Monday, 5 January 2026

श्री कृष्ण ने दिया कर्म और धर्म का ज्ञान Saurabh Pandey Suryaputra Karn Episode 234 Pen Bhakti

[संगीत] यदि तुम सुख दुख को समान मानकर हानि और लाभ का विचार किए बिना यदि तुम यह युद्ध करोगे पार्थ तो तुम पाप के भोगी नहीं बनोगे इसी को कर्म योग कहते हैं जो सांख्य योग का ज्ञान प्राप्त कर लेता है जो यह जान लेता है कि आत्मा ही शरीर है देह का अनुभव और भोग केवल मृत्यु तक सीमित है अर्थात वास्तविक नहीं माया है उसके लिए कर्म योगी बनना सरल हो जाता है पार तु यदि कर्म से बंधन निर्मित होता है तो फिर सन्यास लेकर जगत का त्याग कर क उचित नहीं यह युद्ध इसी सोच का ही तो परिणाम है पार तनिक विचार करो जब सत्व गुण से भ अधर्म को जानने वाले लोग कर्म का त्याग करते हैं तब अधर्म से भरे लोग संसार चलाने लगते हैं प यदि महामहिम भीष्म संसार का त्याग ना किया होता तो आज संसार में अधर्म इतना नहीं बढ़ता प यदि तुम्हारे पिता ने सन्यास ना लिया होता तो आज तुम्हारे भ्राता युधिष्ठिर सुख से राज कर रहे होते प्रजा को सुख और धर्म का ज्ञान [संगीत] देते सत्व गुण से संचित लोग ही संसार को ते परंतु जब वही सन्यास का विचार करते हैं तो धर्म की हानि होती है जिस प्रकार सूर्य के ताप से जल वाष्प बनकर उड़ जाता है और कीचड़ रह जाता है उसी प्रकार सत्व गुणी और सज्जन लोग इस संसार का त्याग करते हैं तो तमस गुण से भरे अधर्मी इस संसार पर राज करते हैं और इसी कारण संसार में पाप अपराध और अधर्म बढ़ता है किंतु कर्म योग इस विचित्र स्थिति से सारे संसार का रक्षण करता है एक कर्म योगी हल्की आशा का त्याग करता है किंतु वह कर्मों का त्याग नहीं करता व इसी संसार में रहता है किंतु एक सन्यासी की भाति वो कार्य सारे करता है परंतु कर्म एक भी नहीं करता एक कर्म योगी अपनी संतानों से अपने बंधु बांधव से अपनी प्रजा से किसी भी प्रकार की कोई आशा कोई अपेक्षा नहीं रखता पार्थ स्वयं उसे सन्यास का लाभ प्राप्त होता है और सन्यासी की भाति व संसार को लाभ देता है किंतु [संगीत] माधव मनुष्य अपनी संतानों को सुखी रखने के लिए परिश्रम करता है वह अपनी संतानों से अपेक्षा कैसे ना रखे [संगीत] माधव तो बताओ पार्थ मनुष्य अपनी संतानों के लिए जो कुछ भी करता है क्या व उसका प्रेम है या उसका व्यापार [संगीत] अवश्य यह प्रेम ही है माधव तो फिर अपने कार्यों का प्रतिफल पाने की इच्छा क्यों पात भविष्य का लाभ तो व्यापार में देखा जाता है प्रेम में नहीं यदि मनुष्य अपनी संतानों का चरित निर्माण उचित रूप से करेगा अपनी संतान को प्रेम और धर्म के संस्कार दे तो संतान मनुष को समान और सुरक्षा अवश्य देगी संतानों का निर्णय स्वजनों का व्यवहार उनके कर्म है दूसरों के कर्मों पर यदि मनुष्य को कोई अधिकार नहीं तो फिर व्यर्थ आशाए और अपेक्षाएं रखने का क्या प्रयोजन पार यदि गहन विचार करोगे तो तुरंत ही जान पाओगे जीवन में ऐसा कोई कार्य नहीं जिसके साथ आशा या अपेक्षा जोड़ना अनिवार्य हो कर्म योग का मूल सिद्धांत यही है पार्थ जो मनुष्य यह जान लेता है कि वह स्वयं कुछ नहीं करता उसी के हाथों महत्त्वपूर्ण कार्य होता है कर्मण्य वाधिकारस्ते मा फलेशु कदाचित मा कर्म फले हेतु भूम ते संगो विकर्म कर्मण्य वाधिका तुम्हे अधिकार केवल कर्म करने का है पार्थ फल तो ईश्वर के हाथों में इसलिए ना कर्म से भागना उचित है ना कर्म से फल की इच्छा रखना उचित है कार्य पूर्ण रूप से तभी संपन्न होता है जब उसके साथ फल की आशा ना जुड़ी हो असफलता से दुखी होकर जिसका मन नहीं डोलता वही मनुष्य सफलता का मनोरथ पूर्ण कर पाता है वही बारबार सफलता भी प्राप्त करता है कार्य सफल हो या निष्फल यदि उस कार्य के साथ फल की आशा जुड़ी है तो मनुष्य को हानि ही होती है पा यतो विया कुम स संगते शुप जायते संगत सजते कामा कामात क्रोध भिजाते क्रोधात भवती समोह स्मति विभ्रम स्मृति ब्रद बुद्धि नाश बुद्धि नात प्रण हल्की आशा कामना है और कामना का स्वभाव है कि वह कभी भी पूर्ण रूप से संतुष्ट नहीं हो सकती असंतोष कारण होता है क्रोध के जन्म और इसी क्रोध से अहंकार और मोह जन्म लेता है यदि सद ज्ञान पाने की इच्छा ना हो तो सद ज्ञान पाने की बुद्धि कहां से आएगी और बुद्धि के जाने पर अनुचित प्रकार के कार्य होने लगते हैं अनुचित कार्य करने वाला अपराधी होता है और अपराधी दंड का पात्र होता है समाज में तिरस्कार का पात्र होता है अपनी बुद्धि को स्थिर कर स्वयं को जान सारे मिथ्या बंधनों को तोड़ दो फल की आशा का त्याग करके कर्म करते रहो परंतु स्थिर प्रज्ञा होने का मार्ग क्या है माता सांख योग पा सांख्य योग के कारण मनुष्य सदैव परमात्मा का निरंतर स्मरण करता है परमात्मा के निरंतर स्मरण से उसके हृदय में समर्पण का भाव जागृत होता है और उसे ही भक्ति कहते हैं पा भक्ति से मनुष्य को सत्य और असत्य का ज्ञान प्राप्त होता है और उस ज्ञान से मनुष्य को परमात्मा के दर्शन होते हैं जो परमात्मा के दर्शन कर लेता है वह वास्तव में कर्म योगी बनता है वो जन्मों के फेरों से छूटकर उससे मुक्त होकर मो प्रत करता सभी आत्माओं का अंतिम लक्ष्य वही है और धर्म का अंतिम चरण भी वही है पाक पा परमात्मा के दर्शन करने हेतु दृष्टि पर बंधी मोह क्रोध अहंकार और पूर्व ग्रह की पट्टी उसको उतारना आवश्यक होता है पार्थ यदि अंधेरे कक्ष में बैठा मनुष्य तुमसे यह पूछे कि मैं सूर्य के दर्शन कैसे करूं तो उसे क्या कहोगे पा उससे कहोगे कि अपना कक्ष त्याग कर आकाश के नीचे आ जा सूर्य तो सदा उपस्थित है उसी प्रकार सारा संसार ही परमात्मा है एक परब्रह्म का भाग होकर पुरुष और प्रकृति बने प्रत्येक शरीर में परमात्मा का अंश होता है और जो अपनी आत्मा के दर्शन कर लेता है उसे स्वयं परमात्मा के भी दर्शन हो जाते हैं पार जिस प्रकार नमक के एक कण का स्वाद सारे सागर के स्वाद से भिन्न नहीं होता उसी प्रकार आत्मा का दर्शन परमात्मा के दर्शन से भिन्न नहीं होता [संगीत] पा क्या आप ही परमात्मा है [संगीत] माधव अवश्य केवल मैं ही नहीं तुम भी परमात्मा हो अर्जुन केवल तुम जागरूक नहीं मैंने वो जान लिया है कि मैं ही समस्त संसार इस संसार का कण कण मैं ही सूर्य चंद्र ग्रह और नक्षत्र मैं ही सारे मनुष्य मैं ही दुर्योधन और मैं ही अर्जुन मैं ही अर्जुन ही अर्जन आपके प्रति समर्पण ही परमात्मा के प्रति समर्पण क्यों नहीं हो सकता माधव अवश्य पा रे प्रति समर्पण परमात्मा के प्रति समर्पण [संगीत] है सर्व धर्मा परित माम एकम शरणम ब्रज अहम तवाम सर्व पापे मोक्षा श्याम माश जगत के सारे धर्मों को त्याग कर तुम मेरी शरण स्वीकार करो पार्थ मैं ही भूमि हूं मैं ही आकाश हूं मैं सूर्य से भी पुरातन हूं मैं किसी वृक्ष पर खिली कली से भी नया मैं ही स्वर्ग और नर्क को धारण करने वाली शक्ति हूं पार किंतु वो कैसे संभव है माधव आपका जन्म बहुतों ने अपने जीवन काल में देख आपकी माता जीवित है इनके गर्भ में आपका शरीर बना अ पुरातन और अविनाशी कैसे हो सकते हैं [संगीत] माता तुम शरीर को देख रहे हो पार्थ और मैं आत्मा की बात कर रहा हूं मेरे अनेक जन्म हुए मैंने अनेक अवतार धारण किए मेरे अनेक शरीर बने और मिट्टी में मिल गए आगे भी मैं अनेक बार जन्म लूंगा दन शी यदा यदा ही र्म मस्य गलानी र भवति भारत अभ्युत्थानम अधर्मस्य तदात्मानं सजाम परित्राणाय साधुना विनाशय च दुष्टता धर्म संस्थापन संभवामि [संगीत] युगे भवती भारता [संगीत] जब जब संसार में अधर्म बढ़ता है पार्थ जब साधुओं को मुक्त कराने का समय आता है जब अधर्म यों का नाश निकट होता है तब धर्म की स्थापना करने मैं स्वयं जन्म लेता हूं जता [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] मैं ही अविनाशी परमात्मा मैं ही मतस्य अवतार भी था मैं ही बामण था परशुराम भी मैं ही मैं रामचंद्र भी था ब्रह्मा विष्णु महेश में विद्या लक्ष्मी और काली में मैं ना पुरुष ना स्त्री ह ना नपुंसक मैं ना शरीर हूं ना शरीर का अंग मैं ही ज्ञान मैं ही चैतन्य मैं ही सृष्टि और मैं ही परब्रह्म जब तुम भी आत्म ज्ञान प्राप्त करलो तब तुम भी स्वयं को मुझसे अभिन्न और जुड़ा हुआ पाओगे पास तब तुम भी मेरी ही भाति स्वयं को परमात्मा के रूप में जानो परंतु यह पद प्राप्त करने के लिए तुम्हारा मेरे प्रति संपूर्ण समर्पण अनिवार्य है [संगीत] पाप और यह समर्पण क्या है मा समर्पण वास्तव में मन की ऐसी स्थिति है पार जहां मनुष्य सारे संकल्प त्याग देता है व ना स्वयं कोई निर्णय लेता है ना कोई प्रण लेता है उसको जैसा आदेश मिलता है वह वैसा ही कार्य करता है वास्तव में समर्पण का अर्थ होता है जब कोई अपने आप को किसी को अर्पण करले जब मनुष्य अपनी बुद्धि अपना मन अपना अहंकार सब कुछ किसी को अर्पण कर देता है तो यही समर्पण भक्ति कहलाता है और मनुष्य इसी समर्पित भक्ति से ईश्वर को प्राप्त करता है प माधव पत्नी का समर्पण पति की ओर होता है युद्ध का समर्पण सेनापति की ओर होता है शिष्य के मन में गुरु भक्ति होती है क्या यह सारी भक्तियाना होती हैं क्या इन सभी को ईश्वर की प्राप्ति होगी नहीं पार मनुष्य जिसके प्रति समर्पित रहता है उसी के रूप में ढलने लगता है उसके मन में ना संदेह जन्मता है ना प्रश्न दुष्ट मनुष्य के प्रति जिसका समर्पण होता है उसके कार्य भी दूषित हो जाते हैं अंगराज कर्ण धर्म को जानते हुए भी दुर्योधन के अधर्म को समर्पण इस समर्पण से कर्ण को ईश्वर की नहीं दंड की प्राप्ति को [संगीत] अंगराज को इस युद्ध में जो दंड मिलेगा वह जन का नहीं जाति का नहीं अपितु एक दुष्ट के प्रति समर्पण करने का दंड मिलेगा पार इसलिए समर्पण भी उत्तम भाव के प्रति होना आवश्यक है जैसा भाव वैसी भावना और वैसे ही भक्ति पान जैसी भक्ति वैसा ही परिणाम माला यदि लोहे की हो तो उसे गले में धारण नहीं की जा सकती उससे अपराधी को बांधा जाता है उसी प्रकार स्वामी भक्ति पति भक्ति मित्र भक्ति ऐसी अनेक भक्ति होती है पास परंतु श्रेष्ठ भक्ति केवल परमात्मा की होती है किंतु परमात्मा की भक्ति का सांख्य तथा कर्म योग से क्या संबंध है माता साख योग से मनुष्य आत्मा को जानता है और कर्म योग से मनुष्य जीवन के संबंधों से मुक्त हो जाता है भक्ति के कारण मनुष्य परमात्मा के वास्तविक रूप का ज्ञान पाता है और परमात्मा के ज्ञान मनुष्य जीवन मरण के फेरो से मुक्त होकर सच्चिदानंद स्वरूप को प्राप्त करता है जैसे जल की एक छोटी सी बूंद सागर में समाकर स्वयं सागर बन जाती उसी प्रकार मनुष्य परमात्मा में समाकर परमात्मा बन जाता है अर्थात इस शरीर का कोई महत्व नहीं माधव शरीर का महत्व अवश्य है पार क्योंकि यही माध्यम है कर्म करने का जिस प्रकार एक योद्धा के लिए शस्त्र आवश्यक ठीक उसी प्रकार एक जीव को अपना लक्ष्य प्राप्त करने के लिए शरीर आवश्यक इस शरीर के माध्यम से परमात्मा का साक्षात्कार संभव है मृत्यु और जन्म के बीच के समय में आत्मा के ज्ञान में कोई नहीं हो पाती इस जन्म में जो अनुभव विचार और ज्ञान प्राप्त होते हैं आत्मा उसी को लेकर नया शरीर धारण करती आत्मा की प्रगति और अधोगति केवल शरीर में रहकर ही हो सकती [संगीत] है क्या यहां उपस्थित लोगों का वत कर देने से उनके उधार की संभावना का नाश नहीं होगा माधव क्या उनका वध कर देना ही करुणा [संगीत] है तुम्हारे शत्रु धर्म की सीमा पार कर चुके हैं पार अधर्म करना उनका स्वभाव बन गया है जो अपराध और अपराधियों को उद्धार करने का अवसर एक सीमा तक ही दिया जा सकता [संगीत] है मैंने शिशुपाल के 99 अपराधों को क्षमा किया परंतु 100 अपराध के पश्चात उसे दंड देना अनिवार्य यदि एक अपराधी को अपराध करने दिया जाए तो उसका अधिक से अधिक पतन ही होता है उसे अधर्म से रोकने में ही करुणा है पाक और यह आत्माएं मरेंगी नहीं अधर्म से दूषित हुए शरीर का त्याग करें उस शरीर में प्रगति की संभावना अधिक होती है पा इस दृष्टि से तुम्हारा इन सबका वध करना उचित [संगीत] [संगीत] है

No comments:

Post a Comment

ॐ जय शिव ओंकारा आरती Sawan Special Om Jai Shiv Omkara हर हर महादेव Pen Bhakti

[संगीत] [प्रशंसा] ओम जय शिवा ओंकार स्वामी जय शिवा प्रभु जय शिवा ओमकारा [संगीत] ओम जय शिवा ओंकार [संगीत] [संगीत] हंसते गरुड़ तन हर...