Wednesday, 7 January 2026

हिरण्यकश्यप को विचित्र वरदान प्राप्त था Sankat Mochan Mahabali Hanuman 344 Pen Bhakti

[संगीत] मैं कश्यप पुत्र महाबली हिन कश्यप प्राण लेता अपने भ्राता के धिक को मैं जीवित नहीं छोडूंगा नहीं छोडूंगा जीवित ये क्या माता एक समस्या का अंत हुआ तो दूसरी समस्या ने जन्म ले लिया और हिरण्य कश्यप ने ये कैसा प्रण ले लिया था माता उसका यही प्रण उसके लिए ही अहित करर प्रमाणित हुआ होगा हां पुत्र हिरण कश्यप का यही प्रण भविष्य में प्रभु के चौथे अवतार का कारण बना प्रभु का चौथा अवतार बताइए ना माता प्रभु के इस अवतार में क्या हुआ था अवश्य बताऊंगी पुत्र परंतु उससे पूर्व तुम बताओ कि भगवान विष्णु के वराह अवतार की लीला से तुम्हें क्या सीख मिली माता पीड़ित की पीड़ा हरना हमारा प्रथम दायित्व होता है उसके पश्चात ही उसके स्त्रोत पर ध्यान देकर उसे दंडित करना चाहिए हनुमान को सर्वाधिक यह महत्त्वपूर्ण सीख प्राप्त हुई अति उत्तम पुत्र प्रभु लीला के इस प्रसंग में शक्ति संपन्न जीवों के लिए भी एक महत्त्वपूर्ण सीख निहित है हां माता हनुमान को यह भी ज्ञात हुआ किसी बलशाली को अपने बल का प्रयोग रचनात्मक कार्यों में करना चाहिए अकारण युद्ध करना दूसरों को प्रताड़ित करना यह तो सर्वथा अनुचित कार्य है ऐसा करने पर पर बलशाली भी दंड का भाग ही बनता है और ऐसे अत्याचारी जीवों को दंड कौन और कब देता है पुत्र शक्ति और बल के अनंत सागर स्वयं प्रभु विष्णु जी माता जब कोई दुराचारी अपने दुष्कर्म की समस्त सीमाए लांग जाता है तो प्रभु के धैर्य का बांध टूट जाता है और वह स्वयं आकर ऐसे व्यक्ति को दंड देते हैं भले ही इसके लिए उन्हें मैले कीचड़ में वास करने वाले पशु का रूप ही क्यों ना लेना पड़े सत्य है पुत्र यदि किसी की विपदा हरने के लिए मैले कीचड़ के भीतर भी जाना आवश्यक हो तो संकोच नहीं करना चाहिए पुत्र और हां समय रहते अपनी बुरी प्रवृत्तियों को समझकर उन पर अंकुश लगा लेना चाहिए इसी में भलाई है परंतु माता यह ज्ञात होने के पश्चात भी कुछ लोग अपनी दुष्प का त्याग क्यों नहीं करते पुत्र उनका अहंकार ही उन्हें अपने विनाश की ओर ले जाने के लिए प्रेरित करता है अहंकार व्यक्ति की बुद्धि को इतना अक्षम कर देता है कि खुले नेत्रों से प्रत्यक्ष उदाहरण देखने के पश्चात भी अहंकारी जीव कोई सीख ग्रहण नहीं कर पाता जैसे माता जैसे हिरण्य क शप उसके भ्राता के पापों का महा विनाशकारी परिणाम प्रत्यक्ष रूप में उसके समक्ष था परंतु फिर भी वह पाप कर्म करने से पीछे नहीं हटा माता तो क्या हिरण्य कश्यप को ज्ञात हो गया था कि उसके भ्राता हिरण्याक्ष का वध प्रभु श्री हरि नहीं किया था हां पुत्र गुरु शुक्राचार्य ने उन्हें बता दिया था कि हिरण्याक्ष के वध की घटना प्रभु श्री हरि की ही लीला है हरी लीला हरी लीला बहुत देख ली हरी लीला अब मैं उस हरि को ण कश्यप लीला दिखाकर उसे उसकी समस्त लीलाएं बुला [संगीत] दूंगा सर्वनाश कर दूंगा उसका मैं इस संसार से नाम तक मिटा दूंगा उसका मैं यथा शीघ्र जाकर उस हरी को पराजित करूंगा मैं धान पुत्र तुम्हारे अति बलशाली भ्राता का शीष तुम्हारे समक्ष पड़ा है जिसे श्री हरि ने इतनी निर्ममता से उसके धड़ से अलग कर दिया फिर भी प्रभु श्री हरि की अपार दिव्य शक्ति का अनुमान नहीं लगा पा रहे हो तुम पुत्र यदि तुम्हे श्री हरि के समक्ष अपने आप को जीवित रखना है तो उनसे युद्ध से पूर्व सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी से अमृत का वरदान प्राप्त कर चित कथन है आपका अवश्य कोई अ साधारण शक्तियों से संपन्न योद्धा ही नक्ष का वध कर सकता था अपने शत्रु की शक्तियों को कभी कम नहीं आंकना चाहिए मैं यथा श्र जाकर प्रभु श्री ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए पस्या प्रारंभ करता हूं नाथ आप य कैसा अनर्थ करने जा रहे हैं मुझे ऐसी अवस्था में एक आकी छोड़कर आप तब के लिए कैसे प्रस्थान कर सकते हैं ऐसी अवस्था अर्थात क्या हुआ है आपको देवी का याद स्वामी आपको संतान सुख प्राप्त होने वाला है आप पिता बनने वाले [संगीत] हैं देवी दुख के इस समय में इस सुखद शुभ संवाद से आपने मेरे हृदय को आनंदित कर [प्रशंसा] दिया देवी इसके लिए मैं आपका धन्यवाद करता हूं ता के रूप में जिस शूरवीर योद्धा को हमने खोया है व पुत्र बनकर लौट रहा है हमारे जीवन में देवी तो नाथ आप स्वयं यहां उपस्थित रहकर इस सुख को अनुभव कीजिए यह तप का विचार त्याग दीजिए देवी यदि मेरे तप पर जाना अति आवश्यक ना होता तो मैं कदापि ना [संगीत] जाता किंतु उस श्री हरि से अपने भ्राता के वद का प्रतिशोध लेना है तभी उसकी आत्मा को शांति मिलेगी और उसके लिए प्रभु श्री ब्रह्मा जी से वरदान पाना अति आवश्यक है यह प्रतिशोध की भावना आपको निष्ठुर बना रही है अपनी ही संतान के प्रति आपका वात्सल्य क्षीण कर रही है [संगीत] देवी मेरा पुत्र मेरे वंश का विस्तार करेगा मेरा उत्तराधिकारी बनकर मेरे साम्राज्य मेरे मान सम्मान असरों की प्रतिष्ठा में वृद्धि [संगीत] करेगा मेरे अपने अंश से उत्पन्न होने वाले अपने तेजस्वी पुत्र के प्रति वात्सल्य शून्य कैसे हो सकता हूं तो प्रमाणित कीजिए अपना वात्सल्य अपना पिता धर्म और कह दीजिए कि आप नहीं जाएंगे वन और यही मेरे साथ रहकर अपने पुत्र के जन का सुख भोग देवी हम यों के लिए हमारी प्रतिष्ठा सर्वोपरि है उसको ठेस पहुंचाने वाले को भयंकर परिणाम भुगतना ही पड़ता है अपने पुत्र के लिए सशक्त उदाहरण रखना मेरे लिए अति आवश्यक है इसलिए मेरा मार्ग अवरुद्ध मत कीजिए देवी मुझे विश्वास है अपने पुत्र के जन्म से पूर्व मैं प्रभु श्री ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त कर लौट आऊंग और अपने पुत्र के जन्म के उपरांत असुरों के चिर छत्रु श्री हरि का सर्वनाश कर उसके मस्तक का मुकुट उपहार के रूप में अपने पुत्र को कड़ा के लिए दूंगा [संगीत] मैं शीघ्र लौट कर आऊंगा देवी मेरे पुत्र का ध्यान रखना और अपना [संगीत] भी यह शत्रुता सदैव असुर कुल के लिए अहित करर परिणाम लेकर आई है परंतु इन पुरुषों को सम ना कहां संभव है माता क्या हिरण्य का शप प्रभु नारायण के पास जाकर उनसे युद्ध करने के लिए इतना कटिबद्ध था कि अपनी कुट युक्ति से जनित कुटिल योजना को भी क्रिया वंती भी कर दिया था हां पुत्र परंतु दुर्भाग्यवश जब इंद्रदेव को यह ज्ञात हुआ कि हिरण कश्यप कठोर तपस्या करने वाला है तब उन्होंने भी एक अरुचिकर योजना रची मुझे विश्वास है कि वो दुष्ट असुर स्वर्ग पर अपना अधिपत्य स्थापित करने के लिए ही तप करने जा रहा है इन लालची असरों की दृष्टि सदैव हमारे स्वर्ग पर ही होती है परंतु यदि वह कपटी अपनी योजना गड़ सकता है तो उसे विफल करने के लिए मैं देवराज इद्र भी योजना बना सकता हूं सुनिए स हिरण्य कश्यप की अनुपस्थिति का लाभ उठाकर उसके सभी शक्ति राक्षसों का संहार करेंगे उसकी पत्नी क्या आदू को कारागार में बंदी बनाकर जन के साथी उसके पुत्र का अंत सुनिश्चित करें सेना विहीन और पुत्र मृत्यु के समाचार से शोकाकुल हिरण्य कश्यप युद्ध करने में अशक्त हो जाए और तब तप में सफल होकर लौटने का भी उसे कोई लाभ नहीं होगा परंतु माता यह तो अनुचित है उस अजन्म नवजात शिशु का क्या दोष था फिर देवराज इद्र ने ऐसी घृणित योजना क्यों बनाई हां यह सर्वता अनुचित ता पुत्र परंतु शत्रु का भय श्रेष्ठ पुरुषों में भी ऐसे पतित विचारों को जन्म दे देता है और उन्हें अन्यायपूर्ण अनैतिक कृत्य करने पर बा कर देता है माता क्या देवताओं ने अपनी योजना पर पूर्ण विचार नहीं किया अपनी योजना अनुसार उन्होंने हिरना कश्यप के पुत्र का वद कर दिया नहीं पुत्र देवताओं के सौभाग्य से देव ऋषि नारद ने इंद्रदेव की इस योजना का विरोध किया देवताओं द्वारा इतना भीषण पाप हो उन्हें स्वीकार नहीं था इसीलिए इधर इंद्रदेव ने महारानी कयाधु का अपहरण किया और उधर देव ऋषि नारद ने इंद्रदेव को अपनी भूल का बोध करवाया माता फिर देवराज इद्र ने क्या किया इंद्रदेव को अपनी भूल का बोध हुआ तो वे उसकी अनिष्का परिणाम की मात्र कल्पना से ही इतने आतंकित हो गए कि वह कयाधु को देवर्ष नारद के पास ही छोड़ गए फिर माता फिर अपनी संतान के जीवन के प्रति चिंतित कदु को देवर्षी नारद ने अपने आश्रम में शरण दी जहां सदैव श्री हरि का नाम ध्वनित होता था उनके ही भजन गाए जाते थे उन्हीं की अनुपम लीला का वर्णन होता था सौभाग्य से उस वातावरण में व्याप्त भक्ति को वह शिशु अपनी माता के गर्भ में ही सीख रहा था नारायणा नारायण हरि दीन दयाला नारायण [संगीत] नारायणा नारायणा हरि केशव त्रिफला नारायणा नारायणा नारायणा हरि केशव कृपाला [संगीत] नारायणा [संगीत] तुम जग के स्वामी जगपाल हो तुम हो भोर विष्णु तुम रात हो अंता भी तुम अनंता भी तुम निर्बल सबल सबके नाथ हो नारायणा नारायणा हरि माधव मृणा ला नारायणा नारायणा नारायणा हरि माना [संगीत] [संगीत] नानानाना मस्य कुर्म का रूप धरा जग स्वामी तुम जगदीश्वरा तुम सर्वज्ञ हो सर्वत्र हो जय हो तुम्हारी दामोदरा नारायणा नारायणा हरि जय जग बाला [संगीत] नारायणा [संगीत] माता यह कैसा विचित्र सा संयोग है एक और पिता अपनी आसुरी वृति के अनुरूप श्री हरि नारायण से अपनी चीर शत्रुता निभाने को आतुर था और दूसरी ओर उसका पुत्र जन्म से पूर्व ही प्रभु नारायण का परम भक्त बन चुका था यह भी प्रभु की ही लीला थी हनुमान पिता पुत्र का यह विरोधाभास उनका यह संघर्ष भविष्य में भगवान श्री नारायण का प्रभु के अवतार का कारण बना परंतु माता आपने यह तो तो नहीं बताया कि हिरण्य कश्यप अपनी तपस्या में सफल हुआ या नहीं हिरण्य कश्यप इस संपूर्ण घटनाक्रम से अनभिज्ञ घोर तपस्या में लीन था ओम ब्रह्म देवाय नमः ओम ब्रह्म देवाय नमः ओम ब्रह्म देवाय एक पाव पर खड़ा होकर स्वामी की आराधना कर रहा था उसकी दृढ़ और अटूट थी दिन सप्ताह माह बीत गए परंतु वह एक ही अवस्था में खड़े होकर एकाग्र चित होकर तप कर रहा था उसका मंत्र उच्चारण समय के साथ-साथ और भी प्रभावी होता गया ब्रह्म देवाय नमः ओम ब्रह्मा नमः ओम ब्रह्मा नमः ओम ब्रह्म देवाय नम ओम ब्रह्म देवाय नमः एक सच्चे भक्त के समान व घोर तपस्या कर रहा था माता हां पुत्र और सच्ची भक्ति सदे फलित होती है माता अर्थात ब्रह्मा जी ने उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर उसे अमृत्व का वरदान दे दिया बताइए ना माता फिर क्या हुआ था आगे की घटनाओं का क्रमानुसार विवरण सुनो पुत्र एक और तो प्रभु विष्णु जी की भक्ति के वातावरण में हिरण कश्यप के पुत्र का जन्म हुआ जिससे संपूर्ण आश्रम में प्रसन्नता की लहर दौड़ उठी और संपूर्ण आश्रम खुशी से भर [संगीत] उठा [संगीत] ओम नमो नारायण [संगीत] हरि ओम नमो नारायण हरि ओम नमो नारायण हरि ओम नमो नारायण हरि ओम ब्रह्म देवाय नमः एक और तो प्रभु की कृपा से श्री हरि के भक्त ने जन्म लिया और दूसरी ओर उस शिशु के पिता को भी उसकी तपस्या का फल प्राप्त होने वाला था ओम ब्रह्म देवाय नमः ओम ब्रह्म देवाय [संगीत] नमः ओ ब्रह्म देवा नमः ओम ब्रह्म देवाय [संगीत] नमः ओम ब्रह्म देवाय नमः ओम ब्रह्म देवाय नमः वस क [संगीत] शप [संगीत] प्रणाम प्रभु ब्रह्मदेव कल्याण [संगीत] होवत मैं तुम्हारी तपस्या से अत्यंत प्रसन्न हव कहो क्या वरदान चाहिए तुम प्रभु भक्त आपके दर्शन मात्र से त हो गया किंतु एक उद्देश्य की पूर्ति हेतु मुझे मर्व चाहिए मुझे मृत का वरदान प्रदान करने की कृपा करें प्रभु प्रभु तप में कोई त्रुटि हुई है मुझसे जिसके कारण में अमरत्व की योग्यता प्राप्त नहीं कर सका नहीं पुत्र अमृत्व का वरदान देने का अधिकार मुझे भी नहीं है जीवन मरण प्रकृति के नियम है और मैं भी उनका उल्लंघन नहीं करता यदि मैं अपनी इच्छा अनुसार वरदान प्राप्त नहीं कर [संगीत] सकता क्षमा कीजिए प्रभु तो फिर तप का क्या लाभ है प्रभु मुझे तपो फल के रूप में अमृत्व मात्र [संगीत] अमृत्व यदि आप मुझे अमरत्व का वरदान नहीं देंगे तो मैं पुन घोर तप करूंगा घोर तप तप करते करते मेरे प्राण निकल जाए किंतु तफल के रूप में मुझे अमरत्व चाहिए मात्र अमरत्व [संगीत] माता तपो फल तो देना ही पड़ता है किंतु ब्रह्मा जी ने उसे अमर होने का वरदान दिया था फिर कैसे प्रभु नारायण विष्णु जी उनका संहार कर सकते थे वह तो अजय धीरज रखो हनुमान प्रभु ब्रह्मा जी सृष्टि के रचयिता है विधि के विधान के विरुद्ध कोई भी कार्य नहीं कर सकते और विधि का विधान है जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु निश्चित है और इसीलिए उन्होंने हिरण्य कश्यप को अमृत्व का वरदान नहीं दिया पुत्र तुम्हें और तप करने की आवश्यकता नहीं है पुत्र तुम तपो फल के अधिकारी हो चुके किंतु मैं तुम्हें अमृत का वरदान देकर सृष्टि का विधान नहीं बदल सकता हां यदि तुम चाहो तो अपनी मृत्यु को बाधित कर सकते [संगीत] हो उचित है प्रभु जैसा आप चाहे ना दिन में ना रात में ना भीतर ना बाहर ना आकाश में ना पाताल में ना जल में ना थल में ना देव से ना नर से ना राक्षस से ना गंधर्व या किनर से ना उभयचर या नर्चर से ना स्थल चर या जलचर से ना मंत्र या तंत्र से ना जिसकी सृष्टि आपने की किसी की द्वारा मेरी मृत्यु ना हो यही नहीं प्रभु मेरी शक्तियों के समक्ष कोई भी योद्धा टिक ना पाए तीनों लोकों में मेरी ही विजय का पताका लहराए यही वरदान मुझे प्रदान कीजिए [संगीत] [संगीत] था प्रभु ऐसा प्रतीत होता है आप मेरी कविताओं में उलझ गए आप ये जान ही नहीं पाए कि मैंने आपसे क्या मांग लिया बल में सर्वोपरि तीनों लोगों का सम्राट बाधित मृत्यु के रूप में अमरता का वरदान सर्वशक्तिमान हो गया य हिर्न कश्यप सर्वशक्तिमान अवत हो गया हूं मैं अव सर्वता अव क्या हुआ पुत्र किस असमंजस में डूबे हुए हो दैत्य राज हिरण्य कश्यप ने तो अपनी बातों में उलझा करर ब्रह्मा जी को ही छल लिया पुत्र हनुमान यह तो हिरण कश्यप का सोचना था किंतु सृष्टि के रचयिता और उनके निर्माता को भला कौन छल सकता है हनुमान प्रभु तो सर्व ज्ञाता सर्वव्यापी है जो कुछ भी हो रहा है या भविष्य में होने वाला है सब प्रभु की ही लीला [संगीत] है देवर्षी आप तो त्रिकाल दर्शी है सर्वज्ञ है कुछ मेरे पुत्र के भविष्य के बारे में भी बताइए ना यह बड़ा होकर दैत्य सम्राट बनेगा ये महाबली अरराज बनेगा मेरा पुत्र स्वामी तीनों लोगों पर शासन करेगा मेरा [संगीत] पुत्र अच्छा हुआ स्वामी आप आ गए हा देवी के आधु मैं आ [संगीत] गया अमृता का वरदान प्राप्त कर लौटा हूं मैं अमरता का वरदान हां एक प्रकार से का ही वरदान है यह तीनों लोकों में कोई भी प्राणी जिसका जन्म हुआ हो उससे अधता का अर्थ ही है [संगीत] अमरता देवी य मेरे घोर तप का परिणाम तो है ही किंतु इसमें वह सौभाग्य भी सम्मिलित है जो मेरा पुत्र लाया है मेरे [संगीत] लिए [संगीत] देखो प्रिय मेरे पुत्र के दमकते हुए मुखड़े को तेजस्वी पिता का तेजस्वी [संगीत] पुत्र तेजस्वी तो है आपका पुत्र देते राज रने कश्यप दिग दिग तक फैले गी इसकी [संगीत] की सत्य है आपका कथन देव जिस प्रकार आपने मेरी पत्नी की रक्षा मेरे पुत्र का समुचित लालन पालन किया उसके लिए मैं जीवन भर आपका ऋणी रहूंगा मैंने कुछ नहीं किया देते राज यह तो ईश्वर की इच्छा थी नहीं देवर्ष यह तो आपकी महानता है महारानी क यादू अब हम राज भवन चलकर गुरुदेव से अपने पुत्र के लिए एक महान नाम का शोध करवाएंगे जिसकी प्रसिद्धि दिग दगा तक फैल जाएगी स्वामी क्यों ना हम देवर्षी से ही अपने पुत्र का नामकरण कराए यदि यह मेरी रक्षा ना करते तो मुझे उस त इंद्र के कपट के बारे में सब ज्ञात कपटी को अपनी करनी का फल भोगना पड़ेगा देवऋषि मेरे इस पुत्र का जन्म आपके संरक्षण में हुआ है मैं महान दैत्य राज हिरण कश्यप अपने इस महान पुत्र के नामकरण का सौभाग्य आपको प्रदान करता हूं तेते राज आपके पुत्र के जन्म लेने से मात्र आपके और महारानी कदू के जीवन में ही उल्लास एवं आनंद नहीं आया मेरा आश्रम भी एक अपूर्व अलहाज से भर उठा था और अलहाज से भर उठ संपूर्ण दत्य वंश हां दत्य राज अतः आपके पुत्र के लिए सबसे उपयुक्त नाम होगा प्रल्हाद प्रल्हाद प्रल्हाद प्रल्हाद उत्तम अति [संगीत] उत्तम मेरा पुत्र मेरा प्रहलाद दिग दगा तक गूंजेगा यह नाम प्रल्हाद प्रल्हाद प्रल्हाद प्रल्हाद सबके हृदय को आहात से भरने वाला नाम है ना माता हां हनुमान सदैव प्रसन्न रहने वाला और सबको प्रसन्नता प्रदान करने वाला बालक प्रहलाद माता पुत्र मोह के आनंद में पढकर तो मनुष्य सब कुछ भूल जा है दैत्य राज हिरण्य कश्यप भी अपनी शत्रुता आदि भूल ही गए होंगे काला रंग हो या कलुषित हृदय उनमें कितना भी उजला रंग मिल जाए या उजले विचार उनकी काली मां कभी भी समाप्त नहीं होती अपने पुत्र का आनंददाई मुखड़ा क्रूर हृदय रण कश्यप को अपनी शत्रुता भुला नहीं सका वह अपनी पत्नी एवं पुत्र को महल में ही छोड़कर तीनों लोग पर विजय प्राप्त करने के लिए निकल पड़ा और उसका सर्वप्रथम लक्ष्य था भगवान विष्णु जी का [संगीत] धाम य द्वार क्यों नहीं खुला [संगीत] रने कश्यप के भैसे द्वार बंद कर लिए छलिया विष्णु आज समस्त ब्रह्मांड में तुम्हें मुझसे कोई नहीं बचा सकता मेरे भ्राता हि के िक आज मैं तुम्हारा व करूंगा यदि साहस है तो मेरे समक्षा द्वार खोलो भ विष्णु तुम क्या सोचते हो छलिया विष्णु तुम्हारा यह द्वार तुम्हारी मुझसे रक्षा कर लेगा मेरा एक ही बार इसे चूर चूर कर [संगीत] देगा ईश्वर से प्राप्त शक्तियों की सार्थकता तभी है जब इनका प्रयोग जन कल्याण के लिए हो ना कि निजी स्वार्थ के लिए

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