Wednesday, 7 January 2026

हस्तिनापुर के लिए शकुनि की रणनीति क्या थी Mahabharat Best Scene B R Chopra Pen Bhakti

[संगीत] [संगीत] महाभारत ममो श्री माथे पर अब यह चिंता की लकीर क्यों और क्या अब तो हमारी छाती से पांडवों का पंचशूल भी निकल गया हां किंतु इस पंचशूल में लिपटकर हस्तिनापुर का आधा राज भी तो हमारे हाथ से निकल गया ना यह अच्छा तो मुझे भी नहीं लगा ममा श्री परंतु मैं करता क्या पिता श्री की निष्ठा बीच से कटी हुई है वो मेरे तो है ही परंतु दुख की बात तो यह है कि वह पांडवों के भी हैं छोटी मां के सामने आ जाते ही वो कुछ कह नहीं पाते इसलिए उस आधे राज्य को जाने दीजिए मामा श्री सारी पृथ्वी जो पड़ी है और मैं मैं इस राज्य की सीमाएं स्वयं बढ़ा सकता हूं इसमें तो मुझे संदेह ही नहीं है दुर्योधन परंतु हस्तिनापुर राज्य का एक टुकड़ा तो हाथ से निकल ही गया ना और जब तक यह एक टुकड़ा फिर से हस्तिनापुर में नहीं मिल जाएगा मेरे हृदय में कांटा खटकता [संगीत] रहेगा इस समस्या पर विचार करना आरंभ कर दो भांजो मामा श्री अभी तो भ्राता युधिष्ठिर का राज अभिषेक भी नहीं हुआ और और आपने अपनी व्यू की रेखाएं खींचना भी आरंभ कर दिया यदि कल का कार्य आज हो जाए तो कल का दिवस विश्राम का दिवस हो जाएगा [संगीत] दुशासन कसो मत विचार करो विचार यदुवंशियों को वश में करना अति आवश्यक है यदुवंशी यह बीच में कहां से आ गए द्वारिका से आए पुत्र द्वारिका से वासुदेव कृष्ण तो नहीं फसे क्योंकि स्वयं वह भी तो एक बड़ा खिलाड़ी है परंतु बलराम उन्हें राम करो पुत्रों उन्हें उत्तम भोजन खिलाओ और सोम पान कराओ और उनके चरणों को कस के दोनों हाथों से पकड़ लो कस के चरण मुझे तो आपके और पिता श्री के चरणों को भी हाथ लगाने में कष्ट होता है मामा श्री मैं जानता हूं बलराम ना तुम्हारे पिता हैं और ना तुम्हारे मामा अरे हम लोगों के चरणों को तू हाथ लगाए चाहे ना लगाए हम लोगों के आशीर्वाद तो सदैव तुम्हारे हैं बालपन की सीमाएं पार करके बड़े हो जाओ दुर्योधन यहां सभी को किसी ना किसी का चरण चुंबन करना ही पड़ता है यदि जीवन में सफल होना चाहते हो तो किसी का चरण पकड़ना सीखो और जो तुमसे यह नहीं हो सकता तो मैं चला गंधार अरे मामा श्री आज तक कभी ऐसा हुआ है कि आपने जो भी कहा हो मैंने उसे मानने में आनाकानी की हो बलराम तो फिर बलराम ही सही शाबाश बच्चों यह क्या है कृष्ण द्वारिका से सुभद्रा ने संदेश भेजा है दाऊ क्या लिखा है कुछ नहीं सब कुशल मंगल है युवराज आपके दर्शनों के लिए पधारे हैं युधिष्ठिर जी आए हैं द मैं उन्ह लेकर आता हूं सेवक तो युवराज दुर्योधन के आने की सूचना लेकर आया था याद आया अब युवराज वही है क्योंकि ज्येष्ठ पांडु पुत्र तो अब खांडव प्रस्त नरेश कहे जाएंगे बुलाओ जो आज्ञा परंतु दाऊ क्या दुर्योधन केवल आपके दर्शन के अभिलाषी है मैं किसी गिनती में नहीं क्या तुम्हारी गिनती में होने का अर्थ यह है कि मुझसे कोई मिलने आ ही नहीं सकता लोग तो बड़ों से ही मिलने आते हैं ना छोटों से मिला थोड़ी उन्हें तो बस आशीर्वाद ही दिया जा सकता है निसंदेह दाऊ निसंदेह प्रणाम दाऊ प्रणाम प्रणाम आओ यहां बैठो मेरे निकट कृष्ण से परिचय है कि नहीं कहां दाऊ इनसे परिचय का सौभाग्य तो आज प्राप्त हो रहा है और मिलता भी कैसे दाऊ यह तो अपने प्रिय भाइयों के स्वागत और उनके आ जाने के आनंद में लीन रहे होंगे प्रणाम ता दुर्योधन मेरा भी प्रणाम प्रणाम मैं भी आपसे मिलने के लिए बहुत उत्सुक था वासुदेव जब यह समाचार मिला कि छोटी मां के संग तुम भी आ रहे हो तो सोचा कि तुमसे जी भर के बंसी सुनेंगे अर्थात अपना ही जी भरने की सोची भ्राता दुर्योधन परंतु वह बंसी तो मैं नंदगांव छोड़ आया हूं तब तो आपने नंदगांव से बाहर रहने वालों के साथ बहुत अन्याय किया वासुदेव क्यों दाऊ हां भाई इसकी बातें तो यही जाने कब किसे पकड़ ले कब किसे छोड़ दे इसका तो कोई ठिकाना ही नहीं बड़ा निर्मोही है यह परंतु दाऊ आपको तो कभी नहीं छोड़ा ना मैं छोड़ने दूंगा तब ना छोड़ोगे चलिए दाऊ आपको हस्तिनापुर भ्रमण करा दूं हमारी नगरी द्वारिका जैसी तो नहीं है फिर भी देखने योग्य अवश्य है हां दाऊ अवश्य जाइए तुम नहीं चलोगे क्या नहीं दाऊ मैं तनिक भर के लिए पहले विदुर जी के घर जाऊंगा फिर द्रोणाचार्य जी और पितामह भीष्म के दर्शन करूंगा यही वे लोग हैं युवराज जिनके यहां होने के कारण आपके हस्तिनापुर आदरणीय है अच्छा तो ठीक है तुम इन लोगों से मिलाओ मैं तो जा रहा हूं लीजिए दाऊ चलिए दाऊ चलो प्रिय दुर्योधन आभार महाभारत महाभारत हो महाभारत

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