इस पवित्र धाम में प्रभु जगन्नाथ जी की स्थापना किसी दिव्य और महान ब्राह्मण के द्वारा ही होनी चाहिए वह संपूर्ण सृष्टि में केवल एक ही है और वह है सृष्टि के रचयिता परम पूज्य ब्रह्मा जी सर्वे भवंतु सुखन सर्वे सर्वे भद्रा पग ब हे देवर्ष आपका सुझाव अद्भुत है इससे अधिक प्रसन्नता की बात और क्या हो सकती है किंतु मैं ब्रह्मदेव को आमंत्रित कैसे करूंगा आमंत्रण तो स्वयं जाकर ही दिया जाता है ना राजन बलोक किंतु कोई मनुष्य ब्रम लो कैसे जा सकता है प्रभु मैं नहीं [संगीत] हम मैं आपके साथ स्वयं चलूंगा [संगीत] ब्रह्मलोक इसी कार्य के लिए तो प्रभु जगन्नाथ जी ने मुझे आपके पास भेजा है राजन किंतु इससे पहले आपको विचार कर रहे होगा कि आप मेरे साथ आना चाहते हैं या [संगीत] नहीं इसम भला विचार करने का क्या कारण हो सकता है देव इससे अधिक हर्ष की बात मेरे लिए क्या हो सकती है स्वयं ब्रह्मदेव आकर प्रभु की स्थापना का शुभ का संपन्न कराएंगे इस कार के बाद फरा तो जीवन सफल हो जाएगा तो मैं ब्रह्मदेव को आमंत्रित करने के लिए अवश्य जाना चाहूंगा नारायण नारायण कदाचित आप समझे नहीं राजन मैं पुनः कहता हूं आपको सोच समझकर उत्तर देना होगा क्योंकि जब हम ब्रह्मलोक से लौटेंगे तब इस सृष्टि की सदिया बीत चुकी होगी आपके सभी संबंधी अपना जीवन जी चुके राजन यदि आप अभी मेरे साथ ब्रह्मलोक आते हैं तो कदाचित आप अंतिम बार अपने संबंधियों से मिलाप कर रहे [संगीत] हैं और उस समय आपके राज्य में राजा भी कोई और होगा और राज भी किसी और का होगा और आपके भ्राता उनकी तो अनेकों पीढ़ियां जा चुकी [संगीत] होगी क्या आपको यह स्वीकार हैरे अपने परिवार को अपनी इस पृथ्वी को सबका बलिदान करके ब्रह्मलोक में जाना क्या आपको यह स्वीकार है [संगीत] राजन फर महाराज इंद्र दूम की एक और परीक्षा थी आपने जो कहा वह उचित था पुरी में जगन्नाथ मंदिर का निर्माण वहा प्रभु की स्थापना वास्तव में एक भाग्य रथी कार्य था महाराज इंदम और उनके परिवार को अनेकों परीक्षा देनी पड़ रही थी और अब अय अंतिम परीक्षा अत्यंत कठिन थी जहां अपने परिजनों के साथ अपने जीवन का भी त्याग करना था तो फिर क्या चुनाव महाराज इने सब कुछ त्याग कर ब्रह्मलोक जाने के लिए तैयार हुए वो तब तो महाराज इंदम सोच विचार में डूब गए होंगे ना अपने सभी परिजनों को छोड़कर ब्रह्मलोक जाने का निर्णय लेना सरल तो कदा भी नहीं रहा होगा ना ना उनके लिए और ही उनके परिजनों के [संगीत] लिए संसार को प्रभ जगन्नाथ जी के महान धाम से वंचित नहीं कर सकता धर्म मोह और माया का अंत कर जीवन के निर्मल अर्थ से अवगत कराता [संगीत] है हे देवर्ष नारद मैं ब्रह्मलोक अवश्य जाऊंगा [संगीत] स्वामी लक्ष्य की प्राप्ति ही जीवन की सबसे कठोर परीक्षा का मीठा फल होती है देवी आपके सहयोग के बिना मैं इस मंदिर निर्माण के लक्ष्य को कभी प्राप्त नहीं कर सकता किंतु आपको भी इस महान कार्य में लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कठोर परीक्षा देनी होगी देवी मुझसे विलग होने की [संगीत] परीक्षा स्वामी अंगनी हूं आपकी आपके कार्य धर्म और लक्ष की प्राप्ति में मैं भी उत्तरदाई हूं जब तक मेरी स्वास चलेगी मैं निरंतर तपस्या करूंगी कि आपके ब्रह्मलोक की यात्रा सफल [संगीत] हो भैया आप हमारी चिंता मत कीजिए मैं और ललिता भाभी का ध्यान रखेंगे हम अपना शेष जीवन भाभी की सेवा और आपकी कार्य की पूर्ति की कामना में बिताएंगे मैं भी प्रतिदिन आपके नाम से प्रभु नील माधव को भोग चढ़ाऊ और प्रभु से प्रार्थना करूंगा कि आपको आशीर्वाद दे और आप अपने जीवन का जय प्राप्त कर सके नारायण नारायण अद्भुत आप सभी प्रभु कार्य के लिए कितना महान त्याग करने जा रहे हैं जब परिवार का समर्थन प्राप्त हो तो कोई भी लक्ष्य बड़ा नहीं रहता और अब मेरे परिवार का साथ पाकर मेरा उत्साह और मेरा साहस और बढ़ गया है हे देवशी नारद मेरा मार्ग दर्शन कीजिए मुझे बताइए कि मुझे और क्या करना है यहां से प्रस्थान करने से पूर्व आपको प्रभु की प्रतिमा पूर्ण करनी [संगीत] होगी प्रतिमा पूर्ण करनी होगी स्वामी को किंतु कैसे नील माधव विग्र को प्रभु की इस प्रतिमा में स्थान देकर राजन तभी तो श्री जगन्नाथ स्वरूप में संपूर्ण जगत नील माधव के दर्शन कर पाएगा यही तो चाहते हैं ना आप राजन किंतु देवशी प्रतिमा निर्माण के बाद ये कैसे संभव होगा नारायण नारायण प्रभु जगन्नाथ और प्रभु नील माधव की प्रतिमा में भेद कहां है बस उनका एक होकर देखा जाना ही शेष है जिसके लिए आपको नीलांचल क्षेत्रों में 100 कुए बनवाने होंगे और यज्ञ करवाना होगा और उन 100 कुव के जल से आपको प्रभु जगन्नाथ जी का अभिषेक करना होगा तभी प्रभु नील माधव विग्रह को आप प्रभु जगन्नाथ जी की प्रतिमा में समाहित कर पाएंगे और जब प्रभु की प्रतिमा स्थापना के लिए पूर्ण होगी तब आप ब्रह्मलोक की यात्रा करके स्वयं ब्रह्मदेव को प्रभु की स्थापना के लिए आमंत्रित कर [संगीत] पाएंगे 100 कूप 100 यज्ञ वहां अन्य सभी यह सुनकर ऐसे ही स्तब्ध हो गए थे किंतु महाराज इंद्रद नहीं उन्हें ना तो कूब खुदवाने में कोई कठिनाई दिखाई दी और ना ही स यज्ञ करवाने में उनके लिए तो यह सब बस एक भागीरथी कार्य का एक भाग था जो मंदिर निर्माण के रूप में स्वयं भगवान ने उन्हें सौंपा था इसलिए देवर्षि नारद का निर्देश पाकर महाराज इंद्र दमन ने इन दोनों ही कार्यों का आरंभ कर [संगीत] दिया महाराज इंद्रद्युम्न ने यज्ञ स्थल को भी स्वयं अपने ही हाथों से स्वच्छ कर जुट गए फिर विधि पूर्वक यज्ञ आरंभ हुआ जिसके मंत्र उच्चार से संपूर्ण वातावरण गुंजायमान हो उठा और अंत में पूर्णाहुति के साथ यज्ञ संपन्न हुआ इस प्रकार देवर्षि द्वारा दिए गए सभी निर्देशों का उन्होंने पालन किया कुछ ही माह में एक दुर्गम कार्य को बड़ी सुगमता से संपन्न किया उन्होंने नीलांचल क्षेत्र में वह 100 को भी बनवा चुके थे और 100 यज्ञ भी संपन्न कर चुके थे और फिर महाराज ने स्वयं उन 100 कूपों पर जाकर प्रभु जगन्नाथ के अभिषेक हेतु वहां का जल एकत्र किया साधारण वस्त्रों को धारण कर सरल भक्ति के भाव से वो और उनका संपूर्ण परिवार प्रत्येक कूप पर गया और वहां का जल एकत्र किया इस प्रकार वह 100 कूपों का जल लेकर आए इतना कठिन परिश्रम करने में उन्हें थकान का भी अनुभव होने लगा किंतु महाराज इंद्रद्युम्न रुके नहीं प्रभु का नाम लेकर आगे बढ़ते रहे और जब वह स्वयं यह कार्य करने में असमर्थता का अनुभव करने लगे तो देवी गुंडी और विद्यापति ने उनका साथ दिया महाराज को प्रभु के महान भक्त विश्व वसु और देवी ललिता का साथ भी प्राप्त था जो निरंतर प्रभु सेवा में उनका हाथ बटा थे भू श्री जगन्नाथ नील माधव की जय प्रभु श्री जगन्नाथ की जय प्रभु जगन्नाथ जी की जय प्रभु जगन्नाथ जी की जय प्रभु श्री जगन्नाथ की जय प्रभु नील माधव की जय प्रभु नील माधव की [संगीत] जय जब किसी को इतना सहयोग प्राप्त हो और वह स्वयं अपने लक्ष्य के प्रति जागरूक हो तो सफलता दूर नहीं रहती प्रभु नाचल क्षेत्र में बने मेरे द्वारा 100 कोपों का जल में ले आया अब कृपा कर मुझे अपने प्रभु नील माधव विग्रह को अपनी प्रतिमा में समाहित करने की अनुमति दीजिए जिससे दोनों एक हो [संगीत] सके जय माधव मदन मुरारी जय माधव मदन [संगीत] मुरारी ज माधव मगन मुरारी जय माधव मदन मुरारी जय केशव कली बल हारी जय केशव कलि बल हारी जय केशव कलि बलिहारी जय माधव मगन मुरारी जय माधव मगन [संगीत] मुराई सब हू लूट लूट दधि खायो कब हू मधुवन रास रचायो कब हू मधुवन रास रचायो नाचत बिपिन बिहारी नाचत विपन बिहारी जय माधव मगन मुरारी जय माधव मदन [संगीत] मुरारी करुणा कर द्रोपदी [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] पुकारी [संगीत] करुणा कर द्रोपदी पुकारी पट में लिपट गए बनवारी पट में लिपट गए [संगीत] बनवारी निरख रहे नर नारी निरख रहे नर नारी जय माधव मदर मुरारी जय माधव बदन मुरारी जय केशव कलि बलिहारी जय केशव करली बलिहारी जय माधव म [संगीत] [संगीत] नंद शांताकारम भुजगशयनम पद्मनाभम सुरेशम विश्वा काम गगन सदृशं मेघ वर्णम शुभांग लक्ष्मीकांतम कमल नयनम योग रद ध्यान गम्यम वंदे विष्णु भव भय हरम सर्व लोक एक [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] नाथम [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] और प्रभु जगन्नाथ जी की जय प्रभु जगन्नाथ जी की जय प्रभु जगन्नाथ जी की जय प्रभु श्री जगन्नाथ जी की जय प्रभु श्री जगन्नाथ जी [संगीत] की ओम श्री नारायण [संगीत] हरि प्रणाम देवर्ष नारद [प्रशंसा] कल्याण इस पवित्र धाम में प्रभु जगन्नाथ जी की स्थापना किसी दिव्य और महान ब्राह्मण के द्वारा ही होनी चाहिए और वह है ब्रह्मा जी यदि आप अभी मेरे साथ ब्रह्मलोक आते हैं तो कदाचित आप अंतिम बार अपने संबंधियों से मिलाप कर रहे हैं स्वामी अब अपने कर्तव्य पथ पर आगे जाएंगे अर्थात उनसे विदा लेने का कठिन समय आ गया राजन प्रभु प्रतिमा पूर्ण हुई [संगीत] और मंदिर में स्थापना के लिए तैयार है आपके मार्ग दर्शन और आपकी सहायता के लिए आपको कोटि कोटि धन्यवाद ना ना ना धन्यवाद अभी नहीं अभी तो मेरा मुख्य मार्गदर्शन शेष है आपको ब्रह्मलोक पहुंचाने [संगीत] का क्या [संगीत] राजन आप उसके लिए तैयार [संगीत] हैं यह पल आप सभी के लिए कठिन है क्योंकि आप आप सभी अंतिम बार एक दूसरे से मिल रहे हैं विदा लेना असंभव सा लग रहा होगा [संगीत] ना जो एक दूसरे के हृदय में बसते हैं वो कभी विदा नहीं कहते देवर्षी हां देवर्षी हम एक दूसरे के पास ना होकर भी सदा साथ रहेंगे एक दूसरे के हृदय में सदा वास करेंगे सर्वथा उचित कहा आपने विद्यापति देवी ललिता आप सभी को बुलाना असंभव है प्रभु जगन्नाथ जी के मंदिर के निर्माण में आपने जो श्रम किया है और विश्व वसु जी की अटल भक्ति उसके कारण प्रभु जगन्नाथ जी के हृदय में आपके लिए एक विशेष स्थान देवी गुंडी च आप भी इस प्रभु कार्य में कभी पीछे नहीं रही है और अभी भी अपना पूर्ण योगदान दे रही है किंतु मुझे ऐसा आभास हो रहा है कि प्रभु के इस कार्य में आपका भाग अभी भी बाकी है क्योंकि प्रभु के हृदय में आपका भी अत्यंत महत्व और शीघ्र ही जगन्नाथ पुरी में आपका भी अनूठा स्थान होगा देवर्ष प्रभु का आशीर्वाद पाकर मैं तो धन्य हो जाऊंगी किंतु अभी मेरे मन में सिर्फ एक ही इच्छा है मेरे स्वामी की ब्रह्मलोक यात्रा सफल [संगीत] हो तब हमें प्रस्थान करना चाहिए और हां जब जब हम ब्रह्मदेव जी के साथ यहां पुनः लौटेंगे जगन्नाथ जी की प्रतिमा की स्थापना के लिए तब तक मंदिर के द्वार बंद रहेंगे उचित है हम इस बात का ध्यान रखेंगे महारानी मैं आपको ललिता और विद्यापति को अपने साथ अपने कबीले ले [संगीत] जाऊंगा [संगीत] प्रणाम प्रभु मुझे आशीष दीजिए मैं यात्रा सफल कर [संगीत] सकू प्रणाम भक्त शिरोमणि विश्वसु [संगीत] जीी जीवन भर मेरा साथ देकर तुमने मेरा भाई होने का र भली बात निभाई भैया मैंने तो वही किया जो एक भाई होने के नाते आपके प्रति और एक भक्त होने के नाते प्रभु के प्रति मेरा कर्तव्य [संगीत] था [संगीत] स्वामी आप तनिक भी चिंता मत कीजिएगा जब आप वापस आएंगे तो मुझे नहीं पाएंगे किंतु मैं वचन देती हूं कि यह शरीर तो नश्वर है ये मिट भी जाए परंतु मैं आपकी प्रतीक्षा [प्रशंसा] [संगीत] [संगीत] करूंगी [संगीत] [संगीत] चलिए [संगीत] देवशी [संगीत] अपने प्रियजनों से विलग होकर महाराज इंद्र दमन देवर्षि के साथ ब्रह्मलोक यात्रा के लिए निकल चुके थे और इस पूरी यात्रा में वह हरि नाम का जाप करते रहे हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे हरे रामा हरे रामा रामा रामा दूसरी और थी महारानी गुंडीज जिनके बारे में देवर्षि नारद ने ही कहा था कि इस कार्य में उनका भाग अभी समाप्त नहीं हुआ था वोह भी कुछ ऐसा असाधारण करने वाली थी जिससे वो भी अपने पति की यात्रा में सहायक [संगीत] बने अद्भुत इस स्थान पर इस शिला को देखकर मुझे दिव्य आभास हो रहा [संगीत] है भाभी यह वही स्थान है जहां पर मैंने यात्रा के मध्य में प्रभु से मार्गदर्शन करने की प्रार्थना की थी और तब मुझे प्रभु ने दिशा दिखाई थी तो कदाचित यही प्रभु मेरा भी मार्गदर्शन करने की कृपा करेंगे जब तक मेरी स्वास चलेगी मैं निरंतर तपस्या करूंगी कि आपकी ब्र लोग की यात्रा सफल [संगीत] [संगीत] हो मुझे प्रभु ने संकेत भेज दिया है वही स्थान है जहां मैं तपस क्या [संगीत] [प्रशंसा] करूंगी भाभी आप यहां क्यों आ गए हे देवर्ष अब इस पर्वत को पार कर आगे कैसे जाना है अर्धांगिनी के सु कर्मों की शक्ति अर्धांग को भी प्राप्त होती है राजन पति धर्म के मार्ग पर चले हैं यह तो होना ही था मैं यही ध्यान समाधि में लीन रहूंगी भाभी आप क्या कह रही है आप यहां रहेंगे नहीं भाभी मां आप हमारे साथ कबीले चलिए यदि प्रभु ने इन्हें यहीं रहकर ध्यान करने की प्रेरणा दी है तो हमें इनका समर्थन करना चाहिए मैंने स्वामी को वचन दिया था कि जब तक मेरी स्वास चलेगी मैं स्वामी की सफलता के लिए तपस्या करूंगी उचित है भाभी यदि आपकी यही इच्छा है तो फिर हम भी यहीं रहकर अपना कर्तव्य निभाएंगे हां भाभी मां हम यही रहकर आपकी देखभाल करेंगे और हमारे बाद हमारे वंशज भी यही करेंगे नहीं भाभी आप हमें रोक नहीं सकते हमने भैया को वचन दिया है हम सदा आपके साथ रहेंगे आपका ध्यान रखेंगे भाभी मां आप अपना वचन निभा रही हैं तो हमें भी अपना वचन निभाने का अधिकार दीजिए नहीं देवर जी मैं धरती मां के आंचल में बैठकर ही समाधि लूंगी [संगीत] हे प्रभु कृपा कीजिए स्वामी को ब्रह्मलोक पहुंचकर ब्रह्मदेव को आमंत्रित करने में सफलता प्रदान कीजिए आज दीजिए [संगीत] अप [संगीत] सत्य कहा था आपने देव अर्धांगिनी होने के नाते पति के धर्म कर्म में आधा पुण्य पत्नी को भी प्राप्त होता है उसी प्रकार पत्नी जब पूजा पाठ करती है तब करती है तो उसका पति कहीं भी क्यों ना हो पत्नी का पुण्य भी उसे प्राप्त होता है [संगीत] ओम श्री हरि नारायण ओम श्री हरि [संगीत] नारायण महान उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए महान त्याग भी करना पड़ता है
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