Monday, 5 January 2026

श्री कृष्ण का विदुर और द्रोणाचार्य से संवाद Mahabharat Best Scene B R Chopra Pen Bhakti

[संगीत] महाभारत वाह सरसों का ऐसा स्वादिष्ट साग तो मैंने कभी खाया ही नहीं था और फिर यह मकई की रोटी काके श्री यह सब खाकर मैं धन्य हो गया सुन रही हो तुम्हारे पकाए सा को खाकर कौन धन्य हो रहा है सच कह रहा हूं काका श्री राज भवन के पकवान खा खाकर मन उब गया था अब कभी हस्तिनापुर आना हुआ तो आप ही का अतिथि बनूंगा तब तो इस घर के भाग ही खुलेंगे वासुदेव अपना यह वचन भूल तो नहीं जाइएगा इन्हें भूलना ही तो नहीं आता [संगीत] भाग्यवान अधिपति तीनों लोक के खाए विदुर घर साथ स्वाद भरा था प्रेम का साग बना अनुराग साग बना अनुराग एक प्रश्न करू वासुदेव क्यों नहीं अवश्य पूछिए प्रश्नों के उत्तर देने के लिए ही तो मैं यहां आया हूं कांपल से द्वारिका के मार्ग में में हस्तिनापुर तो नहीं आता या आता है आज के भारतवर्ष का कोई मार्ग हस्तिनापुर से कतरा के जा ही नहीं सकता विदुर जी और आप स्वयं इस रहस्य को जानते हैं जो हो रहा है उसे होने दीजिए और जो होने वाला है उसकी प्रतीक्षा कीजिए मेरे हस्तिनापुर के यह कैसे बुरे दिन चल रहे हैं वासुदेव यदि ऐसा ना होता तो क्या युधिष्ठिर जैसे योग्य कुमार को यूं घर निकाला मिलता दिन तो शुभ या अशुभ होते ही नहीं काकी श्री शुभ या अशुभ होते हैं कर्म केवल कर्म यदि नियम यह है वासुदेव तो फिर युधिष्ठिर को उसके शुभ कर्मों का दंड क्यों भगत पड़ रहा है परंतु आप इसे दंड मानते ही क्यों है आचार्य क्या किसी नए नगर के निर्माण का अवसर मिल दुर्भाग्य है क्या राजकुमार दुर्योधन इस दायित्व की कसौटी पर आपके विचार में खरे उतर सकते थे और यदि नहीं तो फिर जो हो रहा है वही होना भी चाहिए राजकुमार युधिष्ठिर अपने अनुज को लेकर प्रगति के पथ पर अपनी यात्रा आरंभ करने वाले हैं परंतु दुर्योधन तो विवश है वे यह यात्रा नहीं कर सकते ऐसा क्यों ऐसा इसलिए आचार्य कि दुर्योधन अपने आप में कुछ है ही नहीं वे महाराज तराश के वृक्ष की केवल एक टहनी है और वृक्ष धरती के टुकड़ों से अपनी जड़ों द्वारा बंधे हुए होते हैं ना तो वह आगे जा सकते हैं ना ही पीछे हट सकते हैं वे केवल टूटकर गिर सकते हैं आचार्य या फिर परिस्थितियों की अग्नि का बनाए जाने के लिए काटे जा सकते हैं वासुदेव आचार्य यदि प्रश्न करना ही हो तो उसके उत्तर से घबराना नहीं चाहिए आप तो स्वयं ही अपने आप से जूझ रहे हैं आचार्य क्योंकि दुर्योधन भी आप ही हैं और अर्जुन भी आप ही परंतु आप अपना यह वाक्य सदैव याद रखने का प्रयत्न कीजिएगा आचार्य कि अर्जुन वो नर है जो नारायण के दर्शन करवाएगा महाभारत महाभारत महाभारत महाभारत हो महाभारत

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