[संगीत] महाभारत प्रणाम संजय इस सूत पुत्र के लिए आदर उचित नहीं महाराज आदर किसी पिता के पुत्र की धरोहर आदर व्यक्ति की पति है और आप मेरे लिए सदैव आदरणीय रहेंगे क्योंकि आप मेरे ज्येष्ठ पिता श्री के सारथी हैं सारथी तो तब रहूंगा ना महाराज जब रत होगा पहले मेरे निकट आसन ग्रहण करें संजय आइए और अब यह बताइए कि जेष्ठ पिताश्री और बड़ी मां कैसी है पता नहीं मेरी आंखों से उनके दर्शनों के आनंद का सावन कब बरसेगा पता नहीं हम इस मृग तृष्णा से कब निकलेंगे ऐसे प्रश्नों के उत्तर तो केवल विधाता के पास होते हैं महाराज परंतु महाराज कुशल से हैं और उन्होंने आपके लिए अपना आशीर्वाद भेजा है मैं कैसा भाग्यवान हूं संजय कि कवाट के सागर के दूसरे तट पर खड़े हुए जेष्ठ पिता श्री के पास अब भी इस अनुज पुत्र के लिए आशीर्वाद है किंतु आपने यह नहीं बताया संजय कि बड़ी मां कैसी है क्या आप अपनी माता श्री के विषय में कुछ नहीं पूछेंगे महाराज उनके विषय में क्या पूछना है संजय वे भरत कुल वधु हैं अवश्य ही सुरक्षित होंगे भरत वंश एक ही भूल दो बार तो नहीं कर सकता पितामह दो बार तो चुप नहीं रह सकते आचार्य द्रोण और कुलगुरु कृपाचार्य दो बार एक ही अपमान को सहन नहीं कर सकते इसलिए हे संजय मैं माता श्री की ओर से बिल्कुल ही चिंतित नहीं हूं हां यह बताओ कि पिता मा कैसे हैं और वह मेरा प्रिय अनुज मूर्ख दुर्योधन कैसा है महाराज हस्तिनापुर में हस्तिनापुर के अतिरिक्त सभी कुशल है वे कुरुवंश में दरार पड़ जाने के कारण बहुत दुखी हैं इस कारण तो हम भी बहुत दुखी हैं किंतु यह तो आप भी जानते हैं कि दुख के इस वृक्ष का बीज हमने नहीं बोया बीज किसी ने बोया हो महाराज किंतु वृक्ष तो सामने खड़ा है उस वृक्ष का नाम दुर्योधन है संजय और हम अवश्य उस वृक्ष को काट गि आएंगे यह तो शांति की भाषा नहीं है मजले भैया और यदि महाराज को शांति नहीं चाहिए तो इन्होंने पांचाल राज पुरोहित को शांति दूत बनाकर क्यों भेजा था वासुदेव ठीक कह रहे हैं अनुज आप हमारे संदेश के उत्तर में क्या संदेश लाए हैं संदेश सुनने से पहले भ्राता श्री इनसे यह तो पूछ लीजिए कि यह संदेश लाय किसका है दुर्योधन दुशासन के पिता धृतराष्ट्र का हस्तिनापुर नरेश धृतराष्ट्र का या फिर हमारे जेष्ठ पिता श्री धृतराष्ट्र का यह तीनों तो एक ही है कुंती पुत्र अर्जुन एक कैसे हैं संजय यह तीनों एक नहीं है और यदि यह तीनों एक ही होते तो पांडवों के ज्येष्ठ पिताश्री और हस्तिनापुर नरेश ने गंधार नरेश को द्यूत में कपट करने से रोक दिया होता जो महापुरुष उस कपटी द्यूत में दुर्योधन की जीत पर प्रसन्न हो रहे थे वह केवल दुर्योधन के पिता श्री धृतराष्ट्र थे जिन्होंने हस्तिनापुर का विभाजन किया वह भी केवल दुर्योधन के पिता श्री धृतराष्ट्र ही थे और जो अपनी कुल वधु द्रौपदी का वस्त्रहरण देखते रह गए वह भी केवल दुर्योधन के पिता श्री ही थे आज हस्तिनापुर के सिंहासन पर कोई राजा तो है ही नहीं उस सिंहासन पर तो एक पिता विराजमान है इसलिए पार्थ का प्रश्न मुझे तो उचित लगता है संजय यह बतलाना आवश्यक है कि आप किसके दूध बनकर आए हैं हे देवकी नंदन मैं कदाचित तीनों ही का दूध हूं और हे गिरिधर मेरी बूढ़ी आंखें सा साने जो कुछ देख रही है वह दृश्य शुभ नहीं है तो हे संजय कृपया पहले यही बताइए कि आपकी अनुभवी आंखें क्या देख रही हैं यह तो केवल एक युद्ध देख रही है मधुसूदन और युद्ध भी कैसा एक और सम्राट युधिष्ठिर के ध्वज और आपके आशीर्वाद की छाया में पांचाल नरेश द्रुपद युवराज दृष्ट दुम उधारी सर्वश्रेष्ठ गदाधर भीम मरा थी नकुल सहदेव महारा थी अभिमन्यु और दूसरी ओर हस्तिनापुर धवले गंगापुत्र भीष्म आचार्य द्रोण कृपाचार्य अश्वथामा और स्वयं दुर्योधन और दुशासन और अंगराज कर्ण जैसे मारथी हे केशव मुझे तो इन दोनों सेनाओं में से कोई भी सेना हारती हुई नहीं दिखाई देती तो क्या यह होगा मधुसूदन कि इच्छा मृत्यु की लकड़ी का सहारा लिए गंगापुत्र भीष्म भरत वंश के शवों के बीच अकेली खड़ी रह जाएंगे आपकी अनुभवी आंखें यही तो धोखा खा गई संजय हे राजदूत संजय जब दो सेनाएं युद्ध करती हैं तो उनमें से एक की पराजय तो निश्चित है परंतु मैं क्या करूं वासुदेव कृष्ण इन दोनों सेनाओं में से पराजय चाहे किसी की हो मेरा हृदय तो अवश्य लह लुहान होगा हे केशव मैंने इन सारे राजकुमारों को अपनी गोदी में खिलाया है इन सबका बालपन देखा है मैं इनके शव देखना नहीं चाहता नहीं किंतु युद्ध की बात कौन कर रहा है संजय हम तो स्वयं ही कोई विकल्प खोज रहे हैं शांति का एक मार्ग अब भी बचा है ज्येष्ठ पिता श्री यदि हमें इंद्र प्रस लौटा दे तो हम और सब कुछ भूल जाने का प्रयास कर सकते हैं बड़े भैया आप अपने बड़े भाई को बीच में टोका नहीं करते प्रिय अनुज यदि हम युद्ध चाहते संजय तो दूध क्यों भेजते तब तुम सेना लेकर आते और हस्तिनापुर के द्वार खट खटाते इसलिए कृपया यह बताइए कि जेष्ठ पिता श्री ने हमारे प्रस्ताव के उत्तर में क्या प्रस्ताव किया है मैं कोई प्रस्ताव लेकर नहीं आया हूं महाराज मैं तो केवल एक आशीर्वाद लेकर आया हूं मेरे महाराज ने कहा है कि आप सब तो धर्मशील हैं जहां है वहीं सुखी रहे तो हे संजय हम उनका आशीर्वाद स्वीकार करते हैं उनसे कहना कि इंद्र प्रस में हमारी आत्मा है और हम वहीं सुखी रहेंगे और हे संजय हस्तिनापुर के ध्वज तले खड़े होने वाले जिन महारथियों के नाम तुमने लिए हैं वे सभी आदरणीय हैं और विराट में अर्जुन से युद्ध भी कर चुके हैं यह हमारा सौभाग्य है कि हमने गंगापुत्र भीष्म आचार्य द्रोण और कुलगुरु कृपाचार्य के युग में जन्म लिया इनके चरण स्पर्श हमारे लिए पूजा है परंतु इसका तात्पर्य यह तो नहीं कि यदि वे अधर्म के धय तले खड़े हो तो हम अधर्म और अन्याय को प्रणाम करके अपने अधिकार छोड़ दे दुर्योधन अनुज है आए प्रणाम करे और कहे कि भ्राता शी मुझे इंद्र प्रस दे दीजिए तो कदाचित मैं उसे इंद्र प्रस भी दे दूं परंतु उससे कहिए कि वह हमें अपने गंगापुत्र भीष्म और आचार्य द्रोण की धमकी देने की भूल ना करे दुर्योधन का अहंकार तभी तक है जब तक वह भीम की गदा के सामने नहीं आता इसलिए हे संजय ज्येष्ठ पिताश्री से ये अवश्य कह देना कि उनके अनुज पुत्र युद्ध और शांति दोनों के लिए तैयार हैं यदि वे युद्ध का आदेश देंगे तो युद्ध होगा और यदि वे शांति चाहेंगे तो शांति रहेगी धर्म तुला में आ पड़ा युद्ध शांति का भार देखे अब क्या होत है युद्ध खड़ा उस पार भूले जब घर के [संगीत] बड़े सत्य शांति का सार धर्मराज का धर्म भी हसे बीच मज धा महाभारत महाभारत महा भार महा [संगीत] भार म [संगीत]
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