Monday, 5 January 2026

श्री गणेश जी के तप के कारण किसे श्राप मिला Hitanshu Vighnaharta Ganesh Episode 717 Pen Bhakti

[संगीत] गणेश जगत कल्याण हेतु तपस्या कर रहे हैं और उनकी इस तपस्या से यहां शापों का योग बनेगा जिससे कलयुग में लोगों की भलाई का मार्ग खुल [संगीत] जाएगा लीजिए प्रभु आपका यह चित्र पूर्ण हो गया और आपकी मोहक छवि मुझे इसमें स्पष्ट दिखाई दे रही है किंतु आप यहां साक्षात अपनी राधा के पास क्यों नहीं है मेरे प्रभु श्री परम [संगीत] [संगीत] कृष्ण ओम ओम [संगीत] ओ यह क्या हो रहा है [संगीत] प्रभु प्रभु चित्र में भी आपकी छवि धूमिल क्यों हो रही है प्रभु मेरे प्रभु मेरे श्री परम [संगीत] [प्रशंसा] कृष्ण [संगीत] [प्रशंसा] [प्रशंसा] ये क्या हुआ राधा मैया उनकी छवि प्रभु से दूर कैसे हो गई राधे अब वो समय निकट आ गया जब एक दूसरे से दूर होना ही हमारी नियती होगी और हमें अपने पुनर्मिलन के लिए लंबी प्रतीक्षा करनी होगी नहीं प्रभु ऐसा संभव नहीं आपकी राधा आपसे दूर नहीं हो सकती एक तो यह लीला और उस पर आज फिर भोर से दोपहर हो गई परंतु मुझे आपके दर्शन पाने का सौभाग्य नहीं मिला मेरे साथ यह अन्याय क्यों प्रभु कदाचित आपको मुझसे प्रतीक्षा करवाने में आनंद आने लगा है परंतु आज आज मैं प्रतीक्षा नहीं करने वाली आप जहां भी है वही पहुंचकर आपसे उत्तर [संगीत] लूंगी आपके मन में क्या प्रश्न है यह मुझे जत है देव आपके पास आने वाला किसी रहस्य को लेकर विचार ना करे य कैसे हो सकता है धीरज समय के साथ आपको आपके सभी प्रश्नों के उत्तर प्राप्त हो जाएंगे मेरे प्रश्नों का उत्तर मुझे मिले ना मिले कोई बात नहीं किंतु मां राधा के दर्शन किए बिना मैं नहीं लौटू अवश्य देव नारायण नारायण प्रभु एक प्रश्न और है आज आपके परम मित्र सुदामा जो यहां के द्वारपाल होते हैं वह दिखाई नहीं दे रहे हैं देवश्री यदि आपको सुदामा जी से भेंट करनी है तो पहले आपको गोपी तुलसी को ढूंढना होगा क्योंकि जहां तुलसी रहती है सुदामा जी भी वहीं पाए जाते [संगीत] हैं क्योंकि जहां तुलसी रहती है सुदामा जी भी वहीं पाए जाते हैं [संगीत] यह स्वादिष्ट है इसे रखती हूं तुलसी तुमने अपने फलों की टोकरी तो बहुत अच्छे से सज्जित की है है ना सुदामा जी का इतना ध्यान है तुम्हें क्यों सुदामा जी क्यों मेरा उनसे क्या संबंध है मैं ना उनका विचार करती हूं ना ही उनका कोई कार्य मेरा तो सर्वस्व प्रभु को निछावर है मेरे मन मंदिर में उन्हीं की मूरत है सुदामा की नहीं अब चलना चाहिए कहीं विलंब ना हो जाए यह फल शीघ्र ही प्रभु कृष्ण को जो पहुंचाने [संगीत] हैं [संगीत] ओ ओ [संगीत] अद्भुत आनंददायक कौन है यह जो मुझे इस पुष्प की वर्षा से इतना आनंदित कर रहा [संगीत] है इतना सुंदर मोर पंख इसे तो मैं ही रखूंगी प्रभु श्री परम कृष्ण की बासुरी की धुन है यह तो अवश्य प्रभु प्रभु मेरी सेवा से प्रसन्न हुए हैं और अब मेरे लिए इतना कुछ कर रहे [संगीत] हैं इतने सारे मोर पंख ये सब मेरे होंगे अवश इसके पीछे प्रभु है वो स्वयं है [संगीत] यहां [संगीत] प्रभु [संगीत] आप सुदामा जी यह उचित नहीं है आपने भ्रम क्यों उत्पन्न किया कि मेरे प्रभु है यहां पर तुम्हारे प्रभु वही तो है तुम्हारे सामने मुझे ही अपना प्रभु मान लो प्रभु मान लो आपको विरजा जी ने उचित कहा था जहां तुलसी है वही सुदामा जी भी प्रभु के समान वेष भूषा करने से और हाथ में बासुरी पकड़ लेने से कोई प्रभु नहीं बन सकता सत्य कहा किंतु मैं उ जैसा बनने का प्रयास कहां कर रहा हूं मैं तो बस इतना चाहता हूं कि वैसा बनो कि तुम्हारे मन को भा जाऊ तुलसी सुदामा जी कल्पना की उड़ान को यही रोक दीजिए क्योंकि मेरे पास ना व्यर्थ का समय नहीं है विलं हो रहा है मुझे विलं हो नहीं रहा विलं तो हो चुका है हो चुका है हां देवी विरजा वहां पहले ही पहुंच चुकी है पहुंच चुकी है हम किंतु तुम उदास मत होना कल प्रभु के दर्शन सर्वप्रथम तुम्हें हो इसका उपाय मैं करूंगा अब इतनी सुंदर सज्जा ऐसे ही व्यर्थ थोड़ी ना होनी चाहिए सुंदर है ना हां मुझे तो यह सब सुंदर लग रहे हैं यह फलों की डलिया भी यह सज्जा भी और उसे सज्जित करने वाले यह थ भी वो तो कमल के उस डंठल के समान है जो अपनी सुंदरता से परम श्री कृष्ण का भी मन मोह लेते हैं और और जिसके हाथ इतने सुंदर हो उसकी तो सुंदरता का वर्णन ही नहीं किया जा सकता उसकी सुंदरता तो भोर के सूर्य के समान दमकती है और मुस्कुराहट ऐसी जैसे प्रकृति खिल उठी हो और और जो इस फूलों की डलिया को सज्जित करने वाली है उसके नेत्रों का तो बखान में क्या ही करूं जैसे ओस की बूंदे शीप के भीतर मोती बनकर अपनी चंचलता का परिचय दे रही [संगीत] हूं प्रभु श्री कृष्णा का इतना सुंदर चित्र तो मैया राधा ही बना सकती है अगर चित्र यहां है तो माता राधा यहीं कहीं होनी चाहिए और उनकी गहराई जैसे शीर सागर के समान हो सुदामा जी मेरे प्रभु श्री परम कृष्ण कहां है भीतर बाहर से जो सुंदरता का सागर हो बस निहारते रहने का ही मन करे तुलसी तुमने मेरे प्रभु श्री परम कृ को कहीं देखा है और केश तो जैसे काली घटा आकाश में हिलोरे ले रही हो कि बस अब बरसी कि तब बरसी तुलसी सुदामा सुना नहीं आप दोनों ने मैं आपसे कुछ पूछ रही हूं तुलसी सुदामा कहां है मेरे प्रभु श्री परम कृष्णा ओ लगता है प्रभु ने आज भी राधा मैया से प्रतीक्षा करवाई है अब मैया का क्रोध उन पर फटे उसे रोकने के लिए मुझे ही कुछ करना पड़ेगा मैया प्रभु प्रभु तो यहां नहीं है हां मैं तो स्वयं उन्हें ढूंढ रही थी वो कहीं दिखे ही नहीं मैंने तो स्वयं उनके लिए फल भी सजाए हैं मैया कदाचित आप उन्हें यहां ढूंढ रहे हैं किंतु वो आपको वहां ढूंढ रहे होंगे [संगीत] ओ मैया वहां जाने का क्या लाभ होगा प्रभु तो आप ही को ढूंढने गए होंगे तो वहां कैसे [संगीत] होंगे अच्छा तो यह कारण है मेरी प्रतीक्षा का विरजा ने आपको रोक कर रखा है [संगीत] य विरजा तुम जिस सुख की लालसा में प्रभु को रोक करर मुझसे प्रतीक्षा करवाती हो वह सुख तुम्हें कभी ऐसे प्राप्त हो ही नहीं सकता क्योंकि सांसारिक सुख और आध्यात्मिक आनंद दो विपरीत ध्रुवों की तरह है बिना एक को छोड़े दूसरा तो प्राप्त हो ही नहीं सकता और वो सुख प्रभु के हृदय से जुड़ने से ही प्राप्त होता है मात्र उनका साथ पाने से नहीं जिस प्रकार तुम्हारी कामनाओं और भावनाओं के बहाव पर तुम्हारा कोई नियंत्रण नहीं उसी प्रकार गोलोक और संपूर्ण जगत के बीच नदी के रूप में तुम्हारा बहाव होगा और यह श्राप है मेरा नदी के रूप में तुम्हारा बहाव होगा और यह श्राप [संगीत] गणेश की ऊर्जा से यहां शापों का योग बनेगा यहां शापों का योग बनेगा शांत हो जाइए मैया इस प्रकार क्रोध असत तो आपने भी कहा था ना सुदामा जी तो आप मुझे क्रोध करने से कैसे रोक सकते हैं और यही नहीं जब मैंने आपसे प्रभु को लेकर पूछा तो उत्तर देना तक भूल गए थे आप क्योंकि आपका ध्यान तो तुलसी में रमा हुआ था आपका यह आचरण यहां गोलोक वासियों को नहीं असुरों को ही शोभा देता है तो उचित है यदि आपको इसी में आनंद आता है तो मैं आपको भी श्राप देती हूं भूलोक में एक असुर बनकर आपका जन्म हो भूलोक में एक अर बनकर आपका जन्म हो और जो दरिद्रता आज आपने अपने स्वभाव में दिखाई है वो उससे भी अगले जन्म में आपके साथ रहेगी जब आप एक दद ब्राह्मण के रूप में जन्म ले कहीं देवी राधा मुझे भी श्राप ना दे दे मुझे उनसे क्षमा मांग लेनी चाहिए और तुलसी तुम भी तो दोष से मुक्त नहीं सुदामा के साथ उनके अनुचित आचरण की भागीदार तो तुम भी थे इतनी चंचलता है तुम्हारे मन में प्रभु सेवा से निकलने पर भी उससे भटक गई वह भी मात्र अपनी प्रशंसा के दो शब्द सुनकर नाम जपती हो प्रभु श्री परम कृष्ण का और मन में वास करती है चंचलता और चंचलता तो मानव स्वभाव है इसलिए मैं तुम्हें श्राप देती हूं कि तुम भूलोक पर मानव रूप में जन्म लो यह न्याय नहीं अन्याय है हमसे भूल हुई है यह मैं स्वीकार करता हूं किंतु आपने भी क्षमा करने के स्थान पर हमें समझाने के स्थान पर हमारी भूल सुधारने के स्थान पर इतने कठोर दंड दे दिए श्राप का चक्र चला दिया और प्रभु आप आपने भी इस अन्याय में मैया का साथ दिया शांत रहकर यह होने दिया एक बार मैया को रोका नहीं आपने तो यदि मैं श्राप का भागी हूं तो आप भी श्राप के भागी आप भी श्रा के [संगीत] भागी आप अपने प्रभु के लिए अपने प्रेम भाव के कारण देवी तुलसी के प्रति मेरे प्रेम को समझने में असमर्थ र और भूलोक में जन्म लेने का श्राप देकर हम दोनों को दूर कर दिया उसी प्रकार मैं भी शराब देता हूं आप दोनों को भी भूलोक में जन्म लेना होगा आप दोनों को भी वियोग सेना हो हां मैया प्रभु श्री परम कृष्ण और आपको एक दूसरे से बिछ की पीड़ा सैनी होगी ब की प हो पड़ा हो [संगीत] ओ [संगीत] ओ आप दोनों को भी भूलोक में जन्म लेना होगा आप दोनों को भी वियोग सहना होगा यह मैंने क्या कर दिया कैसा श्राप दे दिया प्रभु और मैया [संगीत] को नहीं राधे राधे प्रभु मैं आपकी शक्ति हूं आपकी प्रत्येक लीला में समान भागीदार भी यह मुझे ज्ञात परंतु आपसे दूर रह यह मैं कैसे सहन कर लू प्रभु सब संभव है परंतु आपसे दूर रहना आपकी राधा के लिए असहनीय है बड़े लक्ष्य की प्राप्ति बड़े त्याग के बाद ही संभव त्याग ही जीवन में सुधार का आधार बनता है और य दायित्व केवल मनुष्य का नहीं अ पत ईश्वर का भी है हमें भी जगत कल्याण हेतु परम त्याग करना ही [संगीत] होगा यह कैसा अनिष्ट कारी श्राप दे दिया मैंने आप दोनों को मैया आपने सत्य ही कहा था मैंने आसुरी स्वभाव का परिचय दिया है इसलिए मेरा जन्म असुर कुल में ही होना चाहिए इसी योग्य हूं मैं इसी योग्य मुझे क्षमा कर दीजिए प्रभु मुझे क्षमा कर दीजिए [संगीत] सुदामा तुम तो मेरे सखा हो मुझे अत्यंत प्रिय हो पर तुम्हारे मन में भी मेरे लिए सिवाय प्रेम के कुछ नहीं फिर तुम मेरे साथ कुछ कुछ अनुचित कैसे कर सकते हो आज यहां जो भी हुआ वो नियती के अनुसार ही हुआ वो नियति जिसे स्वयं प्रभु श्री गणेश ही निर्धारित करते हैं जिसे वही लिखते हैं [संगीत] यह तो उन्हीं का लिखा विधि का विधान है जो श्राप प्रिय राधा ने देवी विरजा को दिया है वह श्राप होते हुए भी वरदान है क्योंकि उसके अनुसार दिव्य नदी बनकर व आध्यात्मिक और भौतिक संसार को एक दूसरे से विलग करेंगी अब गोलोक में उन्हीं को प्रवेश मिलेगा जो सांसारिक सुखों के प्रति अपने सभी आकर्षणों को त्याग कर अध्यात्म की भावना और पूर्ण भक्ति और निष्ठा से विरजा नदी को पार कर आगे बढ़ेंगे और राधा ने तुम्हें जो श्राप दिया है सुदामा वो तुम्हारे लिए भी वरदान ही होगा जिसे तुम वियोग समझ रहे हो वो वियोग नहीं तुम दोनों के मिलन का संयोग प्रकट करेगा [संगीत] [संगीत] और आप देवी तेसी आपको तो एक परम सुख प्राप्त होने वाला है इस श्राप के कारण मेरे एक दिव्य रूप में आपको मेरा सानिध्य प्राप्त होगा और इस प्रकार आपकी प्रबल कामना भी पूर्ण हो जाएगी [संगीत] और यह सब श्री गणेश जी के कारण ही हो रहा है [संगीत] ओ ओ [संगीत] ओ ओ विसूचिका के रूप में करकटी को गणेश जी ने पराजित तो किया किंतु वह मानव जाति का संकट बनी रहेगी विशेष रूप से कलयुग में और इसलिए गणेश जी की तपस्या के परिणाम स्वरूप आप विसूचिका से उत्पन्न रोगों की औषधि बनेगी मानव जाति के कल्याण हेतु आपका जन्म दिव्य तुलसी पौधे के रूप में [संगीत] होगा और मैं शालिग्राम रूप में प्रकट होगा में प्रकट [संगीत] [संगीत] होगा निर्मल हृदय और प्रेम से परिपूर्ण मैया राधा का हृदय उनका तो श्राप भी वरदान है और मैं मैं ये कैसी मूर्खता कर बैठा मेरा श्राप तो श्राप ही रहा ना प्रभु नहीं सखा सुदामा यह भी नियति का ही भाग है अब आपके श्राप के फल स्वरूप मैं भी अपना कर्तव्य निभा सकूं और मेरा कर्तव्य तो स्पष्ट यदा यदा ही धर्मस्य गला भवति भारत अनम धर्मस्य तदात्मानं सजाम परित्राणाय साधुनाम विनाशाय दुष्टता धर्म संस्थापन थाय सम भवाम युगे युगे [संगीत] अर्थात जब जब संसार में धर्म की हानि होगी संतों और साधुओं पर अत्याचार होंगे तब तब धर्म की रक्षा है मैं अवतार लूंगा और अधर्म का नाश करूंगा और अब आपके श्राप के कारण मैं श्री कृष्ण अवतार लूंगा जो मेरे पूर्ण अवतार होंगे दुराचार कंस शिशुपाल के वध का कारण बनूंगा धर्म युद्ध महाभारत का प्रणेता होगा और पृथ्वी पर धर्म की स्थापना करूंगा आपकी लीला अप्र पार है प्रभु नारायण नारायण यह मेरी ही लीला नहीं है देवशी यह तो श्री गणेश द्वारा रचित नियति भी है जिसका एक महत्त्वपूर्ण भाग उजागर होना भी अर्थात अभी तक जो हुआ उसको आधार देने के लिए अभी एक मुख्य श्राप तो शेष है और एक श्राप स्वामी पुत्र गणेश यहां नहीं है तो ऐसा लगता है जैसे मेरा हृदय ही कहीं और सब कुछ शून्य लगता है स्वामी कब पूर्ण होगा उसका तप प्रिय अभी तक तो आपके पुत्र के तप का एक ही भाग पूर्ण हुआ है और जब तक मां की इच्छा पूर्ण ना हो तब तक पुत्र का तप संपन्न कैसे हो सकता है आपके हृदय में उसकी विवाह की कामना है प्रिय तो तब तक उसका तप निरंतर चलता रहेगा जब तक उसके विवाह का मार्ग ना खोल जाए यह तो बहुत अच्छा होगा प्रभु किंतु इस तप के कारण अब ऐसा क्या होने जा रहा है तपस्या सच्चे मन से हो तो उससे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में सदा अच्छा ही फल प्राप्त होता है तो फिर गणेश के तप से तो संसार की भलाई का ही मार्ग खुलेगा ओम नमो भगवते वासुदेवाय नम हमारी चिंता का कारण बन रही है इन दोनों की तपो शक्ति जिसम निरंतर हो रही है ओम नमो भगवते वासुदेवाय नमः ओ नमो भगवते वासुदेवाय नमः ओ नमो भगवते वासुदेवाय नम उस की र्जा तो अब असहनीय होती जा रही है हा वरुण देव इन दोनों की तपो शक्ति में मेरी अग्नि से भी र्जा है इस स्थिति में तो हम स्वर्ग के भीतर भी प्रवेश नहीं कर सकेंगे तो कौन मिटाएगा हमारे इस विघ्न को विन हरता प्रथम पूज्य गणेश जी अपनी तपस्या में लीन समस्या का निवारण करने के लिए हमें हमें उनके पास जाना होगा जिनकी यह दोनों तपस्या कर रहे हैं प्रभु श्री हरि नारायण अब मात्र वही समस्या का समाधान सुझा सकते [संगीत] हैं शांताकारम भुजग शयम पद्मनाभम सुरेशम विंदे विष्णु भव भय हरम सर्व प्रणाम श्री हय रायण प्रणाम प्रणाम माता प्रभु आपकी चिंता का कारण मुझे ज्ञात है देवराज इद्र आप चिंता मुक्त हो जाइए राक्षस राज दं का यज्ञ अब पूर्ण होने ही वाला है ओम नमो भगवते वासुदेवाय और महाराज धर्म ध्वज की तपस्या भी उसके चरम पर है ओम नमो भगवते वासुदेवाय नमः विघ्नहर्ता श्री गणेश का तप जिसका आधार है वह प्रभु श्री परम कृष्ण की ही लीला है जिसका अपने अगले चरण में जाने का समय आ गया गया धन्यवाद [संगीत] प्रभु ये ये क्या हो रहा है मेरे साथ मुझे भी विचित्र अनुभव हो रहा [संगीत] है ओम नमो भगवते वासुदेवाय [संगीत] नमः संतान प्राप्ति के लिए आपने इतने वर्षों मेरा तप किया तो अब उस तप के फल को प्राप्त करने का समय आ गया है अब समय आ गया है आप दोनों का भूलोक में जन्म लेने का यदि आप मेरे तप से प्रसन्न है तो मुझे वरदान दीजिए कि मुझे ऐसा पराक्रमी पुत्र प्राप्त हो जो स्वयं श्री कृष्ण स्वरूप हो जो त्रिलोक विजेता बने और जो देवताओ से अविजित रहे और सबसे अधिक आपका परम मैं आपको ऐसे महा परा कमी तेजस्वी परम भक्त पुत्र प्राप्त करने का वरदान देता हूं जो राक्षस कुल में जन्म लेने पर परम पूजनीय होगा जिसका नाम शंखचूड़ होगा नाम शगा सुदामा आप असुर राज दंभ के परिवार में शंख चूड़ के नाम से जन्म लेंगे आपके तब से प्रसन्न हूं और आपको वरदान देता हूं आपके कुल में एक तेजस्विनी पुत्री का जन्म होगा एक ऐसी पुत्री जो यशस्वी होगी पवित्रता की प्रतीक होगी जिसका नाम तुलसी होगा तुलसी होगा देवी तुलसी आप महाराज धन ध्वज की पुत्री के रूप में जन्म लेंगी भूलोक के नियमों के अनुसार आपको और सुदामा को अभी की घटनाओं का वहां कोई स्मरण नहीं रहेगा किंतु मैं आपको आशीर्वाद देता कि मेरे प्रति आपकी भक्ति आपका स्नेह सदैव बना [संगीत] रहेगा [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] गणेश जी मैंने अपना कर्तव्य पूर्ण किया अब आपको तुलसी को पौधे के रूप में जन्म लेने हेतु प्रशस्त करना [संगीत] [संगीत] होगा त्याग एक ऐसा सद्गुण है जो व्यक्ति को निर्मल और पवित्र बनाने के साथ-साथ किसी भी बड़े लक्ष्य की प्राप्ति में सहायक होता है

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