महाभारत हे केश किंतु मैं मुनि या स्थित प्रज्ञ को पहंगा कैसे उसकी पहचान क्या है वो वो उठता बैठता कैसे हैं उसके बोलने की शैली कैसी है केशव उसे पहचानने में तो कोई कठिनाई ही नहीं है पार्थ प्रजाति यदा का मान सरवान पार्थ मनोन आत्मन वामना तुष्ट स्थित प्रज्ञ तद चते उसी की भांति तुम अपनी कामनाएं त्याग दो अपनी व्यक्तिगत अभिलाषा से मुक्त हो जाओ सुख दुख से परे होकर अपने स्वयं में संतुष्ट हो जाओ पार्थ तो ना तुम्हें दुख की अग्नि जला सकेगी और ना सुख की वर्षा तुम्हें भिगा सकेगी हे पार्थ स्थित प्रज्ञ वो मुनि है जो सुख और दुख दोनों ही में समान भाव रखता है और कोई उसका यह संतुलन तोड़ भी नहीं सकता जब उसके शब्द बाहर निकलते हैं तो मन में तैरते दुख और सुख से बाहर नहीं निकलते बल्कि आत्मा की अथाह गहराइयों से बाहर निकलते हैं वह मोह की भाषा नहीं बोलता वह निष्काम कर्म की भाषा बोलता है वह जब बैठता है तो कछुए की भाति अपने भीतर सिमट कर बैठता है और अपने स्वयं ही को दुर्ग बना लेता है अर्थात उसकी इंद्रियां उसके वश में होती हैं और अपनी इंद्रियों को केवल वही अपने वश में कर सकता है जिसका अपना मन अपने वश में हो हे पार्थ ध्यायतो विषयात पजत संगा सजते काम कामात क्रोध विजयते भवति समोह समोह स्मृति विभ्रम स्मृति भ्रंश बुद्धि नाश बुद्धि नाशा प्रणति हे पार्थ सामान्य पुरुष विषय का ध्यान करता है और विषय का ध्यान उसे आसक्त बना देता है इस आसक्ति या लगाव से काम का जन्म होता है जब काम की पूर्ति नहीं होती तो क्रोध उत्पन्न होता है जब क्रोध उत्पन्न होता है तो विषय के प्रति मोह और बढ़ जाता है और जब मोह और बढ़ जाता है पार्थ तो सोचने की शक्ति भटक जाती है जब सोचने की शक्ति भटक जाती है तो बुद्धि का नाश होता है और जब बुद्धि का नाश होता है तो मनुष्य का सर्वनाश हो जाता है और हे कुंती पुत्र तुम्हारा यह मोह तुम्हें बुद्धि के विनाश की ओर ले जा रहा है तनिक सोचो पार्थ कि जिसके पास बुद्धि ही ना होगी उसे शांति कैसे मिल सकती है व तो शांति और अशांति में अंतर ही नहीं कर सकता और जो शांति को अशांति से अलग तक नहीं कर सकता वह भला कैसे सुखी हो सकता है हे पार्थ जैसे पवन के झोंके नाव को भटका देते हैं वैसे ही कामनाए बुद्धि को भटका देती हैं इंद्रिया नाम चरता यन मनो अनु विधते तस्य हरति प्रज्ञाम वायुर नाव वामसी इसलिए हे महाबाहो अपनी इंद्रियों को अपने वश में रखो स्वयं ही उनके वश में ना हो जाओ पार्थ यह बात ध्यान से सुनो और समझो कि जब संसार सोता है तब मुनि जागता है और जब संसार जागता है तब मुनि सोता है यह सोना जागना क्या है केशव ये रात दिन कैसे हैं रात और दिन की तो मैंने बात ही नहीं की थी पार्थ मैंने तो केवल सोने और जागने के विषय में बात की थी सामान्य पुरुष की जाग हर क्षण कुछ पाने और भोगने के मोह में व्यतीत होती है यही उसकी चेतना का लक्ष्य है यदि उसे भूख लगी तो उसे भोजन चाहिए यदि उसे प्यास लगी तो उसे जल चाहिए यदि उसे ऋतुओं से अपना बचाव करना है तो घर चाहिए उसकी सोच आत्म निष्ठ है परंतु मुनि अर्थात सित प्रज्ञ की सोच वस्तुनिष्ठ है वह व्यक्तिगत भूख और व्यक्तिगत तृष्णा के परे देखता है वह वृक्ष से गिरे हुए फल के विषय में नहीं सोचता वह वृक्ष के विषय में सोचता है वनों के विषय में सोचता है सामान्य मनुष्य को ईधन के लिए लकड़ी चाहिए तो वह वृक्षों को तब तक काटता चला जाएगा जब तक वन नष्ट ना हो जाए परंतु मुनि प्रकृति में वनों के महत्व के विषय में सोचता है प्रकृति के संतुलन के विषय में सोचता है वनों और ऋतुओं के संबंध के विषय में सोचता है इसलिए हे पार्थ जो सामान्य पुरुष की इंद्रियों के लिए दिन है वह मुनि के लिए रात है क्योंकि वह तो इंद्रियों की सीमा को पार कर चुका है और जो सामान्य पुरुष की इंद्रियों के लिए रात है वह मुनि के लिए दिन है क्योंकि उसी सन्नाटे में मुनि की चेतना का सूर्योदय होता है मुनि की रुचि सामने की समस्याओं के साथ-साथ उन समस्याओं के समाधान में भी है और यही उसे सामान्य पुरुष से अलग करती है पार्थ या निशा सर्व भूता नाम तसम जागृति संयमी य स्याम जागृति भूतानि सा निशा पश्तो मुने हे पार्थ सत्य इंद्रियों की पहुंच के बाहर है ऐसा नहीं कि मुनि को भूख नहीं लगती लगती है परंतु वह अपनी भूख के परे देखता है और यह सोचता है कि भूख का उपचार क्या है इसीलिए सामान्य मनुष्य का दिन मुनि के लिए रात है और जो सामान्य मनुष्य की इस रात से अपने को बचा ले वही स्थित प्रज्ञ है सामान्य मनुष्य तोन नदियों की भांति है जिन्हें व्याकुलता बहा ले जाती है परंतु उन्हें अपने मार्ग का ज्ञान नहीं होता वह तो अंधाधुंध बही जाती क्योंकि वह केवल बहने ही को अपना कर्म समझती हैं और वह अपना सारा जल अपनी सारी उथल पुथल सागर में उड़ेल देती हैं किंतु सागर फिर भी अपने तटों की मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता इसी प्रकार कामनाओं की नदियां सामान्य मनुष्य को तो बहा ले जाती हैं परंतु जब वह मुनि तक आती हैं तो मुनि उन्हें समेट लेता है और अपनी मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता हे पार्थ तुम भी सागर बनो सागर मुनि है सागर ज्ञानी है तुम भी ज्ञानी बनो पार्थ क्योंकि ज्ञान ही उत्तम है हे ऋषिकेश हे योगेश्वर हे ज्ञान मूर्ति यदि ज्ञान कर्म से उत्तम है तो आप आप मुझे इस लोह लोहान कर्म में क्यों लगा रहे हैं केशव आप मुझे इस लोह लोहान कर्म में क्यों लगा रहे [संगीत] हैं हे केशव आपने तो मुझे उलझा दिया यदि ज्ञान कर्म से उत्तम है तो फिर मैं यह भयानक कर्म करूं क्यों क्यों युद्ध करूं केशव क्यों ना मुनि बनकर मौन समाधि में चला जाऊं मैं कल्याण का मार्ग पूछ रहा हूं केशव कृपया मुझे मार्ग दिखलाइए केशव मुझे मार् दिलाए लोके स्मिन द्विधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मया नग ज्ञान योगेन सांख्या नाम कर्म योगेन योगी नाम हे निष्पाप अर्जुन संसार में दो प्रकार के लोग होते हैं अंतर्मुखी और बहिर्मुखी जो अंतर्मुखी होते हैं वे स्वयं के भीतर जाकर ईश्वर को देखते हैं यही ज्ञान योग है और जो बहिर्मुखी होते हैं वे स्वयं से बाहर निकलकर उसे प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं किंतु कर्म से छुटकारा नहीं क्योंकि स्वयं के भीतर जाकर उसे खोजना भी तो कर्म ही है हे कुंती पुत्र मार्ग तो यही दो है एक ज्ञान योग का और दूसरा कर्म योग का हे केशव तो फिर मैं ज्ञान योग के ही मार्ग पर क्यों ना चलू [हंसी] किंतु हे पार्थ ज्ञान योग भी कर्म के त्यागने का मार्ग नहीं है सिद्धि का मार्ग नहीं है क्योंकि कर्म के बिना तो जीवन संभव ही नहीं आंखें हैं तो वे अवश्य देखेंगी पलके हैं तो वे अवश्य झपक कर्ण है तो वे अवश्य सुनेंगे जो कर्मेंद्रियों के आड़े आए जो उन्हें बल पूर्वक रोककर उनका दमन करके विषयों का चिंतन करे वह योगी नहीं वह ज्ञानी नहीं वह तो मिथ्या चारी है सिद्ध पुरुष इंद्रियों को अपने वश में करता है उनका दमन नहीं करता पार्थ वह आंखें बंद करके नहीं जीता कर्म बिना तो शरीर की यात्रा संभव ही नहीं व्यक्ति सांस तो लेगा ही ना पार्थ यदि वातावरण में कोई सुगंध या दुर्गंध है तो वह उसका अनुभव करने के लिए भी विवश है यदि उसके आसपास कोई नाद है कोई ध्वनि है कोई कोलाहल है तो उसे सुनने के लिए उसके कर्ण उसके आदेश की प्रतीक्षा तो नहीं करेंगे ना इसलिए जो अपने इंद्रियों को नियंत्रित रखे जो उन पर अपनी चेतना का अंकुश लगाकर उन्हें कर्मो मुख करे उन्हें कर्म की दिशा दिखाए वही श्रेष्ठ है वह अपने विकल्पों को समझता है पार्थ और अपनी संकल्प शक्ति का प्रयोग करता है और हे पार्थ अपने नियत कर्म करना कुछ ना करने से अच्छा है अब यह भी ठीक है पार्थ की आंखें देखती हैं किंतु वे क्या देखें और क्या ना देखें इसका निर्णय तो ज्ञानी स्वयं ही लेता है वह आंखों को देखने की करणों को सुनने की और पांव को चलने की खुली छूट नहीं देता विकल्प के इसी मोड़ पर ज्ञानी और अज्ञानी के अंतर का भेद खुलता है पार्थ इसलिए कर्म तो आवश्यक है क्योंकि उसके बिना तो शरीर का निर्वाह संभव ही नहीं किंतु हे पार्थ ज्ञानी पुरुष की भांति कर्म करो ज्ञानी पुरुष की भांति नियतम कुरु कमत्व कर्म जयो कर्मण शरीर यात्रा प चते न प्रसिद्ध कर्मण यज्ञ अर्थात कर्मणो त्र लोकयम कर्म बंधन तदर्थ कर्म कौंतेय मुक्त संग समाचर हे काते कर्म ऐसे करो जैसे यज्ञ किया जाता है क्योंकि कर्म ही यज्ञ है और इसका स्रोत स्वयं अविनाशी ब्रह्मा है इसलिए कर्म का मार्ग सीधा ब्रह्मा तक जाता है और इसीलिए जो व्यक्ति सृष्टि चक्र चलाने में योगदान नहीं करता उसका जीवन मूल्य हो जाता है तुम इस मूल्य की ओर ना जाओ पार्थ तुम इस मूल्य हीनता की ओर ना जाओ जो व्यक्ति केवल अपनी समस्याओं के विषय में सो सता है वह तो पापी है इसलिए तुम इस मोह जाल से निकलकर अपने कर्तव्यों को पहचानो पार्थ और उनका पालन करो हे पार्थ कर्म फल की इच्छा ही मार्ग में बाधा है कर्म फल की इच्छा ही तो व्यक्ति के गले में बंधा हुआ वह पत्थर है जो उसे स्वयं की तहो से ऊपर उठने ही नहीं देता यही तो व्यक्ति को समाज से काट देता है और उसे व्यक्तिगत लाभ और व्यक्तिगत हानि की दल ढकेल देता है समाज तुम में नहीं है पार्थ तुम समाज में हो इसलिए लोक संग्रह और लोक कल्याण ही को अपना परम कर्तव्य मानो क्योंकि जो समाज के लिए कल्याणकारी होगा वही तुम्हारे लिए भी कल्याणकारी होगा जो कर्म लोक संग्रह के लिए होगा पार्थ उसी के द्वारा तुम्हें सिद्धि प्राप्त होगी व्यक्तिगत लाभ से तो पाप की ग निकलती है क्योंकि वह तो स्वार्थ सिद्धि के लिए व्यक्ति को भटका देता है और हे पार्थ यह भी ना भूलो कि तुम एक महान पुरुष हो और लोग तुम्हें दृष्टांत मानकर तुम्हारे पीछे पीछे काम और स्वार्थ के मार्ग पर चल पड़ेंगे क्योंकि एक श्रेष्ठ व्यक्ति का आचरण तो दूसरों के लिए दृष्टांत बन ही जाता है मुझ ही को लो नमे पार्था स्थ कर्तव्यम त्रिश लोकेश किंचन नान वाप्त अत व्यम वर्त एव च कर्मणि त्रिलोक में मेरे लिए कुछ करना आवश्यक नहीं पार्थ और त्रिलोक में ऐसा भी कुछ नहीं जिसे मैं प्राप्त करना चाहूं और प्राप्त ना कर सकूं फिर भी मैं तुम्हारे सामने हूं कर्म कर रहा हूं पार्थ कर्म कर रहा हूं यह दिखला रहा हूं यह सिद्ध कर रहा हूं कि निष्काम कर्म के मार्ग पर चलते हुए जीवन व्यतीत करना संभव है हे संजय वासुदेव ने यह क्या कहा महाराज यहां पर तो वासुदेव कृष्ण के स्वर ही बदले हुए हैं जैसे ही स्वयं वो नहीं बल्कि कोई और बोल रहा है और कौन महाराज कुंती पुत्र अर्जुन क्या समझे यह तो मैं नहीं जानता किंतु स्वयं नारायण के अतिरिक्त तो कोई और इस शैली में बोल ही नहीं सकता कोई और तो यह कह ही नहीं सकता कि त्रिलोक में कोई ऐसी वस्तु है ही नहीं जिसे वह प्राप्त करना चाहे और प्राप्त ना कर सके वह कह रहे हैं कि त्रिलोक में उनके करने योग्य कुछ है ही नहीं फिर भी फिर भी वह कर्म कर रहे हैं कि यदि वह कर्म नहीं करेंगे तो संसार उन्हें दृष्टांत मानकर कर्म को त्याग देगा और कर्म चक्र ठहर जाएगा और उसके ठहर जाने से समाज नष्ट हो जाएगा और इस सर्वनाश का कारण वही ठहराए जाएंगे संजय यह तो कोई साधारण या असाधारण पुरुष कह ही नहीं सकता और यह वाक्य तो यदि किसी ब्रह्म ऋषि के भी हो तब भी यह अहंकार का प्रदर्शन माना जाएगा किंतु वासुदेव के उच्चारण में तो अहंकार की झलक भी नहीं थी महाराज इसी ने तो मुझे भी भयभीत कर दिया है संजय यदि वो इस स्वर में मुझसे भी धनुष उठाने को कहे तो अपनी नेत्र हीनता भूलकर मैं भी धनुष उठा लूंगा संजय तो क्या अर्जुन उठा लेगा इस प्रश्न का उत्तर मैं दे सकता हूं महाराज किंतु भविष्यवाणी मेरे कर्म क्षेत्र के बाहर है यदि भगवान यह चाहते कि मनुष्य को भविष्य का ज्ञान होना चाहिए तो स्वयं उसे यह ज्ञान दे देते इसलिए अपने भविष्य को अपने वर्तमान से निकलने का समय दीजिए महाराज यह प्रतीक्षा भी आपके कर्म क्षेत्र के भीतर है कदाचित तुम ठीक ही कह रहे हो संजय और कदाचित मैं यह जानता भी हूं कि इस युद्ध का परिणाम क्या होगा फिर भी चाहता यह हूं कि इस युद्ध का परिणाम वो ना हो जो होने वाला है कल तक मैं यह सोचा करता था कि मैं शत पुत्रों का पिता हूं इसलिए मैं तो कभी अकेला हो ही नहीं सकता किंतु अब लगता है कि मैं अकेला होने वाला हूं संजय अकेला होने वाला हूं इसलिए मुझे अब अपनी आंखों की उंगली पकड़ा कर कुरुक्षेत्र ले चलो सक्ता कर्मण्य विद्वान सो यथा कुर्वंति भारत कुर्यात विद्वान तथा सक्त लोक संग्रह हे भारत कर्म तो अज्ञानी भी करते हैं परंतु केवल अपने निहित स्वार्थ की दृष्टि से ज्ञानी का कर्म तो निस्वार्थ होता है संसार के संतुलन को स्थिर बनाए रखने के लिए होता है लोक कल्याण के लिए होता है इसलिए हे पार्थ अपने मन पर कोई बोझ न लो अपना कर्म मुझे अर्पण कर दो और यह धर्म युद्ध करो कर्तव्य पालन के मार्ग पर तो मृत्यु भी कल्याणकारी हो जाती है यदि पितामह गुरुजनों और सगे संबंधियों का तुम्हें वध भी करना पड़े तब भी तुम्हें पाप नहीं लगेगा क्योंकि कर्तव्य पालन पाप रहित होता है पार्थ कर्तव्य पालन पाप रहित होता है यदि वे वीर गति को प्राप्त हुए तो उनकी मृत्यु कल्याणकारी हो जाएगी और यदि तुम वीर गति को प्राप्त हुए तो तुम्हारी मृत्यु भी इसलिए हे पार्थ युद्ध करो क्योंकि धर्म का मार्ग पाप का मार्ग नहीं हो सकता पाप की बात निकल आई है तो यह बताइए केशव कि कभी-कभी मनुष्य पाप करने के लिए इतना विवश क्यों हो जाता है उसे कौन विवश करता है उसे विवश करती है उसकी वासना उसे विवश करता है उसका निहित स्वार्थ उससे पाप करवाता है उसका क्रोध उसका मोह इन शत्रुओं को पहचानो पार्थ जैसे धुआ अग्नि को ढक देता है या धूल दर्पण को या झिल्ली गर्भ को वैसे ही ज्ञान को ढक देते हैं काम मोह और वासना आवृत ज्ञान मेते न ज्ञानी नो नित्य वैरीना काम रूपेण कौंतेय दुष्प रेणा नले नच काम और मोह की अग्नि ज्ञान को नष्ट कर देती है और इसीलिए ज्ञानी की वैरी है हे कौंतेय अग्नि को स्वच्छ बना दर्पण को परिशुद्ध करो और अपनी इंद्रियों को सौम्य बनाकर ज्ञान और विवेक के नाश कों का वध करो इंद्रियानी पराण इंद्रिय परम मन मन सस्तु परा बुद्धि यो बुद्धे परत स्तु स हे पार्थ जड़ पदार्थ से इंद्रिया श्रेष्ठ है और इंद्रियों से श्रेष्ठ है मन मन से श्रेष्ठ तर है बुद्धि और बुद्धि से भी श्रेष्ठ है आत्मा तो आत्मा की चिंता करो पार्थ आत्मा की चिंता करो और देह इंद्रियों मन और बुद्धि से ऊपर उठने का प्रयत्न करो हे पार्थ तुम तो मेरे भक्त भी हो और मेरे मित्र भी इसलिए मैं तुम्हें वह योग बताने जा रहा हूं जो बहुत समय से लुप्त है परंतु सृष्टि के आरंभ में इसे मैंने ही सूर्य को दिया था और सूर्य से मनु को मिला और मनु से एक श वाकू तक पहुंचा सूर्य को दिया था आपने यह योग सूर्य को दिया था परंतु हे केशव आपने आधुनिक काल में जन्म लिया है और सूर्य देव प्राचीन है तो मैं यह कैसे मान लू कि सृष्टि के आरंभ में ही आपने यह योग सूर्यदेव को दिया होगा बोलिए केशव बहु में तानी जनमानी तव चा अर्जुन तान हम वेद सर्वानी नवम वे परं तप हां पार्थ मेरे और तुम्हारे बहुत से जन्म हो चुके हैं मुझे वह सारे जन्म याद हैं परंतु तुम्हें याद नहीं है हे परं तप वैसे तो मैं अजन्मा हूं अविनाशी हूं और समस्त प्राणियों का स्वामी हूं परंतु मैं अपनी प्रकृति को अधीन करके अपनी ही योग माया से प्रकट होता रहता हूं यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानि भवति भारत अभ्युत्थानम अधर्मस्य तदात्मानं सजाम परित्राणाय साधु नाम विनाशाय च दुष्कर्म संस्थापन थाय संभवामि युगे युगे [संगीत] हां पार्थ मैं प्रकट होता हूं मैं आता हूं जब जब धर्म की हानि होती है तब तब मैं आता हूं जब जब अधर्म बढ़ता है तब तब मैं आता हूं सज्जन लोगों की रक्षा के लिए मैं आता हूं दुष्टों का विनाश करने के लिए मैं आता हूं धर्म की स्थापना के लिए मैं आता हूं और युग युग में जन्म लेता हूं किंतु हे केशव धर्म की हानि होती ही क्यों है धर्म की हानि इसलिए होती है पार्थ कि मनुष्य मोह के बंधन को नहीं तोड़ पाता कि वह अपने स्वयं से नाता तोड़कर समाज से नाता नहीं जोड़ पाता हे पार्थ यदि ऐसा ना हुआ होता तो लाक्षा ग्रह दुर्घटना न हुई होती द्रौपदी वस्त्र हरण ना हुआ होता और कौरव और पांडव सेनाएं यूं आज एक दूसरे के सामने नहीं खड़ी होती तो क्या द्रौपदी वस्त्र हरण पर मुझे क्रो नहीं आना चाहिए था केशव यह निर्णय तो स्वयं तुम्हें लेना है पार्थ किंतु द्रौपदी वस्त्र हरण केवल तुम्हारी व्यक्तिगत समस्या नहीं है पार्थ जो समाज इंद्र प्रस की पटरानी महाराज द्रुपद की पुत्री और पांडवों की पत्नी द्रौपदी के वस्त्र हरण पर चुप रह गया वह समाज भला किसी साधारण नारी के मान सम्मान की क्या रक्षा करेगा द्रौपदी वस्त्रहरण एक सामाजिक समस्या है पार्थ एक सामाजिक समस्या है और यह तुम्हारा कर्तव्य है कि तुम उन शक्तियों को नष्ट करने के लिए युद्ध करो जो किसी द्रौपदी का वस्त्र हरण कर सकती हैं यह शक्तियां समाज की शत्रु है पार्थ और जो महापुरुष इस युद्ध में उन शक्तियों के पक्ष में हैं उनके पक्ष में युद्ध करने आए हैं उनसे युद्ध करने में भी संकोच ना करो अपने व्यक्तिगत क्रोध और व्यक्तिगत मोह के बंधनों से मुक्त होकर लोग कल्याण के लिए युद्ध करो पार्थ यही तुम्हारा परम कर्तव्य है मुझे देखो पार्थ इस समाज और उसके वर्णों को गुणों और कर्मों के आधार पर स्वयं मैंने रच तो दिया परंतु इस समाज रचना का फल मैंने कभी नहीं चाहा इसीलिए कर्ता होते हुए भी मैं अकता हूं और जो इस रहस्य को समझे पार्थ वह कभी अपने कर्मों में लिप्त नहीं होगा नमाम कर्माणि लिम पंती नमे कर्म फले पहा इति माम यो भी जानाति कर्म भी मुझे कर्म फल की इच्छा नहीं है जभी तो कर्म मुझे दूषित नहीं कर पाते तुम भी निष्काम कर्म करो पार्थ और अपने कर्म पर अपने निहित स्वार्थ की छाया ना पड़ने दो हे भारत कर्म अकर्म और विकर्म के अंतर को समझो और कर्म अकर्म और विकर्म में क्या अंतर है केशव कर्म तो कर्म है ही किंतु जो कर्म कर्म फल की आशा से मुक्त होकर किया जाए वह अकर्म है और जो कर्म व्यक्ति और समाज के हित में ना हो वह विकर्म है निषिद्ध है कर्म अकर्म से श्रेष्ठ है कर्ता अकता से श्रेष्ठ है और हे पार्थ जो अकता है जो कर्म फल की इच्छा से मुक्त है वही ज्ञानी है वही बुद्धिमान है और वही कर्म योगी है उसके लिए उसका कर्म ही कर्म फल भी है और इसीलिए वह एक कर्म के पालन के उपरांत कर्म फल की प्रतीक्षा में नहीं ठहरता बल्कि दूसरे कर्म की ओर बढ़ जाता है उसके ज्ञान की अग्नि मोह क्रोध द्वेष आकांक्षा लाभ हानि सुख और दुख के मैल को जलाकर उसके कर्म को शुद्ध कर देती है और उसका कर्म अकर्म बन जाता है और वह कर्ता से अकता और यह अकता यह ज्ञानी जीवन के आवश्यक साधन जुटाने के अतिरिक्त अपने लिए और कुछ नहीं करता उसके शेष कर्म समाज कल्याण के लिए होते हैं यह मनुष्य कर्म करते हुए भी पाप से दूषित नहीं होता उसका जीवन तो स्वयं ही समाज के लिए कल्याणका हो जाता है हे निष्पाप अर्जुन ऐसे ही व्यक्ति का जीवन यज्ञ है तुम भी अपने जीवन को यज्ञ बना लो और उसके हवन कुंड में अपने कर्म फल की इच्छा मोह और क्रोध को आहुतियां की भाति जला डालो और यज्ञ क्या है केशव अलग-अलग लोग यज्ञ की परिभाषा भी अलग-अलग करते हैं पार्थ कुछ लोगों के लिए यज्ञ ब्रह्म का स्वरूप है उनके लिए सब कुछ ब्रह्म है कुछ लोग देवताओं को प्रसन्न करने के लिए यज्ञ करते हैं तो उनके लिए पूजा ही यज्ञ है कुछ साधक आत्मा को परमात्मा से मिलाने की साधना को यज्ञ कहते हैं इन्हीं यज्ञों की भांति इनमें दी जाने वाली आहुतियां भी अलग-अलग प्रकार की हैं कोई धन की आहुति देता है तो कोई कर्म की किंतु वास्तव में यज्ञ चार प्रकार के हैं पहला द्रव्य यज्ञ है इसमें अर्जित द्रव्य और धन को समाज कल्याण के कार्यों में लगाया जाता है अर्थात यह लोक सेवा यज्ञ है दूसरा तपो यज्ञ है जब कोई अपने कर्म को अपनी तपस्या बना लेता है तो उसका जीवन तपो यज्ञ बन जाता है हे पार्थ अपने धर्म का पालन भी यज्ञ है किंतु यह धर्म सांप्रदायिक नहीं सनातन है यह व्यक्ति और समाज दोनों ही के लिए कल्याणकारी है तीसरा यज्ञ योग यज्ञ है इसमें अष्टांग योग की साधना की जाती है और इसमें लोग ध्यान और समाधि का मार्ग अवलंब करते हैं प्राणों का प्राणों में हवन किया जाता है चौथा यज्ञ है ज्ञान यज्ञ यूं तो पार्थ चारों ही यज्ञ महत्त्वपूर्ण है परंतु श्रेष्ठतम है ज्ञान यज्ञ क्योंकि ज्ञान ही तो अच्छे और बुरे में अंतर करता है और अपनी अग्नि में तपाक कर्म को शुद्ध करता है और शुभ बनाता है ज्ञान ही तो कर्म के उत्कर्ष का चरम बिंदु है और ज्ञान ही तो तुम्हे मोह बंधनों से मुक्त कराएगा पार्थ हे पार्थ पाप के सागर को केवल ज्ञान की नौका ही पार कर सकती [संगीत] है कर्म करो तुम ज्ञान से श्रेष्ठ ज्ञान है धर्म कर्म धर्म योग ही धर्म है धर्म योग ही कर्म आभार महा भार महाभारत महाभारत हो महा
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