Tuesday, 6 January 2026

श्रीधर ने सुनाई अप्सरा तारा और रुक्मण की कथा Romiit Vighnaharta Ganesh Episode 840 Pen Bhakti

नन सुख जी आपको वृद्ध माता का निता स्वीकार करना [संगीत] चाहिए उचित कहा श्रीधर ने नियम तो यही है जाना तो हम वही चाहिए किंतु किंतु किसी यजमान को निराश और दुखी करना भी तो ठीक नहीं है तो ऐसा समाधान निकालना होगा जिससे सभी संतुष्ट हो अर्थात दो टोली बना कर के दोनों घरों में पूजा करानी होगी बृद्ध माता को कल का जगराता बहुत भाया था तो श्रीधर को उनके घर जाकर के पूजा करा देनी चाहिए और मैं और भोला सेठ जी के वहां चले जाएंगे क्योंकि बड़ी पूजा है तो अधिक लोगों की आवश्यकता पड़ेगी ना उचित है प्रणाम पंडित जी मैं आपकी प्रतीक्षा करूंगा आपका बहुत बहुत धन्यवाद य निर्णय हो गया सेठ जी के वहां से जो कुछ थोड़ी बहुत संभावना मिलेगी व मैं और भोला बांट लेंगे और बृद्ध माता के वहां से जो कुछ भी तुम पाओगे तुम अकेले अपने घर लेकर के जाना मेरे लिए तो वृद माता का आश शीश पर्याप्त है मुझे और कुछ क्या चाहिए माता आप जाक तैयारी [संगीत] कीजिए चिंता मत करो श्रीधर अवश्य वृद्ध माता ने स्वर्ण मुद्राओं का ढेर छिपा करके रखा है सब दे देगी तुम्हें माता रानी जो चाहेगी वही मिलेगा मुझे प्रणाम पंडित जी आज आपने आने को कहा था तो हम आ गए मंदिर के लिए कुछ दे दीजिए कुछ लाइए पंडित जी भाई जैसे आज आए हो वैसे कल चले आना अरे कल क्यों आना है मैंने चंदा तैयार रखा हुआ है रुकिए [संगीत] हा लीजिए दीजिए उन्हे रजत मुद्राए वो भी चार चार दे दूंगा अवश्य दे दूंगा अ तुम यहां क्यों खड़ी हो धूप में भीतर जाओ भाग्यवान भीतर [संगीत] जाओ यह लो यह क्या कर रहे हैं पंडित जी इतना हृदय छोटा मत कीजिए इतने बड़े पुजारी होकर बस एक कांसे की मुद्रा दे रहे हैं चंदा लेने आए हो तो उसके नियम तो समझो जो जिसकी श्रद्धा होती है वह उतना ही देता है उसे ही स्वीकार करो और अधिक चंदा चाहिए तो श्रीधर जी से मांगो कल उसको ही अधिक संभावना मिली है [संगीत] आज मेरे पास कुछ नहीं है पर आज पाठ में जो भी संभावना मुझे मिलेगी वह कल मैं आपको अवश्य दे दूंगा हां हां अवश्य आना कल चंदा में स्वर्ण मुद्राएं खनकेगी क्योंकि श्रीधर जी तो वैसे भी अपने पास कल के लिए कुछ नहीं रखते हैं सब कुछ दान में दे देते [प्रशंसा] हैं अब तृप्त होगा मेरा मन जब कल चंदा मांगने वाले इसके द्वार पर होंगे और इसके पास कुछ भी देने को ना होगा तब पता चलेगा इसे अपमान का क्या अर्थ होता है प्रणाम पंडित जी प्रणाम श्रीधर [संगीत] जी बापू बापू नैन सुख जी इतना सुखी मत रहिए आपके सुख को दुख में बदल देर नहीं लगती क्या हुआ बापू इतना क्यों गुस्सा हो रहे [संगीत] हो यह लीजिए स्वामी यह चुनरी ले जाइए सुलोचना आज तुम भी चलो मेरे साथ बोला भैया तो नयन सुख जी के साथ गए दुर्गा माता के कार्य में तुम मेरी सहायता कर देना सुलोचना धम केगी उसकी कोई संतान भी नहीं है तो शुभ कार्य में मैं उसके साथ क्यों जाऊ जब भी उसका मुंह देख लेती हूं तो कोई कार्य सफल ही नहीं होता सुलोचना आप चलेंगी ना मेरे साथ मैं वो शुभ कार्य व भाभी ने भी कहा मैं अभागन हूं दुर्भाग्य लेकर आऊंगी मुझे नहीं जाना [संगीत] चाहिए सुलोचना संतान ना होने से कोई अभागी या अभागा नहीं हो जाता दोष मुझ में भी हो सकता है और किसी के कहने से कुछ नहीं होता आज नहीं है कल तो हो ही सकती है संतान तनिक विचार करो जगत जननी माता पार्वती जिनकी जहां दृष्टि पड़ती है व शुभता आती है उन्हें भी संतान कोक से प्राप्त नहीं हुई और वो संपूर्ण जगत की माता और जन्नी है इसीलिए इसीलिए व्यर्थ के नियमों में ध्यान मत दीजिए और भक्ति की ल जगाए रखिए चलिए [संगीत] सुलोचना जा रहे हो जाओ किंतु अपनी स्वर्ण मुद्राएं मत भूल जाना हा जैसा मैंने पहले कहा था नसक जी जो होगा माता की इच्छा से होगा अगर माता चाहेगी तो स्वर्ण मुद्रा भी मुझे अवश्य प्राप्त [संगीत] होगी अभी एक प्रमाण देना शेष है श्रीधर को क्या वो और सुलोचना उस वृद्धा की सहायता कर पाते हैं अथवा नहीं प्रणाम पधारिए आपका स्वागत है आइ आइए आइए पंडित जी आइए आज आनंद आ जाएगा आज के दिन जीवन की शेष संभावना प्राप्त करने का अवसर है चलो चलिए चलिए आपको कोई कष्ट नहीं होगा जो आवश्यकता है हमें कह दीजिए हा हा हा अवश मां हम है ना चिंता मत कीजिए हम पूजा की तैयारी कर लेंगे आप विश्राम [संगीत] कीजिए [संगीत] मां आई माता रानी को चुनरी [संगीत] चढ़ाई इतना बस किंतु इतने से क्या होगा शेठ जी भोग सब सवा किलो का लगेगा सवा किलो फल सवा किलो मिठाई सवा किलो मेवा शीघ्र मंगवाए ले आओ मेरे पास तो बस यही एक फल है प्रसाद में चढ़ावे के [संगीत] लिए [संगीत] जय माता की पेड़ के जड़ में नियमित जल डालने से वह जल सबसे ऊंची टनी तक भी पहुंचता है उसी प्रकार सच्चे भक्ति भाव से अपनी भक्ति को सींचने से वह भक्ति ईश्वर तक अवश्य पहुंचती [संगीत] है इसीलिए फल एक हो या 100 इससे कोई अंतर नहीं [संगीत] पड़ता मां जगराते में और कोई नहीं आएगा अतिथि आ गए हैं तो प्रारंभ करें अन्यथा मुहूर्त निकल जाएगा कुछ समय प्रतीक्षा कर लीजिए कुछ अतिथि आ रहे हैं हा जितने अधिक अतिथि आएंगे उतना अधिक चढ़े अवश जी मुझ गरीब वृद्ध के यहां कौन आएगा भला मा जिसके घर में इतनी श्रद्धा से पूजा होती है वहां अतिथि आए ना आए स्वयं भगवान चले आते हैं मैं पूजा आरंभ करता [संगीत] हूं इस प्रकार एक और अतिथियों की भीड़ थी तो दूसरी ओर थी वोह वृद्धा माता किंतु वह कहां महत्त्वपूर्ण था भगवान भीड़ से नहीं भक्ति से प्रसन्न होते हैं और पूजा आरंभ हुई तो एक और नयन सुख ने ढोंग आडंबर की झड़ी लगा दी तो वहीं दूसरी ओर श्रीधर ने माता रानी के जागरण का आरंभ तारा रानी और उनकी बहन रुक्मण की भक्तिमय कथा से किया जिससे जीवन में यह सीख मिले कि दुष्कर्म का फल जन्म जन्मांतर तक भोगना हो और सुकर्म का पुण्य ही नहीं मिलता अपितु सत्कर्म करने से पूर्व के पाप भी मिट जाते हैं तारा रानी और रुक्मण की कथा का आरंभ होता है जब वह दोनों देवराज इंद्र की राजसभा में अपसरा थी तारा जो भी करती थी पूरी एकाग्रता से करती थी नित्य कला में भी उसका पूरा ध्यान रहता था जबकि रुक्मण का मन बहुत शीघ्र अस्थिर हो जाता था किंतु साथ में जब दोनों बहनें नित्य करती थी तो संपूर्ण स्वर्ग आनंद से झूम उठता [संगीत] था अद्भुत अद्भुत तारा उत्तम रुक्मण आप दोनों के नृत्य ने हमें आनंद और स्फूर्ति से भर दिया आपके देवराज आपसे अत्यंत प्रभावित हम आप दोनों से प्रभावित होकर आपको वरदान देना चाहते हैं इसलिए निसंकोच बताइए क्या चाहती हैं आप तारा अपसरा होते हुए भी धार्मिक भी थी पूजा पाठ के प्रति निष्ठा भी रखती थी इसीलिए उस दिन उन्होने जो मांगा व सबको बड़ा विचित्र लगा मांग लो दीदी जो मांगना है आज देवराज अति प्रसन्न है हे देवराज आप हमें वरदान देने के इच्छुक है तो हमें अनुमति दीजिए कुछ समय पृथ्वी पर भ्रमण करने [संगीत] का केवल इतना ही हां उचित और खमन आपको क्या पृथ्वी भ्रमण का वरदान दीदी तारा ने अवश्य कुछ सोचकर ही मांगा होगा अवश्य वहां स्वादिष्ट भोजन मिलेगा और वह आनंद मिलेंगे जो मात्र पृथ्वी पर ही प्राप्त हो सकते हैं तो मुझे भी पृथ्वी पर ही जाना चाहिए मुझे भी वही अनुमति चाहिए देवराज जो आपने दीदी को दी है उचित जैसे आप दोनों की इच्छा [संगीत] और फिर दोनों अप्सरा बहने देवराज इंद्र की अनुमति पाकर पृथ्वी ब्राह्मण के लिए निकल [संगीत] गए अति सुंदर बहुत सुंदर है यहां की सुंदरता तो अपने आप में अद्भुत है जैसे किसी चित्रकार की मनोहर चित्रकारी हो सत्य कहा दीदी विलंब नहीं करते चलिए इस सुंदरता का आनंद उठाते हैं हां इन भव्य मंदिरों के भक्तिमय वातावरण का आनंद भी अद्भुत होगा मुझे लगा आप उपवन की बात कर रही है उपवन तो स्वर्ग लोक में भी है रुक्मण लेकिन इतने दिव्य और भव्य मंदिर नहीं है तो आप पृथ्वी पर मंदिरों की यात्रा करने भर आई है बस हां और भला यहां आने का क्या कारण है उचित है पहले मैं मंदिर जाकर दर्शन कर लेती हूं फिर पृथ्वी के स्वादिष्ट भोजन का आनंद उठाऊंगी आओ बहन [संगीत] चलोना माण मोले पुर तारा नायक शेखरा स्मित मुख माफी नोहा पाण प्या मली पूर्ण रत्न चकम रत्नम विम रत्न घटर चरण धय तत्परा अरुणाम करुणा [संगीत] तरंग चलो दीदी अब थोड़ा हार्ट की ओर चलते हैं वहां स्वादिष्ट पकवान मिलेंगे जो स्वर्ग में नहीं [संगीत] मिलते पंडित जी हमें एकादशी व्रत की महता बताए सभी चिंताओं का एक ही समाधान एकादशी का व्रत सभी की मनोकामनाएं पूर्ण करने वाला अद्भुत व्रत जिसका फल इस जीवन में नहीं अगले जीवन में भी प्राप्त होगा संजोग देखिए आज एकादशी है आप अपना व्रत आज ही आरंभ करें तब तो एकादशी का व्रत मैं भी कर सकती [संगीत] हूं बहन करने दो ना मुझे यह व्रत ऐसा अवसर फिर नहीं मिलेगा मैंने तो पृथ्वी पर यहां के सुख भोगने की कल्पना की थी किंतु दीदी भी ना यहां भी बस पूजा पाठ और व्रत ही करना चाहती है बहन सभी पापों से मुक्ति दिलाने वाला व्रत है यह एकादशी का व्रत करने से प्रभु नारायण जी की असीम कृपा होती है सुना नहीं तुमने संभव है यही हमारी नियति हो हमें यह व्रत करना हो इसलिए हम पृथ्वी पर आ गए क्यों बहन उचित है तुम यह व्रत करोगी तो मैं भी कर लूंगी किंतु खाली पेट रहना तो बहुत कठिन होगा और एकादशी के व्रत में तो निर्जला रहना होता है जल की एक बूंद तक नहीं पी सकते नहीं नहीं इस व्रत में फलहार भी किया जा सकता है उचित है फिर हम दोनों करेंगे व्रत धन्यवाद बहन मेरी तो बस यही मनोकामना है कि हर जन्म में तुम ही मेरी बहन बनो लेकिन बहन तुम मुझसे एक वादा करो कि तुम अपने चंचल भाव को अपने ऊपर हावी नहीं होने दोगी इस व्रत से पीछे नहीं हटो गी और यह व्रत जरूर पूरा करोगी वचन देती हूं दीदी किंतु हां फलाहार के लिए फल का चुनाव मैं ही करूंगी तो चलो ना फल लेकर आते हैं नहीं दीदी आप मंदिर के भक्ति में वातावरण का आनंद उठाओ फल मैं ले आऊंगी देवी तारा मंदिर में रुकी रही पूर्ण विधि विधान से पूजा करती र लेकिन उन्हें भी इस बात का ज्ञान ना था कि उनकी बहन मन से उसके जीवन की सबसे बड़ी भल होने वाली [संगीत] थी यह कैसी सुगंध [संगीत] है अवश्य कुछ बहुत स्वादिष्ट पक रहा है वहां [संगीत] किंतु मुझे तो दीदी तारा के साथ एकादशी का व्रत रखना है मैं तो नहीं खा [संगीत] सकती य रुक्मण कहां रह गई अब तक तो आ जाना चाहिए [संगीत] था क्या करूं यदि मैं माछ खाती हूं तो दीदी रुष्ट होंगी परंतु खाए बिना मेरा मन भी नहीं मान रहा क्या करूं क्या करूं लालच का आवरण जब व्यक्ति के ऊपर चढ़ जाता है तब उसे उसकी भूल का आभास तक नहीं होता

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ॐ जय शिव ओंकारा आरती Sawan Special Om Jai Shiv Omkara हर हर महादेव Pen Bhakti

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