महाभारत [संगीत] कृष्ण पुत्र बुआ कृष् [संगीत] बुआ कृष्ण यस य आसू बरसों से रुके हुए थे बरसों से रुके हुए थे अच्छा किया बुआ जो यह पुराने आंसू बहाकर अपनी आंखें रिक्त कर ली क्योंकि अब हम आंसुओं की सीमा में प्रवेश करने वाले हैं यह तुमने क्या कहा आप चिंता ना करें बुआ आपके पांच पुत्र अवश्य सुरक्षित रहेंगे इधर जो भी है वो भी तो मेरे पुत्र ही है देवकी नंदन तो क्या आप दुर्योधन और दु जैसों को लाक्षागृह दुर्घटना दूध क्रीड़ा द्रौपदी वस्त्र हरण पांडवों का वनवास और अज्ञातवास की पीड़ा के लिए क्षमा कर देंगी बुआ प्रश्न यह नहीं है कि कौन पुत्र है और कौन पुत्र नहीं है प्रश्न है धर्म और अधर्म का बुआ मैं पांडवों के पक्ष में इसलिए नहीं हूं कि वे मेरी कुंती बुआ के पुत्र हैं मैं उनके पक्ष में केवल इसलिए हूं कि आज धर्म उन्हीं के पक्ष में है मेरी निष्ठा धर्म के प्रति है मैं धर्म की रक्षा कर रहा हूं इसलिए बुआ आप मुझे यह बताइए कि लौटकर मैं आपके पुत्रों को आपकी ओर से क्या संदेश [संगीत] दूं युधिष्ठिर से कहना कि जिस दिन के लिए क्षत रानिया पुत्र उत्पन्न करती हैं वह दिन आ गया है तो क्या आप मेरे साथ वहां चलना नहीं चाहेंगे नहीं वत्स मेरी कर्म भूमि तो यह हस्तिनापुर है मैं ता श्री भीष्म जेष्ठ श्री और दीदी गंधारी को तो नहीं छोड़ सकती मुझे देखकर इन सबों को यह याद तो रहता होगा कि इन लोगों ने मेरे पुत्रों के साथ कैसे कैसे अन्याय किए हैं मैं केवल इस राज परिवार की कुल वधु ही नहीं हूं बस मैं इन सबका अंतर विवेक भी हूं हे शांति दूध मुझे केवल इतना बता दो कि युद्ध होगा कि नहीं होगा मैं तो केवल शांतिदूत हूं ना बुआ इसलिए युद्ध का निर्णय तो मैं नहीं ले सकता यह निर्णय तो हस्तिनापुर नरेश के हाथ में है यदि उन्होंने न्याय करने का साहस किया तो युद्ध नहीं होगा कदापि नहीं होगा परंतु यदि उन्होंने फिर अन्याय ही करना चाहा तो युद्ध अवश्य होगा और सच पूछिए तो यह निर्णय उनके हाथ में भी नहीं है दुर्योधन के हाथ में है तब तो यह युद्ध होगा देवकी नंदन तब तो यह युद्ध होगा धैर्य से काम लो धैर्य से हमें तो केवल यह देखना है कि पांडवों ने इस मायावी कृष्ण को क्या प्रस्ताव देकर भेजा है वे हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकते मामा श्री आइए आइए वासुदेव प्रणाम मधुसूदन आइए [संगीत] राजिए मुझे सदैव इस बात का दुख रहेगा वासुदेव कि आपने भोजन के लिए मेरे प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया सदैव सदैव बहुत फैला हुआ शब्द है युवराज और फिर मैं तो एक शांतिदूत हूं तो जब तक संधि ना हो जाए आपकी कृपा एं कैसे स्वीकार कर सकता हूं इसलिए हे ज्येष्ठ गांधारी पुत्र आइए पहले हम एक मत तो हो ले हे केशव आपकी यह अभिवृत्ति तो मेरी समझ में बिल्कुल नहीं आ रही वाद विवाद की सफलता या असफलता का अतिथि या अतिथ की मर्यादा से भला क्या संबंध है क्योंकि आपसे तो हमारी कोई लड़ाई है नहीं इसलिए यह बात मेरी समझ में नहीं आ रही वासुदेव कि आप जैसे मर्यादित पुरुष अपने आति का अपमान कैसे कर सकते हैं हे अंगराज मैं किसी भी स्थिति में धर्म को त्याग नहीं सकता कोई किसी के साथ तब भोजन करता है जब आपस में स्नेह हो या फिर वह भूखा हो और मैं मैं भ्राता दुर्योधन का प्रिय भी नहीं हूं और भूखा भी नहीं हूं यह आप कैसे कह सकते हैं क्या आप मुझे प्रिय नहीं है क्योंकि यदि मैं आपको प्रिय रहा होता भ्राता दुर्योधन तो द्वारिका में आप पार्थ से झगड़ पड़े होते कि आपको मेरी नारायणी सेना नहीं यह निहत्था वासुदेव कृष्ण चाहिए परंतु हे मधुसूदन इससे तो कुछ सिद्ध नहीं होता कुंती पुत्र अर्जुन तो आपसे आपको मांग ही चुके थे तो आप तो उनके पहले ही हो चुके थे तो जब मैं पहले ही कुंती पुत्र अर्जुन का हो चुका हूं गंधार नरेश तो युवराज दुर्योधन की कृपा एं कैसे स्वीकार कर सकता हूं जो पांडवों का मित्र नहीं है गंधार नरेश वह मेरा मित्र कदापि नहीं हो सकता क्योंकि धर्म पांडवों के शिबिर में है और जहां धर्म है वहीं मैं हूं और मैं यहां केवल पांडवों का दूध बनकर नहीं आया मैं धर्म दूत भी हूं यदि मैं आपका भोजन करता भ्राता दुर्योधन तो वह धर्म की मर्यादा का उल्लंघन हो जाता क्रोध में ना जेश गांधारी नंदन क्रोध का कवच नम्रता के वाण को रोक नहीं सकता और आज मैं तुमसे यही बात करने आया हूं कि तुमसे मेरी कोई लड़ाई नहीं है इसलिए मेरी बात ध्यान से सुनो शांति का मार्ग प्रगति का मार्ग है उन्नति का मार्ग है और युद्ध का मार्ग सीधा शमशान की ओर जाता है भोजन का समय है वासुदेव मैं आपसे फिर से यही निवेदन करूंगा यदि आप मेरे साथ भोजन करें तो मैं उसे आशीर्वाद समझूंगा तुम यदि सचमुच मुझे भोजन करवाना ही चाहते ना युवराज दुर्योधन तो अब तक मेरा शांति प्रस्ताव मान चुके होते भोजन तो मैं विदुर जी के घर ही करूंगा यह गवाला अपने को समझता क्या है मैं तो इस अपने साथ भोजन करवा के इस ग्वाले को मान ना चाहता था परंतु यह गवाला तो इसी योग्य है उस दासी पुत्र के घर जाकर साग रोटी खाए मामा श्री मैं आपको वचन देता हूं कि यदि कल राजसभा में इसने कोई भी अटपटी बात कही तो मैं इसे उसी समय बंदी बना लूंगा जब बुद्धि विपरीत हो सचमुच काल विनाश लगता है कुरुवंश का नाश नाश बस ना आ भारत महाभारत महाभारत महाभारत हो महाभारत [संगीत]
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