Friday, 2 January 2026

मातृ दिवस स्पेशल मातृ दिवस की शुभकामनाएं Mothers Day Special Mahabharat Scene Pen Bhakti

महाभारत [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] प्रणाम माते चिरंजीवी हो माते आप चिंतित लग रही हैं मैं चिंतित इसलिए लग रही हूं कि मैं चिंतित हूं कारण माते नातों के इतिहास में तुम पहले पिता हो जिसने अपने पुत्र का अधिकार किसी और को दिया है तुम कैसे पिता हो पुत्र मैं एक ऐसा पिता हूं माते जो केवल पिता ही नहीं एक राजा भी है पुत्र फिर भी पुत्र होता है भरत आप मा है ममता ने आपको विवश कर दिया है मैं राजा हूं न्याय ने मुझे जकड़ रखा है मेरा परिवार बहुत बड़ा है माते और फिर मैं जिसे युवराज नियुक्त करने जा रहा हूं वह भी तो मेरा ही पुत्र है क्योंकि वह मेरी प्रजा में से एक है सारा जन समुदाय मेरा परिवार है यदि मैं अपने पुत्र को युवराज घोषित कर दूं तो यह राज्य और प्रजा दोनों के साथ अन्याय होगा राजमाता आपको तो गर्व होना चाहिए क्या आपके पुत्र ने न्याय किया है आर्य पुत्र गंगे तो तुम्ह मुझ पर दया आ ही गई कैसे है महाराज आत्मा बिना शरीर कैसा हो सकता है प्रिय अब और देर ना करो गंगा के पानी को मुक्ति दिलाकर हम राज चलते जो तुम्हारे बिना ऐसा लगता है जैसे दीप बिन दिवाली की रात गुलाल बिन होली का दिन हम एक बार फिर सुखन का वही जीवन जिंगे प्र बहता हुआ पानी कभी लौटा है आर्यपुत्र जो मैं लौट आऊंगी अतीत कभी वर्तमान नहीं बन सक मैं आपका अतीत हूं और आपका भविष्य आपको लौटाने आई हूं तुम्हारे बिना मेरा कोई भविष्य नहीं है प्रिय है आर्य पुत्र है और मैं आपका भविष्य अपने साथ लेकर आई हूं क्योंकि वास्तव में भविष्य अतीत की कोक से ही जन्म लेता है व रहा आपका भविष्य [संगीत] [संगीत] मा मां मा देखो आज मैंने नदी को फिर से रोक दिया था हा पुत्र मैंने भी देखा और तुम्हारे पिता महाराज ने भी पिता महाराज देख क्या रहे हैं महाराज अपने पुत्र को संभालिए पुत्र अपने पिता महाराज को प्रणाम करो [संगीत] आस कह रही श्वास से धीरज धरना सीख मांगे बिन मोती मिले मांगे मिले ना भीख मांगे मिले [संगीत] तुम्हारा नाम क्या है पुत्र मां ने मेरा नाम देवत रखा है धनु विद्या किससे सीखी है ऋषि भार्गव से पिता महाराज आप क्या समझे थे आर पुत्र कि मेरी ममता पुत्र प्रेम में अंधी होकर इसे युवराज कह गई मुझे भरत वंश की इस परंपरा का ज्ञान है कि वह जन्म में नहीं कर्म में विश्वास करते हैं कि वह जन्म भोगी नहीं कर्म योगी होते हैं मेरे और तुम्हारे पुत्र को योग्य तो होना ही चाहिए प्रिय यह अवश्यक नहीं था आर्य पुत्र परंतु हस्तिनापुर की राजगद्दी पर कर्म का ही अधिकार चला आ रहा है इसलिए मैंने आवश्यक समझा कि देवव्रत ऋषि वशिष्ठ से वेद और वेदांत की शिक्षा प्राप्त करें और गुरु पति से राजनीति सीखे जो इसने किया और जब ऋषि भार्गव ने यह कह दिया कि अब त्रिलोक में इस बालक के नों का सामना कोई नहीं कर सकता तो मैंने सोचा कि अब समय आ गया है कि हस्तिनापुर को उसका युवराज लौटा दिया जाए गंगे [संगीत] हस्तिनापुरी से पाकर धन्य हो गया अब तुम अपने पिता महाराज के साथ हस्तिनापुर जाओ जहां इतिहास तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है और आप माते वृक्ष की छाया वृक्ष से बंधी होती है व चाहकर भी यात्री के साथ आगे नहीं जा सकती तुम्हारे लिए मैं भी एक ऐसी ही छाया हूं समय के वृक्ष से बंधी हुई अब तुम अपने पिता महाराज के साथ जाओ और हस्तिनापुर में अपने कर्तव्यों का पालन करो जो आज्ञा माते आचार्य पुत्र चलती हूं प्र [संगीत] [संगीत] बैठो पुत्र [संगीत] [संगीत] चिंता का कारण [संगीत] माते मैं नहीं हूं पुत्र मुझे यह नहीं पता कि मुझे तुमसे जो कुछ कहना है वो कोई माता अपने पुत्र से कैसे कहे पिता श्री ने आपसे यही कहा था ना माते कि आपके कंधों पर इतिहास का बोझ पड़ने वाला है मैं सब जानता हूं माते संभवत उस बोझ का ज्ञान अब आपको हो रहा है मेरे पिता की दुराग्रह ने मुझे इस मोड़ पर ला खड़ा किया है संभव है पिता श्री ने मुझे इसी ऐतिहासिक क्षण पर आपकी सेवा करने के लिए मृत्यु लोक में आने का आदेश दिया था आपका क्या आदेश है माते यदि जानते हो तो पूछ क्यों रहे हो पूछ इसलिए रहा हूं माते य केवल माता और पुत्र की समस्या नहीं है इस समस्या का संबंध औरों से भी है इस समस्या का संबंध हस्तिनापुर से भी है और भारतवर्ष के इतिहास से भी और आप केवल मेरी माता नहीं है आप राज माता भी है आप अपने कर्तव्य का पालन कीजिए माते राजमाता की यह समस्या है कि हस्तिनापुर का सिंहासन सुना है मेरे दोनों पुत्र इस लोक को त्याग गए हैं महाराज के ज्येष्ठ पुत्र ब्रह्मचर्य के लिए वचन बद्ध है इसलिए मुझे अपने जेष्ठ पुत्र को कष्ट देना पड़ा अंबिका और अंबालिका की कक का मान रखना तुम्हारा कर्तव्य है क्योंकि तुम चित्रांग और विचित्र वीर्य के जेष्ठ भ्राता हो आपका आदेश सिर आंखों पर माते परंतु इस कर्तव्य पालन के लिए मुझे थोड़ा सा समय चाहिए मैं उग्र साधना में था आपका आदेश मिला वैसे ही चलाया भीष्म का स्वागत भी ना कर सका अभी मेरा रूप आपके आदेश के योग्य नहीं है माते एक वर्ष उपरांत मैं आपके आदेश का पालन अवश्य [संगीत] करूंगा मेरे पास एक वर्ष नहीं है पुत्र आप माता है आप मेरा रूप देख नहीं रही [संगीत] मां का आदेश है कि तुम अपने कर्तव्य का पालन करो जो आग माते क्योंकि जो होना है वह तो होकर ही रहेगा मनुष्य का यह कर्तव्य है कि वर्तमान की झोली में अपना उपहार डालकर आगे बढ़ जाए [संगीत] अब बहुत रात हो गई है सो जा लल्ला सो जा कहानी सुने बिना कैसे सो जाऊ मैया जैसे तेरा दाऊ सो गया है दाऊ की बात और तू बहुत हटी हो गया है मैया को बहुत सताने लगा है मैया तुम्हे मेरा रा सताना अच्छा नहीं लगता मुझे तो तेरा सब कुछ अच्छा लगता है उलाने सुनना भी हा मटकी फोड़ना भी हा माखन खाना भी हा हा लला तो कहानी सुनाओ ना मैया अच्छा सुन एक थे राजा कहां के कहीं के भी हो तुझसे क्या तुझसे कितनी बार कह चुकी हूं कहानी के बीच मत चोका कर पर तू भला सुनने वाला है अयोध्या के राजा थे नाम था दशरथ और कुछ बताऊं नहीं मैया मैं समझ गया तीन रानियों से चार पुत्र थे राजा के राम लक्ष्मण भरत और शत्रुगन राम सबसे बड़े थे पर भरत की मां कैकेई ने महाराज को पुराने वचनों की रस्सी में जकड़ लिया राम ने पिता के वचन का मान [संगीत] रखा रघुकुल रीति सदा चली आई प्राण जाही वरू वचन न जाई राम को वनवास मिला और भरत को राजगद द पर भरत कब मानने वाले थे राम को मनाने वन में गए राम ना माने तो भरत तपस्या करने बैठ गए वहां राम पंचवटी में ठहरे थे सेवा करने के लिए छोटा भाई लखन साथ था और सीता सुकुमारी एक दिन क्या हुआ कि एक राक्षस सोने के हिरण के रूप में कुटिया के सामने से निकला सीता ने राम से कहा मुझे तो यह हिरण चाहिए राम जाते जाते लखन से कह गए कि तुम अपनी भाभी के पास रहना यह सब तो लंकापति रावण का माया जाल था दूर से राम की पुकार सीता तड़प उठी बोली लक्ष्मण जाओ भाई की सहायता करो लक्ष्मण रेखा खींच कर चले गए ब्राह्मण के वेश में रावण भिक्षा मांगने आया और सीता को भिक्षा देने के लिए लक्ष्मण रेखा पार करनी पड़ी बस रेखा के पार होते ही रावण सीता को हर ले गया सीता ने पुकारा हे नाथ हे नाथ लक्ष्मण कहां है मेरा धनुष कहां है मेरा वाण क्या हुआ लला क्या हुआ अरे ऐसा काहे को करता है सो जा क्या हुआ यशोदा काना क्यों चिल्ला रहा था राम जाने क्यों राम जी बनकर लक्ष्मण से धनुष वाण मांग रहा था रावण से जूझने के लिए मैं तो डर ही गई थी चल सो जा मालती बहन अरे ऐसे क्यों बैठी हो मालती बहन अपनी आंखों से स्वयं ही देख लो यशोदा बहन कान्हा काना मैया भाग उतर नीचे कूद नीचे अरे क्यों रे घर में माखन नहीं है क्या आज मैं समझी तू चोर है सचमुच चोर है मैया मैया मैया मैया मैया मैया मैया सारे गांव को त्रास ही त्रास हो रहा है तेरी माखन चोरी के कारण आज तू चोरी करके माखन खाते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया कि नहीं क्या माखन नहीं खाया तूने हा [संगीत] [संगीत] आयुमान भवा यह आशीर्वाद ना दीजिए माते मैं पहले ही से पिता श्री के वरदान की डोर में जकड़ा हुआ हूं इतने दुखी ना हो दुख की तो कोई सीमा ही नहीं होती ना मा परंतु आज इतने दुखी क्यों हो एक कारण हो तो बताऊ मैं शोक मना रहा हूं उन जीवन मूल्यों का जिनकी मृत्यु मेरी आंखों के सामने हो रही मैं शोक मना रहा हूं उस उजली रेखा का जो हमारे पूर्वजों ने सत्य और असत्य के बीच खींची ी माते मैं रो रहा हूं मैं रो रहा हूं उस कठोर सच्चाई पर कि मैंने पिता श्री को जिस सिंहासन की रक्षा करने का वचन दिया था जिस सिंहासन के प्रति निष्ठा की शपथ ली थी उस सिंहासन को प राष्ट्र का पुत्र मोह अपमानित कर रहा है लोभ ने उसके विवेक की आंखों पर पट्टी बांधी है और अभिमान उसके सर चढ़कर बोल रहा है और मेरी व्यवस्था यह है कि मैं पांडु पुत्र स्नेह और आशीर्वाद के सिवा कुछ नहीं दे सकता माते कुछ नहीं दे सकता मन मेला ना करो पुत्र तो फिर मैं क्या करू माते जब जी बहुत व्याकुल हुआ करे तो मां के पास चले आना तुम तो स्वयं इस युग में विंध्या पर्वत के सबसे ऊंचे शिखर हो तुम तो जानते हो कि सीढ़ी तो एक ही होती है उसी से चढ़ते भी है उसी से उतरते भी है परंतु सीढ़ी चाहे कितनी भी ऊंची क्यों ना हो कहीं ना कहीं जाकर तो वह समाप्त होती ही है तो जब सभ्यताएं और संस्कृतियों इस सीढ़ी के ऊपरी सिरे तक जा पहुंचती है तो उन्हें उतरना ही पड़ता है पुत्र और जब वो उतरने लगती हैं तो वो जीवन मूल्य कुछ ले जाते हैं जिनके आधार पर वो ऊपर चढ़ी थी और इसकी राब से बचने के लिए उनके हाथ में जो भी आता है वो उसे पकड़ लेती है राजनीति भी इस नियम के चक्र से बाहर नहीं ये युग भारतवर्ष के उतार का युग है पुत्र परंतु निराश होने की कोई आवश्यकता नहीं क्योंकि मनुष्य सीढ़िया बनाना जानता है यह ना भूलो पुत्र कि अमृत पाने के लिए सागर को मतना पड़ता है और यह भी ना भूलो कि सागर मंथन में पहले विष निकलता है और किसी ना किसी को व विष पीना पड़ता है तुमने वही विष पीने के लिए जन्म लिया है पुत्र यही तुम्हारा कर्म है [संगीत] [संगीत] माते भोजन करने नहीं चलोगी माते मैं तुझे नहीं जाने [संगीत] दूंगी मैं आपके स्नेह का ऋणी हूं माते इस ऋण को चुकाए बिना मैं नहीं जा सकता अरे तो तुझे जाने के लिए कौन कह रहा है तुझे पाने के पश्चात तो मैं अपने पुत्र को भी भूल गई हूं वत्स तूने कभी उसके लिए मुझे रोते देखा है मैं देवकी या यशोदा से अपनी तुलना नहीं कर रही हूं वस परंतु क्या मां की ममता करण चुकाया जा सकता है अरे मां के हृदय की पीड़ा तो स्वयं नारायण भी नहीं समझ सकते क्योंकि वे परम पिता है परम माता तो नहीं है ना माते किसी गुरु माता को यह बातें शोभा नहीं देती अब समय आ गया है कि सुदेव कृष्ण यहां से मथुरा लौट जाए यह जो भी दे उसे प्रसाद समझकर स्वीकार करो हां हां जाए मैं रोक थोड़े ही रही हूं अवश्य जाए पर यह सोचता होगा कि इसे मैं हंसते हुए जाने की आज्ञा दे दूंगी तो यह इसकी भूल है अब तो जाने का समय आ गया गुरु माता आज तो अपने हाथों से मुझे खिला दो सच कहता हूं मेरा पेट ना तो नंदगांव में भरा ना मथुरा में और ना ना ही यहां बड़ा भाई होकर तो मैं बहुत ही पछता रहा दाऊ तुम चाहे मेरे बड़े भाई बनो या छोटे पछताओगे अवश्य पर गुरु माता यह है मुझ पर बड़ा अन्याय बड़ा भाई होने के नाते माता की स्नेह पर सबसे पहला अधिकार तो ज्येष्ठ पुत्र का ही होना चाहिए ना मां के स्नेह पर पुत्रों का अधिकार एक समान होता है व अब चलो माता भोजन करा दो बहुत भूख लगी है और उसके पश्चात हमें आपके पुत्र को भी तो लेने जाना है और आज जब आप पहला कोर मुझे खिलाएंगे तो मेरा जाना और भी आवश्यक हो जाता है वो क्यों दाऊ क [संगीत] पचा प्रणाम माते आयुष्मान भा तुम इतने दुखी और चिंतित क्यों हो पुत्र मुझे यहां से कब मुक्ति मिलेगी माते जब तुम देखो कि हस्तिनापुर का राज से हासन चह और से सुरक्षित है तुम्हारे कंधे बहुत शक्तिशाली है पुत्र अपनी प्रतिज्ञा का बोझ उठाकर जीते रहो पांडु के राजा बनने के पश्चात मैंने यह सोचा था कि हस्तिनापुर अब चाह और से सुरक्षित है परंतु तुम विधाता तो नहीं हो ना पुत्र यह पृथ्वी तुम्हारी कर्म भूमि अपने कर्म अपने कर्तव्य के मार्ग पर चलते रहो जहां तक व मार जाए वहां तक चलते रहो यह मार्ग तो मेरा अपना ही चुना हुआ है माते अपने लिए स्वयं मैंने ही तो इस मार्ग को चुना है परंतु जिसे माता-पिता का स्नेह एक साथ प्राप्त ना हुआ हो वह थोड़ा सा लालची हो जाता है स्नेह का लालची तो जब मुझे स्नेह की आवश्यकता हो तो आपके अतिरिक्त मैं और कहां जाऊ आपके दर्शन पाते ही मेरे इस विश्वास को कि मैं पृथ्वी पर अकेला नहीं हूं थोड़ा सा बल मिल जाता है कल का दिन हस्तिनापुर पर बहुत भारी है माते इसलिए आपके पास थोड़ा सा ममता का प्रसाद लेने चला आया हूं कल पिता और राजा न्याय और अन्याय के संघर्ष का दिन है माते और मैं इसमें अन्याय का साथ देने के लिए विवश हूं क्योंकि आज हस्तिनापुर का राज मुकुट अन्याय के सर पर रखा हुआ है माते आप विधाता से कहे कि वह मेरे हस्तिनापुर के चंद्रमा के इस ग्रहण को काटते होनी टल नहीं सकती पुत्र व तो होकर ही रहेगी परंतु माते [संगीत] [संगीत] माता श्री आप [संगीत] विराजी बैठो [संगीत] पुत्रों यह किस विषय पर वाद विवाद हो रहा है कौन कायर है कैसी ढाल भूख लग रही थी उसे टालने के लिए यूं ही हम लोग आपस में कुछ कह सुन रहे थे सहदेव का प्रस्ताव यह है माता श्री कि हम सभी वारवत चले तो कैसा रहेगा तुमने तो मेरे मन की कह द पु तुम्हारा अकेला जाना मुझे यं भी उचित नहीं लग रहा था पुत परंतु तुम लोगों के साथ मेरा जाना क्या उचित रहेगा य आप क्या कह रही है माता श्री यदि आप नहीं गई तो मैं नहीं जाऊंगा और मैं नहीं गया तो कोई नहीं जाएगा हा हा माता आप अच्छा अच्छा मैं भी चलूंगी समझ ना पाए पांडु सुत कपट चाल का जाल प्रेम सना विष प्रेम से स्वीकार रा तत्काल स्वीकारा तत्काल अभिमन्यु ठहर जा अभिमन्यु ठहर जा नहीं तो आज मैं तुझे बहुत पीटू अरे अभिमन्यु [संगीत] तुम इधर-उधर क्या देख रही हो सुभद्रा मैं तो तुम्हारे सामने ही बैठा हूं आप भली भाती जानते हैं भैया कि मैं इधर-उधर क्या देख रही हूं कहां है वो नटखट नटखट यह तो मेरे अनेक नामों में से एक नाम है परंतु तुम तो मुझे भैया ही कहा करो वह नाम मुझे नंदगांव वालों ने दिया था और तब मैं था भी बड़ा ही नटखट इसका माखन चुरा के खा गया उसकी मटकी तोड़ दी यशोदा मैया तो लाने सुनते सुनते थक जाती थी मैं अभी मन्यू को खोज रही हूं भैया अच्छा आप चाहे नंदगांव में मुझे कितना ही घुमाए आज मैं उसे पीटे बिना नहीं छोडूंगी मामा श बताइएगा मत अच्छा तो त य छिपा है अब यह मेरी शरण में है सुबद्र आओ पुत्र वाह वाह यह कभी मत भूलना सुभद्रा कि यदि यह आने वाला ना होता तो अर्जुन से तुम्हारा विवाह भी ना हुआ होता यह बालक तुम्हारे जीवन का अर्थ है और यह तुम्हारे पास भविष्य की धरोहर की भांति है यह तुम्हारा पुत्र होने के नाते याद नहीं रखा जाएगा परंतु तुम इसकी माता होने के नाते याद रखी जाओगी तो क्या मैं इसके चरण स्पर्श करूं नहीं यह तो इसी बालक का सौभाग्य है परंतु सुभद्रा अपनी ममता का सारा कोश निछावर कर दो इस पर अभिमन्यु अपनी मां को सताया अवश्य करो क्योंकि यह तुम्हारा अधिकार है किंतु इतना भी ना सताया करो कि मां रो पड़े मां का रोना ईश्वर को अच्छा नहीं लगता आप कहते हैं ना कि मुझे पिता श जैसा धनुर बनना है कहते हैं कि नहीं कहता हूं पुत्र और तुम्हें अर्जुन जैसा धनुर्धर बनना ही है तो अब मेरी माता श को समझा दीजिए ना जब अभ्यास करने लगता हूं तो कहती है भोजन का समय है वि शाम का समय है सुन लिया आपने यह तपस्वी है सुभद्रा यही इसके मोक्ष का मार्ग है इसे टोका ना करो यह मानव इतिहास में सबसे कम आयु वाला महारथी होने वाला है और यह ऐसा युद्ध करेगा सुभद्रा कि भूत भविष्य और वर्तमान तीनों ही से सदैव प्रणाम करते रहेंगे यह आप किस युद्ध की बात कर रहे हैं भैया मैं उस युद्ध की बात कर रहा हूं प्रिय सुभद्रा जो इस युग में सत्य और असत्य प्रकाश और अंधकार के बीच होने वाला अंतिम युद्ध होगा निर्णायक युद्ध होगा जिस युद्ध में कोई निष्पक्ष नहीं रह पाएगा सुभद्रा और तुम अभिमन्यु बनकर इस युद्ध में भाग लोगी और आप सब कुछ आज ही पूछ लो सुभद्र ले जाओ इसे और इसके प्रति अपने कर्तव्य का पालन करो इसके धनुष में अपने आशीर्वाद का बाण लगाओ और अपने आशीर्वाद ही का कवच इसे पहनाओ क्योंकि मैं जिस युद्ध की बात कर रहा हूं सुभ उसका एक पूरा दिन इसके नाम होने वाला है यह युद्ध में विजय तो होगा ना भैया यह ऐसा रण जीतेगा सुभद्र कि संसार के बड़े-बड़े योद्धा बड़े-बड़े महारथी से प्रणाम करेंगे महाभारत महात महाभारत महाभारत [संगीत]

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