्थिर होते हैं उनसे कभी कोई भूल नहीं होती वासुकी जी मुझे क्षमा कीजिए मेरे जीवन का एक ही उद्देश्य है साधना और प्रभु को भक्ति से पाना इसीलिए मैं आपसे पुनः कह रहा हूं कि इस विवाह प्रस्ताव को मैं कदापि स्वीकार नहीं कर सकता किंतु प्रणाम नागराज वासुकी जी [संगीत] प्रभु अब आपका ही आसरा है मेरा मार्ग दर्शन कीजिए ऋषि जरत का ने तो विवाह प्रस्ताव ठुकरा करर मेरा मनोबल तोड़ दिया है निराशा ने घेर लिया है मुझे प्रभु हे प्रभु मुझे तो विवाह की मंगल धुन के स्थान पर संपूर्ण नागवंश के विनाश का सर सुनाई दे रहा है हे भुजगेंद्र हारम यदि अब भी कुछ नहीं हुआ तो आपके इस भुजंग भूषण का विनाश भी तय है धीरज रखने वाला व्यक्ति आत्मविश्वास की नाव पर सवार होकर बड़े से बड़े संकट का भाव सागर पार कर लेता है धीरज रखिए नागराज वासों की जी मनसा के भ्राता के रूप में अभी तो एक ही बार प्रयास किया है आपने सफलता का द्वार निरंतर प्रयास से ही खुलता है कदाचित ऋषि जरत का इस बार अपना निर्णय बदल संभव है [संगीत] प्रभु यह मैं कहां आ गया यह क्या स्थान है पुत्र पत्र पर पत्र ये स्वर तो जाने पहचाने लग रहे हैं जैसे पितामह और पिताजी मुझे पुकार रहे हैं मुझसे कुछ कहना चाह रहे हैं किंतु यह स्वर आ कहां से रहे हैं पर पत्र पर पत्र पुत्र पुत्र पर पुत्र पुत्र [संगीत] पुत्र पितामह पिताजी आप यहां इस अवस्था में पाताल लोक और स्वर्ग लोक के बीच इस तरह अधर्म क्यों लटके हैं देख रहे हो पुत्र हमारी दुर्दशा इस डाल के सहारे टिके हुए हैं हम अरे मशक हटो हटो मशक अरे मशक हटो हटो नहीं पुत्र तुम ऐसे हमारी सहायता नहीं कर सकोगे इस मशक को यहां से नहीं हटा सकोगे किंतु पिताश्री मैं क्या करूं यदि ये यहां से नहीं हटेगा तो आप आप सब लोग नीचे गिर जाएंगे हां पुत्र हम पाताल के अंधकार में खो जाएंगे स्वर्ग और अन्य उच्च लोगों की यात्रा नहीं कर सकेंगे पुत्र नहीं नहीं नहीं पिता श्री पितामह आप लोगों ने तो जीवन भर पुण्य किए हैं तो उसका यह परिणाम कैसे हो सकता है आप अवश्य ही स्वर्ग जाएंगे यदि मैं कोई सहायता कर सकता हूं तो मुझे बताइए मैं अवश्य करूंगा विवाह कर संतान की प्राप्ति करनी होगी पुत्र ये डाल तुम्हारा जीवन है और ये मशक काल जिस दिन काल इस मशक की भाति तुम्हारा जीवन भी उतर देगा उस दिन हमें नर्क की आग में चलना ही होगा मात्र तुम्हारा विवाह ही अब हमें नरक को जाने से रोक सकता है पुत्र नहीं नहीं मैं अपने तप से नहीं भटक सकता विवाह नहीं कर सकता किंतु अपने पूर्वजों को इस अवस्था में भी नहीं देख सकता पुत्र यही है एकमात्र उपाय वंश आगे बढ़ेगा तभी हमें इन कष्टों से मुक्ति मिलेगी पिी ऋण चुकाना चाहते हो तो विवाह करना ही पड़ेगा पुत्र तुम्हें विवाह कर लो पुत्र विवाह कर लो हमारे कष्ट हर लो पुत्र हमारे कष्ट हर लो विवाह कर लो पुत्र विवाह कर लो विवाह कर लो पुत्र हमारे कष्ट भलो पुत्र आप कुशल तो है ना श्वर मैं आपका न संपन्न होने की प्रतीक्षा कर रहा था इस आशा में कि इस बार आप मुझे निराश नहीं करेंगे मैं आपसे पुनः निवेदन कर रहा हूं और आप जब तक हां नहीं कहेंगे मैं इसी प्रकार प्रस्ताव लेकर आता रहूंगा देवाधि देव महादेव के आदेश से उनकी पुत्री के विवाह का प्रस्ताव लेकर मैं पुनः आपके समक्ष आया हूं आपकी सहमति की अपेक्षा है विवाह कर संतान की प्राप्ति करनी होगी पुत्र तभी शास्त्र अनुसार हमारा उद्धार संभव है अन्यथा हमें पाताल के अंधकार में खो जाने से कोई नहीं रोक सकता पुत्र उचित है मैं विवाह के लिए तैयार हूं मैं विवाह के लिए तैयार [संगीत] हूं मैं धन्य हो गया ऋषिवर आपके इस निर्णय ने नागवंश को बहुत बड़े संकट से उबार लिया बहुत बड़ा उपकार किया है आपने हम पर मैं जाकर अभी य शुभ समाचार माता पार्वती और बहन मंसा को सुनाता हूं रुकिए नागराज बासुकी [संगीत] जी मुझे अभी कुछ और भी कहना शेष है क्या रे शिवर अब क्या कहना शेष है यही कि मैं विवाह तो करूंगा किंतु उसके लिए मेरी तीन शर्तें हैं कैसे शत्र [संगीत] [संगीत] शवर [संगीत] यह कैसी शर्तें रख दी [संगीत] आपने जिन्हें माता-पिता का स्नेह प्राप्त है वे भाग्यशाली हैं किंतु जिन्हें उनकी सेवा का अवसर प्राप्त है वे परम सौभाग्यशाली हैं

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