Sunday, 28 December 2025

देवी सावित्री के कारण सत्यवान को मिला जीवनदान AkankshaPuri Vighnaharta Ganesh Ep 770 PenBhakti

[संगीत] यह क्या देख रहा हूं मैं स्वयं माता कामधेनु देवी सावित्री को वैतरणी पार करवा रही [संगीत] है इसमें अचंभित होने की कोई बात नहीं है देवशी सावित्री ने अपने सास ससुर की सेवा वैसे ही की है जैसे कि एक पुत्री करती है निरंतर अपने पति के समान निष्ठा रखी अपने परिवार को माता अन्नपूर्णा के समान भोजन दिया माता काम भन के समान उनकी सभी इच्छाओं को पूरा किया काम का अर्थ है इच्छा और धेनु का अर्थ है गाय सृष्टि के 14 रत्नों में से एक माता काम अपनी देव्य शक्ति के कारण किसी की भी इच्छा को पूर्ण करने की क्षमता रखती तो तनी पार करने वाली देरी काम भनू को तो उसकी इच्छा पूर्ण करने उसकी सहायता करने तो आना ही था धन्यवाद माता कामवी मुझे बतर पार कराने के लिए आपको कोटि कोटि [संगीत] धन्यवाद पुत्री सावित्री तुम्हारा आत्म बल तुम्हारे पुण्य कर्म से मात्र मैं ही नहीं सभी दिव्य शक्तियां प्रभावित है तभी माता कामधेनु ने तुम्हें वैतरणी पार लगाया है किंतु प्रत्येक आत्मा की यात्रा और उसका भाग्य उसके कर्मों द्वारा निर्धारित होता है तुम्हारे पति की आत्मा सांसारिक बंधनों से परे उस आत्मा के पीछे आना अब उचित नहीं इसलिए जहां तक तुम आ चुकी हो से लट जाओ हे धर्मराज हे अमे तन मन धन का संबंध तो आत्मा का संबंध होता है यही है पति पत्नी का संबंध इसीलिए जहा पति की आत्मा रहती है वही पनी का रहना भी उचित [संगीत] है तुम्हारा प्रेम अनुपम है सत्यवान का जीवन ना सही इसकी कोई अन्य इच्छा तो पूर्ण करही अपने पति के प्रति तुम्हारी भक्ति तुम्हारी निष्ठा से मैं बहुत प्रभावित हुआ किंतु यह सत्य है कि मैं तुम्हें सत्यवान के प्राण नहीं लौटा सकता उसके सिवाय तुम जो वरदान मांगोग मैं अवश्य पूर्ण करूंगा यह क्या था राज आपने तो मुझे देते हुए भी कुछ नहीं दिया जिस कारण से आप मुझे यह वरदान दे रहे हैं कारण को छीनने वाले भी तो आप ही है इसलिए यदि आप मुझे कुछ देना चाहते हैं मुझे मेरे स्वामी के प्राण दे दीजिए उसके सिवाय मुझे और कुछ नहीं चाहिए कुछ नहीं चाहिए तो क्या धर्मराज के वरदान को नकार कर मेरा तिरस्कार करोगी नहीं नहीं धर्मराज यह भी नहीं कर सकती तो वरदान मांग लो अब तो बस एक ही इच्छा है कि मृत्यु से पहले एक ब स्वयं तुम्ह अपनी नेत्रों अपनी दृष्टि से देख पाती होत है यम मुझे स्वयं के लिए कुछ नहीं चाहिए कि यदि आप मुझे कुछ देना चाहते हैं तो फिर मेरे सास ससुर की दृष्टि लौटा दीजिए मुझे यह वरदान देने की कृपा कीजिए धर्मराज स्वामी स्वामी स्वामी हां पुत्र सत्यवान और पुत्री सावित्री अभी तक नहीं लौटे स्वामी उनको आने में इतना विलम कैसे हो गया वो अभी तक लौट के क्यों नहीं आए तुम चिंता मत करो मैं उन्हें अभी ढूंढ कर आता हूं पर बिना नेत्रों के आप उन्हें कैसे ढूंढेंगे और यदि जाना ही चाहते हैं तो मुझे भी साथ ले चलिए हम एक दूसरे का सहारा [संगीत] बनेंगे तथास्तु धन्यवाद [संगीत] धर्मराज [संगीत] अद्भुत चमत्कार हो गया स्वामी हमारी दृष्टि लौट आई हम सब देख सकते हैं स्वामी हे प्रभु हम दोनों के नेत्र ठीक हो गए हम हम देख सकते हैं हां स्वामी यह प्रभु की असीम कृपा ही तो है कि हमें पुत्री सावित्री जैसी पुत्र वधु प्राप्त हुई है अवश्य ही हमारा यह दुख उसी के कारण सुख में बदल गया है यह बहुत ही शुभ संकेत है कुछ मंगल होने वाला है हमारे नेत्र का लौट आना ऐसे में तो हमारे परिवार को साथ होना चाहिए था यह दोनों कहां है अब अपने सास ससुर के पास लौट जाओ वह तुम्हें देख सकेंगे और तुम में ही अपने पुत्र को देखकर संतुष्ट भी होंगे वैसे भी देवलोक में प्रवेश करने का प्रयास किया तो वह तुम्हें वहीं भेज देंगे जहां से तुम आई [प्रशंसा] [संगीत] हो नहीं नहीं यह मेरे साथ कदापि नहीं हो सकता यदि देवलोक में सच्चाई है यदि देवलोक के देवता मेरे पति धर्म की सच्चाई को देख सकते हैं तो फिर वो मुझे उचित मार्गदर्शन अवश्य दिखाएंगे अवश्य [संगीत] दिखाएंगे नारायण [संगीत] नारायण हट करने से असंभव संभव नहीं हो जाता वो देवलोक कदापि पार नहीं कर सकेगी यह कैसी ध्वनि है [संगीत] अब फिर से यह कैसे संभव हो गया रायण नारायण मां अपना त्रिशूल भेजकर पुत्री की सहायता करने के लिए आपको अनेको धन्यवाद मा नहीं देव श्री यह त्रिशूल मेरी शक्ति से उत्पन्न नहीं हुआ है पति धर्म की शक्ति कितनी असीम होती है इसका अनुमान तो आपको देवी अनुसया देवी अरुंधति और देवी सुमति के उदाहरणों से ज्ञात हो ही गया होगा ये वही असीम शक्ति है जो किसी भी देवता यहां तक कि त्रिदेव की शक्ति से भी अधिक यह स्वयं त्र के पति धर्म की ही शक्ति है जो वहां त्रिशूल बनकर प्रकट हुई तो फिर उसे भला देवलोक को पार करने से कौन रोक सकता था नारायण नारायण देवी आपके निश्चय की दृढ़ता सराहनीय है किंतु आपकी इस यात्रा का परिणाम आपकी सफलता नहीं होगी यदेव परिणाम की चिंता तो वो करते हैं जो कर्म से अधिक उसके फल के बारे में सोचते हैं वर्तमान के प्रयासों से अधिक भविष्य के सुख के बारे में सोचते हैं और कर्म करते समय साहस का त्याग नहीं करना चाहिए और जिसके सत्पुरुष स्वयं आप हो तो उसका साहस तो और बढ़ जाता है तुम्हारे इस सरल सहज ज्ञान से मैं बहुत प्रभावित हूं पुत्री किंतु ज्ञात रहे यह कर्म जो तुम कर रही हो उसका परिणाम तुम्हारी असफलता ही नहीं अभी तो संकट भरा भी है इसीलिए मैं तुम्हें अभी भी कह रहा हूं और आगे बढ़ने का प्रयत्न मत करो लौट जाओ अपने स्थान पर अब मुझे अपने स्थान से लौट जाने का सुझाव दे रहे हैं यमदेव तो फिर यह भी तो बताइ कि मेरा स्थान है कहां क्योंकि एक पत्नी का स्थान तो वही होता है जहां उसका पति होता है तो फिर आप जहां मेरे पति को लेकर जा रहे हैं मेरा स्थान भी वही है यमराज अपने ज्ञान अपनी वाणी अपने सारगर्भित वचनों से और अपने पति के प्रति अटूट निष्ठा से तुमने पुनः मुझे प्रभावित किया है किंतु दुर्भाग्यवश मैं तुम्हारे पति को तुम्हें फिर से लौटा नहीं सकता तो सत्यवान के प्राण के स्थान पर जो चाहती हो मांग [संगीत] [प्रशंसा] लो मुझे पुत्र वधु के रूप में पुत्री की प्राप्ति हुई है ऐसे संबंध में धन की कामना करना किसी को भी शभ [संगीत] हे धर्मराज अब जब मैं और मेरे स्वामी हम दोनों ही अपने वृद्ध माता पिता के साथ नहीं है तो फिर मेरी इच्छा है कि उनकी देखभाल वैसे ही हो जिसके व योग्य है यदि आप वरदान देने के इच्छुक है तो दया कीजिए और उनका राज पाठ लौटा [संगीत] दीजिए तथा [संगीत] थातु पुत्र सत्यवान पुत्री सावित्री पुत्र सत्यवान पुत्री सावित्री क्षमा कर दीजिए भैया मैंने आपके साथ जो किया मैंने आपका राजपाट आपसे छीन लिया अब उसका फल मेरा पुत्र भुगत रहा है मुझे शमा कीजिए शमा कीजिए मुझे मुझे क्षमा कर दीजिए मैं अपनी भूल सुधारना चाहता हूं मैं प्रायश्चित करना चाहता हूं भैया आप पुनः राज पाठ संभाल लीजिए और मुझे आपकी सेवा की अनुमति दीजिए यह अवश्य ही हमारी पुत्र वधु के सु कर्मों का फल है किंतु वो है कहां पुत्री सावित्री में मैं तुम्हें और कुछ नहीं दे सकूंगा और तुम्हें निराश होता हुआ देख मुझे भी दुख होगा लट ज अपने सास ससुर के पास क्योंकि सत्यवान के प्राण नहीं अब मात्र उसकी स्मृतियां ही तुम्हारे साथ रह सकती हैं हे आपने मुझे जो वरदान दिए वो आपकी कृपा थी मुझ पर कि तू एक कृपा और कर दीजिए मुझ पर मुझे यहां से लौटने के लिए मत कहिए क्योंकि अब मेरे लौटने का कोई कारण भी शेष नहीं है बस एक अपने सास ससुर की चिंता थी मुझे अब वो भी दूर हो गई इसीलिए अब मुझे मेरे पति स्वामी से विलक कोई नहीं कर सकता व जहां जाएंगे मैं भी वही जाऊंगी नियती व्यक्ति से बड़ी होती है पुत्री यदि मैं तुम्हें तुम्हारे सत्यवान के प्राण लौटा सकता तो अवश्य लौटा किंतु हम भी कुछ नियमों से बंधे हैं और सृष्टि का यह नियम कोई भंग नहीं कर सकता ना मैं ना तुम तो यह व्यर्थ का प्रयास मत करो धर्मराज मेरी वि है आपसे मुझे मेरे धर्म से भटकने के लिए मत कहिए आप अपने धर्म का पालन करिए और मुझे मेरे धर्म पर चलने दीजिए धर्म में तुम्हारी आस्था अनुपम है मांगो पुत्री अपने पति के प्राण के सिवाय कोई तीसरा वरदान मांगो पुत्र के रूप में मेरा कोई उत नहीं यह राज पाठ इसकी लालसा इसका आकर्षण अब मुझ में नहीं रहा हे यमराज मेरे पिता को भी बस एक ही दुख है कि उनका कोई पुत्र नहीं तो मुझे यह वरदान दीजिए कि मेरे माता पिता को एक प्रतापी पुत्र उन्हें एक पुत्र की प्राप्ति हो जो उनका वंश आगे बढ़ा सके तथास्तु तथास्तु अब तो तुम्हें वापस जाना स्वीकार होगा नहीं यमदेव यह वरदान पाकर तो मैं पिता पर से भी निश्चित हो गई मेरे लौटने का जो कारण शेष व भी तो आपने मिटा [संगीत] दिया यदि यही इच्छा है तुम्हारी तो इसे भी पूर्ण कर लो पुत्री किंतु अब मैं ब्रह्मलोक को पार कर जहां प्रभु ब्रह्मदेव की आज्ञा के बिना कोई भी प्रवेश नहीं कर सकता इसीलिए अब आगे से मुझे तुम्हारी चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि तुम कितने भी प्रयास कर लो तनिक भी आगे नहीं बढ़ सकोगी [संगीत] और ब्रम लो पार करने की आज्ञा तुम्ह ब्रह्मदेव कदापि नहीं [संगीत] देंगे ओम ब्रह्म देवाय [संगीत] [संगीत] नमः [संगीत] मेरा विश्वास सत्य सिद्ध हुआ वह आगे नहीं आ सकती ब्रह्म लोक पार नहीं कर सकी तो अब मैं चिंता रहित यमलोक की ओर बढ़ सकता [संगीत] [संगीत] हूं [संगीत] आश्चर्य तुम यहां तक कैसे पहुंच गई ब्रह्मदेव की आज्ञा और उनके आशीर्वाद से हे ब्रह्मदेव मैंने ये सुना था जो मन से पति धर्म का पालन करते हैं उन्हे उनके जीवन में ही मोक्ष प्राप्ति का अनुभव हो जाता है यदि य सत्य है तो मुझे आज्ञा दीजिए मुझे आशीर्वाद दीजिए प्रभु कि मैं मेरे पति के प्राणों के साथ लोक स मुझे आज्ञा दीजिए मुझे आशीर्वाद दीजिए प्रभु कि मैं मेरे पति के प्राणों के साथ लो [संगीत] पुत्री सावित्री का व्रत किसी अखंड तप के समान था और उसका पति प्रेम पति व्रत धर्म भी अद्भुत है इसीलिए वह अपने ही जीवन में मोक्ष की अधिकारी है और जिसे यह अधिकार हो उसके लिए ब्रह्मलोक के द्वार खोलना और उसे पार करना कहां [संगीत] कठिन [संगीत] देवी तुम अद्भुत हो बाधाओं को पार करने की अद्वितीय क्षमता है तुम में किंतु यमलोक के द्वार पर तुम जिस इच्छा से पहुंची हो वह पूर्ण नहीं हो सकती क्योंकि तुम्हारा यमलोक में प्रवेश करना असंभव है और तुम्हारी कोई भी प्रार्थना कोई भी तर्क मेरे निर्णय को नहीं बदल [संगीत] [संगीत] सकता इसलिए अब तुम लौट जाओ क्योंकि तुम्हारे यहां खड़े रहने का कोई लाभ नहीं हैद मैं नहीं जाऊंगी [संगीत] हट मत करो पुत्री यह यमलोक है और मैं यमलोक का अधिपति और मैं तुम्हें अपने लोक में प्रवेश करने की अनुमति कदापि नहीं दूंगा पुत्री पुत्री आपने मुझे पुत्री कहकर पुकारा तो फिर आप मेरे धर्म पिता हुए और कोई भी पिता अपनी पुत्री को किसी भी अवस्था में अपनी पुत्री को अपने निवास पर आने से नहीं रोक सकते तुम्हारी बुद्धि और मधुर वचनों की जितनी भी प्रशंसा करूं कम है तुमने तो मेरा हृदय जीत लिया मेरे भीतर पिता की भावना जगा दी तुमने पुत्री बहुत दुविधा में डाल दिया है मुझे किंतु धर्मराज अपने धर्म से कभी भी विमुख नहीं होते इसीलिए सत्यवान के प्राण तो मैं तुमहे नहीं लटा सता किंतु तुम्हारा पिता होने के नाते मैं तुम्हें एक और वरदान देता हूं किंतु इस बार जो भी मांगना अपने लिए मांगना कुछ ऐसा जिससे तुम संतुष्ट हो जाओ और तुम लौट जाओ पुत्री मैं आपको वचन देती हूं यदि मैं आपसे अपना मनचाहा वरदान पा लूंगी तो मैं अी यहां से लौट जाऊंगी तो अवश्य मांग लो अपने पति के प्राण छोड़कर कुछ भी मांग लो उचित है धर्म पिता तो फिर आप अपनी इस पुत्री को आशीर्वाद दीजिए कि बल और पराक्रम से परिपूर्ण मेरे 100 कुलदीपक पुत्र मेरे 100 कुलदीपक पुत्र तथास्तु तथास्तु तथास्तु इस वरदान के लिए आपको कोटि कोटि धन्यवाद धर्म पिता अब तो तुम प्रसन्न हो पुत्री अब तो तुम लौट स क्या हुआ पुत्री तुमने तो वचन दिया था ना मनचाहा वरदान पाओगी तो तुम लौट जाओगी तो विलंब मत करो लौट जाओ क्योंकि यहां रहने का कोई लाभ नहीं होगा नारायण नारायण नारायण नारायण प्रणाम देव श्री नारद धर्मराज आपने पुत्री को मनचाहा वरदान देक उसे तो धन्य कर दिया किंतु आपको इस बात का तो ज्ञात होगा ही कि एक पिता जब अपनी पुत्री को कुछ देता है उसे वापस नहीं लेता इसीलिए धर्म पिता होने के नाते आपने जो वरदान उसे दिया है उसे फलीभूत होने का एक अवसर भी तो दीजिए अन्यथा संसार आपके धर्म और न्याय पर शंका करेगा धर्मराज एक नारी बिना पति के मां कैसे बन सकती है धर्मराज बल और पराक्रम से परिपूर्ण मेरे 100 कुलदीपक पुत्र हू हे धर्म पताशी अपने धर्म का पालन करते हुए अपने वरदान का न्याय कीजिए मेरे पति परमेश्वर को जीवन दान दीजिए उनके प्राण लौटा [संगीत] दीजिए पुत्री सावित्री आज तुमने सिद्ध कर दिया कि धर्म के प्रति निष्ठा और कर्तव्य परायणता शक्ति ही नहीं अतुलित ज्ञान भी प्रदान करता है जो धर्मराज को भी धर्म का अर्थ समझाने में समर्थ होता है आज मैं यह समझ गया कि कर्म और भाग्य के अनुसार प्राण लेना मेरा कर्तव्य है अपने पति के प्राण के लिए यमराज का भी सामना करने में तनिक भी संकोच ना करना यह एक पति धर्म पराय स्त्री का कर्तव्य है और जो भी नारी ऐसी श्रद्धा विश्वास और प्रेम से अपने कर्तव्य पर अडिग रहेगी उसे तो धर्म के अनुसार उसका फल मिलना ही [संगीत] चाहिए मैं तुम्हें तुम्हारे पति के प्राण लौटाने के लिए तैयार हूं तैयार हूं धन्यवाद धर्मराज न इतना ही नहीं आज से जो भी नारी आपकी कथा सुनकर जेष्ठ मास की अमावस्या का व्रत करेगी उसके पति के भाग्य में यदि अकाल मृत्यु भी होगी तो भी व टल जाएगी और इस व्रत का नाम होगा वट सावित्री त वट सावित्री त [संगीत] नारायण नारायण जाओ पुत्री अपने पति के प्राण के साथ लौट जाओ कल्याण कल्याण कल्याण कल्याण [संगीत] [संगीत] स्वामी स्वामी स्वामी स्वामी सावित्री स्वामी सावित्री क्या मैं निद्रा में लीन हो गया था सावित्री सावित्री स्वामी स्वामी पुत्र पुत्री [संगीत] पुत्री पुत्री यह सब तुम्हारे कारण ही संभव हो चुका [संगीत] है सावित्री तुमने मेरी रक्षा नहीं अभी तो मेरे पूरे परिवार का उद्धार किया है धन्य है ऐसी पत्नी मुझ पर भी कृपा कीजिए देवी मेरा भी उद्धार कीजिए दे मुझे मुझे समझ में आ गया पराई वस्तु पर अपना अधिकार नहीं करना चाहिए नहीं करना चाहिए य ये मा पाप मैं कभी नहीं करूंगा कभी नहीं करूंगा सेवा कर द मुझ सेवा कर [संगीत] उठिए [संगीत] देवज आपकी क्षमा ही आपका पश्चाताप [संगीत] है भाभी मा की जय हो देवी सावित्री की जय हो भाभी मा की जय हो देवी सावित्री की जय [संगीत] हो ओ तो माता अरुंधती के समान माता सावित्री को भी हमारे आगमन का आभास हो [संगीत] गया प्रणाम देवी प्रणाम माता हे गौरी नंदन लक्षमी पुत्र प्रभुत्व का आभास तो निर्जीव कंकड़ पत्थरों को भी हो जाता है यहां के सेवक सेविका ही नहीं यहां का कण कण आपकी प्रतीक्षा कर रहा है और क्यों ना करें शुभता के प्रतीक श्री गणेश और समृद्धि की प्रतीक माता लक्ष्मी का आगमन जो हो रहा है य यहां आपके दर्शन पाकर हम सब धन्य हो गए आप यहां हमारा सत्कार कर रही है और हम हम तो यहां एक अनुरोध लेकर आए हैं कि धर्म नि स्त्रियों में श्रेष्ठतम अर्थात आपका हल्दी कुमकुम सत्कार करने की इच्छा रखते हैं हम हमें अनुमति दीजिए देवी पुत्र माता यह [संगीत] लीजिए माता माता लक्ष्मी आज मैं धन्य हो गई धन्य तो मैं हुई हूं देवी आपके हल्दी कुमकुम सत्कार के बाद मेरा संकल्प भी आज पूरा हो गया और मेरी [संगीत] यात्रा पुत्र गणेश मेरी इस यात्रा को संपन्न और सफल करने में तुम्हारा बड़ा योगदान था तुमने मेरा भार उठाया तुम्हारे कारण ही मैं तीन साधवी देवी की कथा स इसलिए मैं आशीर्वाद देती हूं आज से जो भी संतान अपने माता-पिता को तीर्थ यात्रा ले जाने का कर्तव्य निभाएगा उस पर मेरी विशेष कृपा होगी उसे समृद्धि की प्राप्ति हो माता जिस पर आपकी कृपा हो वह मेरी कृपा से कैसे वंचित रह सकता है ऐसी संतानों पर माता लक्ष्मी और गणेश की कृपा होगी और उन्हें जीवन पर्यंत शुभता और समृद्धि प्राप्त [संगीत] होगी [संगीत] यात्रा में अपनी मां का सहयोग कर मेरा पुत्र गणेश दत्तक पुत्र का कर्तव्य भली भाति निभा रहा है तुम्हारे में क्या चल रहा है पुत्र मां मैं सोच रहा था क्या किसी पुरुष ने भी अपनी पत्नी के प्रति ऐसी निष्ठा का परिचय दिया था जैसे तीनों साद भी माताओं ने दिया हां पुत्र वैकुंठ लौटने की हमारी यात्रा में मैं उनकी कथा भी तुम्हें सुना दूंगी ऐसे अनेक महान पुरुष हुए हैं किंतु उनमें श्रेष्ठ है वृगु ऋषि के पौत्र मुनि रूरू जहां महा तपस्वी रूरू अपनी कठोर तपस्या में लीन थे वही उसी स्थान के निकट प्रतिदिन महादेव की आराधना करने परम सौंदर्य की धनी विश्व वसु और मेनका की पुत्री देवी प्रमा द्वारा आया करती [संगीत] थी रूरू और देवी प्रमा द्वारा एक दूजे के संग सात जन्मों के बंधन में बनते उससे पूर्व देवी प्रमा द्वारा काल का ग्रास बन गई और यही से आरंभ होती है मुनि रूरू के पति धर्म की [संगीत] परीक्षा जिनकी इच्छा शक्ति दृढ़ हो और जो साहसी एवं बुद्धिमान हो उनमें किसी भी असंभव लक्ष्य को संभव बनाने का सामर्थ्य होता है

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