प्रभु नारायण की एक शक्ति योग माया है और उनकी अन्य शक्ति योग माया के अधीन है उनमें से एक शक्ति की ही स्वरूप है करकटी यानी ूच का फिर अच्छा हो या बुरा जब तक प्रभु नारायण की कृपा से यह माया स्वरूप संसार रहेगा तब तक विसूचिका भी रहेगी इसी कारण से अमृत्व का वरदान मांगने की आवश्यकता ही नहीं थी किंतु ब्रह्मदेव वो शमा योग्य नहीं उसने दुर्बल असहाय मनुष्यों को वृद्धों को बालकों को सभी को संक्रमित किया है यहां तक कि प्रभु भक्ति में लीन प्रभु भक्तों को भी नहीं छोड़ा यदि मैं इसे ना रोकता तो यह सभी को संक्रमित कर संपूर्ण मानव जाति का संघर कर [संगीत] [संगीत] देती नारायण की योग माया की एक शक्ति स्वरूप होते हुए भी मैं ये कैसी भूल कर बैठी धिक्कार है मुझ पर मैं मात्र दंड की अधिकार हूं क्षमा नहीं प्रभु मैं समझ गई हूं मैं दंडित होने के ही योग्य हूं प्रभु मैं अपना अपराध स्वीकार करती हूं और मैं प्रायश्चित करना चाहती हूं प्रभु इसलिए आप मुझे जो भी दंड देंगे मुझे स्वीकार है प्रभु [संगीत] गंग गंग गंग गंग [संगीत] ग अपराध और अपराधी दोनों ही दंड के भागी होते हैं इसलिए तुम्हें दंड तो अवश्य मिलेगा दंड स्वरूप मैं तुम्हारी शक्तियां सीमित कर रहा हूं अब तुम स्वयं किसी को भी संक्रमित नहीं कर सकोगी तुम्हें इसके माध्यम की आवश्यकता होगी जल वायु स्पर्श आदि जिनके आहार में जिनके विचार में और जिनके व्यवहार में विकारों का दोष हो तुम उन्हें ही प्रभावित कर सकोगी और इस प्रकार तुम अन्याय वाधिका कहलाओगे यही होगा तुम्हारा प्रायश्चित और इस प्रकार लोगों को जीवन जीने का उचित मार्ग प्राप्त हो जाएगा प्रभु मुझे आपका यह दंड स्वीकार है प्रभु अब भया क्रांत रहने का कोई कारण नहीं पुत्री अब शांत हो जाओ चिंता मत करो प्रभु कदाचित वो बालिका अभी भी आतंक के प्रभाव में है संकट मिट जाने के पश्चात जो भय अंतर समाकर वही रह जाता है उससे मुक्ति पाना सरल नहीं [संगीत] [संगीत] होता [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] छोटी बहन शांत हो जाओ [संगीत] ना गणेश हां बहन तुमने तो मुझे पहचान लिया मेरा नाम गणेश ही है और प्रभु गणेश जी के नाम के प्रताप से यह संकट टल गया है हे दिव्य बालक आप अवश्य ही कोई महात्मा है मेरी पुत्री की सहायता कीजिए यह मेरी नन्ही बालिका है आप इसकी आतंक की अवस्था से इसे बाहर निकालिए बहन अब तो कोई संकट नहीं तो अब भै बीत रहने का कोई कारण नहीं वो वो क्या था क्या हुआ था वो भूल थी वि सूचिका की भूल जिसके कारण महामारी का प्रकोप छाया हुआ था किंतु चिंता ना करो प्रभु गणेश जी ने सब ठीक कर दिया [संगीत] है देखो बहन तुम्हारी मां और अन्य लोग पूर्णता स्वस्थ हो चुके [संगीत] हैं ओम गणेशाय नमः ओम गणेशाय नमः ओम गणेशाय [संगीत] नमः आपकी भक्ति में इतनी अपार शक्ति है कि प्रभु ने आपकी प्रार्थना सुन सबके जीवन का विघ्न हर लिया तो क्या भक्ति की शक्ति से ऐसी महामारी में अपनी रक्षा की जा सकती है जो एक से दूसरे में दूसरों से अन्य सभी में एक किक कर फैलती जाती है जिनके पास भक्ति की शक्ति है आचार विचार और व्यवहार में स्वच्छता के सदाचार का परिचय है प्रभु ऐसे व्यक्ति की सदैव रक्षा करते हैं तो क्या इतना पर्याप्त है नहीं बहन इसके अतिरिक्त हमें अपने गृह की स्वच्छता का भी ध्यान रखना अनिवार्य है इसलिए नमक के जल से अपने निवास को स्वच्छ रखना और अपने निवास के बाहर गौ माता के गोबर का लेप लगाना जो शुभ ही नहीं होता अपितु अशुद्ध कीटाणुओं और कीट से हमें ही नहीं हमारे निवास को भी सुरक्षित रखता है किंतु कलयुग में दुराचारी अन्याय एवं दुर्गुणों से भरे मनुष्यों की अधिकता होगी यदि उनका प्रभाव सदाचारी व्यक्तियों पर हुआ तो उनके लिए मैं एक मंत्र देता हूं स्वच्छता के नियमों का पालन करते हुए उन्हें इस मंत्र का जाप करना होगा ओम ह्रीम राम रीम राम विष्णु शक्ति नमः अर्थात हे विष्णु शक्ति मैं आपसे इस महामारी को दूर करने की प्रार्थना करता हूं ओम ह्रीम हराम रीम राम विष्णु शक्ति ओम ह्रीम हराम रीम राम विष्णु शक्ति नमः यह मंत्र तो उनकी सहायता करेगा जो संक्रमित हो चुके हैं किंतु कोई ऐसा उपाय नहीं जो सदाचारी को पहले ही शक्ति प्रदान कर दे जिससे विसूचिका का उन पर कोई प्रभाव ही ना हो जो नकारात्मकता को निकट ना आने दे जो तन को ही नहीं मन को भी सबल करे उसे शक्ति प्रदान करें यदि ऐसा कोई उपाय संभव है प्रभु तो फिर वह कलयुग में भी मानवता और सदाचार दोनों की ही रक्षा करेगा जैसा कि मैंने आपको पूर्व में बताया था उसके लिए शीघ्र पृथ्वी पर एक ऐसे दिव्य पौधे का जन्म होगा जो आरोग्य का प्रतीक होगा जिसके पूजन से मन को शक्ति मिलेगी जो प्रसाद बनकर तन को भी शक्ति प्रदान करेगा उसे निरोग रखेगा प्रत्येक निवास के आंगन में उसका होना ही शुद्धि और सकारात्मकता देगा [संगीत] यह पौधा निवास के लिए ही नहीं जो उसे प्रसाद रूप में ग्रहण करेंगे उसका भी रक्षा कवच बनेगा कोट कोटि धन्यवाद आपका बाल महात्मा आपने तो यहां स्वयं आकर विघ्न हरता के समान हमारे सारे विघ्न हटा दिए मां आपको स्मरण नहीं इन्होंने क्या कहा था यह गणेश ही तो [संगीत] है सदा स्मरण रखना बहन जहां भक्ति है वहां बह नहीं और जहां वहा विन हरता गणेश है इसलिए भक्ति और आशा को कभी मत [संगीत] खोना प्रभु मुझे उचित पथ दिखाने के लिए आपको शत शत नमन अब मैं उस पथ से कभी नहीं भटक हे विघ्न हरता गणेश जी मुझे इस विघ्न से उबारने के लिए आपका कोटि कोटि धन्यवाद [संगीत] [संगीत] तो विघ्न हरता ने मा प्रकृति के विघ्न को हर ही लिया संसार को वि सूचिका के ै से मुक्त कराने वाले गणेश के स्वरूप को एका अक्षर गणेश के नाम से जाना जाएगा एका अक्षर गणेश के नाम से जाना जाएगा हे एका अक्षर गणेश मैं भी आपका धन्यवाद करता हूं और साथ ही ये घोषणा करता हूं कि जिस गंग मंत्र का उच्चारण करके उस बालिका ने आपका आवान किया था वो एका अक्षर मंत्र कहा जाएगा वो एका अक्षर मंत्र कहा जाएगा और मैं आपको आशीर्वाद देता हूं कि जिस प्रकार आपने उस नन्ही सी बालिका को सास दिया उसी प्रकार आपके एका अक्षर मंत्र गंग का उच्चारण कर आपके एकाक्ष गणपति स्वरूप का स्मरण करने वाले भक्तों पर किसी महामारी किसी युद्ध दुर्घटना अथवा ऐसे किसी संकट का प्रकोप कभी नहीं होगा और संकट ही नहीं अपी तो उस संकट के प्रभाव से मन में बसे भै से भी छुटकारा मिलेगा ओ ग ओ ओ इस संसार के सामने जो ये भयानक विघ्न छाया है इस विघ्न को दूर कर समस्या का हल निकालिए ना प्रभु संसार शीघ्र पृथ्वी पर एक ऐसे दिव्य पौधे का जन्म होगा जो आरोग्य का प्रतीक होगा जिसके पूजन से मन को शक्ति मिलेगी हे प्रभु महा गणाधीश हो रहा है कृपा कर मेरा मार्गदर्शन कीजिए प्रभु मुझे बताने की कृपा कीजिए कि अभी मेरे द्वारा क्या करना शेष है ओम सिद्धि बुद्धि सहित महा गण प्रणाम प्रभु महा गधिचि गणेश आपने उचित समझा आपका कार्य अभी संपन्न नहीं हुआ और उसे पूर्ण करने के लिए आपको एक नवीन कथा का भाग बनना होगा जिसके लिए आपको परिवार से दूर वन में मां गंगा के तट पर तप करना होगा मैं आपको आपके तप की सफलता का आशीष देता [संगीत] हूं शुभ कार्य में तो तनिक भी विलंब नहीं करना चाहिए तो मैं अभी माता और पिता श्री से अनुमति लेकर अपने तप के लिए प्रस्थान करता हूं किंतु क्या माता मुझे आज्ञा [संगीत] देंगी यही मना रहा हूं कि माता मुझे ना रोके जाने दे क्या हुआ पुत्र गणेश जब से तुम विसूचिका रूपी संकट को दूर करके लौटे चिंता में ही खोए हुए हो हां देवर जी जब से आपने हमें झूला उपहार में दिया है तब से तो आप अनुपस्थित ही है क्या बात है गणेश किस विचार ने तुम्हें इतना गंभीर बना दिया पिता श्री माता कुछ समय के लिए मुझे यहां से दूर तब करने जाना है नहीं पुत मैं तुम्हें अचानक यूं कहीं नहीं जाने दूंगी और अब तो हमें तुम्हारे विवाह की तैयारी भी करनी है किंतु माता विवाह का तो विचार भी नहीं है मेरे मन में मुझे तब के लिए जाना ही होगा यह अनिवार्य है और वैसे भी मैं तो अभी बालक ही हूं मेरी इच्छा विवाह की है ही नहीं मुझे तो ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए ही अपना जीवन बिताना है ओ तो क्या अब तुम भी वही हट करोगे जो तुम्हारे भ्राता ने किया था नहीं पुत तुम तो मेरी हर बात स्वीकार करते हो ना तो अब तुम मेरे लिए कोई कठिनाई मत खड़ी करो यह तो मां ने सर्वथा उचित कहा है अनुज गणेश वैसे भी विवाह के लाभ तो तुम ने मुझे समझाए थी तो अब तुम स्वयं विवाह से पीछे नहीं हट सकते किंतु माता किंतु परंतु कुछ नहीं पुत्र मैं कुछ नहीं सुनना चाहती मैं तुम्हें कहीं नहीं जाने [संगीत] दूंगी पिता श्री माता को आप ही समझाइए ना प्रिय स्वर्ण भी तपक ही कुंदन बनता है चंदन में घिसने के बाद ही ललाट पर लगाया जा सकता है कदाचित गणेश का तब भी अकारण ना हो इसलिए हमें उसे रोकना नहीं चाहिए किंतु इसका विवाह स्वामी वो कैसे होगा और यह तो ब्रह्मचर्य का पालन करने की बात कर रहा है आप चिंता मत कीजिए देवी कार्तिकेय का विवाह भी तब हुआ था जब व अपने तप के लिए दक्षिण की दिशा में गया था तो संभव है अब गणेश के तप से भी इसके विवाह का संयोग उत्पन्न होगा इसलिए हमें गणेश को अनुमति दे देनी चाहिए संभव है इसके तप के पीछे संसार का कल्याण छिपा हो हा माता मुझे अनुमति दे दीजिए ना मेरा मन तो नहीं करता पुत्र किंतु मैं तुम्हारे तप में बाधा नहीं बनूंगी मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है पुत्र तुम अपने तप अवश्य सफल हो बसमा को जाने माता की आजा को व सर्वो परि माने जीवन समर्पित है तुझको माता सांस सांस अर्पित है तुझको माता सांस सांस अर्पित है तुझको माता जय प्रथम देवा श्री गणेश जय विन हर श्री गणेश जय प्रथम देवा श्री गणेश जय विन हरता श्री गणेश जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा जय गणेश जय गणेश जय गणेश जय ओ [संगीत] ओ ओ ओ नारायण नारायण ये कौन है तेजस्वी तपस्वी जिसके तप से सूर्य जैसे तेज का विस्तार हो रहा [संगीत] है [संगीत] नारायण नारायण यह तो स्वयं प्रभु श्री हरि नारायण [संगीत] है [संगीत] यह तो प्रभु श्री हरि नारायण नहीं पंच मुकुट धारी श्री कृष्णा [संगीत] है नमो विश्व स्वरूपाय विश्व सत्यं हेतु विश्वेश्वरा विश्वा गोविंदाय नमो नमः नमो विज्ञान रूपाय परमा नंदन रूपने कृष्णाय गोपी नाथाय गोविंदाय नमो हे गोलोक विधाता परम श्री कृष्ण देवर्ष नारद का प्रणाम स्वीकार करें [प्रशंसा] [संगीत] ओ नारा नारायण क्षमा कीजिए प्रभु किंतु आप किस रूप में है यह स्पष्ट जत क्यों नहीं हो रहा है [संगीत] मुझे प्रभु यह कैसी लीला है प्रभु ये क्या हो रहा हैरा नारायण इस लीला का रहस्य तो केवल मात्र एक प्रभु श्री कृष्ण ही उजागर कर सकते [संगीत] हैं [संगीत] [संगीत] [संगीत] फ [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] हे [संगीत] अद्भुत [संगीत] [संगीत] विघ्नेश्वराय वरदाय सुरु प्रिया लंबोदराय सकला जगत ताय नागा शति यज्ञ विभूषित गौरी सुताय गणनाथ नमो नमस्ते प्रणाम श्री गणेश व्यक्ति जिस भाव दृष्टि से सृष्टि को देखेगा सृष्टि उसे वैसी ही दिखेगी और भाव दृष्टि का बदला जा सकता है और दृष्टि का भाव बदलते ही सृष्टि भी बदल जाती है इसीलिए तो पाषाण में भी हमारे दर्शन हो जाते हैं इसीलिए तो गणेश में मेरे और मुझ में गणेश के दर्शन हो रहे हैं आपको देवश्री [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] कस्तूरी तिलक ललाट पटले वक्ष स्थले कम नासा ग्रेवर मुक्ति कम कर तले ण करे कर सर्वांग हरिचंदनम सु ललितम यह लीला आपकी है लीलाधर या परम श्री गणेश जी की मैं तो यह भी ज्ञात नहीं कर पा रहा नहीं देवश्री लीला नहीं तत्व का रहस्य समझिए मैं और गणेश एक ही तत्व तो है परंतु नेत्र तो केवल हमें दृष्टि प्रदान करते हैं किंतु हमारे मन की भावना हमें उसके भी दर्शन करवाती है जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते आपको तो स्मरण होगा देव माता पार्वती ने पुत्र प्राप्ति की इच्छा से अत्यंत भावुक होकर मेरा स्मरण किया था और मुझसे मेरे ही जैसा पुत्र पाने का वरदान मांगा प्रभु मुझे एक ऐसी संतान का वरदान दीजिए जो ब्रह्मदेव की तरह ज्ञानी हो आप तरह तेजस्वी और निपुण मुझ जैसा भला और कोई कैसे हो सकता है क्योंकि मैं तो मैं ही हूं इसीलिए गणेश भी मैं हूं और मैं ही [संगीत] [प्रशंसा] गणेश [संगीत] नारायण नारायण समझ गया प्रभु किंतु इस लीला के पीछे भी कोई रहस्य अवश्य है देव श नारद आपसे भला सत्य कहां छिप सकता है आपने उचित समझा संसार की बुद्धि और युक्ति दोनों के ही स्वामी गणेश ही और वो तो विधि और विधान दोनों के कारण भी है और अब स्वयं गणेश ही रच विधि का नया [संगीत] विधान गणेश की ऊर्जा से यहां शापों का योग बनेगा और वही शाप कारण बनेंगे मेरे पूर्ण अवतार श्री कृष्ण के लिए और भविष्य में संसार के कल्याण हेतु पवित्र तुलसी पौधे के भी जन्म का और साथ ही संसार को सहज पुण्य का भागी बनाने वाले पवित्र शली ग्राम के अवतरित होने का और यह सब प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से गणेश की तपस्या के कारण ही [संगीत] होगा तुलसी वृक्ष के उत्पन होने की यात्रा तो आज यहां गोलोक से ही आरंभ [संगीत] होगी [संगीत] रमा लता पुष्पा कहां हो [संगीत] गोपियों इसमें से एक भी फल उचित नहीं है मुझे संपूर्ण गोलोक से श्रेष्ठतम फलही [संगीत] चाहिए गणेश का तप अनुपम ऐसी अनूठी ऊर्जा उत्पन्न कर रहा है जो भावनात्मक ता के चरम पर पहुंचकर जागृत हो क्योंकि स्वयं गणेश का जन्म उनकी माता के वात्सल्य की पुत्र प्राप्ति की प्रबल इच्छा के चर्म का परिणाम है और यहां सभी पर इस ऊर्जा का अद्भुत प्रभाव होगा जिससे उनकी भावनाओं में एक नवीन जवान आएगा और फिर जो होगा वह विधि का नवीन विधान [प्रशंसा] [संगीत] होगा आज य सबसे पहले मुझे प्रभु परम कृष्ण के पास ले जाने राधा जी और बरजा जी से भी सबसे पहले प्रभु श्री परम कृष्ण को अपने पति के रूप में पाने की अभिलाषा जभी भी पूर्ण हो किंतु उनकी सेवा करने का कर्तव्य निभाने की अभिलाषा मैं अभी संपन्न [संगीत] करूंगी आप सब मुझे ऐसे एकटक क्यों देख रही हैसे ल को देखा ही नहीं मुझे देखना छोड़िए और जल्दी से मेरी सहायता कीजिए शीघ्रता कीजिए ना [संगीत] जाइए प्रभु आइए देवी विरजा [संगीत] नारायण नारायण प्रभु की सेवा में गोपियों के आगमन का समय हो गया अर्थात मेरे प्रस्थान का समय हो गया किंतु प्रभु गोलक तक आया हूं और आपकी शक्ति मैया राधा के दर्शन से वंचित होकर लौट गया तो आपके दर्शन पाने का दिव्य सुख अधूरा रह जाएगा प्रभु मैया कहां है प्रणाम देवश्री प्रणाम आपके लिए प्रभु की सेवा का आनंद आ हा हाहा नहीं तो राधा जी सदा इनके साथ रहती और जब वोह नहीं भी होती है तब भी वह सदा प्रभु के मन में विराजमान होती है और राधा जी के मन में उनके प्रभु श्री परम [संगीत] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] कृष्ण [संगीत] [संगीत] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] मा [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] श्री कृष्ण को य अवश्य भाए आशा नहीं विश्वास है [संगीत] [संगीत] मुझे [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] विपत्ति से होने वाली हानि की क्षति पूर्ति की जा सकती है किंतु उस विपत्ति के भय से होने वाली हानि की क्षति पूर्ति करना अत्यंत दुष्कर है
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