Sunday, 28 December 2025

देवी सुमति को त्रिदेवों से मिला आशीर्वाद Deblina Malkhan Vighnaharta Ganesh Ep 766 PenBhakti

माता सुमती ने सूर्यदेव को उदित होने से रोक दिया था जिससे संपूर्ण सृष्टि जड़त हो गई थी जब देवराज के द्वारा निरंतर निवेदन करने पर भी माता ने उनकी एक ना सुनी तब निराश हताश होकर देवराज त्रिदेव के पास गए और उनसे इस समस्या का समाधान करने की विनती की फिर फिर क्या हुआ मां वो त्रिदेव जो सभी में सर्वोच्च जो अनंत है अनादि हैं उन्हें भी माता के समक्ष समर्पण करना पड़ा और वह याच कों के समान देवी सुमति के द्वार पर गुहार लगाने लगे हे देवी हम त्रिदेव आपके द्वार पर आए हैं हमें अपने दर्शन दीजिए देवी त्रिदेव यहां देवी सृष्टि के संकट को दूर करने हेतु हम स्वयं आपके पास आए हैं इसीलिए आपसे निवेदन है हमें दर्शन दीजिए इतने वर्षों के कठोर तप के बाद भी प्रभु मेरे सामने नहीं आए मुझे प्रत्यक्ष दर्शन नहीं दिए और इस नारी ने ऐसा कौन सा महान कार्य किया है चित्र देव इसके द्वार पर गुहार लगा रहे हैं और यह उनकी गुहार भी नका रही [संगीत] है [संगीत] प्रभु प्रणाम ी आहो भाग्य मेरे जो आप त्रिदेव ने मुझे दर्शन देने की कृपा की जत नहीं ये मेरे कौन से पुण्य के फल है अपने पति के प्रति आपकी निष्ठा उनके प्रति आपका अटूट प्रेम और आपका दृढ़ संकल्प ही आपका परम पुण्य है देवी रे भीतर मेरी जो विष है मेरीय दुर्दशा उसी के कारण है मैंने अपनी गति बढ़ाओ वहा आरंभ होता ही होगा यदि ऐसा है प्रभु तो मुझे आशीष दीजिए [संगीत] आयु मुझे आयुष्मति होने का नहीं मुझे सदा सुहागन रहने का आशीर्वाद [संगीत] दीजिए कितने अनुचित व्यवहार किए मैंने इसके साथ किंतु यह फिर भी मेरे ही जीवन रक्षा का आशीष मांग रही है मुझे ज्ञात है आप तीनों भी देवराज के समान मुझे अपनी सौगंध लौटाने का आदेश देने आए हैं नहीं देवी यह हमारा आदेश नहीं यह आपसे अनुरोध है हां देवी सूर्यदेव को अपनी सौगं के बंधन से मुक्त कीजिए और सृष्टि को महा संकट से बचाइए अवश्य करी प्रभु किंतु उसके पहले आप ऋषि मांध को मेरे पति को दिया उनका श्राप लौटाने को कहिए नहीं कह सकते ना प्रभु क्योंकि उन्होंने तब से श्राप की शक्ति अर्जित की है तो मैंने भी पतिव्रत की शक्ति प्राप्त की है और मैं अपने पति की मृत्यु कदापि नहीं स्वीकार करूंगी यह तो त्रिदेव की बात स्वीकार कर अपने लिए कुछ भी मांग सकती थी किंतु इसने मेरे लिए उस अफसर को भी गवा दिया तो क्या आप अपने पति के लिए संपूर्ण संसार को महा संकट में डाल देंगी देवी मेरे संसार तो मेरे पति है प्रभु अच्छे या बुरे वही मेरे सर्वस्व है भोलेनाथ किंतु यदि आप चाहते हैं कि सूर्योदय हो तो मुझे वचन दीजिए आश्वस्त कीजिए मुझे कि सूर्योदय होने पर मेरे पति की मृत्यु नहीं होगी क्षमा करें तु यह तो हम भी नहीं कर सकते किसी तपस्वी ऋषि के शाप को बदलने की शक्ति और अधिकार तो हम त्रिदेव के पास भी नहीं है और आपको एक धर्म निष्ठ कर्तव्य पराया स्त्री से अपने पति को जीवन की रक्षित करने के अधिकार से वंचित करने का अधिकार है नहीं प्रभु आप मुझ मुझे क्षमा कीजिए जिस प्रकार आप असमर्थ है वैसे ही मैं भी हूं आप अपनी मर्यादा से बंधे हैं तो मैं अपने धर्म से मैं भी अपने पति धर्म परायणता से कदापि नहीं डिगने वाली मुझे क्षमा कर दीजिए त्रिदेव मुझे आज्ञा [संगीत] दीजिए मैं अत्यंत लज्जित हूं जिसको मैंने कष्टों के सिवा कुछ नहीं दिया उसने मेरे जीवन की रक्षा के लिए त्रिदेव को भी लौटा दिया जब स्वयं त्रिदेव ही उन्हें मनाने में असमर्थ रहे तो समस्त संसार सूर्योदय के बिना ही अस्त की ओर बढ़ता [संगीत] रहा तो फिर विनाश की ओर बढ़ती सृष्टि की रक्षा किसने की मां यह एक धर्म निष्ठ कर्तव्य पराय साधवी का प्रभाव था और उस प्रभाव से मुक्त कराना और एक अन्य साधवी द्वारा ही संभव था यही विचार लेकर त्रिदेव भी देवी अनुसिया के पास गए थे जिन्होंने अपने पति धर्म और तपोबल की शक्ति से लोहे के चने को भी पका दिया था उनका तपोबल इतना महान था कि उन्होंने त्रिदेव को भी शिशुओं में बदल दिया था फिर हम त्रिदेवियां के अनुरोध पर उन्हें उनका स्वाभाविक रूप लेने दिया तब त्रिदेव ने उन्हें वरदान दिया कि वह उनके पुत्र के रूप में जन्म लेंगे और शीघ्र देवी अनुसिया चंद्रदेव के रूप में प्रभु ब्रह्मदेव की ऋषि दुर्वासा के रूप में प्रभु महादेव की माता बनेंगी और इतना ही नहीं ब्रह्मा विष्णु महे स्वयं प्रभु दत्तात्रेय के रूप में उनके पुत्र बनेंगे तो क्या माता अनुसूया के कहने पर माता सुमति मान [संगीत] गई देवी सुमति सूर्यदेव के किरणों से उनकी ऊर्जा से सृष्टि को जीवन मिलता है यदि शीघ्र सूर्य उदय नहीं हुआ तो संपूर्ण सृष्टि का ही अंत होगा कोई शेष नहीं रहेगा प्रलय का भय नहीं है मुझे माता यदि उसे आना है तो वह भी आ जाए किंतु मैं अपने पति के मृत्यु को उनके निकट नहीं आने दूंगी किंतु देवी मैं मृत्यु तो नहीं चाहता किंतु मेरे बुरे कर्मों का फल कदाचित मृत्यु ही है तो मेरे सु कर्मों का लाभ कब होगा स्वामी जो मैंने आपकी सेवा करके एकत्रित किए हैं मेरे सुकर्म आपको कुछ नहीं होने देंगे मुझ पर विश्वास रखिए मैं अपना सुहाग खोगी और ना आप अपना जीवन आप तो पुनः स्वस्थ होंगे तब मैं आपको उस नृत्यांगना के पास ले जाऊंगी जहां आप पुन उसके साथ का आनंद ले सके मुझे और लज्जित मत करो सुमति मैं अन्य किसी का साथ नहीं केवल तुम्हारा साथ चाहता हूं तुम्हें सभी सुख देना चाहता हूं अपने बुरे चरण का प्रायश्चित करना चाहता हूं एक कर्तव्य परायण नारी का मन कोई और समझे ना समझे एक धर्म निष्ठ नारी अवश्य समझेगी मैं तुम्हारे मन का भाव समझती हूं और वचन देती हूं कि मेरे रहते हुए तुम्हारे पति की कोई हानि नहीं होगी जिस प्रकार तुमने अपने पति के प्रति कर्तव्य निष्ठा से सूर्यदेव को रोका उसी प्रकार मैं भी अपने पति धर्म के तपोबल से तुम्हारे पति के प्राणों की रक्षा करूंगी किंतु इस सृष्टि में अन्य अनेक पति धर्म परायण स्त्रियां भी हैं जो सूर्यदेव के उदित ना होने से संकट में है तुम उनसे उनके पति का जीवन तो नहीं छीन सकती ना मेरा विश्वास करो सूर्यदेव को अपने सौगंध के बंधन से मुक्त कर दो देवी अनुसिया मुझे पूर्ण विश्वास है आप मेरे पति को कुछ मत होने दीजिएगा हे सूर्यदेव मैं आपको अपनी सौगं से मुक्त करती हूं मुक्त करती हूं आप उदित हो सकते हैं आप उदित हो सकते हैं आप उदित हो सकते हैं आप उदित हो सकते हैं जय का जय का जय का शक्ति रूप व देही दर्शनी अनंता उग्र उग्र उग्र जानकी जय हो निष्कला श्री अराम के पूर प्रकृति कं भवा सदा सदा जय यमराज का आगमन हो रहा है आगमन यमराज का आगमन हो रहा है यमराज यमराज का आगमन हो रहा है मैंने जो वचन दिया वो भंग नहीं होगा देवी सुमति आपके पति को कुछ नहीं [संगीत] होगा जाओ दूत उग्र सवस का समय आ गया है उसके आश्रम में जाकर उसके प्राण ले [संगीत] [संगीत] आओ ऐसा कोई स्थान नहीं है जहां यमराज के यमदूत न जा सके अब मैं पुनः प्रयास [संगीत] [संगीत] करूंगा मैं भी तो देखूं यह कैसी बाधा है जिसने मेरे दूध को आगे बढ़ने से रोक दिया यह कैसे संभव है मुझे तो अपना कर्तव्य भी निभाना [संगीत] है [संगीत] प्रभु प्रणाम त्रिदेव प्रभु यह कैसा कवच है जिसे मैं भी भेद नहीं पा रहा हूं यमदेव यह प्रणता साधवी देवी अनुसूया के संकल्प से निर्मित रक्षा कवच है किंतु प्रभु ऋषि मांध के श्राप के अनुसार मुझे उग्र सवस की आत्मा को यमलोक ले जाना [संगीत] है प्रभु कितने वर्षों तक मैंने कठिन तपस्या की उसकी तपो शक्ति और उस तपो शक्ति से दिया गया श्राप क्या उसका कोई मूल्य नहीं यमदेव जब एक पति धर्म पराय साधवी के वचन के विरुद्ध सूर्यदेव उदित नहीं हो सके तो आप एक अन्य पति धर्म पराय साधवी द्वारा रचित सुरक्षा कवज को कैसे भेज सकते हैं हां मैं देवी सुमति के पति का कोई हानि नहीं होने दूंगी प्रभु प्रभु अब तो यह विचित्र धर्म संकट है अब आप तीनों ही कोई उपाय सुझाए जिससे ऋषि माधव का श्राप भी व्यर्थ ना हो और प्रभु मैं भी अपना कर्तव्य पूर्ण कर सकूं और माता अनुसूया का वचन भी भंग ना हो उपाय है हे देवी ऋषिवर के शाप को निरर्थक मत होने दीजिए यम देव को उग्र सवस के प्राण लेने दीजिए नहीं ऐसा कदापि नहीं होगा और रहा प्रश्न आपके वचन की मर्यादा का तो जब आप लोहे के चनों में प्राण फूक सकती हैं तो भला आपके लिए क्या असंभव होगा मैं आपका आशी समझ [संगीत] [प्रशंसा] ग [संगीत] धन्यवाद प्रभु आपने यह क्या किया देवी वचन दिया था आपने कि आप मेरे पति को कुछ नहीं होने देंगी फिर आपने क्यों अपना सुरक्षा कवज हटा [संगीत] लिया स्वामी स्वामी स्वामी स्वामी [प्रशंसा] [संगीत] स्वामी स्वामी [संगीत] [हंसी] [संगीत] स्वामी मैंने जो वचन दिया था वो भंग नहीं होगा होगा मैं तुम्हे तुम्हारे पति को अवश्य लौटा [संगीत] दे नम नमस नमो नम सर्व भूते मानम मुझे कर दो सुम मुझे क्षमा कर दीजिए माता संता नम त नम त नम त नमो नम आपकी कृपा से मैं पुन स्वस्थ भी हो गया माता आपको कोटि कोटि नमन ना यह मेरी कृपा है ना यह मेरा चमत्कार यह तो मात्र और मात्र आपकी पत्नी सुमति के कर्तव्य निष्ठा का प्रभाव है जो उसने अपनी कर्तव्य परायणता से प्राप्त किया [संगीत] है मैं तो तुमसे दृष्टि मिलाने के योग्य भी नहीं तुमसे क्षमा कैसे मांगू प्रत्येक दुर्व्यवहार के बदले तुमने तुमने मुझे प्रेम दिया मेरे क्रोध के बदले तुमने मुझे सेवा दी मेरे प्राणों के लिए संपूर्ण संसार से बड़ गई देव त्रिदेव सबके सामने अड़ी रही त नहीं पूर्व जन्म में मैंने ऐसे कौन से पुण्य किए थे जो इस जन्म में मुझे पत्नी रूप में तुम मिली मुझे क्षमा कर दो अब अपने शेष जीवन में मुझसे कभी भूल नहीं होगी नहीं नहीं स्वामी क्या कर रहे हैं आप भोर का भटका संध्या को घर आ जाए तो उसे भूला नहीं कहते आपको अपनी भूल समझ आई मेरे लिए इतना ही पर्याप्त है मुझे आपसे किसी क्षमा याचना की आवश्यकता नहीं देवी बाहर सभी प्रतीक्षा कर रहे [संगीत] हैं प्रणाम त्रिदेव मैंने उस समय आपकी आज्ञा नहीं मानी इसलिए मुझे क्षमा कर दीजिए देवी सुमती आपने तो यह प्रमाणित कर दिया कि एक पति धर्म परायण नारी यदि चाहे तो विधि का विधान पलट सकती है इसलिए पति धर्म परायण नारे के विरुद्ध जाना संकट का संकेत है मेरी बुद्धि में मेरी दृष्टि में यह कैसा दोष था कि सुमति के निकट होते हुए भी मैं उसे उचित सम्मान नहीं दे पाया आपने अपनी भूल स्वीकार कर देवी सुमती को सम्मान दिया और इसीलिए आपका रोग भी दूर हो गया आप अपना यही आचरण बनाए रखिएगा और आज मैं अनुसूया यह घोषणा करती हूं कि जो भी पति अपनी पत्नी के महत्व को उसके त्याग को ना समझकर उसका अपमान करेगा वह दुर्भाग्य का भागी बनेगा क्योंकि पत्नी ही धन ज्ञान समृद्धि का प्रतीक है जो अपनी पत्नी को नकारे वो इन तीनों को भी नकार देगा और इस प्रकार देवी सुमति ने यह प्रमाणित कर दिया कि धर्म निष्ठ स्त्री यमराज को भी रोक सकती है उनका दृढ़ निश्चय त्रिदेव भी नहीं पलट सकते और इस कथा से हमें यह भी सीख मिलती है कि निष्ठा विश्वास प्रेम समर्पण से किया गया कोई भी कार्य कभी व्यर्थ नहीं जाता और जो योग्य होते हैं वह अपने आत्म बल से अपना भाग्य स्वयं निर्धारित करते हैं जिन देवी सुमति के कर्तव्य परायणता के भाव के प्रभाव से उनके पति की अकाल मृत्यु टल गई उनके दर्शन से तो अपार सुख प्राप्त होगा तब शुभ कार्य में विलं कैसा पुत्र गणेश हम उनके आश्रम के बाहर पहुंच चुके [संगीत] [प्रशंसा] हैं मां वो त्रि देवों के पुकार ने पर बाहर नहीं आई तो मुझे नहीं लगता कि वह हमारे पुकारने पर भी आएंगी क्योंकि वह तो अपने पति उग्र श्रव्य स्त [संगीत] [संगीत] होंगी स्वामी विश्राम करिए [संगीत] दिन का अंत हो चुका है आप भी विश्राम कर लीजिए नहीं स्वामी जब तक आप गहरी निद्रा में लीन नहीं होते मैं आपकी सेवा करती रहूंगी मां मैं उन्हें बुलाने का प्रयास करूं अवश्य पुत्र इससे हमें उनके कर्तव्य निष्ठ आचरण का एक और उदाहरण मिलेगा माता सुमति मैं गौरी नंदन और लक्ष्मी पुत्र गणेश आपके आशीर्वाद के लिए यहां प्रस्तुत हूं मेरे साथ मां लक्ष्मी भी है कृपया हमें भीतर आने की अनुमति दीजिए [संगीत] स्वयं गौरी पुत्र और लक्ष्मी पुत्र गणेश आए हैं यहां मैं उनके दर्शन के लिए लालायित हूं किंतु स्वामी की सेवा छोड़कर कैसे जाऊ मैंने तो उन्हें वचन दिया है जब तक वो गहरी निद्रा में लीन नहीं हो जाते मैं इसी प्रकार उनकी सेवा करूंगी मां मैंने कहा था ना उनकी अपने पति के प्रति निष्ठा इतनी दृढ़ है कि वह ऐसे ही नहीं आएंगी क्या ऐसा कोई उपाय नहीं जिससे मैं बिना स्वामी की निद्रा में बाधा डाले गजानन के दर्शन सुख का लाभ उठा [संगीत] सक [संगीत] क्षमा कीजिए प्रभु मैं उठकर आपको प्रणाम नहीं कर सकती क्योंकि स्वामी अभी नित्रा मग्न हुए हैं और मैं उठी तो उनकी निद्रा टूट [संगीत] जाएगी कितना अच्छा होता यदि मैं उचित प्रकार से आपका स्वागत कर पाती आपके चरण पखार आपको आश्रम में आसन प्रदान [संगीत] करती आपने उचित ही कहा था मां माता जब अपने स्वामी की सेवा में लीन है तभी उनको पुकारने से हमें उनके कर्तव्यनिष्ठ आचरण की शक्ति का ज्ञान [संगीत] होगा आओ [संगीत] [प्रशंसा] पुत्र स्वामी गहरी निद्रा में चले गए तो अब मैं माता लक्ष्मी और गणेश जी के दर्शन कर सकती [संगीत] हूं प्रणाम प्रणाम प्रणाम देवी सुमति क्षमा करना प्रभु क्षमा करना माता मैं आपके आगमन पर आपका उचित स्वागत नहीं कर सकी नहीं माता आपकी पति धर्म निष्ठा का परिचय पाकर तो हम भी धन्य हो गए वही हमारा उचित स्वागत था मुझे आज्ञा दीजिए प्रथम पूज्य गणेश जी माता लक्ष्मी मैं आपकी क्या सेवा कर सकती हूं देवी सुमति हम सेवा के लिए नहीं आपके हल्दी कुमकुम सत्कार के लिए आए हैं यदि आपकी अनुमति हो तो माता मैं आपके अनुरोध को तो आदेश मानती हूं आपकी किसी बात को कैसे अस्वीकार कर सकती हूं आप मेरा सत्कार करें यह तो मेरा परम सौभाग्य होगा धन्यवाद माता [संगीत] गणेश [संगीत] [संगीत] धन्यवाद माता देवी सुमती अब हमें आज्ञा दीजिए नहीं नहीं मैं आप को इस प्रकार यहां से जाने की अनुमति नहीं दे सकती किंतु माता मां का प्रण तो तभी संपन्न होगा जब हम माता सावित्री के पास जाकर उनका भी सत्कार [संगीत] करें हमें अनुमति देने की कृपा कीजिए उचित है किंतु यह तो आप भी भली भाति जानती है कि यहां अनुमति के बिना कुछ भी संभव नहीं [संगीत] है जिन्होंने सूर्यदेव तक को रोक दिया वह चाहे तो हमें भी रोक सकती हैं फिर माता सुमती को कैसे मनाए माता हमें अकारण तो नहीं रोकें फिर हमें जाने की अनुमति नहीं देने का क्या कारण हो सकता है [संगीत] [संगीत] आपके मुख के भाव मैं समझ सकती हूं जाने के अनुमति दूंगी अवश्य दूंगी किंतु जब तक मैं अपने हाथों से गौरी नंदन और आपके पुत्र प्रभु गणेश को भोजन नहीं करा लेती माता लक्ष्मी तब तक मुझे संतोष नहीं मिलने वाला उचित है देवी हां माता इतनी लंबी यात्रा के बाद भूख तो लग गई [संगीत] है यह लीजिए गणेश जी यह भी [संगीत] खाइए [संगीत] वाह माता आनंद आ गया भोजन तो बहुत स्वादिष्ट था भूख मिट गई पर मन नहीं भरा किंतु अब तो जाना भी है [संगीत] ना हमें आज्ञा दे प्रणाम माता प्रणाम देवी सुमति प्रणाम गणेश [संगीत] जी तुम्हें तो यहां आकर दोदो लाभ हो गए पुत्र देवी सुमति के दर्शन भी मिले और भर पेट भोजन भी हां मां भोजन से तो पेट भर गया किंतु किंतु क्या पुत्र किंतु मन नहीं भरा क्यों भोजन इतना स्वाद भोजन तो स्वादिष्ट था ही मां उससे मेरा पेट तो भर गया परंतु मन नहीं भरा मन तो धर्म निष्ठ साधं की कथाओं को सुनकर ही भरेगा तो मुझे माता सावित्री की कथा सुनाइए ना मां चिंता मत करो पुत्र हम लवे देश में स्थित माता सावित्री के राज भवन की ओर ही बढ़ रहे हैं राज भवन मां उनका निवास आश्रम में नहीं वह तो एक साधवी है ना हां पुत्र अपने धर्म और कर्म से ही उनकी गिनती श्रेष्ठ साधं में होती है क्योंकि देवी सावित्री तो एक राजपुत्र थी और अब एक राज्य की रानी है किंतु पुत्र इतनी सरलता से उन्हें राजभवन का सुख प्राप्त नहीं हुआ था देवी अरुंधति के पास उनकी धर्म निष्ठा के साथ प्रेम की अद्भुत शक्ति थी और देवी सुमति के पास उनके पति के प्रति कर्तव्य बोध और दृढ़ निश्चय की अद्भुत शक्ति थी और देवी सावित्री के व्यक्तित्व में तो यह दोनों ही गुण समाहित थे ऐसा आत्मविश्वास था उनमें कि उनके सामने तो यमराज को भी झुकना पड़ा और उनके पति के प्राण लौटाने पड़े उन्होंने तो वह कर दिया जो किसी के लिए संभव नहीं यमदेव को लौटा करर उन्होंने नियति को ही पलट दिया आप मेरे पति की आत्मा को नहीं ले जा सकते यमराज नहीं धर्म निष्ठ व्यक्ति जब पूर्ण श्रद्धा और लगन से अपना कर्तव्य पालन करते हैं तो निश्चय ही उनका दुर्भाग्य सौभाग्य में परिवर्तित हो जाता

No comments:

Post a Comment

ॐ जय शिव ओंकारा आरती Sawan Special Om Jai Shiv Omkara हर हर महादेव Pen Bhakti

[संगीत] [प्रशंसा] ओम जय शिवा ओंकार स्वामी जय शिवा प्रभु जय शिवा ओमकारा [संगीत] ओम जय शिवा ओंकार [संगीत] [संगीत] हंसते गरुड़ तन हर...