[संगीत] [संगीत] महाभारत [संगीत] रुक जा [संगीत] पुत्र हाथ मत लगाओ इन पासों को क्यों माता श्री यह पासे तो मेरे पिता श्री की अंतिम स्मृतियां है जिन्ह देखते ही मेरे स्वर्गीय पिता श्री महाराज सकनी की स्मृतियां मेरे आंखों के सामने साकार हो जाती है हां पुत्र और साथ ही महाविनाश की स्मृतियां भी जो इनको देखकर मन में व्याकुलता और आंखों में अश्रु का रूप धारण कर लेती है नहीं पुत्र नहीं इन पासों में एक वंश एक पीढ़ी की बर्बादी की कहानियां छिपी हुई है नहीं माता श्री यह वो पासे जिनके द्वारा मेरे पिता श्री महाराज शकुनी ने एक साम्राज्य की नीव हिला दी थी अवश्य हिला दी थी पुत्र अवश्य हिला दी थी परंतु नीव के हिलने के कारण जो साम्राज्य धारा शई हुआ था उनके तले तुम्हारे पिता श्री की जीवित समाधि बन चुकी थी आप सत्य कह रही है माता श्री मैं ना तो अपने पिता श्री के वद को भूला हूं और ना ही मैंने उन लोगों को क्षमा किया है जो कि उनके वत का कारण बने थे किंतु आज तो मैं इन पासों को इसलिए लेकर जा रहा हूं क्योंकि मद्र नरेश ने मुझे द्यूत क्रीड़ा के लिए आमंत्रित किया है फिर वही द्यूत क्रीड़ा तुम लोगों की समझ में क्यों नहीं आता कि यह कोई क्रीड़ा नहीं बल्कि एक दुष्ट रोग है जिसने परिवार के परिवार नष्ट कर दिए हैं कोई आवश्यकता नहीं वहां जाने की कैसी बातें कर रही है माता श्री एक क्षत्री के जीवन से यदि द्यूत क्रीड़ा और आखे निकाल दिया जाए तो उसमें रह ही क्या जाएगा मैंने मद्र नरेश का निमंत्रण स्वीकार कर लिया है और माता श्री आप तो जानती ही है कि क्षत्रिय यदि एक बार निमंत्रण स्वीकार कर लेता है तो उससे मुकरना महापाप समझता है नहीं पुत्र स्वयं दत क्रीड़ा ही महापाप जिसने भी इसमें भाग लिया उसे सिवा हार के और कुछ ना मिला धन की हार मन की शांति की हार चरित्र की [संगीत] हार यह पासे हार से परिचित नहीं है माता श्री इन्ह जीतने और लगातार जीतने के लिए बनाया गया था यह मेरे पिता श्री की कला की निपुणता का प्रतीक है आप प्रार्थना कीजिए माते कि इनके मेरे हाथों में आते ही एक बार फिर से पिता श्री का चमत्कार जाग उठे कला इन पासों में नहीं पुत्र तुम्हारे पिता श्री के अपने हाथों में थी वह इन्ह फेंक कर जीत जाने की कला जानते थे परंतु उससे भी क्या हुआ वह द्यूत क्रीड़ा में तो अवश्य जीत गए परंतु अपने जीवन का दाव हार गए सारा कुरुवंश हार गया मैं नहीं हारू माता श्री कुछ भी नहीं हारू मुझे पिता श्री के सिखाए हुए सारे दांव अच्छी तरह याद है पुत्र जो वर्तमान अपने अतीत से नहीं सीखता उसका भविष्य अंधकार में ही होता है और उस वर्तमान को अतीत की भूल दोहराने का दंड अवश्य मिलता [संगीत] है यह पासे गांधार की प्रतिभा की पहचान है माता श्री यह झूठ है विचित यह सरासर छूट है गांधार की प्रतिभा की पहचान य दुष्ट पासे नहीं वरना तुम्हारे पूर्वजों का शौर उनका साहस उनकी दूरदर्शिता है मैं कहतीं दो इन दुष्ट पासों को फेंक दूंगा माता श्री अवश्य फेंक दूंगा किंतु यहां नहीं नरेश की सभा में और जब मैं इन पासों को वहां पर फेंकू तो देखने वाले इसके चमत्कार से अवाक रह जाएंगे तुम अकारण चिंतित होती हो पुत्र आप निश्चिंत रहिए माता श्री मैं अपने पिता श्री की कला का मान खटने नहीं दूंगा महाभारत महाभारत महाभारत महाभारत हो महाभारत
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