[संगीत] महाभारत आज मुझे कहते हुए बड़ी प्रसन्नता हो रही है कि महाराज कुछ ही क्षणों में हस्तिनापुर को उसका युवराज देने वाले हैं महाराज त राष्ट्र की जय महाराज त राष्ट्र की जय महाराज राष्ट्र की जय महाराज की की तुम्हारा हदय क्या कह रहा है मेरे तो दोनों ही [संगीत] पुत्र इस शुभ अवसर पर ऐसे कोई अपराध क्या होगा दीदी क्या बात है विदुर चार बंदी लाए गए हैं महाराज अपराध महाराज को इनका अपराध बताया जाए महाराज की जय हो इन चार बंदियों ने मिलकर एक व्यक्ति की हत्या कर दी है महाराज अपराधी क्या कहते हैं अपराधी अपना अपराध स्वीकार करते हैं महाराज तब तो फिर क्षमा चाहता हूं महाराज तुम कुछ कहना चाहते हो विदुर यदि आप आज्ञा दे तो आज्ञा है आज तो महाराज दोनों जेष्ठ राजकुमारों में से किसी एक को युवराज नियुक्त करने जा ही रहे हैं तो आज इन्हीं को न्याय करने का अवसर प्रदान किया जाए महाराज कि पूरा जन समुदाय राजकुमारों की योग्यता भी देख ले दस श्री मैं विदुर से सहमत हूं महाराज परंतु गंधार कुमार का विचार जान लेना भी उचित होगा क्षमा चाहता हूं ता श्री य हस्तिनापुर की समस्या है और यह कुरु राज्यसभा है गंधार कुमार शकुनी भी हस्तिनापुर ही की हो चुके हैं विर मैं फिर क्षमा चाहता हूं ता श्री परंतु हो जाने में और होने में बहुत अंतर है मैं तो हस्तिनापुर का हूं ना काका श्री तो फिर न्याय करने का पहला अवसर मुझे दिया जाए क्योंकि मैं महाराज का जेष्ठ पुत्र हूं इस नाते से तो नहीं परंतु तुम युधिष्ठिर के अनुज हो इसलिए पहला अवसर तुम्हें ही मिलना चाहिए राजकुमार दुर्योधन को न्याय करने का आदेश दिया जाता है पिता श्री हस्तिनापुर नरेश की जय कुंती दीदी तुम्हारे विचार से इन चारों बंदियों को क्या दंड मिलना चाहिए इसमें विचार करने की क्या आवश्यकता है महाराज शताब्दियों से हमारे यहां परंपरा चली आ रही है कि हत्या करने वाले को मृत्यु दंड दिया जाता है इसलिए मैं इन चारों अपराधियों को इनके अपराध के लिए मृत्यु दंड देता हूं जीते रहो भाचे राजकुमार दुर्योधन की राजकुमार दुर्योधन की राजकुमार दुर्योधन [प्रशंसा] [संगीत] की तो विदुर आदेश दिया जाता है कि इन चारों अपराधियों को क्षमा चाहता हूं अब क्या आपने जेष्ठ कुंती पुत्र युधिष्ठिर को न्याय करने का अवसर प्रदान नहीं किया महाराज परंतु न्याय तो हो चुका है विदुर फिर भी महाराज न्याय करने का अवसर तो मिलना ही चाहिए क्या पता राजकुमार युधिष्ठिर राजकुमार दुर्योधन के न्याय से सहमत हो ना हो इसमें सहमत या अस सहमत होने का प्रश्न ही नहीं है यदि राजकुमार युधिष्ठिर सहमत ना हो तो व स्वयं ऐसा कहेंगे महाराज तो यही सही वत्स युधिष्ठिर को आज्ञा दी जाती है कि अब वह न्याय करें जेष्ठ पिता श्री हस्तिनापुर नरेश की जय हो क्या तुम अपने अनुज दुर्योधन के न्याय से संतुष्ट हो व सब कुछ जाने बिना मैं महाराज को इस प्रश्न का उत्तर नहीं दे सकता इसमें जानना क्या है वत्स दंड देने से पहले मैं अपराधियों का वर्ण और जाति जानना चाहता हूं न्याय का जातियों से क्या लेने देना यदि यह आवश्यक ना होता तो मैं यह प्रश्न ही ना उठाता अपराधी अपनी अपनी जाति बताएं मैं शूद्र हूं महाराज मैं वैश्य हूं महाराज मैं क्षत्रिय हूं महाराज महाराज मैं ब्राह्मण हूं [प्रशंसा] न्याय के नियमों के अनुसार शूद्र अपराधी को चार वर्ष कारागृह में बिताने का दंड दिया जाता है वैश को आठ वर्ष कार्या ग्रह में बिताने का दंड दिया जाता है और क्षत्रिय को 16 वर्ष परंतु ब्राह्मण अपराधी को मृत्यु दंड दिया नहीं जा सकता इसलिए कुल गुरु कृपाचार्य ही इसके दंड का निर्णय करें अति सुंदर क्या न्याय है अपराध एक और दंड चार अपराध एक नहीं है मामा श्री शूद्र का अपराध एक अज्ञानी का अपराध है इसलिए केवल चार वर्ष परंतु वैश्य अपराधी उतना अज्ञानी नहीं है इसलिए उसका दंड दना हो गया और क्षत्रिय जो समाज का रक्षक है यदि वही हत्या का अपराधी हो तो उसका दंड वैश्य की अपेक्षा दना होगा ब्राह्मण तो ज्ञानी है उसने जानते बुझते मनुष्य की हत्या की है उसका अपराध सबसे भयंकर है मैं अपने अपराध के लिए स्वेच्छा अगनि प्रवेश का आदेश चाहता हूं महाराज इसका निर्णय तो कुलगुरु कृपाचार्य ही ले सकते हैं किंतु तुम्हारे न्याय की तुला में असमानता है व सबको एक ही तुला में तोलना न्याय नहीं अन्याय है मामा श्री युवराज की युवराज युधिष्ठिर की युवराज युधिष्ठिर की युवराज युधिष्ठिर की युवराज युधिष्ठिर की युवराज युधिष्ठिर की नय तो हो चुका है अब मैं महाराज से य प्रार्थना करता हूं व य घोषित कर दे कि वो युवराज किससे नियुक्त करना चाहते हैं मैं ता श्री से यह प्रार्थना करता हूं कि वह शंख बजाकर जेष्ठ पांडु पुत्र युधिष्ठिर को युवराज बनाने की घोषणा कर [संगीत] [प्रशंसा] द विजय हुई फिर न्याय की हटा मोह का पाश सत्य मेव जयते बना अंतिम सत्य प्रकाश अंतिम सत्य प्रकाश आओ बस आओ आ प्रणाम जेष्ठ पिता श्री [संगीत] महाभारत महाभारत महाभारत महाभारत हो महा भार
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