[संगीत] श्री राम किसके लिए अपना ये अमूल्य समय नष्ट करी जा रही हो प्रय उस वलकल वस्त्र में लिपटे नर के लिए जिसकी विजय की कोई आशा नहीं वोह अपना राज पाठ और भाग्य गवाकर वन वन भटकता है धरती पर सोता है तो शक्का हो रही है कि वह कहीं जीवित भी है कि नहीं वो ना धन में ना तप में ना पल में ना पराक्रम में ना तेजस्विता में ना यश में किसी भी चीज में हमारी समानता नहीं कर सकता हे कृषांग और नर नहीं लंकेश दशानन रावण है तुम्हारे योग्य जिसने मानव ही नहीं यक्ष गंधर्व नवग्रह सब पर विजय पाई है और तुम उस भिक्षुक वनवासी की प्रतीक्षा कर रही हो जो मेरे समक्ष त्रण मात्र से भी अधिक नहीं [संगीत] है [संगीत] यदि तुम इतने ही पराक्रमी तो मेरे स्वामी के समक्ष मेरा हरण करते क्यों चोर होकर लिप्त होना पड़ा तुम्हें पहले तो मेरे स्वामी को छल से दूर किया मुझसे फिरता लक्ष्मण को छल से दूर भेजकर उनकी अनुपस्थिति में हरण किया [संगीत] मेरा प्रतापी नहीं कायर हो तुम रावन काय दुर्बल [संगीत] पयार तो मेरे स्वामी पुरुष सिंह श्रीराम और साक्षात नर बाग ता लक्ष्मण का सामना कदापि नहीं कर सकता कायर नहीं मूर्ख भी हो तुम रा मुझे स्वर्ण माणिक और ऐश्वर्या आदि का प्रलोभन देव अपना चित मुझसे हटाकर अपनी पत्नियों पर केंद्रित कर क्योंकि एक पर स्त्री पर कु दृष्टि रखने वाला तुम जैसा कुस और निकृष्ट व्यक्ति सबकी ना का पात्र तो बनता ही स्वयं के पतन का कारण भी बनता है क्या इस बात के तुम्ह किसी ने नहीं दी स्वयं को वेदों का ज्ञाता कहते हो तुम क्या मास कंठस्थ किया तुमने वेदों उनका मर्म नहीं [संगीत] जाना क्या तुम्हारे गुरु और तुम्हारे माता पिता ने यह नहीं सिखाया कि एक पराई स्त्री पर कुदृष्टि डालना महापाप है रावण एक पल स् पर दृष्टि डालकर तुमने जो अधर्म की अग्नि प्रज्वलित की है वो तुम्हारी इस स्वर्ण नगरी लंका को जलाकर मोम की भाति पिगला दी बंद कर अपना यह प्रवचन कोई अधर्म नहीं किया है हमने ये रक्ष संस्कृति है छल से या बल से किसी की भी पत्नी का हरण कर सकते हैं हम राक्षस यद्यपि बल का प्रयोग करके हम चाहते तो तुम्हें विवश भी कर सकते थे किंतु लंका में लाने के पश्चात हमने तुम्ह स्पर्श भी नहीं किया क्यों क्योंकि हम चाहते थे कि तुम स्वयं अपने मन से हमें स्वीकार [संगीत] करो किंतु अब मेरा धैर्य समाप्त होता जा रहा है और तुम्हारा समय हा समय समाप्त होता जा रहा है तुम्हारा क्योंकि यदि मेरे स्वामी यहां आ गए तो समझो तुम्हारा विनाश आ गया इसलिए अभी जो समय तुम्हारे पास बचा हुआ है रावण उसका सदुपयोग करो शुद्ध हृदय होकर मुझे मेरे स्वामी को लौट उनके चरणों में गिरकर क्षमा मांग शमा हम हम मांगेंगे क्षमा एक साधारण मानव सेमा हमारे शब्दकोश में ही नहीं है क्योंकि है हम तो तुम यूं समझ लो रावण मेरे हरण का दंड तुम्हारा मरण तुम्हारा मरण तुम्हारा मरण जिन्हे तुम साधारण मानव समझ रहे हो उनके धनुष की टंक मात्र से ही तुम्हारी यह लंका थरथरा उठेगी उनके कं पत्र वाले तीर चीड़ दे तुम्हारी और तुम्हारे राक्षसों की छाती मान लीजिए स्वामी देवी सीता की बात आप क्यों अपने विनाश को आमंत्रण दे रहे हैं विनाश तो अब तुम्हारा होकर ही रहेगा दुष्ट रावण कहते हैं पुरुष स्त्री से जितना अनुन विनय करता है वो उसका उतना ही अधिक प्रिय हो जाता है किंतु मैं तुम्हारे साथ जितने मीठे वचन बोलता हूं तुम मेरा उतना ही तिरस्कार करती हो तुम मेरी दया के योग्य नहीं हो आज अभी मैं तुम्हें बल पूर्वक अपना बनाऊंगा अन्यथा तुम्हारा अंत करके सदा के लिए तुम्हारी तृष्णा से मुक्त हो जाऊंगा रावण यदि अब सीता माता को स्पर्श भी किया तो इसी क्षण तुम्हारा अंत कर देगा [संगीत] [प्रशंसा] हनुमान [संगीत] रुक जाइए स्वामी आप क्यों अपनी मृत्यु को आमंत्रण देना चाहते हैं क्या आपको स्मरण नहीं है वो शा जो नर कुबेर की गुहार के कारण ब्रह्मदेव ने आपको दिया था जब आपने रंभा की इच्छा के विरुद्ध उन पर बल प्रयोग किया था मैं तुम्हें श्राप देता हूं कि आज के पश्चात यदि तुमने किसी भी स्त्री की इच्छा के विरुद्ध उस पर बल प्रयोग किया या उसका प्रयास भी किया तुम्हारा शीष सात भागों में खंडित हो जाएगा तुम्हारी य वासना ही एक दिन तुम्हारे विनाश का कारण [संगीत] बनेगी मैंने बल प्रयोग किया और मेरे 100 टुकड़े नहीं नहीं शराब सत्य भी हो सकता [संगीत] है एक नारी का वध आप जैसे महाबली को बिल्कुल शोभा नहीं देता यदि देवी सीता अपनी इच्छा से आपको स्वीकार नहीं करना चाहती तो आप इन्ह पूर्ण सम्मान के साथ इनके पति के पास वापस भेज द इनके यहां रहने का अर्थ होगा एक बहुत बड़ी विता को आमंत्रण दे विपदा आएगी किंतु मुझ पर नहीं इस पर सीता तुम्हें जो अवधि मैंने दी थी उसमें दो मां और शेष दो मा और मैं तुम्हारी प्रतीक्षा करूंगा तत्पश्चात भी यदि तुम मेरी सैया में नहीं आई मेरे कलेवा के लिए तुम्हारे टुकड़े कर देंगे अनुचर मम दाम डंड भेद कोई भी ति अपना किंतु इस मिथिला की राजकुमारी को इतना विवश कर दो कि यह स्वयं में अपनाने के लिए तत्पर हो जाए दुष्ट मरण रहे इस कार्य में असफलता का अर्थ है इसके साथ ही तुम सबकी मृत्यु भी जी लंकेश बहुत शांत रह लिया मैं यदि अब इन राक्षसों ने सीता माता को कष्ट दिया तो इनका यही अंत कर दूंगा मैं ये राक्षसिस भी कर ले किंतु हनुमान के रहते माता सीता को कोई क्षति नहीं पहुंचा सकती भय भेद करना चाहते हैं यह माता सीता को ली लंकेश का अपमान करके तूने अच्छा नहीं किया इसका दंड तो तुझे निश्चित ही मिलेगा लंकेश हमारे भगवान है हम उनका अपमान सहन नहीं करेंगे तुम्हारी बलाई इसी में है कि भूल जाओ इस भिक्षुक पति को स्वीकार कर लो महाराज रावण को अन्यथा हम लोग खा जाएंगे तुम्ह भोजन बनाओगी राक्षस जिस क्षण तुमने माता सीता को स्पर्श किया वही क्षण तुम लोगों के जीवन का अंतिम क्षण होगा ये तुम्हारे जीवन का अंतिम क्षण है स्वीकार कर लो हमारे भगवान लंकेश को अनुचित है ये सब किंतु मैं महाराज के आदेश के विरुद्ध कुछ कर भी तो नहीं सकती हनुमान की सहन शक्ति की सीमाएं लांग रही है ये राक्षसिस नर की तुम प्रतीक्षा कर रही हो हो वो तो तुम्हें कपका बुला चुका नहीं तो आ नहीं गया होता अब तक स्वीकार कर लो लंकेश को भूल जाओ इस वनवासी को अन्यथा हम सभी तुम्हें खा [संगीत] जाएंगे प्रभु श्री राम की आज्ञा का पालन करना है इसलिए अभी इनके बीच जाना उचित नहीं होगा किंतु माता सीता को प्रताड़ित होते हुए भी नहीं देख सकता कुछ तो करना होगा बोल जाओ वनवासी को स्कार कर को कुछ तो करना [संगीत] होगा ये क्या ये विट [संगीत] कैसा [संगीत] यह क्या हुआ किसने किया यह अवश्य कोई है वहां पर जो कोई भी है वहां पर बच के नहीं जा पाएगा चलो जय श्री राम आपकी कृपा से हनुमान की युक्ति सफल रही प्रभु त्रिजटा यह क्या हुआ तुम इतना भयभीत क्यों हो त्रिजटा बताओ किसने किया यह सब बोलो त्रिजटा य सुद्र मूर्ति किसने ध्वस्त की है स्वस्त हो जाएगा सब कुछ ध्वस्त हो जाएगी ये लंका मूर्ति की ही भाती विनाश हो जाएगा सारे राक्षस कुल [संगीत] का क्या नरक प्रलाप किए जा रही हो त्रिजटा क्या हुआ कैसे हुआ यह मूर्ति के ध्वस्त होने के बारे में तो मुझे कुछ ज्ञात नहीं है किंतु अभी अभी मैंने एक स्वप्न देखा है बहुत भयानक स्वप्न लंका का विध समस्त लंका वासियों विनाश देखा है मैंने स्वप्न स्वप्न तो मात्र स्वप्न है परंतु उसके लिए मूर्ति कैसे ध्वस्त हुई है बोलो मेरी मानो तो यह विनाश का आरंभ है लंकेश सीता के रूप में सारी लंका के लिए विनाश एवं स्वयं के लिए मृत्यु लेकर आए हैं यहां यही भह तो मुझे भी सता रहा है देवी सीता पतिव्रता स्त्री है हर एक पति वृता स्त्री साक्षात शक्ति का रूप होती है माता को इस असीम दुख से मुक्त कराने के लिए हनुमान को इसी समय जाकर उन्हें अपने और प्रभु श्रीराम के बारे में बताना होगा [संगीत] नहीं किंतु कहीं ऐसा ना हो जाए कि मुझे इस वानर रूप में देखकर माता और अधिक भयभीत हो जाए या कहीं माता मुझे रावण का गुप्तचर ना समझ ले मूर्ख हो तुम सब एक स्वप्न मात्र से भयभीत हो गई किंतु त्रिजटा का देखा हुआ सपना सदैव सत्य होता है और प्रातः काल का समय प्रात काल के स्वप्न भविष्य में सदैव सत्य होते हैं यह बताओ कि तुमने देखा क्या स्वप्न में मैंने देखा वह वनवासी राम अपने अनुज लक्ष्मण के साथ गजराज पर आरूढ़ होकर आए और सीता को लेके लंकेश के पुष्पक विमान में उत्तर दिशा की ओर ले गए और और देखा घने रक्ति मेघों में एक रथ जिसमें गर्क जुते हुए थे जो काले वस्त्र और लाल पुष्प हार पहने हुए मृत्यु की देवी का रथ है और शीष मुड़ा हुए लंकेश उस पर आरूढ़ है जिन्ह मृत्यु की देवी दक्षिण दिशा की ओर खींच कर लिए जा रही है और लंकेश के पीछे महाराज कुंभकरण मेघनाथ और अक्ष कुमार बंधे हुए खींचे चले जा रहे [संगीत] हैं और पीछे छूट गई है दस्त लंका खंडार बनी हुई जहां चारों ओर अग्नि ही अग्नी दिखाई दे रही है हमारी सोने की चमकती हुई लंका जलकर काली हो गई है ऐसा भयानक दृश्य था किसी की भी आत्मा काप उठे मेरा अंतर्मन स्पष्ट संकेत दे रहा है मुझे देवी सीता का आना साक्षात मृत्यु की देवी का आगमन है श्री राम की विजय और लंकेश रावण का विनाश निकट ही दिखाई दे रहा है मुझे और हां मैंने उसे भी देखा जो श्रीराम का मुख्य सहायक है राम का दूत है वह एक महावली वानर वही हमारी स्व नगरी लंका को खास फूत की भाती अगली की ज्वाला में भस्म कर [संगीत] देगा शत्रु कितना भी भयभीत करें पर आत्मविश्वास के साथ पूरी दृढ़ता से उसका सामना करना चाहिए
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