[संगीत] महाभारत महाराज धृतराष्ट्र पधार रहे [प्रशंसा] हैं आइए महाराज आइए आइए महाराज प्रणाम महाराज आइए राज आइ आइए महाराज धीरे य संभल के गुरु परिवार की इस बैठक में भाग लेने का मैं अधिकारी नहीं हूं इसलिए यदि महाराज आज्ञा दे तो मैं चला जाऊं य अतिथि सत्कार की कुरु परंपराओं का अपमान होगा गंधार नरेश विराज जो आज्ञा ता श्री विराज विराज जी क्या सब लोग आ गए ताजी जी महाराज मैंने आप सब लोगों को यहां आने का कष्ट इसलिए दिया है कि मैं एक धर्म संकट में हूं और मुझे आप सबकी सहायता की आवश्यकता है धर्म संकट क्या है महाराज धर्म संकट यह है ता श्री हस्तिनापुर के पास आज दो युवराज हो गए हैं और यह तो स्पष्ट है कि किसी भी राज्य के पास दो युवराज नहीं हो सकते युवराज युधिष्ठिर के आने के उपरांत तो निर्णय यही लेना चाहिए महाराज कि राजकुमार दुर्योधन व स्थान रिक्त कर दे इस समस्या का कोई और समाधान तो हो ही नहीं सकता [संगीत] महाराज मेरे इस प्रस्ताव का यह अर्थ नहीं है कि मैंने दुर्योधन का पक्ष लेना छोड़ दिया है व दुर्योधन में तो मेरे प्राण बसे हैं मैंने तो सदैव यही चाहा है कि व पहले युवराज और फिर महाराज बने किंतु आज यह सोच हस्तिनापुर के हित में नहीं और फिर मैं यह कैसे भूल सकता हूं कि मेरी बहन गांधारी आज हस्तिनापुर की पटरानी है इसलिए हस्तिनापुर का हित मेरी बहन का हित है आगे आप लोगों की जैसी इच्छा यह समस्या इतनी सहज नहीं है गंधार नरेश कि इतनी सरलता से इसका समाधान मिल जाए तो क्या आप ये नहीं मानते विदुल कि राजकुमार युधिष्ठिर युवराज है युवराज तो युधिष्ठिर ही है द्रोणाचार्य जी परंतु हमें यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि पांडवों के देहांत का समाचार मिलने के पश्चात हम सभी ने इसी कक्ष में बैठकर निर्णय लिया था कि दुर्योधन को युवराज बना दिया जाए और मेरा दुर्योधन भी इस विषय में आप लोगों के पास कोई प्रार्थना पत्र लेकर नहीं आया था कम से कम मुझे तो याद नहीं क्यों विदुर जी राज पदों के विषय में प्रार्थना पत्रों के आधार पर निर्णय लिए भी नहीं जाते गंधार नरेश वैसे मैं उस सभा में सम्मिलित भी नहीं था यदि होते तो क्या करते कदाचित मैं यह प्रस्ताव रखता कि यह निर्णय लेने में इतनी शीघ्रता दिखला की कोई आवश्यकता नहीं क्योंकि ये पहले ही सिद्ध हो चुका है कि दुर्योधन इस योग्य ही नहीं अब यह प्रश्न क्यों उठा रहे हो विद क्योंकि जो कुछ हो चुका है उसे हम अन हुआ तो नहीं कर सकते राजनीति का यह अध्याय फिर से पढ़ो विदुर राष्ट्रीय महत्व की किसी सूचना पर केवल तुम्हारा अधिकार नहीं हो सकता तुमने हमसे कौन सी सूचना छुपाई है विदुर आपसे नहीं महाराज आपसे नहीं मुझसे परंतु अब इस सूचना पर विचार करने से कोई लाभ नहीं होने वाला क्योंकि स्वयं विदुर जैसा विद्वान भी काल के प्र को पीछे तो नहीं ला सकता इसलिए हमें वर्तमान का सामना करना चाहिए यह तो हम घूम फिर करर फिर उसी बिंदु पर आ गए कि हस्तिनापुर अपने दो युवराज में से किसे पद पर से हटाए और किसे पद पर रहने दे आपके विचार में हस्तिनापुर को अब क्या करना चाहिए कुलगुरु आप जिसे भी इस पद से हटाएंगे उसके साथ अन्याय करेंगे महाराज परंतु मैं तो अन्याय करना ही नहीं चाहता आचार्य द्रोण जी महाराज आपके विचार में मुझे क्या करना चाहिए आचार्य द्रोण को इस धर्म संकट में क्यों डाल रहे हैं महाराज बृहस्पति शिष्य जेष्ठ गुरु गंगापुत्र भीष्म परही यह निर्णय क्यों ना छोड़ दिया जाए यही ठीक रहेगा क्योंकि ताश पर तो कोई पक्षपात का आरोप लगा ही नहीं सकता क्यों विदुर जी महाराज परंतु कहीं लोग यह ना कहने लगे कि स्वयं महाराज को जो निर्णय लेना चाहिए था वह उन्होंने तारी पर टाल दिया हम सब तो आपके सहयोगी हैं महाराज और निर्णय लेना निर्णय लेना तो आपका कर्तव्य है असाधारण परिस्थिति में नहीं और यह भी ना भूलो विदुर हस्तिनापुर के राज सिंहासन पर सबसे पहला अधिकार ता श्री ता श्री हमें इस संकट से निकलने का मार्ग दर्शन करें न्याय की मांग यही है महाराज कि किसी के साथ अन्याय ना हो इसलिए आज बड़े दुखित हृदय से हस्तिनापुर के विभाजन का प्रस्ताव रख रहा वास्तव में राजनीति जब भी ठोकर खाएगी महाराज तो उसका दंड तो देश को भुगतना ही पड़ेगा ना हस्तिनापुर राज्य को को आप दोनों युव राजों में आधा आधा बांट दीजिए महाराज और मुझे आज्ञा दीजिए कि मस्त नापुर के इस दुर्भाग्य पर एक अंत में रो [संगीत] सकू आभ महाभारत महाभारत महाभारत हो महाभारत
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