Monday, 5 January 2026

श्री कृष्ण ने दिया ३ गुणों का ज्ञान गीतासार SaurabhPandey SuryaputraKarn Episode 233 PenBhakti

[संगीत] महामहिम भीष्म और आचार्य द्रोण हम सबका देह इन पंच महा भूतों से बनाए जिसे अंतता उन्हीं में मिल जाना है तो मोह किसका पार्थ इस माटी से बने देह का तो क्या यह देह महत्त्वपूर्ण नहीं है माधव इसी देह से हम अपना रूप और परिचय पाते हैं यदि ऐसा है पाप तो मनुष्य के मृत्यु के पश्चात उसके देह को नष्ट क्यों कर दिया जाता है मनुष्य का वास्तविक स्वरूप और परिचय उसके देह से नहीं उसके स्वभाव उसके कर्म उसके विचारों से होता है पार्थ जब मनुष्य का देह नष्ट हो जाता है इस संसार में नहीं रहता तो मनुष्य के कर्म और उसके विचार उसका परिचय बनकर इस संसार में रहते हैं पार मनुष्य का जीवन केवल 20 दृश्य और अदृश्य पदार्थों का संगम है परंतु फिर भी सबके विचार सबका चरित्र भिन्न है क्यों माधव जब उद्गम सम्मान है तो सब में अंतर [संगीत] क्यों कारण है तीन गुण रजोगुण सत्व गुण और तमोगुण य तीन गुण क्या है मा तमस का अर्थ है अंधकार अर्थात प्रकाश का आभाव विचार के प्रकाश के अभाव में केवल शरीर की इच्छाओं के अधीन होकर जीना तामसिक व्यवहार कहलाता है पार्थ पशु पक्षी जल जीव यह सब इसी श्रेणी में आते हैं पार्थ और सत्व का अर्थ है ज्ञान का प्रकाश जो सत्य का धर्म का नीति और परंपराओं का विचार करके जीवन जीता है उसे सात्विक जीवन कहते हैं पात और इन दोनों गुणों के मध्य होता है रजोगुण अर्थात ऐसा मनुष्य जिसमें ज्ञान है विचार करने की शक्ति है परंतु वह मन और शरीर की शूद्र इच्छाओं से बंधा रहता है ऐसा मनुष्य रजस अर्थात अहंकार के साथ जीता है इन् तीन गुणों की न्यून या अधिक मात्रा के मेल से मनुष्य का स्वभाव बनता है प्रत्येक मनुष्य दूसरे मनुष्य से भिन्न होता है उधर देखो पार्थ कौन दिखाई देता है दुर्योधन और दशा से अब दुर्योधन के भीतर स्थित गुणों का विश्लेषण करो पा धर्म जानते हैं परंतु उसका वहन नहीं करते अहंकार इनके जीवन का केंद्र है अर्थात तमस की मात्रा न्यून है और रजस गुण की अधिक और सत्य तो बिल्कुल भी नहीं और दुशासन उसने सदा केवल अपने जेष्ठ का आदेश माना है स्वयं का कोई विचार नहीं इसलिए उसके मन में केवल समस गुण है अब महामहिम को देखो पार सत्व के साथ तमस के अद्भुत मेल को देखो उनमें अहंकार नहीं है परंतु पुरातन परंपरा और प्रण से बंधित है अवश पड़ने पर भी परंपरा का त्याग नहीं कर सकते और उधर आचार्य द्रोण को देखो पा ज्ञान और अहंकार का संगम ज्ञान उनको मुक्त करने को आतुर है परंतु अहंकार उन्हें मुक्त होने नहीं देता परंतु माता यदि मनुष्य का स्वभाव इन गुणों के मेल से आकार पाता है तब तो उसका व्यवहार जन्म से ही निश्चित होता है ना सिह का गुण है कि वह मृग का आखेट करेगा ही भय भीत करेगा ही उसी प्रकार मृग का भी गुण है कि उसे सिंह से हैबत होना ही है यदि किसी का अपराधी और अधर्मी होना निश्चित है फिर हम क्यों किसी के कर्मों की प्रशंसा करते हैं क्यों हम किसी को अपराधी मानकर उसे दंड देते हैं क्या आवश्यकता है किसी के नाश की क्या आवश्यकता है किसी के प्रतिकार की उत्तम प्रश्न है पार्थ परंतु मनुष्य का कर्म जानने से पूर्व यह समझ लेना आवश्यक है कि मनुष्य वास्तव में है क्या क्या मनुष्य केवल पंच महा भूतों का मेल है नहीं मनुष्य केवल पंच महा भूतों का पंच पदार्थों का पंच ज्ञान इंद्रियो पंच कर्मन इंद्रियो और तीन गुणों का मेल नहीं इन 2 गुणों के अतिरिक्त भी एक शक्ति है जो मनुष्य को विचार करने की धर्म और कर्म समझाने की उसको भिन्न बनाने की शक्ति देती है और वो शक्ति है चेतना इन तत्वों का मेल प्रकृति है पार्थ जो मनुष्य योनि नामक यंत्र में वास करती है पुरुष अर्थात परमात्मा का अंश जब पुरुष और प्रकृति अर्थात आत्मा और परमात्मा का मेल होता है तभी जाकर मनुष्य का देह जीवित रहता है यदि मनुष्य परमात्मा का अंश है तो फिर ये आत्मा क्या है इसे कैसे जाना [संगीत] जाए तुम एक महारथी हो और इस रथ का उपयोग करते हो उसी प्रकार आत्मा इस शरीर नामक रथ का इस यंत्र का उपयोग करती है परंतु आत्मा शरीर नहीं होती एक रथ के टूट जाने पर जिस प्रकार रथी का नाश नहीं होता उसी प्रकार शरीर के नष्ट हो जाने पर आत्मा का नाश नहीं होता नयनम चिंति शस्त्राणि नयनम दहति पावक ना चम क्लेन ताप ना सो शति [संगीत] मारुता आत्मा को ना कोई शस्त्र छेद सकता है ना अग्नि उसे जला सकती है ना जल उसे डुबो सकता ना वायु आत्मा को सुखा सकती है आत्मा अजर है आत्मा अमर है अमर आत्मा शरीर से जुड़े होने के पश्चात भी वह शरीर से अलग है ना हनते हन्य माने शरीर पार शरीर की हत्या की जा सकती है परंतु आत्मा की हत्या नहीं की जा सकती वो अचल है स्थिर है वो सनातन है सर्वव्यापी है जिस प्रकार हम पुराने वस्त्रों को त्याग कर नया वस्त्र धारण करते हैं ठीक उसी प्रकार हमारी आत्मा देह नष्ट हो जाने के पश्चात नया देह धारण कर लेती है [संगीत] परंतु स्वयं को देह ना जानकर मैं आत्मा को कैसे जान सकता हूं माता इसमें कुछ असंभव नहीं एक दृष्टिहीन व्यक्ति संसार को अपनी मन की दृष्टि से देखता है बोलने में असम व्यक्ति प्रयास करके अपने संकेतों से संसार को समझाता है जिनके हाथ पांव नहीं होते वो भी पुरुषार्थ करते हैं तो आत्मा को जानना भी इतना कठिन कार्य नहीं है पात जिस प्रकार मूर्छित होने पर शरीर गिर जाता है कुछ करने योग्य नहीं होता उसी प्रकार आत्मा से अनजान व्यक्ति मूर्चित शरीर के समान होता है वह जीवित रहता है परंतु कर्म और धर्म को समझ नहीं पाता जो मनुष्य अपने भीतर जाकर उस परमात्मा के अंश की खोज करता है वह जान जाता है कि वो केवल इंद्रियों का संगम है केवल यह शरीर नहीं केवल भाव नहीं वो स्वयं को आत्मा के रूप में पहचान लेता है परब्रह्म विभाजित होकर पुरुष और प्रकृति बने पार्थ फिर प्रकृति की प्रत्येक वस्तु में आत्मा का वास हुआ प्रकृति यानी मनुष्य का शरीर जब वह मोह और अंधकार से घिर जाता है तब वो अपनी चेतना को खो देता है तब उस मोह निद्रा को तोड़कर अपनी चेतना को जगा स्वयं को परमात्मा का भाग जानना यही आत्मा का कार्य यही उसका उद्देश्य है पार्थ यदि हर आत्मा परमात्मा का अंश है तो फिर ये प्रगति और अवग नाश और उत्थान पाप और धर्म ये सब परमात्मा स्वयं कर रहे हैं नहीं पार यह मनुष्य की चेतना और आत्मा करती है जिस प्रकार कीचर से घिरा रत्न अपनी चमक खो देता है जिस प्रकार मेघों से घिरा सूर्य अपना प्रकाश खो देता है वैसे ही प्रकृति के 24 तत्त्वों से घिरी आत्मा यह भूल जाती है कि वो परमात्मा का अंश है उसे लगता है कि यह देह ही सब कुछ है देह के अतिरिक्त भी उसका कोई अस्तित्व है इसका उसे भान ही नहीं रहता वह केवल देह की संवेदना को ही ज्ञान मानती है हानि लाभ सुख दुख स्वाद गं स्पर्श श्रवण बस इसे ही अपना अनुभव मान लेती है वो पाप कर जो आत्मा परिवर्तन का प्रयत्न नहीं करती जो अधर्म करते रहती है उसको जागरूक करने के लिए दंड देना अनिवार्य होता है प उसके जागरण के लिए युद्ध अनिवार्य होता है अर्थात यह युद्ध अनिवार्य है मैं शरीर नहीं हां पार्थ तुम भी यह शरीर नहीं तुम भी आत्मा हो और इस युद्ध भूमि में खड़ा प्रत्येक योद्धा वैसा नहीं जैसा तुम उसे जानते हो वह सभी आत्माएं मोह अहंकार और अंधकार से घिरी हुई कुछ समय के लिए आत्मा इनके शरीरों में वास कर रही है शरीर मरेंगे किंतु सब अमर है अपनी अपनी देह को त्याग कर सब नया शरीर धारण करें और बार-बार तब तक ऐसा होता रहेगा जब तक आत्मा से मोह और अहंकार का आवरण नहीं हट जाता जब तक वह स्वयं को पवित्र आत्मा शुद्ध आत्मा के रूप में नहीं जान लेती और अधर्म का त्याग करके धर्म में दृढ़ नहीं हो जाती [संगीत] ब्रह्म विद्या का पहला पाठ यही है पार तुम क्या खोने से डरते हो तुम क्या साथ लाए थे जो तुम वापस ले जाओगे जिसने जन्म लिया है उसे एक ना एक दिन अवश्य मरना होगा और जो मरेगा उसे फिर से जन्म लेना होगा यही महा ज्ञान सांख्य योग है [संगीत] पार्थ जब मनुष्य स्वयं को परमात्मा के अंश के रूप में जान लेता है तब उसे ज्ञात हो जाता है कि सृष्टि ही परमात्मा है और परमात्मा ही सृष्टि टि और परमात्मा में कोई भेद नहीं तब व अन्य प्राणियों के प्रति कठोर और निर्दय नहीं होता पार्थ यदि जीवा दांतो से कट जाए तो पीड़ा केवल जीभ को नहीं होती समग्र शरीर उसकी पीड़ा अनुभव करता है ठीक उसी प्रकार स्वयं को आत्मा के रूप में जानने वाला पीड़ा को स्वयं अनुभव करता है और उनके सुख में आनंद भी मनाता है पाल जब तक इस संसार में एक भी मनुष्य को पीड़ा है तब तक वास्तव में किसी का भी सुख संपूर्ण नहीं होता और इस सत्य को जानकर मनुष्य का हृदय मनुष्य का मन करुणा से भर जाता है करुणा ही धर्म है पार्थ जिस मनुष्य पर तमस गुण छाया होता है व निर्दय कठोर और स्वार्थी होता है वह अपने सुख के लिए दूसरों को दुख देता है परमात्मा की ओर गति नहीं करता अर्थात परमात्मा से दूर ले जाने वाले मार्ग का नाम अधर्म है पर्थ अर्थात अधर्म तो अज्ञान का दूसरा नाम है [संगीत] माधव परंतु अज्ञानी और अपराधी में अंतर नहीं होता क्या अज्ञानी के लिए दया आवश्यक नहीं उह दंड देना कैसे उचित है जब एक अज्ञानी ज्ञान का मूल्य जानने को सज्ज ना हो तो दंड ही समाधान है पाप और दंड ही दया है उसके प्रति भी और दूसरों के प्रति भी सृष्टि की गति सदा परमात्मा की ओर हो यह आवश्यक नहीं पा कभी-कभी ऐसी स्थिति भी आती है जब अधर्म मोह और अज्ञान बढ़ जाता है धर्म के नाश भय उत्पन्न हो जाता है यदि संसार से धर्म लुप्त हो जाता है तो करुणा भी नष्ट हो जाती है सत्य भी नष्ट हो जाता है यदि भविष्य में आने वाली पीढ़ियों को धर्म प्राप्त हो सके इसलिए आज अधर्म हों का वध करके धर्म की स्थापना करना आवश्यक है बा और आज तुम्हारे समक्ष ऐसी ही स्थिति है और धर्म स्थापना का कर्तव्य तुम्हारा है पार्थ अपनी निर्बलता त्यागो पार्थ और युद्ध के लिए सज्ज हो [संगीत] जाओ किंतु मेरे हाथों से हत्याएं होंगी किसी की मृत्यु होगी क्या मेरे भीतर की करुणा का नाश नहीं हो जाएगा मात यदि करुणा ही धर्म का आधार है तो फिर मेरी आत्मा तो अधर्मी बन जाएगी मातो कर्म का बंधन अवश्य निर्मित होता है परंतु कार्य का बंधन निर्मित नहीं होता पाथ प्रत्य कर्म कार्य होता है पास परंतु प्रत्येक कार्य कर्म नहीं होता कर्म उस कार्य को कहते हैं जब मनुष्य उस कार्य से फल की इच्छा रखता है जब भी मनुष्य धन संपत्ति प्रशंसा के लिए कार्य करता है उस कार्य से फल की आशा रखता है तब वह उस फल में बंध जाता है और इसी कारण उसे बारबार जन्म पता है पार वास्तव में मनुष्य को कोई कर्म नहीं बांधता पार उस कर्म से जुड़ी फल की आशाएं फल की कामना मनुष्य को बांधती है वो कैसे माथा यदि तुम्हें इस युद्ध में विजय होने की आशा है तो पराजित होने पर तुम्हें भीषण दुख होगा पा दुख तुमसे कुकर्म करवाएगा और उसके फल के लिए तुम्हें दूसरा जन्म लेना होगा और यदि तुम्हें विजय प्राप्त हुई तो वह तुम्हारा अहंकार बढ़ाएगा और उस अहंकार से तुम्हें विश्व विजय बनाएगा हत्या करवाएगा उसका पाप तुम्हें बांधे का पार्थ तनिक विचार करो पार्थ यदि इस युद्ध में तुम विजय होने का मोह त्याग दो पराजित होने का भय त्याग तो बताओ पा इस युद्ध के पश्चात तुम्हें दुख प्राप्त होगा या [संगीत] सुख ना सुख ना दुख अर्थात वास्तव में तुम्हारा सुख दुख अ यह सब इस युद्ध के कारण नहीं यह सब इस युद्ध से जुड़ी तुम्हारी आशाओ के कारण है पा क्या यह सत्य नहीं सुख दुखे समय कवा लाभा लाभा जया जय ततो यु य जसवा नवम पापम [संगीत] पार्थ सुख और दुख को समान मानक हानि और लाभ का विचार किए बिना यदि तुम यह युद्ध करोगे पार्थ तो तुम पाप के भोगी नहीं [संगीत] बनोगे

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