Monday, 5 January 2026

श्री कृष्ण ने अर्जुन को दिखाया विश्वरूप Saurabh Pandey Suryaputra Karn Episode 235 Pen Bhakti

[संगीत] यदि एक अपराधी को अपराध करने दिया जाए तो उसका अधिक से अधिक पतन ही होता है उसे अधर्म से रोकने में ही करुणा है पा और यह आत्माएं मरेंगी नहीं अधर्म से दूषित हुए शरी कर उस शरीर में प्रगति की संभावना अधिक होती है इस दृष्टि से तुम्हारा इन सबका वध करना उचित है मनुष्य का शरीर उसकी संपत्ति भी और उसकी मर्यादा भी धर्म के मार्ग पर प्रवास करने वाला मनुष्य अपने शरीर को शुद्ध करता है और इसी के माध्यम से वह आत्मा का साक्षात्कार करता है इसी को क्षेत्र क्षेत्र ज्ञ संबंध कहा जाता है प मैं इसका तात्पर्य नहीं जान पाया माधव जब मनुष्य यह जान लेता है कि उसका शरीर एक भूमि का टुकड़ा है अर्थात क्षेत्र है और वह स्वयं उस भूमि के टुकड़े में रहने वाला उस भूमि के भाग को जानने वाला अर्थात क्षेत्र ज्ञ तब वह शरीर के माध्यम से स्वयं की प्रगति साथ पाता है आत्मा शरीर में रहकर तीन गुणों का संतुलन करती है वो तमस गुण को कम करके सत्व गुण को बढ़ाने का उपाय करती है और ईश्वर की भक्ति करके वह परमात्मा के साथ एक हो जाती है भक्ति कैसे की जाती है मा क्या समर्पण ही भक्ति नहीं नहीं पात समर्पण भक्ति का प्रथम चरण है भक्ति किसी कार्य का नाम नहीं भक्ति मनुष्य के मन की स्थिति का नाम है मनुष्य के लिए आवश्यक है कि व जाप ताप याग यग यम नियम योग स्वाध्याय से अपने अंतर को पवित्र रखे और परमात्मा को समर्पित रहे अपने सारे कार्य कार्यों का फल जीवन का प्रत्यक शवास परमात्मा को समर्पित करता रहता है यदि भक्ति केवल मन की स्थिति है तो जब तप आदि का क्या महत्व है माधव जिस प्रकार आज का धुला हुआ पात्र कल को मलीन हो जाता है ठीक उसी प्रकार मनुष्य का मन परमात्मा की भक्ति से बारबार विमुख हो जाता है पा इसलिए आवश्यक है कि मनुष्य जाप ताप स्वाध्याय के माध्यम से स्वयं को निरंतर स्मरण करवाता रहे कि उसका जीवन परमात्मा को समर्पित है भक्ति का केवल एक ही सार है पाक कि मनुष्य अपना सारा जीवन परमात्मा को अर्पित करके भक्ति करता रहे और सत्व गुण से युक्त संपत्ति को संभाल कर [संगीत] रखे सत्व गु संपति किसे कहा जाता है मा अहिंसा सत्यम अ क्रोध त्यागा शांति रप सुन दया भूतेषु अलोलम मार्दव यप तेज शमा गति सच अो होना मानि भवंती संपद दव अभिजात भारत कारण तथा स्वार्थ के हेतु हिंसा करना अधर्म है पा अहिंसा ही वास्तव में परम धर्म है उसके साथ सत्य क्रोध का ना होना त्याग मन में शांति निंदा ना करना दया भाव रखना सुखों के प्रति आकर्षण ना होना और आकार कार्य ना करना तेज क्षमा धैर शरीर की शुद्धता धर्म से दो राह ना करना और अहंकार का ना होना इन सभी गुणों को सत्व गुण या दवी संपत्ति कहा जाता है पा इसी से मनुष्य परमात्मा की अर्थात मेरी भक्ति कर पाता है पा जो मेरी भक्ति करता है वो इस जीवन के कर्तव्यों का वहन करता है की स्थापना करता है और कर्म के फलों की इच्छा किए बिना उनकी आशा त्याग कर अपना जीवन जीता है पा उसे मैं इस जन्म में संतोष देता हूं तथा मृत्यु के पश्चात अपने में स्थान देता हूं पार्त जो रूप सब को अपने में स्थान दे दे आपका वो रूप कैसा है माधव कौन है साख के माध्यम से मैंने जाना है कि मैं आत्मा अमर हूं जो नाश वंत शरीर में केवल वास करता हूं और कर्म योग के माध्यम से मैंने जाना है फल की इच्छा को त्याग कर केवल कर्म करने से मन को शांति और जीवन में सफलता प्राप्त होगी और भक्ति योग के माध्यम से मैंने आपके प्रति समर्पण का महत्व जाना है किंतु आपके प्रति संपूर्ण श्रद्धा से समर्पित होने की इच्छा होते हुए भी मन से संशय नहीं जा [संगीत] रहा आपके सारे ज्ञान को प्राप्त करने के पश्चात भी मेरी बुद्धि स्थिर नहीं हो पा रही माधव इस रणभूमि में मुझे अब भी चारों ओर मनुष्य ही दिखाई दे रहे हैं आपने कहा था कि मनुष्य है ही नहीं सब स्थान पर परमात्मा [संगीत] है तो उस परमात्मा का रूप मुझे दिखाइए माधव और मेरे सारे संदे हों का नाश [संगीत] कीजिए तो देखो [संगीत] [संगीत] पार्थ [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [संगीत] माधव [संगीत] [संगीत] [संगीत] [संगीत] [संगीत] [प्रशंसा] आ [संगीत] आ [संगीत] [संगीत] श्री कृष्ण गोविंदा हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेवा श्री कृष्णा गोविंद हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेव कवि हरे हे नाथ नारायण वासुदेवा श्री कृष् [संगीत] वासुदेवा ार रावा नारायण [प्रशंसा] वासुदेवा सांख योग से कर्म योग की कर्म योग से भक्ति योग की और भक्ति योग से ज्ञान योग की प्राप्ति होती है पार्थ मेरे विश्वर रूप के दर्शन करना ही वास्तविक ज्ञान है पार्थ विश्व में यही एक ज्ञान सारे ज्ञान का तथा विज्ञानों का आधार है यही एक ज्ञान है जो मुक्ति प्रदान करता है देवताओं को जो दर्शन सरलता से नहीं प्राप्त होता ऐसा मेरा वास्तविक रूप मैं तुम्हें दिखा रहा हूं [संगीत] पार्थ बीजम मम सर्व भूता ना विधि पार्त सनातन बुद्धिर बुद्धि मतम अस्मि तेजस तेजस्विन महम मैं ही सारे जीवों का ब्रह्म बीज हूं मैं ही बुद्धि मानों की बुद्धि हूं मैं ही बलवान का बल हूं पर्थ मैं पृथ्वी के कण कण में वास करता हूं सारी पृथ्वी सूर्य चंद्र ग्रह नक्षत्र तारा मंडल और समस्त ब्रह्मांड मेरे भीतर वास करते हैं मैं ही सत्य हूं मैं ही संपूर्ण हू मैं ही जीव हू मैं ही शिव [संगीत] हूं अक्षरों में आकार वेदों में सामवेद देवों में इंद्र प्राणियों में चेतना हूं रुद्र में शंकर हूं हवन में अग्नि हूं धन में कुबेर हूं पर्वतों में सुमेरू हूं ऋषियों में भृगु हूं ध्वनियों में ओमकार हूं यज्ञों में जाप हं वृक्षों में पीपल हं कीर्ति मैं ही हूं बुद्धि में स्मृति मेघा और क्षमा में ही हूं र्व में चित्ररथ हू देव ऋषियों में नारद ह मुनि में कपिल हू अश्व में उच्च अश्व हूं गजों में रावत हू पशु में सिंह पक्षियों में गरुड़ हूं मनुष्यों में राजा हूं शस्त्रों में वज्र हूं गायों में कामधेनु हूं सर्पों में वासुकी शेष नाग हूं मैं वरुण दे वायु यमराज श्री राम और पवित्र गंगा मैं ही हूं सृष्टि का आदि मध्य तथा अंत में हूं ब्रह्म विद्या महाकाल ब्रह्म [संगीत] प्रभाव मैं ही विजय हूं मैं ही निश्चय हूं मैं ही सत्व दंड नीति शक्ति मौन तथा तत्व ज्ञान भी मैं हूं वासुदेव अर्जुन हू वेदव्यास हूं ऐसा कोई स्थल नहीं जहां मैं नहीं [संगीत] पार मैं ही समय हूं मैं ही काल हूं मैं ही मृत्यु भी हूं पार और यहां उपस्थित सभी मनुष्यों की मृत्यु बनके भी मैं ही खड़ा हूं [संगीत] पार यदि तुम शस्त्र नहीं उठाओगे तब भी मैं इन सबका नाश कर दूंगा अपने मोह को त्यागो पार अपने कर्तव्य को देखो धर्म का भार उठाओ अपना गांडीव उठाओ और सर संतान करो पार युद्ध करो युद्ध करो [संगीत] पास भगवान माधव मधुसूदन आज मेरे सारे संदेह का नाश हो गया [संगीत] है हे नारायण हे माधव यह मेरा सौभाग्य है कि मैं स्वयं आपके वास्तविक अवतार का साक्षी [संगीत] बना आपके ज्ञान के प्रकाश से मुझे मेरी शंकाओं के अंधकार से निकालकर मुझे उचित मार्ग दिखाने के लिए आपका धन्यवाद आपको मार्गदर्शक रूपी पाकर आज मेरा जीवन धन्य हो [संगीत] गया अब मैं आपसे विनती करता हूं कि आप अपने वासुदेव कृष्ण रूपी अवतार में पुनः लौट आइए और मैं वचन देता हूं कि मैं अर्जुन पूर्ण रूप से आप पर विश्वास करके अपने कर्तव्य का पालन [संगीत] करूंगा [संगीत] [संगीत] [संगीत] उठो पार्थ जिसका आरंभ किया है उसका समापन करना है तुम्ह इस अधर्म का नाश करके नया प्रारंभ करना है तुम तुम्हें अपना कर्तव्य पूर्ण करना है पा उठो [संगीत] चतुर अंताया वर्णों में दुर्लभ समा पृथ रं आया वर्णों में र्ल समा करो कर्म शुलम जते [प्रशंसा] [संगीत] अ

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