Monday, 5 January 2026

श्री कृष्ण ने अर्जुन को क्या उपदेश दिया Saurabh Pandey Suryaputra Karn Episode 232 Pen Bhakti

[संगीत] जिस प्रतिशोध के लिए तुम सबने 13 वर्ष तपस्या की आज उस प्रतिशोध की अग्नि क्षीण हो गई है जिस न्याय के लिए तुमने इतने वर्षों प्रतीक्षा की आज तुम्हारा मन उसके लिए व्याकुल नहीं जिन अस्त्रों को तुमने इस युद्ध के लिए सहेजा क्या उन अस्त्रों को संधान करने का संकल्प तुम्हारा हृदय त्याग चुका है पार्थ क्या अब तुम्हें यह युद्ध अनिवार्य प्रतीत नहीं होता [संगीत] पाथ [संगीत] हां माता यह युद्ध अनिवार्य है तो फिर तुम व्याकुल क्यों हो पार्थ कहीं तुम्हें यह स्मरण तो नहीं हुआ है कि कैसे महामहिम भीष्म ने तुम्हें प्रेम दिया तुम सबको संरक्षण दी वन से वापस बुलाकर तुम्हें तुम्हारा अधिकार दिया कि कैसे आचार्य द्रोण ने तुम्हें सर्वश्रेष्ठ धनुर बनाने के लिए एकलव्य को कर्ण को धनुर की विद्या से वंचित रखा और पाप का भार अपने सर पर लिया तो क्या यह असत्य है माधव क्या उन्होंने यह सब नहीं किया क्या उनका वद करना धर्म है [संगीत] मेरे पक्ष का क्या वहां के निर्दोष भी इस युद्ध में मारे जाएंगे यह नाश क्यों तुम्हारा कार्य युद्ध करना है पार्थ धर्म अधर्म की तुलना करना नहीं और केवल विपक्ष ही नहीं तुम्हारा स्वयं का पक्ष भी तुम्हें दुर्बल बना रहा है वहां भी सर्वत्र धर्म नहीं है [संगीत] पार्थ आओ मैं तुम्हें अपना पक्ष दिखाता [संगीत] [संगीत] हूं [संगीत] देखो अपने भ्राता युधिष्ठिर को भ्राता भीम को नकुल सहदेव को अपने भतीज को अपने पुत्रों [संगीत] को तुम्हे क्लेश है कि इनम से ना जाने कौन कन काल कवित होगा [संगीत] इनकी मृत्यु की संभावना तुम्हारे मन को दुर्बल बना रही है [संगीत] [संगीत] पार्थ परंतु पार्थ क्या यह वास्तविकता में धर्म के पक्षधर हैं तुम्हें प्रतीत होता है कि यह सब निरपराध मारे जाएंगे तो बताओ कौन है जो अपराधी नहीं जो दोषी नहीं यदि युधिष्ठिर स्वयं का अधिकार राज्य पर मानते हैं तो इसमें दुर्योधन का क्या दोष क्या उनकी माता पहले गर्भवती नहीं हुई थी क्या यह सत्य नहीं कि युधिष्ठिर ने अपना राज्य द्यूत क्रीड़ा में लगाया जिसे दुर्योधन ने जीता यदि दुशासन ने अपनी जेष्ठ की आ मानकर द्रौपदी का वस्त्र हरण करने का अपराध किया तो तुम चारों ने भी अपनी जेष्ठ की आज्ञा मानकर अपनी पत्नी का अपमान होने [संगीत] दिया जिस कण ने अपने कौशल से अपनी श्रेष्ठता सिद्ध की उसे बारबार सूत पुत्र कहकर पुकारना क्या भीम का अपराध नहीं था द्यूत क्रीड़ा के नियम जानते हुए भी युधिष्ठिर ने उसका प्रस्ताव स्वीकार किया क्या यह युधिष्ठिर का अधर्म नहीं था तो बताओ पाथ कहां धर्म है और कहां अधर्म कौन दोषी है और कौन निर्दोष बोलो [संगीत] पार्थ [संगीत] आपने उचित कहा माधव दोनों ही पक्षों में धर्म भी दिखता है और अधर्म [संगीत] भी पर मैं क्या करू अपना कर्तव्य जानो पार्थ क्योंकि तुम अभी तक धर्म का स्वरूप नहीं जान पाए हो उचित कहा आपने [संगीत] मेरा अंग अंग कांप रहा है मत मंद हो गई है काे हाथ से बारबार सरक रहा है मैं इस महाविनाश का पूर्व अनुमान करके चिंतित हो गया कोई अपमान इतना बड़ा नहीं कोई प्रतिशोध इतना प्रबल नहीं कि सहस्त्र के लाखों के प्राणों की आहुति देकर पूरा किया जाए मैं इतने बड़े विद्वंस को महाविनाश को स्वीकार नहीं कर पा रहा हूं माधव विनाश से ही विकास का प्रारंभ होता है पात निर्माण के विज्ञान में विध्वंस का ज्ञान अति आवश्यक है यदि एक डाली काटो उससे दो डालिया जन्म लेती यदि एक नए पौधे का निर्माण करना हो तो उस फल को पेड़ से टूटकर दूर जाना होता है जिस भारत के विद्वंस से तुम आज व्याकुल हो कल वही नए भारत का सृजन करेगा पार यदि नया घर बनाना हो तो पुराने घर को तोड़ना होता है ले मा उय यह नपुंसकता एक योद्धा को शोभा नहीं देती प उठो जागो और अपना शस्त्र उठाओ पार तब तक संघर्ष करते रहो जब तक तुम्हें तुम्हारा लक्ष्य ना मिल जाए शस्त्र उठा कैसे कैसे शस्त्र उठाऊं माधव धर्मम चलो भम चम न [संगीत] हम जिनकी सेवा और आज्ञा पालन करना जीवन का धर्म है उन पितामह पर आचार्य द्रोण पर कैसे शस्त्र उठाऊं मैं कैसे माधव य काव है तो मेरे भाई ही ना सबकी धमनियों में एक ही रक्त है इन्ह मार कर इंद्र प्रस्त तो क्या इंद्रलोक भी मिले तो क्या [संगीत] लाभ मनुष्य पौरुष करता है ताकि उसका भविष्य बन सके क्या कर्म करता है ताकि उसकी संतान सुखी रह सके ऐसे शौर्य का क्या लाभ जिससे उसका हम भविष्य नष्ट हो जाए उसकी संतान ल कवित हो [संगीत] जाए इन लाखों सैनिकों को देखिए माता इनम से कितने सुरक्षित अपने घरों को लौटेंगे कितनों की पत्नियां सुहाग का चिन्ह धारण करेंगी कितने बालक अनाथ होंगे कौन बचेगा उन्हें धर्म और भविष्य सिखाने के लिए मैं देख रहा हूं मा इस धर्म युद्ध के पश्चात अधर्म और भी बढ़ेगा गुरुकूल का ही नहीं पूरे भारत का विनाश हो आज के नियम टूटेंगे क्या भविष्य को यही आशा है हमसे तर्क बुद्धि मत पूर्ण है पार्थ परंतु अर्थ मूर्खता पूर्ण क्या नष्ट हो जाएगा कैसा दुख होगा प यदि वृक्ष के कुछ पत्ते झड़ जाए तो वह दुख का कारण नहीं होते पार्थ पत्तों के जन्म का तात्पर्य वृक्ष को जीवन देना होता है स्वयं का जीवन जीना नहीं ठीक उसी प्रकार मनुष्य का जीवन और मरण उसका केवल एक ही लक्ष्य होता है पार्थ समाज में सुख समाज में धर्म स्थापना और आज यह समाज तुमसे यही युद्ध मांग रहा है युद्ध मांग रहा है य माहा मैं कह चुका हूं कि विनाश से उद्भाव प्रारंभ होता है आज समाज में भेद भाव लोभ लालच विष बनकर व्याप्त हो रहा है जो धर्म वर्षों पहले वेदों ने स्थापित किया था वह आज केवल एक शब्द बनकर रह गया है पा धर्म का मर्म लुप्त हो [संगीत] गया तुम्हारे समक्ष कर्ण का उदाहरण है पार्थ जो वर्ण व्यवस्था कर्म पर आधारित थी आज उस पर जन्म हावी हो गया है सहस्त्र का कौशल उनकी प्रतिभाएं दबाई जा रही है प समा आज नया परिवर्तन मांग रहा है नई परंपराएं मांग रहा है और वो सब संभव होगा इस युद्ध से इस युद्ध से इस युद्ध से नई परंपराएं जनलिंग वो व्यवस्था टूटेगी जो आज समाज को तोड़ रही है पार वर्षा से पूर्व आकाश और धरा दोनों मलीन रहती है पा परंतु वही वर्षा आकाश और धरा को स्वच्छ बना देती है और यह युद्ध यह युद्ध वही वर्षा है पार्थ जिसे धरा पुकार रही है अपने झूठे मोह से मुक्त हो जाओ [संगीत] भारत और अपने वास्तविक लक्ष्य को पहचान समग्र मानव समाज के लाभ का विचार करके उठाओ अपना शक उठो और गांडीव की तनकारिया है अपने बाणों से तोड़ डालो इस व्यवस्था को और जन् दो नूतन परंपरा को पार्थ यही धर्म [संगीत] है मैं आपके शब्द सुन पा रहा हूं माधव परंतु इनका अर्थ हृदय तक नहीं जाता मन संचय से इतना भरा है शस्त्र उने में स्वयं को सक्षम पाता हूं का आवरण बनकर दृष्टि के समक्ष धर्म का संशय मन अपनों की हानि के विचारों से भरा है संसार को कैसे [संगीत] देखू आप मेरे सार्थी हैं माधव इस युद्ध में ही नहीं जीवन के मार्ग में भी आज मेरी आमा के सारथी बन जाइए और मेरी आत्मा को सत्य के मार्ग के दर्शन कराइए मुझसे वह कहिए जिसे सुनकर मेरी निर्बलता दूर हो जाए मैं मैं दुविधा के चक्कर से दुविधा के चक्कर से मुक्ति [संगीत] पा [संगीत] पार्थ यदि जल की धारा में मुट्ठी डालोगे तो हाथ में जल नहीं आएगा और यदि धारा में अंजली बनाओ तो हाथ में जल आएगा मुट्ठी अहंकार है पार्थ और अंजली समर्पण होता है यदि समर्पण की अंजुली बनाओगे तो ही तुम सत्य का ज्ञान अर्जित कर पाओगे समर्पण करो पा मैं समर्पण करता हूं समर्पण करता हूं समर्पण करता हूं [संगीत] समर्पण र्म च अर् ज काम ज मोक्ष जक [संगीत] श हस्ति तनय यद हस्ति न तत्व च यद हस्ति तनय य ह तो ठीक है पार्थ यदि तुम सत्य जानने को उत्सुक हो तो मैं तुम्हें सत्य धर्म और कर्म का ज्ञान देता मैं तुम्हें धर्म और कर्म का मर्म समझाता हूं पार्थ मैं तुम्हें वो ज्ञान देता हूं जो मानवता को चीर काल तक उनका मार्गदर्शन करता रहे उसका सहयात्री और सार्थी [संगीत] बनेगा तो समर्पण भाव से सुनो पार्थ वो ज्ञान जो मैं तुम्हें अर्पण करने [संगीत] वाला यदा यदा [संगीत] धर्मस्य क्लार भवती [संगीत] भारत अभ्युत्थानम [संगीत] अधर्मस्य द मानम शी तो बताइए माधव सत्य क्या है धर्म क्या है सत्य धर्म और कर्म यह सब हमारे मन के उत्पाद होते हैं पा जब तक हमारा मन भ्रम और संशय में होता है तब तक सत्य के दर्शन नहीं [संगीत] होते तो कर्म और सत्य का मर्म जानने के लिए उत्तर दो पार तो बताओ मानव पशु पक्षी जल जीव वनस्पति यह सब कैसे बने कैसे इन सब का जन्म हुआ है यह सब कैसे जीते हैं कैसे इनकी मृत्यु होती है और मृत्यु के पश्चात यह सब कहां जाते विचार करके उत्तर देना [संगीत] पा क्योंकि इसी प्रश्न में तुम्हारे भ्रम का उत्तर छिपा हुआ है तो बताओ देह मिट्टी से बना है माधव वायु शवास बनकर उसे जीवन देती अग्नि ताप बनकर उसे चलाता फिरता है जल रक्त और मज्जा से बनकर उसे जीवित रखता है और आकाश दे के रिक्त स्थानों में उपस्थित रहता है इसी प्रकार इन्हीं पांच महा भूतों से देह का निर्माण हुआ है माधव और मृत्यु के पश्चात इन्हीं पांच भूतों से इसका विलय हो जाता [संगीत] है तो इसका अर्थ यह हुआ पार्थ कि मेरा तुम्हारा महामहिम भीष्म और आचार्य द्रोण हम सबका देह इन पंच महा भूतों से बना है जिसे अंतता उन्हीं में मिल जाना है तो मोह किसका पार्थ इस माटी से बने देह [संगीत] [संगीत] का

No comments:

Post a Comment

ॐ जय शिव ओंकारा आरती Sawan Special Om Jai Shiv Omkara हर हर महादेव Pen Bhakti

[संगीत] [प्रशंसा] ओम जय शिवा ओंकार स्वामी जय शिवा प्रभु जय शिवा ओमकारा [संगीत] ओम जय शिवा ओंकार [संगीत] [संगीत] हंसते गरुड़ तन हर...