Tuesday, 6 January 2026

श्रीमद भगवद गीता सार गीता जयंती स्पेशल श्री कृष्ण का गीता ज्ञान Mahabharat Pen Bhakti

महाभारत आज मैं समय नहीं हूं क्योंकि मैं तो किसी के लिए ठहरता ही नहीं पर आज मैं किसी शिष्य की भांति हा जोड़े रणभूमि कुरुक्षेत्र के बीच में खड़ा हुआ नारायण की बातें सुन रहा हूं नारायण मेरे और कुंती पुत्र अर्जुन के बीच में है वैसे तो उनका संबोध कुंती पुत्र अर्जुन ही है किंतु वास्तव में वोह बात मुझसे कर रहे हैं क्योंकि मैं बीता हुआ कल भी हूं आज भी हूं और आने वाला कल भी हूं अर्जुन के प्रश्न केवल अर्जुन के नहीं थे व प्रश्न तो पिछले युगों के लिए भी प्रासंगिक थे इस युग के लिए भी प्रासंगिक हैं और आने वाले युगों के लिए भी प्रासंगिक रहेंगे जब तक मैं हूं तब तक मानव जाति को इन प्रश्नों का सामना करना पड़ता रहेगा इसलिए कोई यह ना समझे कि यह प्रश्न केवल द्रोण शिष्य अर्जुन ही कर रहा है उसके कंठ से मैं भी बोल रहा हूं क्योंकि हर दिन हर युग के भीतर उसका एक अपना कुरुक्षेत्र होता है और होता रहेगा इसलिए हे मानव यदि अपने वर्तमान और भविष्य का सामना करना है तो कुरुक्षेत्र की ओर मुंह करके खड़ा हो जा और स्वयं नारायण से अपने उन प्रश्नों के उत्तर सुन जो सदैव से तुझे परेशान करते चले आ रहे हैं इसलिए हे महाबाहो मेरा हाथ भी की ओर नहीं बढ़ रहा है केश मेरी समझ में तो अब भी यह नहीं आ रहा है कि इस युद्ध से लाभ क्या होगा लाभ हानि यह दोनों ही सापेक्ष शब्द है धनंजय मैं जानता हूं कि तुम्हें पृथ्वी के भोग या स्वर्ग के सुख की कामना नहीं है इसलिए हे कौंतेय सुख दुखे समय कृत्वा लाभा लाभ जया जय ततो युद्ध नवम पापम अवाप सुख दुख लाभ हानि जय पराजय से ऊपर उठो पार्थ मुझसे तो अब भी नहीं उठा जा रहा है केशा अब तक मैं तुम्हें ज्ञान और विवेक की दृष्टि से समझा रहा था पार्थ जो जीवन के आरपार देख सकती है और सत्य की गहराई में झांक कर उसकी अत आत्मा का स्वर समझ लेती है किंतु कदाचित तुम उसकी अमूर्त में उलझ गए तो व्यावहारिक कर्म की तुला में इस क्षण को तोल कर देखो पार्थ व्यावहारिक कर्म की दृष्टि से अपने कर्तव्य के विषय में निर्णय लो तब भी तुम इसी निर्णय पर पहुंचो कि तुम्हारे लिए इस युद्ध में भाग लेना आवश्यक है यही निर्णय तो मैं नहीं ले पा रहा हूं केशव नहीं ले पा रहा हूं तुम यह निर्णय केवल इसलिए नहीं ले पा रहे हो पार्थ कि तुम इस क्षण को केवल व्यक्तिगत लाभ और व्यक्तिगत हानि की तुला में तोल रहे हो यही तो मोह का बंधन है पार्थ यही तो तुम्हारे शोक की जड़ है और इसीलिए तुम्हारा यह कायर में ना भटको पार्थ ना भटको केवल कर्म करो कर्म कर्म तो अपने आप ही में पुण्य है पवित्र है और समाज के लिए कल्याणकारी भी है कर्म तो स्वयं ही अपना फल भी है पार्थ परंतु यदि तुम समाज कल्याण के कार्य में स्वयं अपना हित मिला लोगे तो तुम्हारा वह कर्म अशुद्ध और अशुभ हो जाएगा इसलिए हे पार्थ निष्काम कर्म के मार्ग पर चलो क्योंकि कर्म फल तो तुम्हारे वश में है ही नहीं इसलिए केवल कर्म करो और कर्म फल की इच्छा ना करो कर्मण्य वाधिका रस्ते मा फलेशु कदाचना मा कर्म फल हेतु भू माते संगवा कर्मण किंतु निष्काम कर्म कैसे संभव है वासुदेव फल का ज्ञान ही तो कर्म करवाता है और यदि दृष्टि फल से ही हट जाए तो कोई कर्म करेगा ही क्यों कोई कर्म इसलिए करेगा पार्थ कि कर्म के बिना तो जीवन संभव ही नहीं कुछ तो करोगे ही या भोजन करोगे या नहीं करोगे या भूखे को भोजन करवाओ या नहीं करवाओ ग या युद्ध करोगे या नहीं करोगे तुम्हारे पास तो केवल यही विकल्प है कि तुम क्या करो या क्या ना करो पर परंतु परिणाम तुम्हारे वश में नहीं है पार्थ कर्म फल तुम्हारे वश में नहीं है तुम्हारे अधिकार की सीमा इस विकल्प पर समाप्त हो जाती है कि तुम युद्ध करोगे या नहीं करोगे किंतु युद्ध का परिणाम तुम्हारे हाथ में नहीं है यदि तुम विजय चाहो भी तो यह आवश्यक नहीं कि विजय तुम्हारी ही हो जाए तुम्हारी पराजय भी हो सकती है यदि तुम विजय से मोहित नहीं होगे तो पराजय से भी नहीं घबराओ ग यदि तुम यह सोचो पार्थ कि चाहे विजय हो चाहे पराजय किंतु तुम तो केवल इसलिए युद्ध कर रहे हो कि युद्ध करना तुम्हारा कर्तव्य है तो विजय के सुख या पराजय के दुख का प्रश्न ही नहीं उठता और जो न विजय से सुखी हो और ना पराजय से दुखी वही स्थित प्रज्ञ है इसलिए हे पार्थ कर्म के प्रतिफल की चेष्टा ना करो तुम तो केवल वही करो जो तुम्हारे वश में है अर्थात अपने धर्म का पालन करो यही कर्म योग है पार्थ यही कर्मयोग है इस रहस्य को समझो पार्थ कि तुम्हारे पास तो केवल करने या ना करने का विकल्प है किंतु कर्म के अंत पर मनुष्य के अधिकारों की सीमा समाप्त हो जाती है कर्म का परिणाम मनुष्य के वश में नहीं है तुम सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर हो परंतु यदि तुम्हारा आखेट तनिक भी इधर से उधर हो जाए तो तुम चूक जाओगे तुम्हारा अधिकार तुम्हारे वाण संधान पर है तुम्हारा अधिकार तुम्हारी दृष्टि पर है परंतु उस मृग पर तुम्हारा कोई अधिकार नहीं जिसकी ओर तुम वाण चला रहे हो हे धनंजय सत्पुरुष कभी अपने अधिकारों की सीमा का उल्लंघन नहीं करते अर्थात अपने कर्म में स्थिर रहो पार्थ स्थिर रहो क्योंकि कर्म की कुशलता का ही नाम योग है और योग क्या है किशा योग क्या है वही तो बता रहा था पार्थ योग कर्म का कौशल है मोह का त्याग कर्म का कौशल है मोह से मुक्त होकर अपने कर्तव्य का पालन करना कर्म का कौशल है सफलता और असफलता दोनों ही में समान रहना कर्म का कौशल है बुद्धि युग तो जहा उभे सुकृत दुष्कृतम् सु कौशलम हे केशव किंतु मैं मुनि स्थित प्रज्ञ को पहचानू कैसे उसकी पहचान क्या है व वो उठता बैठता कैसे है उसकी बोलने की शैली कैसी है केशव उसे पहचानने में तो कोई कठिनाई ही नहीं है पार्थ प्रजात यदा का मान सरवान पार्थ मनो गता आत्मन वामना तुष्ट स्थित प्रज्ञ दोते उसी की भांति तुम अपनी कामनाएं त्याग दो अपनी व्यक्तिगत अभिलाषा से मुक्त हो जाओ सुख दुख से परे होकर अपने स्वयं में संतुष्ट हो जाओ पार्थ तो ना तुम्हें दुख की अग्नि ज सकेगी और ना सुख की वर्षा तुम्हें भिगा सकेगी हे पार्थ स्थित प्रज्ञ वह मुनि है जो सुख और दुख दोनों ही में समान भाव रखता है और कोई उसका यह संतुलन तोड़ भी नहीं सकता जब उसके शब्द बाहर निकलते हैं तो मन में तैरते दुख और सुख से बाहर नहीं निकलते बल्कि आत्मा की अथाह गहराइयों से बाहर निकलते हैं वह मोह की भाषा नहीं बोलता वह निष्काम कर्म की भाषा बोलता है वह जब बैठता है तो कछुए की भांति अपने भीतर सिमट कर बैठता है और अपने स्वयं ही को दुर्ग बना लेता है अर्थात उसकी इंद्रियां उसके वश में होती हैं और अपनी इंद्रियों को केवल वही अपने वश में कर सकता है जिसका अपना मन अपने वश में हो हे पार्थ ध्यायतो विषयात संगा संजत काम कामात क्रोध विजयते क्रोधा भवति समोह समोह स्मृति विभ्रम स्मृति भ्रंश बुद्धि नाश बुद्धि नाशा प्रण हे पार्थ सामान्य पुरुष विषय का ध्यान करता है और विषय का ध्यान उसे आसक्त बना देता है इस आसक्ति या लगाव से काम का जन्म होता है जब काम की पूर्ति नहीं होती तो क्रोध उत्पन्न होता है जब क्रोध उत्पन्न होता है तो विषय के प्रति मोह और बढ़ जाता है और जब मोह और बढ़ जाता है पार्थ तो सोचने की शक्ति भटक जाती है जब सोचने की शक्ति भटक जाती है तो बुद्धि का नाश होता है और जब बुद्धि का नाश होता है तो मनुष्य का सर्वनाश हो जाता है और हे कुंती पुत्र तुम्हारा यह मोह तुम्हें बुद्धि की विनाश की ओर ले जा रहा है तनिक सोचो पार्थ कि जिसके पास बुद्धि ही ना होगी उसे शांति कैसे मिल सकती है वह तो शांति और अशांति में अंतर ही नहीं कर सकता और जो शांति को अशांति से अलग तक नहीं कर सकता वह भला कैसे सुखी हो सकता है हे पार्थ जैसे पवन के झोंके नाव को भटका देते हैं वैसे ही कामनाएं बुद्धि को भटका देती हैं इंद्र चरता यन मनो अनु विधते तस्य हरति प्रज्ञाम वायुर नाव वामसी इसलिए हे महाबाहो अपनी इंद्रियों को अपने वश में रखो स्वयम ही उनके वश में ना हो जाओ पार्थ यह बात ध्यान से सुनो और समझो कि जब संसार सोता है तब मुनि जागता है और जब संसार जागता है तब नहीं सोता है ये सोना जागना क्या है केशव ये रात दिन कैसे हैं रात और दिन की तो मैंने बात ही नहीं की थी पार्थ मैंने तो केवल सोने और जागने के विषय में बात की थी सामान्य पुरुष की जाग हर क्षण कुछ पाने और भोगने के मोह में व्यतीत होती है यही उसकी चेतना का लक्ष्य है यदि उसे भूख लगी तो उसे भोजन चाहिए यदि उसे प्यास लगी तो उसे जल चाहिए यदि उसे ऋतुओं से अपना बचाव करना है तो घर चाहिए उसकी सोच आत्म निष्ठ है परंतु मुनि अर्थात स्थित प्रज्ञ की सोच वस्तुनिष्ठ है वह व्यक्तिगत भूख और व्यक्तिगत तृष्णा के परे देखता है वह वृक्ष से गिरे हुए फल के विषय में नहीं सोचता वह वृक्ष के विषय में सोचता है वनों के विषय में सोचता है सामान्य मनुष्य को ईधन के लिए लकड़ी चाहिए तो व वृक्षों को तब तक काटता चला जाए जब तक वन नष्ट ना हो जाए परंतु मुनि प्रकृति में वनों के महत्व के विषय में सोचता है प्रकृति के संतुलन के विषय में सोचता है वनों और ऋतुओं के संबंध के विषय में सोचता है इसलिए हे पार्थ जो सामान्य पुरुष की इंद्रियों के लिए दिन है वह मुनि के लिए रात है क्योंकि वह तो इंद्रियों की सीमा को पार कर चुका है और जो सामान्य पुरुष की इंद्र के लिए रात है वह मुनि के लिए दिन है क्योंकि उसी सन्नाटे में मुनि की चेतना का सूर्योदय होता है मुनि की रुचि सामने की समस्याओं के साथ-साथ उन समस्याओं के समाधान में भी है और यही उसे सामान्य पुरुष से अलग करती है पार्थ या निशा सर्व भूता नाम तसम जागृति संयमी य स्याम जागृति भूतानि सा निशा पश्तो मुने हे पार्थ सत्य इंद्रियों की पहुंच के बाहर है ऐसा नहीं कि मुनि को भूख नहीं लगती लगती है परंतु वह अपनी भूख के परे देखता है और यह सोचता है कि भूख का उपचार क्या है इसीलिए सामान्य मनुष्य का दिन मुनि के लिए रात है और जो सामान्य मनुष्य की इस रात से अपने को बचा ले वही स्थित प्रज्ञ है सामान्य मनुष्य तो नदियों की भा है जिन्हें व्याकुलता बहा ले जाती है परंतु उन्हें अपने मार्ग का ज्ञान नहीं होता वह तो अंधाधुंध बही जाती हैं क्योंकि वह केवल बहने ही को अपना कर्म समझती हैं और वह अपना सारा जल अपनी सारी उथल पुथल सागर में उड़ेल देती हैं किंतु सागर फिर भी अपने तटों की मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता इसी प्रकार कामनाओं की नदिया सामान्य मनुष्य को तो बहा ले जाती हैं परंतु जब वह मुनि तक आती हैं तो मुनि उन्हें समेट लेता है और अपनी मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता हे पार्थ तुम भी सागर बनो सागर मुनि है सागर ज्ञानी है तुम भी ज्ञानी बनो पार्थ क्योंकि ज्ञान ही उत्तम है हे ऋषिकेश हे योगेश्वर हे ज्ञानमूर्ति यदि ज्ञान कर्म से उत्तम है तो आप मुझे इस लोह लोहान कर्म में क्यों लगा रहे हैं केशव आप मुझे इस लोह लोहान कर्म में क्यों लगा रहे [संगीत] हैं हे केशव आपने तो मुझे उलझा दिया यदि ज्ञान कर्म से उत्तम है तो फिर मैं ये भयानक कर्म करूं क्यों क्यों युद्ध करूं केशव क्यों ना मुनि बनकर मौन समाधि में चला जाऊ मैं कल्याण का मार्ग पूछ रहा हूं केशव कृपया मुझे मार्ग दिखलाइए केशव मुझे मार्ग दिखलाइए लोकेश मन द्विधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मया नग ज्ञान योगेन सांख्या नाम कर्म योगेन योगी नाम हे नि पाप अर्जुन संसार में दो प्रकार के लोग होते हैं अंतर्मुखी और बहिर्मुखी जो अंतर्मुखी होते हैं वे स्वयं के भीतर जाकर ईश्वर को देखते हैं यही ज्ञान योग है और जो बहिर्मुखी होते हैं वे स्वयं से बाहर निकलकर उसे प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं किंतु कर्म से छुटकारा नहीं क्योंकि स्वयं के भीतर जाकर उसे खोजना भी तो कर्म ही है हे कुंती पुत्र मार्ग तो यही दो हैं एक ज्ञान योग का और दूसरा कर्म योग का हे केशव तो फिर मैं ज्ञान योग के ही मार्ग पर क्यों ना [हंसी] चलू किंतु हे पार्थ ज्ञान योग भी कर्म के त्यागने का मार्ग नहीं है सिद्धि का मार्ग नहीं है क्योंकि कर्म के बिना तो जीवन संभव ही नहीं आंखें हैं तो वे अवश्य देखेंगी पलके हैं तो वे अवश्य झपक कण तो वे अवश्य सुनेंगे जो कर्मेंद्रियों के आड़े आए जो उन्हें बलपूर्वक रोककर उनका दमन करके विषयों का चिंतन करें वह योगी नहीं वह ज्ञानी नहीं वह तो मिथ्या चारी है सिद्ध पुरुष इंद्रियों को अपने वश में करता है उनका दमन नहीं करता पार्थ वह आंखें बंद करके नहीं जीता कर्म बिना तो शरीर की यात्रा संभव ही नहीं व्यक्ति सांस तो लेगा ही ना पार्थ यदि वातावरण में कोई सुगंध या दुर्गंध है तो वह उसका अनुभव करने के लिए भी विवश है यदि उसके आसपास कोई नाद है कोई ध्वनि है कोई कोलाहल है तो उसे सुनने के लिए उसके कर्ण उसके आदेश की प्रतीक्षा तो नहीं करेंगे ना इसलिए जो अपने इंद्रियों को नियंत्रित रखे जो उन पर अपनी चेतना का अंकुश लगाकर उन्हें कर्मो मुख करें उन्हें कर्म की दिशा दिखाए वही श्रेष्ठ है वह अपने विकल्पों को समझता है पार्थ और अपनी संकल्प शक्ति का प्रयोग करता है और हे पार्थ अपने नियत कर्म करना कुछ ना करने से अच्छा है अब यह भी ठीक है पार्थ की आंखें देखती हैं किंतु वे क्या देखें और क्या ना देखें इसका निर्णय तो ज्ञानी स्वयं ही लेता है वह आंखों को देखने की करणों को सुनने की और पांव को चलने की खुली छूट नहीं देता विकल्प के मोड़ पर ज्ञानी और अज्ञानी के अंतर का भेद खुलता है पार्थ इसलिए कर्म तो आवश्यक है क्योंकि उसके बिना तो शरीर का निर्वाह संभव ही नहीं किंतु हे पार्थ ज्ञानी पुरुष की भांति कर्म करो ज्ञानी पुरुष की भांति नियतम कुरु कर्मम कर्म जयो कर्मण शरीर यात्रा प चते न प्रसिद्ध अकर्म यज्ञ अर्थात कर्मणो नत्र लोको अम कर्म बंधन तद अर्थम कर्म कौंतेय मुक्त संग समाचर हे कौंतेय कर्म ऐसे करो जैसे यज्ञ किया जाता है क्योंकि कर्म ही यज्ञ है और इसका स्रोत स्वयं अविनाशी ब्रह्मा है इसलिए कर्म का मार्ग सीधा ब्रह्मा तक जाता है और इसीलिए जो व्यक्ति सृष्टि चक्र चलाने में योगदान नहीं करता उसका जीवन मूल्य हीन हो जाता है तुम इस मूल्य हीनता की ओर ना जाओ पार्थ तुम इस मूल्य हीनता की ओर ना जाओ जो व्यक्ति केवल अपनी समस्याओं के विषय में सोचता है वह तो पापी है इसलिए तुम इस मोह जाल से निकलकर अपने कर्तव्यों को पहचानो पार्थ और उनका पालन करो हे पार्थ कर्म फल की इच्छा ही मार्ग में बाधा है कर्म फल की इच्छा ही तो व्यक्ति के गले में बंधा हुआ वह पत्थर है जो उसे स्वयं की तहो से ऊपर उठने ही नहीं देता यही तो व्यक्ति को समाज से काट देता है और उसे व्यक्तिगत लाभ और व्यक्तिगत हानि की दलदल में ढकेल देता है समाज तुम में नहीं है पार्थ तुम समाज में हो इसलिए लोक संग्रह और लोक कल्याण ही को अपना परम कर्तव्य मानो क्योंकि जो समाज के लिए कल्याणकारी होगा वही तुम्हारे लिए भी कल्याणकारी होगा जो कर्म लोक संग्रह के लिए होगा पार्थ उसी के द्वारा तुम्हें सिद्धि प्राप्त होगी व्यक्तिगत लाभ से तो पाप की गली निकलती है क्योंकि वह तो स्वार्थ सिद्धि के लिए व्यक्ति को भटका देता है और हे पार्थ यह भी ना भूलो कि तुम एक महान पुरुष हो और लोग तुम्हें दृष्टांत मानकर तुम्हारे पीछे पीछे काम और स्वार्थ के मार्ग पर चल पड़ेंगे क्योंकि एक श्रेष्ठ व्यक्ति का आचरण तो दूस के लिए दृष्टांत बन ही जाता है मुझ ही को लो नमे पार्था कर्तव्यम त्रिश लोकेश किंचन नानत अत व्यम वर्त एव चकर मणि त्रिलोक में मेरे लिए कुछ करना आवश्यक नहीं पार्थ और त्रिलोक में ऐसा भी कुछ नहीं जिसे मैं प्राप्त करना चाहूं और प्राप्त ना कर सकू फिर भी मैं तुम्हारे सामने हूं कर्म कर रहा हूं पार्थ कर्म कर रहा हूं यह दिखला रहा हूं यह सिद्ध कर रहा हूं कि निष्काम कर्म के मार्ग पर चलते हुए जीवन व्यतीत करना संभव है सक्ता कर्मण्य विद्वान सो यथा कुर्वंति भारत कुर्यात विद्वान तथा सक्त चिकर शुर लोक संग्रह हे भारत कर्म तो अज्ञानी भी करते हैं परंतु केवल अपने निहित स्वार्थ की दृष्टि से ज्ञानी का कर्म तो निस्वार्थ होता है संसार के संतुलन को स्थिर बनाए रखने के लिए होता है लोक कल्याण के लिए होता है इसलिए हे पार्थ अपने मन पर कोई बोझ ना लो अपना कर्म मुझे अर्पण कर दो और यह धर्म युद्ध करो कर्तव्य पालन के मार्ग पर तो मृत्यु भी कल्याणकारी हो जाती है यदि पितामह गुरुजनों और सगे संबंधियों का तुम्हें वध भी करना पड़े तब भी तुम्हें पाप नहीं लगेगा क्योंकि कर्तव्य पालन पाप रहित होता है पार्थ कर्तव्य पालन पाप रहित होता है यदि वे वीर गति को प्राप्त हुए तो उनकी मृत्यु कल्याणकारी हो जाएगी और यदि तुम वीर गति को प्राप्त हुए तो तुम्हारी मृत्यु भी इसलिए हे पार्थ युद्ध करो क्योंकि धर्म का मार्ग पाप का मार्ग नहीं हो सकता पाप की बात निकल आई है तो यह बताइए केशव कि कभी-कभी मनुष्य पाप करने के लिए इतना विवश क्यों हो जाता है उसे कौन विवश करता है उसे विवश करती है उसकी वासना उसे विवश करता है उसका निहित स्वार्थ उससे पाप करवाता है उसका क्रोध उसका मोह इन शत्रुओं को पहचानो पार्थ जैसे धुआ अग्नि को ढक देता है या धूल दर्पण को या झिल्ली गर्भ को वैसे ही ज्ञान को ढक देते हैं काम मोह और वासना आवत जन मेते ज्ञानो नित्य वैरीना काम रूपेण कौंतेय दुष्प रेणा नले नच काम और मोह की अग्नि ज्ञान को नष्ट कर देती है और इसीलिए ज्ञानी की वैरी है हे कौंतेय अग्नि को स्वच्छ बनाओ दर्पण को परिशुद्ध करो और अपनी इंद्रियों को सौम्य बनाकर ज्ञान और विवेक के नाश का वध करो इंद्रिया पराण इंद्रिय परम मन मन सस्तु परा बुद्धि यो बुद्धे परत स हे पार्थ जड़ पदार्थ से इंद्रियां श्रेष्ठ हैं और इंद्रियों से श्रेष्ठ है मन मन से श्रेष्ठ तर है बुद्धि और बुद्धि से भी श्रेष्ठ है आत्मा तो आत्मा की चिंता करो पार्थ आत्मा की चिंता करो और देह इंद्रियों मन और बुद्धि से ऊपर उठने का प्रयत्न करो हे पार्थ तुम तो मेरे भक्त भी हो और मेरे मित्र भी इसलिए मैं तुम्हें वह योग बताने जा रहा हूं जो बहुत समय से लुप्त है परंतु सृष्टि के आरंभ में इसे मैंने ही सूर्य को दिया था और सूर्य से यह मनु को मिला और मनु से एक श वाकू तक पहुंचा सूर्य को दिया था आपने यह योग सूर्य को दिया था परंतु हे केशव आपने आधुनिक काल में जन्म लिया है और सूर्य देव प्राचीन है तो मैं यह कैसे मान लू कि सृष्टि के आरंभ में ही आपने यह योग सूर्यदेव को दिया होगा बोलिए केशा बहुनी में तीता जनमानी तव चार्जन तान वेद सर्वानी नवम वे परं तप हां पार्थ मेरे और तुम्हारे बहुत से जन्म हो चुके हैं मुझे वह सारे जन्म याद हैं परंतु तुम्हें याद नहीं है हे परं तप वैसे तो मैं अजन्मा हूं अविनाशी हूं और समस्त प्राणियों का स्वामी हूं परंतु मैं अपनी प्रकृति को अधीन करके अपनी ही योग माया से प्रकट होता रहता हूं यदा यदा धर्मस्य ग्लानि भवति भारत अभ्युत्थानम अधर्मस्य तदात्मानं सजाम परित्राणाय साधु नाम विनाशाय च दुष्कर्म संस्थापन थाय संभवामि युगे युगे हा पार्थ मैं प्रकट होता हूं मैं आता हूं जब जब धर्म की होती है तब तब मैं आता हूं जब जब अधर्म बढ़ता है तब तब मैं आता हूं सज्जन लोगों की रक्षा के लिए मैं आता हूं दुष्टों का विनाश करने के लिए मैं आता हूं धर्म की स्थापना के लिए मैं आता हूं और युग युग में जन्म लेता हूं किंतु हे केशव धर्म की हानि होती ही क्यों है धर्म की हानि इसलिए होती है पार्थ कि मनुष्य मोह के बंधन को नहीं तोड़ पाता कि वह अपने स्वयं से नाता तोड़कर समाज से नाता नहीं जोड़ पाता हे पार्थ यदि ऐसा ना हुआ होता तो लाक्षा ग्रह दुर्घटना न हुई होती द्रौपदी वस्त्र हरण ना हुआ होता और कौरव और पांडव सेनाएं यूं आज एक दूसरे के सामने नहीं खड़ी होती तो क्या द्रौपदी वस्त्र हरण पर मुझे क्रोध नहीं आना चाहिए था केशव यह निर्णय तो स्वयं तुम्हें लेना है पार्थ किंतु द्रौपदी वस्त्र हरण केवल तुम्हारी व्यक्तिगत समस्या नहीं है पार्थ जो इंद्र प्रस की पटरानी महाराज द्रुपद की पुत्री और पांडवों की पत्नी द्रौपदी के वस्त्र हरण पर चुप रह गया वह समाज भला किसी साधारण नारी के मान सम्मान की क्या रक्षा करेगा द्रौपदी वस्त्र हरण एक सामाजिक समस्या है पार्थ एक सामाजिक समस्या है और यह तुम्हारा कर्तव्य है कि तुम उन शक्तियों को नष्ट करने के लिए युद्ध करो जो किसी द्रौपदी का वस्त्र हरण कर सकती हैं यह शक्तियां समाज की शत्रु है पार्थ और जो महापुरुष इस युद्ध में उन शक्तियों के पक्ष में हैं उनके पक्ष में युद्ध करने आए हैं उनसे युद्ध करने में भी संकोच ना करो अपने व्यक्तिगत क्रोध और व्यक्तिगत मोह के बंधनों से मुक्त होकर लोक कल्याण के लिए युद्ध करो पार्थ यही तुम्हारा परम कर्तव्य है मुझे देखो पार्थ इस समाज और उसके वर्णों को गुणों और कर्मों के आधार पर स्वयं मैंने रच तो दिया परंतु इस समाज रचना का फल मैंने कभी नहीं चाहा इसीलिए कता होते हुए भी मैं अकता हूं और जो इस रहस्य को समझे पार्थ वह कभी अपने कर्मों में लिप्त नहीं होगा नमाम कर्माणि लिंप नमे कर्म फले प्र इति माम यो भी जानाति कर्म भी न सबते मुझे कर्म फल की इच्छा नहीं है जभी तो कर्म मुझे दूषित नहीं कर पाते तुम भी निष्काम कर्म करो पार्थ और अपने कर्म पर अपने निहित स्वार्थ की छाया ना पड़ने दो हे भारत कर्म अकर्म और विकर्म के अंतर को समझो और कर्म अकर्म और विकर्म में क्या अंतर है केशव कर्म तो कर्म है ही किंतु जो कर्म कर्म फल की आशा से मुक्त होकर किया जाए वह अकर्म है और जो व्यक्ति और समाज के हित में ना हो वह विकर्म है निषिद्ध है कर्म अकर्म से श्रेष्ठ है कर्ता अकता से श्रेष्ठ है और हे पार्थ जो अकता है जो कर्म फल की इच्छा से मुक्त है वही ज्ञानी है वही बुद्धिमान है और वही कर्म योगी है उसके लिए उसका कर्म ही कर्म फल भी है और इसीलिए वह एक कर्म के पालन के उपरांत कर्म फल की प्रतीक्षा में नहीं ठहरता बल्कि दूसरे कर्म की ओर बढ़ जाता है उसके ज्ञान की अग्नि मोह क्रोध द्वेष आकांक्षा लाभ हानि सुख और दुख के मैल को जलाकर उसके कर्म को शुद्ध कर देती है और उसका कर्म अकर्म बन जाता है और वह कर्ता से अकता और यह अकता यह ज्ञानी जीवन के आवश्यक साधन जुटाने के अतिरिक्त अपने लिए और कुछ नहीं करता उसके शेष कर्म समाज कल्याण के लिए होते हैं यह मनुष्य कर्म करते हुए भी पाप से दूषित नहीं होता उसका जीवन तो स्वयं ही समाज के लिए कल्याणकारी हो जाता है हे निष्पाप अर्जुन ऐसे ही व्यक्ति का जीवन यज्ञ है तुम भी अपने जीवन को यज्ञ बना लो और उसके हवन कुंड में अपने कर्म फल की इच्छा मोह और क्रोध को आहुतियां की भांति जला डालो और यज्ञ क्या है केशव अलग-अलग लोग यज्ञ की परिभाषा भी अलग-अलग करते हैं पार्थ कुछ लोगों के लिए यज्ञ ब्रह्म का स्वरूप है उनके लिए सब कुछ ब्रह्म है कुछ लोग देवताओं को प्रसन्न करने के लिए य करते हैं तो उनके लिए पूजा ही यज्ञ है कुछ साधक आत्मा को परमात्मा से मिलाने की साधना को यज्ञ कहते हैं इन्हीं यज्ञों की भाति इनमें दी जाने वाली आहुतियां भी अलग-अलग प्रकार की हैं कोई धन की आहुति देता है तो कोई कर्म की किंतु वास्तव में यज्ञ चार प्रकार के हैं पहला द्रव्य यज्ञ है इसमें अर्जित द्रव्य और धन को समाज कल्याण के कार्यों में लगाया जाता है अर्थात यह लोक सेवा यज्ञ है दूसरा तपो यज्ञ है जब कोई अपने कर्म को अपनी तपस्या बना लेता है तो उसका जीवन तपो यज्ञ बन जाता है हे पार्थ अपने धर्म का पालन भी यज्ञ है किंतु यह धर्म सांप्रदायिक नहीं सनातन है यह व्यक्ति और समाज दोनों ही के लिए कल्याणकारी है तीसरा यज्ञ योग यज्ञ है इसमें अष्टांग योग की साधना की जाती है और इसमें लोग ध्यान और समाधि का मार्ग अवलंब करते हैं प्राणों का प्राणों में हवन किया जाता है चौथा यज्ञ है ज्ञान यज्ञ यूं तो पार्थ चारों ही यज्ञ महत्त्वपूर्ण है परंतु श्रेष्ठतम ज्ञान यज्ञ क्योंकि ज्ञान ही तो अच्छे और बुरे में अंतर करता है और अपनी अग्नि में तपाक कर्म को शुद्ध करता है और शुभ बनाता है ज्ञान ही तो कर्म के उत्कर्ष का चरम बिंदु है और ज्ञान ही तो तुम्हें मोह बंधनों से मुक्त कराएगा पार्थ हे पार्थ पाप के सागर को केवल ज्ञान की नौका पार कर सकती [संगीत] है कर्म करो तुम ज्ञान से श्रेष्ठ ज्ञान है धर्म कर्म योग ही धर्म है धर्म योग ही कर श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा और हे मानव मैं तुझसे कह रहा हूं कि संसार तेरी कर्म भूमि है और तू अपने कर्मों ही के मानदंड से नापा जाएगा इसलिए तू कर्मों से भागने का जतन ना कर क्योंकि तेरा निष्काम कर्म ही तेरा कर्तव्य है और तेरा कर्तव्य ही तेरा धर्म है किंतु यदि तेरा कर्म केवल तेरे हित के लिए है तो वह कर्म पाप की ओर जाने वाला मार्ग है इसलिए अपने से मुक्त होकर समाज के कल्याण के लिए कर्म कर के यही मोक्ष का मार्ग है दूसरे सारे कर्म तो मोह माया और क्रोध के बंदी हैं और जो स्वयं ही बंदी है वे तुझे मोक्ष के मार्ग पर क्या ले जाएंगे यदि समाज सुखी नहीं तो व्यक्ति भी सुखी नहीं रह सकता यदि समाज की आंखों में आंसू हैं तो समझ ले कि तेरी आंखें भी सूखी नहीं रह सकती यदि वृक्ष कट जाएंगे तो तुझे फल भी नहीं मिल सकता क्योंकि फल देना और छाया देना तो वृक्ष का कर्म है तू समाज का एक भाग है अपने को भाग समझ स्वामी ना समझ इसी में तेरा कल्याण है और यह ज्ञान श्रेष्ठ है और जिसे यह ज्ञान है उसका जीवन ही यज्ञ है अपि चेद पापे सर्वे पाप कृतम सर्वम ज्ञान पलवे नव नम संतर तो तुम भी ज्ञान की नौका में बैठकर पाप के सागर को पार कर जाओ यह समझ लो पार्थ कि जैसे अग्नि सब कुछ जलाकर भस्म कर देती है वैसे ही ज्ञान की अग्नि कर्म फल की इच्छा फल की प्राप्ति ना होने पर आने वाले क्रोध और उस क्रोध के सहारे आगे बढ़ने वाले मोह को जलाकर फसम कर देती है हे पार्थ इस मंत्र को सदैव याद रखो कि संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाली ही कोई वस्तु है और ना ही कोई तत्व ज्ञान ही सर्वोत्तम है अञ श्रद्धा नस संशय आत्मा विनश्यति नायम लोको पर न सुखम संया मन जो अज्ञानी है जिनमें श्रद्धा भाव नहीं है जो बात बात पर शंका करते हैं संशय युक्त हैं वे तो नष्ट हो ही जाते हैं और उन्हें ना इस लोक में सुख मिलता है और ना ही परलोक में इसलिए हे भारत संशय को त्यागो और तुम्हारे भीतर जो मुनि बैठा है उसे जगाओ ज्ञान योगी बनो पार्थ ज्ञान योगी बनो और समझ लो कि ज्ञान की चरम सीमा ही कर्म सन्यास है आप कर्म सन्यास और कर्म योग दोनों ही की प्रशंसा कैसे कर सकते हैं केशव यह दोनों एक दूसरे को काटते नहीं बंधु और कल्याणकारी तो यह दोनों ही हैं किंतु इन दोनों में श्रेष्ठ है कर्म योग वो क्यों और वो कैसे जो द्वेष और आकांक्षा से ऊपर उठकर कर्म करता है वह तो नित्य सन्यासी है ही और वह द्वंद वों से रहित होकर सांसारिक बंधनों से मुक्त हो जाता है इसलिए जो कर्म सन्यास को कर्म योग से अलग समझता है वह तो मूर्ख है ही ज्ञानी ऐसा कभी नहीं समझते कर्म त्याग तो वास्तव में निहित स्वार्थ के त्याग का नाम है पार्थ इसलिए कर्म योग के बिना कर्म सन्यास की प्राप्ति हो ही नहीं सकती कर्मयोगी को तत्त्वों का ज्ञान होता है और उसका देखना न देखना सुनना न सुनना चखना न चखना जागना न जागना लेना न लेना छोड़ना न छोड़ना और उसका हर कर्म लोक कल्याण के लिए होता है और इसीलिए वह पाप से बिल्कुल वैसे ही अलग रहता है जैसे कमल जल में रहकर भी जल से अलग रहता है ब्रह्मण धाय कर्माणि संगम तक्वा करोति लिप नस पापन पद्म पत्र इ वाम बसा हे धनंजय कर्म योगी कर्म फल को त्याग कर परम शक्ति को प्राप्त होता है और नौ द्वारों वाले शरीर रूपी घर में सुखी रहता है मनुष्य के भ्रमित होने का कारण यह है पार्थ कि उसका अज्ञान उसके ज्ञान को कढ देता है और जब आत्म ज्ञान अज्ञान को नष्ट कर देता है तो ज्ञान उस परम तत्व को सूर्य की भाति प्रकाशित कर देता है और ज्ञानी इस नश्वर जीवन ही में परम सत्य को प्राप्त कर लेते हैं उन्हें जन्म पर जन्म नहीं लेना पड़ता वह इसी नश्वर जीवन में मोक्ष को प्राप्त कर लेते हैं तो हे पार्थ यह नश्वर जीवन बहुत ही म महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके उपरांत तुम्हारा आत्मा तो अवश्य होगा किंतु तुम नहीं होगे तो इस नश्वर जीवन काल को अर्थपूर्ण और समाज के लिए कल्याणकारी बनाओ पार्थ ज्ञान प्रकाश है तो इस प्रकाश को प्राप्त करो और यदि तुमने ऐसा कर लिया तो इन भ्रमों में भटकने से बच जाओगे जिनमें आज भटक रहे हो और यदि भटकने से बच जाओगे पार्थ तो तुम्हें शांति मिलेगी हे धनंजय शांति का सीधा मार्ग मैं हूं जो मुझे हर यज्ञ का लक्ष्य हर लोक का स्वामी और हर प्राणी का तशी मानते हैं वही शांति पाते हैं यदि तुम मुझे अपना हिताशी समझते हो पार्थ तो मेरा कहा मानो और युद्ध करो क्योंकि यह युद्ध किए बिना तुम्हें शांति नहीं मिल सकती अपने धर्म से भागने का मार्ग शांति की प्राप्ति का मार्ग नहीं है पार्थ यह युद्ध तुम्हारा धर्म है तो अपने इस धर्म का पालन करो पार्थ और उसके परिणाम के विषय में ना सोचो कौन मरेगा या कौन जिएगा यह तुम्हारी समस्या नहीं है हे पांडव लोग जिसे सन्यास कहते हैं उसे तुम योग मानो और संशय द्वेष और आकांक्षा से मुक्त होकर युद्ध करो क्योंकि इन्हे त्यागे बिना तो कोई योगी हो ही नहीं सकता उद धरे आत्माना आत्मानम ना आत्मानम अवसाद आत्म वत मनो बंधु आत्म वरि परात्मन मनुष्य का यह कर्तव्य है कि वह अपना पतन न होने दे और स्वयं ही अपना उद्धार करे मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र भी है और अपना शत्रु भी जिसने अपने अहम अपने मन और अपनी इंद्रियों को अपने वश में कर लिया हो वह स्वयं ही अपना मित्र है और जो इनके वश में हो गया पार्थ वह स्वयं ही अपना शत्रु है जो शीत काल और ग्रीष्म काल सुख और दुख मान और अपमान में शांत रहे और संतुलन रखे वह जितेंद्रिय पुरुष सदैव परमात्मा में लीन रहता है किंतु हे पार्थ बहुत खाने वाले या बिल्कुल ही ना खाने वाले या अधिक सोने वाले या बिल्कुल ही ना सोने वाले को यह योग सिद्ध नहीं होता जीवन संतुलन का नाम है पार्थ और संतुलित ढंग से जीने वाले मनुष्य का योग उसके दुखों को हर लेता है जैसे वायु रहित स्थान पर दीपक की ज्योति निश्चल रहती है वैसे ही मोह रहित योगी भी निश्चल रहता है चंचल मन को मनमानी ना करने दो पार्थ उसे रोको और उसे अपने आत्मा का अधीन बनाओ तुम्हारी उलझनों का यही उपचार है मेरी ओर देखो पार्थ मेरी ओर देखो जिसे हर दिशा और हर वस्तु में केवल मैं ही दिखाई दूं वह तो कभी भटक ही नहीं सकता जो मुझे नहीं भूलता पार्थ मैं भी उसे नहीं भूलता वह तो सांसारिक जीवन व्यतीत करते हुए भी संसार से अलग और मेरे भीतर ता है हे अर्जुन जो योगी सबके सुख दुख को अपना सुख दुख माने वही परम श्रेष्ठ है आत्मा उपम सर्वत्र समम पश्यति र्जुन सुखम वा यद वा दुखम सहयोगी परमो मत किंतु योग मार्ग पर चलते चलते मन भटक तो सकता है भटक क्यों नहीं सकता अवश्य भटक सकता है केशव तो फिर ब्रह्म की प्राप्ति के मार्ग में इस भटकन का परिणाम क्या होता है भटक जाने वाला बादल की भाति छिन्न भिन्न होकर कहीं नष्ट नहीं हो जाता केशव वह चाहे लोक हो चाहे परलोक कल्याणकारी शुभ कार्य करने वालों की दुर्गति तो हो ही नहीं सकती हे कुंती पुत्र मुझ में मन लगाओ मुझ पर निर्भर होकर योग करो तुम्हें मेरा संशय रहित पूर्ण ज्ञान मिल जाएगा हे धनंजय सबसे बड़ा सत्य तो मैं ही हूं मैं ही वह धागा हूं जिसमें यह सारी प्रकृति मणियों की भांति पिरोई हुई है हे कौते जल में रस मैं हूं सूर्य और चंद्रमा में प्रकाश मैं हूं वेदों में ओमकार मैं हूं आकाश में शब्द भी मैं ही हूं मैं ही पृथ्वी में में पवित्र सुगंध हूं मैं ही अग्नि में तेज हूं प्राणियों में जीवन शक्ति मैं हूं तपस्वी का तप मैं हूं हे पार्थ प्रारंभिक बीज मैं हूं बुद्धि मानों की बुद्धि में तेजस्वी का तेज मैं बलवान में काम रहित बल भी मैं ही हूं और प्राणियों में धर्म के विरुद्ध न जाने वाला काम भी मैं ही हूं मैं सब में हूं पार्थ किंतु सबसे अलग भी हूं मैं अविनाशी हूं मैं निर्गुण हूं हे पार्थ मैं बीते हुए सारे कालों इस बीतते हुए आधुनिक काल और आने वाले सारे कालों के सारे प्राणियों को जानता हूं परंतु मुझे कोई नहीं जानता मैं ही जगत का पिता भी हूं भी और पोषक भी मैं ही ऋग्वेद हूं और मैं ही सामवेद मैं ही स्वामी हूं और मैं ही शरण मैं ही सृजन हूं और मैं ही विलोपन मैं ही सबका आधार हूं पार्थ मैं ही सब कुछ हूं सब कुछ ग्रीष्म भी मैं और वर्षा भी मैं हूं और हे थ मैं ही संसार का अविनाशी बीज भी हूं मैं सबका अति प्रिय मित्र हूं किंतु सबके लिए एक जैसा हूं ना कोई मुझे प्रिय है और ही अप्रिय परंतु जो मुझे श्रद्धा से पूजते हैं मित्र वे मुझ में है और मैं उनमें समोह सर्व भूतेषु नमे द्वे शस्ती न प्रिय ये भजनत तु माम भ मते तेश [संगीत] चाप हे कृष्ण आप परब्रह्म है परम शोधक है आप शाश्वत है दिव्य तत्वज्ञान है तो हे योगेश्वर हे ज्ञानमूर्ति मैं आपको जानू कैसे आपको पहचानू कैसे कृपया विस्तार से मुझे बताइए कृपया विस्तार से मुझे बताइए माधव हे गुरु श्रेष्ठ मेरे विस्तार का तो कोई अंत ही नहीं है फिर भी सुनो मैं प्राणियों के हृदय में स्थित आत्मा हूं अहम आत्मा गुड़ाकेश सर्व भूता शय स्थित अह आदिश मध्य च भूता नाम अंत ए वच हे गुड़ाकेश मैं ही आरंभ भी हूं मध्य भी और अंतिम का अंतिम छोर भी मैं आदित्य में विष्णु हूं मरतो में मरीच ज्योतियां में सूर्य और नक्षत्रों में चंद्र हूं वेदा नाम साम वेदो स्म देवा नाम अस्मि वासव इंद्रिया नाम मनस्सम भूता नाम अस्म चेतना मैं वेदों में सामवेद हूं देवों में इंद्र हूं इंद्रियों में मन हूं और प्राणियों में चेतना हूं मैं रुद्र में शंकर हूं यक्ष और राक्षसों में कुबेर हूं वसु में अग्नि हूं और पर्वतों में सुमेरु हूं पुरोहितों में मैं बृहस्पति हूं सेनापतियों में कार्तिकेय और जलाशयों में महासागर महर्षि हों में मैं भृगु हूं वाणी में ओमकार यज्ञों में जय यज्ञ और अरिगो में हिमालय हूं मैं वृक्षों में पीपल हूं और देव ऋषियों में नारद हूं मैं गंधर्व में चित्ररथ हूं और सिद्धों में कपिल मुनि हे महारथी मैं अश्व में अमृत से उत्पन्न होने वाला उच्च शवा हूं मैं गजों में ऐरावत हूं और मनुष्यों में नरपति मैं शस्त्रों में वज्र धेनु में कामधेनु जनं में कामदेव और नागों में शेष नाग हूं प्रहलाद दम दैत्य नाम काला कलता महम मृगा नाम च मृगें द्रोहम नते यच पक्षम मैं दैत्यों में प्रहलाद हूं गणकोर हूं वनचरे धनुर्धर मैं शस्त्र धारियों में राम हूं अक्षरों में आकार हूं मैं कभी ना समाप्त होने वाला समय हूं मैं चह मुखी श्रेष्टा हूं पार्थ मैं ही मृत्यु हूं पार्थ और मैं ही उन सब का आरंभ हूं जो आने वाले कालों में जन्म लेने वाले हैं और अभी तक जिनके आरंभ का आरंभ ही नहीं हुआ है मृत्यु सर्व हरष चाह उद्भव भविष्य काम कीर्ति श्रीर वा नारी नाम स्मृतिर मेधा ति क्षमा मैं स्त्रियों में कीर्ति श्री वाक स्मृति मेधा धृति और क्षमा हूं मैं ऋतुओं में ऋतुराज हूं और तेजस्विन का तेज हूं मैं गुण हूं मैं विजय हूं मैं प्रयत्न हूं मैं यादवों में वासुदेव हूं और पांडवों में अर्जुन मैं मुनियों में व्यास हूं और कवियों में शुक्राचार्य य चाप सर्व भूता नाम बीजम तद हम अर्जुन नत दस्ती विना यत स्यात मया भूतम चरा चरम मैं ही तो उत्पत्ति का बीज हूं पार्थ वह चाहे चर हो चाहे अचर मेरे बिन तो हो ही नहीं सकता मैं प्राणों का प्राण और जीवन का जीव हूं हे कमल नैन मेरी आंखें खुल चुकी है दुविधा और आशंका के बादल छट चुके हैं आपने जो कहा वही सत्य है और उसके अतिरिक्त कोई सत्य नहीं किंतु हे परमेश्वर मैं आपके ईश्वरीय रूप के दर्शन करना चाहता हूं हे निष्पाप अर्जुन अपनी इन आंखों से तुम मेरा वह स्वरूप नहीं देख सकते इसके लिए तुम्हें दिव्य दृष्टि की आवश्यकता होगी नत माम शक्य से दृष्म अने नव स्व चक्षु दिव्यम ददा मिते चक्षु पमे योगम [संगीत] स्वरम [संगीत] [हंसी] [संगीत] ओ [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [संगीत] [संगीत] [संगीत] [संगीत] [संगीत] [संगीत] ब [संगीत] [संगीत] अदृष्टवांठा [संगीत] से मैं हर्षित हो रहा हूं किंतु मेरा चित भय से व्याकुल हो रहा है इसलिए हे देवेश हे जगन निवास मुझ पर प्रसन्न होकर अपने उसी दिव्य मनुज रूप को फिर से प्रकट [संगीत] कीजिए [संगीत] [संगीत] [संगीत] [संगीत] क्षमा प्रभु क्षमा हे विश्व मूर्ति हे अनंत हे नारायण हे दयासागर जैसे मित्र मित्र को पिता पुत्र को और भगवान अपने भक्त को क्षमा करते हैं प्रभु वैसे ही आप मुझे क्षमा कीजिए प्रभु आप मुझे क्षमा कीजिए हे कुंती नंदन मित्र और मित्र पिता और पुत्र भगवान और भक्त के बीच क्षमा का तो स्थान ही नहीं है इन संबंधों का आधार है स्नेह श्रद्धा और भक्ति मैया वेश्य मनोय माम नित्य युक्ता उपास श्रद्धेया प्रयोक्ता तमा मता जो मेरा भक्त है जो मुझी में ध्यान भी लगा और मन भी जो सदैव मुझी में लीन रहता है और जो पूरी श्रद्धा के साथ मेरी उपासना करता है वही उत्तम योगी है इसलिए हे पार्थ मेरी भक्ति श्रेष्ठ है जो भक्त हैं वे ही संसार में नहीं लते क्योंकि हे पार्थ उर्ध्व मूलम अध शम अश्वम पहुर व्यम ंसी यस्य परनानी यतम वेद सवे द वित हे पार्थ यह संसार तो मानो पीपल का वृक्ष है जिसकी जड़े ऊपर की ओर है और शाखाएं नीचे की ओर वेद इसी वृक्ष के पत्ते हैं जो यह जानता है वह यह समझो पार्थ कि वेदों का अर्थ भी जानता है इस वृक्ष की शाखाएं ऊपर नीचे सारी ओर फैली हुई हैं जिनका परिपोक के तीनों गुणों ने सतोगुण रजोगुण और तमोगुण इस की जड़े मानव समाज में बहुत गहराई तक फैली हुई है इस वृक्ष के वास्तविक रूप की अनुभूति इस संसार में संभव नहीं पार्त क्योंकि यह तो कोई देख ही नहीं सकता कि इस वृक्ष का आदि अंत और आधार क्या और कहां है किंतु मनुष्य इस संसार रूपी वृक्ष को वैराग्य की कुल्हाड़ी से काटकर उस परम पद को प्राप्त कर सक है जहां पहुंचकर उसे फिर लौटना नहीं पड़ता और हे पार्थ वैराग्य निहित स्वार्थ के त्याग का नाम है इसलिए सोचना हो तो केवल मेरे विषय में सोचो पूजना हो तो केवल मुझे पूजो अपने आप को मुझे अर्पण कर दो सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर मेरी शरण में आ जाओ मैं तुम्हें पाप रहित कर दूंगा मन मना भव मद भक्तो मध्या जीी माम नमस्कर मामे वैश स सत्यम ते प्रति जाने प्रियो स में सर्व धर्मानगर व्रज अहम त्वा सर्व पापे भयो मोक्ष श्यामी मा शुच मुझी में मन लगाओ पार्थ मेरे भक्त हो जाओ और मुझे नमस्कार करो यदि तुम ऐसा करोगे तो मैं प्रतिज्ञा करता हूं कि तुम संपूर्ण रूप से मुझे प्राप्त कर लोगे सारे धर्मों को त्यागो पार्थ और मेरी शरण में आ जाओ मैं तुम्हें सारे पाप से मुक्त कर दूंगा इसलिए शोक ना करो धनंजय शोक ना करो हे प्रिय हे भक्त मैं ही कर्म योग भक्ति और ज्ञान का चरम बिंदु और परम लक्ष्य हूं इसलिए योगी की भाति निष्काम कर्म करो चिंता ना करो पार्थ चिंता ना करो मुझ में विश्वास रखो हे महाबाहो अपना उठाओ और युद्ध [संगीत] करो [संगीत] महाभारत महाभारत महाभारत महाभारत m

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ॐ जय शिव ओंकारा आरती Sawan Special Om Jai Shiv Omkara हर हर महादेव Pen Bhakti

[संगीत] [प्रशंसा] ओम जय शिवा ओंकार स्वामी जय शिवा प्रभु जय शिवा ओमकारा [संगीत] ओम जय शिवा ओंकार [संगीत] [संगीत] हंसते गरुड़ तन हर...