Wednesday, 7 January 2026

हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को कालकोठरी में क्यों डाला Sankat Mochan Mahabali Hanuman 347 Pen Bhakti

[संगीत] प्रभु श्री हरि प्रभु श्री हरि प्रभु श्री हरि प्रभु श्री हरि श्री ह मत कहो उसे प्रभु वो प्रभु नहीं है मैं हूं प्रभु तीनों लोगों का स्वामी त्रिलोक पति हिरण यदि पुन उसका नाम अपने जीवा पर लाए तो परिणाम बहुत भयंकर होगा तुम्हारे लिए ऐसा मत कहिए पिताश्री उनका नाम लेना कैसे छोड़ सकता हूं मैं क्षमा स्वामी क्षमा प्रहलाद अभी अबोध है उसे जत नहीं कि व क्या कह रहा है मां मुझे ज्ञात है कि मैं क्या कह रहा हूं सबके श्वास में बसते हैं श्री हरि नारायण विष्णु मेरी विश्वासे उन्हीं से चलती है वह सब कुछ है मेरे लिए प्रहलाद हट जाइए आप नहीं स्वामी नहीं वो आपका पुत्र है बालक है और एक बालक की बातों पर इतना क्रोध मैं समझाऊ इसे समझाइए इसे समझाइए इसे महारानी जिस छलिया विष्णु के य गुणगान गा रहा है उसने मेरे भ्राता इसके काका का वध किया है परम शत्रु है वह [संगीत] मेरा पिताश्री मनुष्य का परम शत्रु कोई अ नहीं उसी के भीतर छुपा हुआ अहंकार मद लोभ मोह और मत्सर है प्रभु श्री हरि तो मात्र पाप कर्म और पापी मनुष्य के विरोधी है तो तुम्हारे अनुसार तुम्हारे काका मेरे भ्राता हिर पापी थे मैं यह नहीं जानता पिताश्री किंतु इतना अवश्य मुझे ज्ञात है यदि उन्हें श्री हरिनारायण के हाथों मृत्यु प्राप्त हुई तो उनसे बड़ा सौभाग्य हम में से किसी और का नहीं हो सकता वो मोक्ष के अधिकारी हो गए होंगे तू ऐसे नहीं मानेगा सेनापति डाल दो इसे काल कोठरी में अभी प्रात तक भूखा प्यासा रहेगा तो भूल जाएगा सारी हरि भक्ति महाराज क्या राजकुमार डाल दो इसे काल कोठरी में डल दो इसे काल कोठरी में अ राजकुमार स्वामी पुत्र प्रहलाद को ऐसा कठोर दंड मत दीजिए ले जाओ इसे स्वामी मैंने कहा ले जाओ इसे स्वामी वो पुत्र है हमारा अबोध है उसे क्षमा कर दीजिए स्वामी उसकी ओर से मैं आपसे क्षमा मांगती हूं पत्र रेना रेना रे नारे [संगीत] नारे एक पिता अपने पुत्र के प्रति कितना निष्ठुर हो सकता है वो भी बिना किसी उचित कारण के पुत्र मनुष्य के स्वयं के भीतर छुपे हुए विकार ही उनके सबसे बड़े शत्रु होते हैं और उन्हीं विकारों के कारण र्ण कश्यप की बुद्धि भ्रष्ट हो चुकी थी वो उचित अनुचित के भेद को समझ नहीं पा रहा था सत्य है माता क्रोध और अहंकार मनुष्य को मानवता के स्थान पर दानव के पद पर ले जाता है मा अहंकार वशी एक पिता अपने पुत्र के प्रति दानव बन गया फिर क्या हुआ माता क्या प्रल्हाद को पूरी रात कारागार में रहना [संगीत] पड़ा राजकुमार छोड़ दीजिए न हरि भक्ति अपने सर्वशक्तिमान पिता की शरण ले लीजिए इस पीड़ा से मुक्त हो जाएंगे आप हरि भक्ति तो मेरे शवास में बसी हुई है उसे त्यागना मेरे वश में नहीं है अल्पायु बालक है आप काल कोठरी का अंधेरा भयावह होता है बिना प्रकाश के कैसे रह पाएंगे आप य जिनके हृदय में हरि भक्ति की ज्योति प्रज्वलित रहती है उन्हें किसी भी अंधकार से भह नहीं लगता क्षमा कीजिएगा राजकुमार अब मुझे जाना होगा [संगीत] [संगीत] [संगीत] प्रणाम पिताश्री [संगीत] प्रहलाद तीनों लो के स्वामी श्री हरिनारायण विष्णु ही है बस स्वामी इस अमावस की काली रात्रि से भी अधिक अंधकारमय होगी वह कालकोठरी हमारा नन्हा सा पुत्र सारी रात्री वहां कैसे रह पाएगा व भी भूखा प्यासा महारानी पिता हूं उसका मुझे भी पीड़ा हो रही है यह सब करके किंतु उसके हृदय से हरि भक्ति समाप्त करने के लिए दंड आवश्यक है ता तक को सारी हरि भक्ति भूल जाएगा फिर मैं स्वयं आपके साथ चलकर अपने पुत्र को काल कोठरी से निकाल लाऊंगा महारानी आप भोजन करके विश्राम कीजिए [संगीत] पुत्र भूखा है तो मां कैसे भोजन कर सकती है पुत्र काल कोठरी की कठोर धरती पर लेटे तो मां कैसे राज भवन की शैया पर ले ट सकती है मां का हृदय ऐसा ही होता है मेरी मां भी मुझे भूखा प्यासा नहीं देख सकती वह भी मेरे लिए सदैव ऐसे ही चिंतित रहती है अरे इतने दुर्बल दिखाई दे रहे हो प्रतीत होता है भोजन नहीं किया तुमने इतने दिनों नहीं मां ये तो आपकी ममता भरी दृष्टि को लग रहा है कि मैं दुर्बल हो गया हूं किंतु जैसा हनुमान पहले था वैसा ही है बस बस चलो आज मैं तुम्हें अपने हाथों से भोजन बनाकर खिलाऊंगी तुम पहले जाओ और स्नान कर लो आज तो बड़ा ही आनंद आएगा मां बनाएंगी पकवान जी भर खाएगा हनुमान पुत्र हनुमान मां की ममता में ही प्रभु का पवित्र प्रेम छुपा होता है हनुमान पुत्र हनुमान अब तुम यह पूछो कि भक्त प्रहलाद ने क्या किया उसने काल कोठरी के अंधकार को प्रभु श्री हरि नारायण के मंत्रों के प्रकाश से भर दिया ओम नारायणाय नमः ओ नारायणाय नमः ओम नारायणाय [संगीत] नमः धन्यवाद प्रभु श्री हरि यह आपकी ही भक्ति का प्रकाश है आपका नाम तो संसार के बड़े से बड़े अंधकार को मिटा देता प्रभु बस एक विनती और है आपसे आपकी भक्ति भले ही मेरे शुदा को शांत कर दे किंतु मेरी मां वह मुझे भूखा जानकर स्वयं भी भूखी रहेंगी मैं उनकी पीड़ा नहीं सहन कर सकता प्रभु कुछ कीजिए [संगीत] प्रभु ओ नारायणाय नमः ओम नारायणाय नमः ओम नारायणाय नमः ओम नारायणाय नमः पुत्र प्रहलाद मां आप यहां मां आप यहां कैसे मैं अपने पुत्र को भूखा कैसे रहने दे दे सकती [संगीत] थी आप मेरे लिए आई है मां किंतु माता जब दैत्य राज हिरण्य कश्यप को प्रातः काल ज्ञात हुआ होगा तो बहुत बड़ा अनर्थ हुआ होगा ना पुत्र हनुमान प्रातः काल जब हिरण्य क शप बंदी गृह पहुंचा उसके साथ महारानी कयाधु भी थी [संगीत] मां [संगीत] प्रहलाद तुम ठीक तो हो चरण स्पर्श माता श्री आयु भा चरण स्पर्श पिताश्री इस काल कोठरी के अंधकार में भय तो बड़ा लगा होगा और भूख ने तो अब तक तुम्हारे मन को परिवर्तित कर दिया होगा प्रहलाद पिता श्री अंधकार तो था ही नहीं प्रभु श्री हरि की भक्ति का प्रकाश था [संगीत] यहां मुझे तनिक भी भय नहीं लगा पिताश्री और ना ही भूख ने विचलित किया मां ने भली बाती भोजन करा के तृप्त कर दिया था क्षमा स्वामी एक मां का हृदय अपने पुत्र को भोखा नहीं देख पाया क्षमा स्वामी एक मां का हृदय अपने पुत्र को भूखा नहीं देख पाया रात्रि में जब प्रहलाद मेरे पास आया तो मैं स्वयं को रोक नहीं पाई और मैंने इसे भोजन कराया [संगीत] मां मां [संगीत] पुत्र पुत्र प्रहलाद तुम यहां [संगीत] मां इस काल कोठरी की सुदृढ सुरक्षा व्यवस्था को भेद कर तुम बाहर कैसे निकले नहीं पिता श्री मैं यहां से बाहर नहीं निकला मां स्वयं आई थी भोजन लेकर मेरे [संगीत] पास ये तुम क्या कह रहे हो पुत्र तुम तो स्वयं मेरे पास आए थे राज भवन मां हम मुझे ज्ञात था आप मुझे भूखा जानकर स्वयं भी भोजन ग्रहण नहीं करेंगी इसीलिए मैं यहां आ गया आपके पास अपनी मां के लिए मेरे पुत्र ने कालकोठरी से बिना अनुमति लिए बाहर निकलने का संकट मोल लिया यदि प्रातः काल तुम्हारे पिता को तुम्हारे बाहर निकलने के बारे में ज्ञात हो गया तो फिर क्या होगा उन्हें जब ज्ञात होगा तब का तब देखेंगे अभी तो मेरे लिए महत्त्वपूर्ण यह है कि मेरा पुत्र भूखा ना सो जाए सेनापति क्या है यह सब सत्य क्या है कौन यहां आया और कौन यहां से गया महाराज काल कोठरी की कुंजी पूरे समय मेरे ही पास ना तो कोई यहां से बाहर गया ना ही भीतर आया यह कैसे संभव [संगीत] है तुम तीनों मिलकर कोई षडयंत्र तो नहीं रच रहे हो सत्य क्या है स्पष्ट बा मुझसे झूठ बोलने का दुस्साहस मत करो सत्य जानने के लिए मैं किसी भी सीमा को पार कर सकता हूं किसी भी सीमा को सत्य सुनना चाहता हूं मैं अन्यथा मुझसे द्रोह का भयंकर परिणाम भुगतो ग तुम तीनों राजद्रोही स्वामी मैं आपकी सहभाग और और यह आपका अंश आपका पुत्र है और यह आपकी सेना के स्वामी भक्त सेनापति आपके साथ द्रोह करने की कल्पना भला हम कैसे कर सकते हैं स्वामी हम तो पूर्ण निष्ठा से आपके प्रति समर्पित है सब ज्ञात है मुझे कितनी निष्ठा है मेरे प्रति इसीलिए कल रात्रि की घटनाओं के तुम तीनों के तीन भिन्न भिन्न विवरण है समझाओ मुझे एक ही व्यक्ति एक ही समय पर दो भिन्न भिन्न स्थानों पर कैसे हो सकता है व भी तब जब काल कोठरी की कुंजी सेनापति के संरक्षण में सुरक्षित थी आपको इस भक्त का कोटि कोटि नमन प्रभु श्री हरि अवश्य आपने ही आकर अपने इस भक्त की रक्षा की है पिता श्री प्रभु श्री हरि के लिए कुछ भी असंभव नहीं है माता श्री और सेनापति जी का इसमें कोई दोष नहीं मुझे विश्वास है कि प्रभु ही आए थे ओम नारायणाय नमः ओम नारायणाय नमः स्वामी आपका नन्हा भक्त आपसे कुछ विनती कर रहा [संगीत] है ओम नारायणाय नमः ओ नारायणाय [संगीत] नमः [संगीत] ओम नारायणाय नमः कष्ट में भत को देखे नाही विष्णु रूप बदल कर आई भय प्रहलादा मां के हेत पुत्र के लाए भय कयाधु मात्र और पुत्र दोनों को हरि भोजन अरु निद्रा सुलभ करी हनुमन शत शत करत नमन जय श्री नारायण भगवन [संगीत] आ [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] आ [संगीत] कैसे सौभाग्य थे भक्त प्रहलाद जी के उन्हीं की भक्ति के वश में होकर व दो रूप धारण कर आए पहले पुत्र बनकर मां को भोजन कराया और माता बनकर पुत्र को प्रभु कभी भी अपने भक्तों को ऐसे कष्ट में नहीं देख सकते प्रभु तो माता भी होते हैं पिता भी भी तो सखा भी अपने भक्तों के लिए वह किसी भी रूप में आकर उनके कष्टों का निवारण करते हैं शांत हो जाओ मेरी राज सभा में उस कपटी हरी का नाम लेने का दु साहस मत करो मैं यह घृणित नाम कदापि नहीं सुन सकता पिताश्री जब आप मुझे प्रभु श्री हरि का नाम नहीं लेने का आदेश देते हैं तब आप भी मेरे साथ उनका नाम स्मरण करते हैं मैं प्रेम से उनका स्मरण करता हूं और आप क्रोध से परंतु भाव कोई भी हो हम दोनों प्रभु का स्मरण कर एक साथ पुण्य के भाग बनते हैं बंद करो अपने अनल प्रला मेरे स्मरण से ही पुण्य की प्राप्ति होती है मैं हूं प्रभु मैं हूं प्रभु मैं हूं प्रभु मैं हूं प्रभु मैं हूं प्रभु मैं हूं प्रभु भक्ति और भावना में यदि सच्चाई हो तो ईश्वर अवश्य सहायता करते हैं

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