की भूख ही एक सच्चे भक्त की भक्ति को और दृढ़ बना देती है और यही हुआ बाल ऋषि पतंजलि के साथ उनकी य भक्ति ना केवल उन्हें ऋषि व्याघ्र पद के निकट ले गई अपितु उन्हें वह स्थान भी मिला जो उनकी तपस्या के लिए सर्वता उपयुक्त था जो बाद में चिदंबरम धाम के रूप में प्रख्यात हुआ राज प्रभु के रहस्यम का काश लिंगम के दर्शन पाते ही बाल ऋषि पतंजलि वहीं प्रभु को आनंद नृत्य में देखने का सौभाग्य पाने के लिए कठोर तपस्या में लीन हो गए और इस प्रकार प्रभु के दो महान भक्त एक और ऋषि पतंजलि और दूसरी और ऋषि व्याघ्र पद एक ही समय पर एक ही पावन धाम चिदंबरम में प्रभु के आनंद नृत्यम को देख पाने की इच्छा से घोर तप करते गए और धीरे-धीरे उनकी भक्ति ऐसी बढ़ी कि व अपने स्थान से डिगे बिना वर्षों तक तपस्या में लीन रहे ओम नताराजा नमः ओ नटराजा [संगीत] नमः ॐ नटराजा नमः फिर जब दोनों की तपस्या चरम पर पहुंची तो प्रभु महादेव ने उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन प्रदान [संगीत] [संगीत] किए [संगीत] ओ नम शिवाय ओ प्रभु प्रभु धा धा धा धन धन धा धा धन धन सामान्य भक्त प्रभु भक्ति में झूमते हैं किंतु य तो प्रभु स्वयं भक्त के लिए आनंद कील में झूम रहे हैं अदभुत है महादेव अपने भक्तों के लिए कुछ भी कर [हंसी] सकते [संगीत] [संगीत] प्रभु आपकी कृपा से हम धन्य हो गए आपके आनंद नित्यम के दर्शन कर हमारा तन मन हमारी आत्मा सभी तृप्त हो गए प्रभु हां प्रभु भाव विभोर हो उठे हम हमारा परम सौभाग्य है कि हमारे जीवन का उद्देश्य पूरा हो गया ऐसा प्रतीत हो रहा है कि हमें मुक्ति प्रदान हो गई यह आप दोनों की भक्ति की शक्ति है मैं आप दोनों की भक्ति और साधना से अत्यंत प्रभावित हूं और आप दोनों आशीर्वाद देता हूं कि मैं जब भी नृत्य करूंगा तो सर्वप्रथम आप दोनों को ही उसका साक्षी बनने का अवसर प्राप्त [संगीत] होगा आज के बाद मेरे प्रत्येक नाट्य नृत्य का आरंभ आप दोनों से ही होगा और मैं आप दोनों को अनुमति देता हूं कि आज के बाद आप दोनों कैलाश में ही रहेंगे इतना ही नहीं मैं आप दोनों को अपना प्रमुख गण नियुक्त करता हूं [संगीत] [संगीत] महेव आप दोनों के ही कारण संपूर्ण सृष्टि को प्रभु के आनंद नृत्य के दर्शन प्राप्त हुए इसीलिए आज से आप दोनों ऋषि ही नहीं महर्षि कहलाएंगे और आप जैसे महान व्यक्तित्व अपनी सच्ची भक्ति और निष्ठा से चितम आएंगे तो उन्हें चिदंबरम मंदिर में प्रभु के दिव्य दर्शन प्राप्त होंगे और इस घटना को चिदंबरम रहस्यम भी कहा जाएगा अर्थात यहां आने वाले प्रत्येक तीर्थ यात्री को प्रभु के दर्शन प्राप्त नहीं होंगे हां चिदंबरम रहस्यम के अनुसार चिदंबरम आकाश लिंगम उन्हें ही दर्शन देंगे जिनके मन हृदय और आत्मा पूर्ण रूप से पवित्र होंगे जिनके चित्त अर्थात जिनकी आत्मा अंबर में समाहित होगी जो दिव्य ज्ञान और भक्ति के आकाश हैं बस जो बेलपत्र माला आकाश लिंगम को समर्पित होगी वही सभी यात्रियों को दिखाई देगी दोनों सिद्ध पुरुषों को तो उनकी भक्ति का फल प्राप्त हो गया था किंतु ऋषि पतंजलि के जीवन का उद्देश्य अभी संपन्न नहीं हुआ था क्योंकि उनके द्वारा अभी संसार को कुछ और भी पाना शेष था बस पतंजलि तुम्हारा जन्म मेरा भक्त बनने के लिए हुआ था मेरे आनंद नृत्यम का साक्षी बनने के लिए हुआ था किंतु तुम्हारे जीवन का एक और भी उद्देश्य है पृथ्वी पर अधिकतम जीव काम क्रोध और अन्य वासनाओं से पीड़ित है योग एक मात्र ऐसा माध्यम है जो शारीरिक ही नहीं मानसिक और भावनात्मक विकारों के कष्ट से मुक्ति दिलाता है योग तो प्राणियों के लिए अमृत के समान है इसलिए मैं तुम्हें एक बड़ा उत्तर दायित्व देता हूं तुम्हें इस योग सूत्र के ज्ञान से समस्त संसार को परिचित करवाना है [संगीत] [संगीत] [संगीत] अब इस ज्ञान का विस्तार समस्त संसार में तुम्हें ही करना है जो आज्ञा [संगीत] [संगीत] प्रभु इस प्रकार यहां चिदंबरम धाम में प्रभु महादेव ने महर्षि पतंजलि को ज्ञान देकर इस स्थान को ज्ञान का प्रतीक बना दिया और ज्ञान तो आकाश के समान अनंत अपार है इसलिए आकाश लिंगम रूप में प्रभु महादेव ने यहां वास करना आरंभ किया किंतु महर्षि पतंजली ने इन योग मुद्राओं का विस्तार कैसे [संगीत] किया भाभी मां तो बिना रुके बिना विश्राम किए अपनी यात्रा पर आगे बढ़ रही है जबकि मैं तो अभी भ्राता से उनके विवाह की बात ही नहीं कर पाया हूं हां गणेश हमें बताओ योग सूत्रों के ज्ञान के विस्तार के लिए महर्षि पतंजलि ने फिर क्या किया इसकी तो एक भिन्न कथा है महर्षि पतंजलि ने योग सूत्रों के ज्ञान के विस्तार के लिए सहस्त्र योग्य शिष्यों का चुनाव किया योग का ज्ञान महर्षि पतंजलि के सहस्त्र शीशों में समाहित था जिसे आंशिक रूप से भी भूले बिना वह उसका विस्तार करना चा थे इसलिए अपने उसी सहस्त्र शीष वाले रूप में उन्होंने प्रभु के इस आदेश के पालन का निर्णय लिया किंतु शिष्यों को अपने विष से सुरक्षित रखने के लिए उन्होंने अपने और उनके बीच एक आवरण कर दिया और सभी शिष्यों को यह आदेश दिया कि वह उस आवरण के उस पार ही रहेंगे वहां से इस पार झांक कर भी नहीं [संगीत] देखेंगे उनका बुद्धिमान शिष्य जो सदा प्रत्येक पाठ में आगे रहता था उसके मन में एक जिज्ञासा प्रबल होने लगी कि उस आवरण के पीछे जो गुरु उसको ज्ञान दे रहे हैं वह कौन है और जो शिष्य सबसे पीछे था उसे लघु शंका का अनुभव हुआ उसे निवृत्त होने जाना था किंतु वो अन्य शिष्यों की ज्ञान प्राप्ति में कोई अवरोध नहीं उत्पन्न करना चाहता था तो वह अनुमति लिए बिना ही वहां से चला [संगीत] गया जहां एक और पीछे बैठा शिष्य वहां से निकल पड़ा वहीं आगे वाले शिष्य से भी अपनी जिज्ञासा को रोक पाना अत्यंत कठिन हो गया और उसने आवरण के पार झांकने का प्रयास [संगीत] किया [संगीत] नहीं नहीं यह तारना सही नहीं जा रही है मुझसे भोजन चाहिए मुझे भोजन दीजिए मिलेगा अवश्य मिलेगा भोजन ही नहीं 56 भोग का आनंद मिलेगा पर इस सत्य को स्वीकार करो अपने जेष्ठ भवान सुरा पद्मन को अपना भगवान मानो अति उत्तम अतिद प्रभु के नाम में 5 के सुगंध नहीं स्वाद भी है अति उत्तम अति [संगीत] स्वाद ओ सुब्रमण्यम कार्तिके स्वामी ओ सुम कार्तिके स्वामी ओ सुब्रमण्यम कार्तिके [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] स्वामी अद्भुत मुझे प्रभु की भक्ति उनके नाम में वो रुचि है वो तृप्ति है जो छपन भोग में भी नहीं उचित कहा जयंत ने प्रभु के नाम से बढ़कर और किसी का कोई आकर्षण नहीं मुझे भोजन का भी नहीं फिर मेरा ध्यान क्यों भटक रहा [संगीत] है ओ सुब्रमण्यम कार्तिके स्वामी नमः ओ सुब्रमण्यम कार्तिके स्वामी नमः सभी पकवान इन दोनों की कोठरी के बाहर रखवा दो मैं भी तो देखू इनकी भक्ति इनको कब तक शक्ति प्रदान करती [संगीत] है [संगीत] ओम सुब्रमण्यम कार्तिके [संगीत] स्वामी नहीं नहीं जयंत के समान मैं भी प्रभु के नाम पर ही स्थिर रहूंगी ओ सुब्रमण्यम कार्तिके स्वामी नमः ओम सुब्रमण्यम कार्तिके [संगीत] स्वामी फिर महर्षि पतंजलि के उस शिष्य का हुआ क्या गणेश इस आवरण के पीछे कौन है यह जानने के लिए वह शिष्य इतना उत्सुक हो गया कि अपनी उत्सुकता वश उसने उस आवरण को हटा [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] दिया ऋषि पतंजलि के विष के प्रभाव के कारण उनके सभी शिष्यों का प्राणा हो गया केवल एक शिष्य जीवित रहता आया शंका के लिए गया [संगीत] था अनर्थ घोर अनर्थ मेरे ही विष से मेरे सभी शिष्यों का अहित हो [संगीत] गया यह क्या हो गया यहां कहीं इसके पीछे मेरी भूल तो नहीं ऋषिवर क्षमा ऋषिवर क्षमा मुझे ज्ञात नहीं था मेरे उठकर जाने से इतना घोर अनर्थ हो जाएगा मैं अपने लघु शता को नियंत्रण में ना रख सका किंतु मेरे कारण कोई व्यवधान उत्पन्न ना हो इसलिए चला गया मैं अब किस मुख से क्षमा याचना करू नहीं ब यहां जो कुछ भी हुआ इसमें तुम्हारा दोष [संगीत] नहीं किंतु भूल तो तुमसे अवश्य हुई कि ज्ञान प्राप्ति के लिए तुम आए तो परंतु तैयारी के साथ नहीं मैं गुरु हूं ज्ञान देना मेरा दायित्व है जो मैं पूर्ण करूंगा तुम्हें ज्ञान [संगीत] दूंगा ज्ञान तो मैंने तुम्हें दे दिया किंतु तुम्हारी भूल के लिए तुम्हें दंडित भी करूंगा क्योंकि गुरु की आज्ञा का पालन ना करना गुरु हत्या के समान ब्रह्म हत्य पदकम है इसलिए मैं तुम्हें श्राप देता हूं जब तक इस ज्ञान प्राप्ति के लिए तुम्हें कोई योग्य शिष्य नहीं मिलेगा तुम एक ब्रह्म राक्षस बनकर एक वृक्ष के ऊपर उल्टे लट के [संगीत] [संगीत] रहोगे यह कथा हमें सिखाती है कि अधिक जिज्ञासा कभी-कभी स्वयं के लिए ही नहीं अन्य सभी के लिए भी हानिकारक सिद्ध होती है और यह भी कि ज्ञान प्राप्ति के मार्ग में गुरु की आज्ञा की अवहेलना इतना बड़ा दोष है कि वह उनके दिए ज्ञान को भी व्यर्थ कर देता है और गुरु हत्या के अपराध के समान होकर व्यक्ति को ब्रह्म राक्षस बना देता है तब तो गणेश उस शिष्य को ब्रह्म राक्षस की अवस्था से मुक्ति इतनी सरलता से नहीं मिली होगी हां भ्राता वो ब्रह्म राक्षस अनेक वर्षों तक योग्य शिष्य की प्रतीक्षा में एक वृक्ष पर लटका रहा और वहां से जो भी जाता उससे एक ही प्रश्न पूछता पचेर निष्ठा किम रूपम अर्थात पच धातु के आगे त जोड़ने से क्या बनता है इसका उत्तर दो अन्यथा मेरा भोजन बनो नहीं हमें ज्ञात नहीं है इस प्रकार सदियां बीती वर्षों की तो कोई गिनती ही नहीं थी किंतु ब्रह्म राक्षस उसी प्रकार वहां लटका रहा पच धातु के आगे ता जोड़ने से क्या बनता है इसका उतर दो अन्यथा मेरा भोजन बनो नहीं हमें ज्ञात नहीं है कोई उसके प्रश्न का उत्तर ना दे [संगीत] सका तब ऋषि पतंजलि से अपने शिष्य का दुख ना देखा गया से मुक्त करने के लिए पुनर्जन्म लिया और नवीन रूप धारण कर वह अपने शिष्य को शाप मुक्त करने उसके निकट जा पहुंचे शिष्य रूप में आए गुरु से भी उस ब्रह्म राक्षस ने वही प्रश्न किया पचेर निष्ठा याम किम रूपम अर्थात पच धातु के आगे त जोड़ने से क्या बनता है इसका उत्तर दो अन्यथा मेरा भोजन बनो पकव पंच धातु में त जोड़ने से पकव बनता है अंततः ब्रह्म राक्षस को व शिष्य प्राप्त हो ही गया जिसकी उसे प्रतीक्षा थी और ऋषि पतंजलि अपने शिष्य रूप में उसी पेड़ के नीचे बैठकर उससे मिलने वाले ज्ञान को पीपल पत्रों पर लिखने लगे और संचित करने [संगीत] लगे ओम नमस्ते देवेश सुरा सुर के उस शिष्य को मुक्ति प्राप्त हुई और वह प्रभु के साथ एकही का हुए ये ज्ञानी शिष्य अन्य कोई नहीं स्वयं चंद्र शर्म थे जो आगे चलकर आदि शंकराचार्य के गुरु गोविंदाचार्य के नाम से विख्यात हुए और शंकराचार्य वही थे जिन्होंने संसार में योग सूत्रों का विस्तार किया और चिदंबरम धाम में प्रभु महादेव के स्फटिक शिवलिंग को स्थापित किया जो चित्त को उजागर करे उस योग शास्त्र का जन्म भी चिदंबरम धाम में ही हुआ गणेश इस परम पावन धाम की सभी दिव्य कथाएं सुनकर अब मैं प्रभु दर्शन के लिए और भी लाला होता जा रहा हूं और अविलंब मंदिर में प्रवेश करना चाहता हूं इसीलिए अब अब चलो [संगीत] आओ नम शिवाय ओम नमः शिवाय नम शिवाय ओम नमः शिवाय ओम नमः शिवाय ओम नमः शिवाय नम श शिवाय नम शनम [संगीत] शवा भी माय भीम पराक्रमा केदारनाथ धाम की इस पावन भूमि में आकर मेरा मन आनंदित हो उठा [संगीत] है प्रभु आपका यह रूप तो अद्भुत [संगीत] है नारियल अब देखना जैसे ही कपूर प्रज्वलित होगा हमारे महत्व को मिटा देगा किंतु इस कपूर में ऐसी क्या विशेषता है शरीर का य कर्पूर गौरा शरीर काय नमः शिवाय च नमः शिवाय मंदार माला कुल कालय कपाल मारा इंद्र कं भराय दिव्यां बराय च दिगंबराय नमः शिवाय नमः शिवाय नमः शिवाय ज नमः [संगीत] शिवाय प्रणाम प्रभु अर्धनारेश्वर [संगीत] प्रणाम पिता श्री प्रणाम माता यह मेरा परम सौभाग्य है मुझे आपके अर्धनारेश्वर रूप के दर्शन प्राप्त हो गए पुत्री तुम्हारी भक्ति और आरती से हम इतने प्रभावित हुए कि हम स्वयं को तुम्हें दर्शन देने से रोक ही नहीं सके किंतु मां कपूर आरती के पहले मुझे नारियल और कदली फल के बीच संवाद सुनाई दे रहे थे वह पूछ रहे थे इस कपूर में ऐसा विशेष है तो क्या है उम कौन अधिक श्रेष्ठ है यह तो मैं भी नहीं समझ सकी य फल श्री फल स्वयं के त्याग के बाद ही मेरा प्रसाद बन पाते हैं पुष्प अपनी सुगंध बिखेर कर हमें प्रसन्न और आनंदित करते हैं किंतु कपूर स्वयं को जलाकर प्रकाश फैलाता है उसका प्रकाश हमसे टकराकर और भी दिव्य हो भक्तों के बीच हमारी दिव्यता का प्रसार करता है एवं उनके भक्ति के भाव को और भी प्रबल बना देता [संगीत] है भक्ति का यही नियम है सर्वोच्च भक्ति वही है जिसमें भक्त स्वयं को अन्य सभी के लिए न्योछावर कर देता है जैसे कपूर ऐसे परस्पर परम भक्ति पति और पत्नी के बीच भी होनी चाहिए कि वह दोनों अपने जीवन को एक दूसरे पर समर्पित कर एक दूसरे में घुल करर एकही का हो जाए और यही हमारे अर्धनारेश्वर रूप का भी मर्म है हमने भी स्वयं को कपूर के भाती एक दूसरे पर न्योछावर कर दिया है कहो पुत्री क्या तुम भी कार्तिके के साथ ऐसे पावन संबंध में बनने के लिए तैयार [संगीत] [प्रशंसा] हो मां मैं तो पिछले जन्म से ही इसके लिए प्रतीक्षा कर रही हूं मुझे ज्ञात है मेरा इस जन्म का उद्देश्य भी यही है बस स्वामी कुमार कार्तिकेय मुझे अपनाने के लिए तैयार हो जाए [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] ओम सुब्रमण्यम कार्तिके स्वामी नमः ओम सुब्रमण्यम कार्तिके स्वामी नमः ओम कार्तिके सुब्रमण्यम [संगीत] स्वामी निरंतर प्रभु के राम में रमा रहूंगा तो तो भूख आभास नहीं होगा ओम सुब्रमण्यम कार्तिके स्वामी मैं भूखी तो हूं किंतु भूख के आगे नहीं प्रभु के सामने झुकना है मुझे ओम सुब्रमण्यम कार्तिके स्वामी नमः ओम कार्तिके सुब्रमण्यम [संगीत] स्वामी चिदंबरम आकाश लिंगम उन्हे ही दर्शन देंगे जिनके मन हदय और आत्मा पूर्ण रूप से पवित्र [संगीत] होंगे ओम नागेंद्रहाराय त्रिलोचनाय भस्मांग रागा महेश्वरा नित्या शुद्ध दिगंबराय तस्म नकारा नमः शिवाय [संगीत] अब स्वयं को रोक पाने में असमर्थ हो रही हूं [संगीत] मैं [प्रशंसा] ओम सुब्रमण्यम कार्तिके स्वामी ओम सुब्रमण्यम कार्तिके स्वामी ओम सुब्रमण्यम कार्तिके स्वामी नमः कुछ तो हो रहा है जो मेरी इच्छा के विरुद्ध ओम कार्तिके सुब्रमण्यम स्वामी ओम सुब्रमण्यम कार्तिके स्वामी [संगीत] नमः क्या हो रहा है वहां जिसका मुझे आभास तो है पर जत [संगीत] नहीं [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] यहां प दुष्ट द्रोही बालक यहां पर [संगीत] कैसे ये दुष्ट यहां कैसे पहुंच गई [संगीत] आश्चर्य तुम यहां इस दु साहस का परिणाम जाने बिना बहुत बड़ी भूल कर दी है तुमने इस भूल का बहुत बड़ा दंड दूंगा मैं तुम्हें पर किंतु ये यहां पर पहुंचा कैसे [संगीत] [संगीत] ज्ञान प्राप्ति के मार्ग में गुरु की अवहेलना ज्ञान प्राप्ति में बाधक ही नहीं बनती अपितु प्राप्त किए हुए ज्ञान को भी व्यर्थ कर देती है
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