[संगीत] महा फिर भी मेरे हाथ में आई ई विजय तो मेरे हाथ से निकल गई ना मित्र मैं धर्म क्षेत्र कुरुक्षेत्र में नैतिकता के बाल की खाल निकालने नहीं आया हूं मित्र मैं य एक युद्ध जीतने आया हूं और युद्ध में विजय से बड़ा धन तो और कोई हो ही नहीं सकता और यह भी ना भूलो मित्र कि मैंने पितामह और गुरु द्रोण की निष्ठा पर कभी भरोसा नहीं किया किंतु तुम मैं आयु में गंगापुत्र भीष्म और आचार्य द्रोण से बहुत छोटा हूं मित्र दुर्योधन इसलिए मैं व सब बातें सहन नहीं कर सकता जो उन लोगों ने सहन कर ली दुशासन हत्या का दुख मुझे तुमसे कम नहीं है आज तक तुम भी पांडवों में से किसी का कुछ नहीं बिगाड़ पाए हो किंतु तुमने कभी अपने प्रति अपनी निष्ठा पर तो संदेह नहीं किया मैंने तुम्हारी निष्ठा पर कभी संदेह प्रकट नहीं किया मित्र इसी बात का तो दुख है कि तुम कदाचित यह जानते नहीं परंतु तुमने मेरी निष्ठा पर संदेह प्रकट कि कि यदि ऐसा नहीं है तो तुम बारबार सूर्योदय पर क्यों ला रहे हो क् उन्होंने अस्थ होकर तुम्हारे हाथों से अर्जुन का शव छीन लिया क्या तुम नहीं जानते मित्र कि मैं कितने तरा में हूं जानता हूं भली भाति जानता हूं मित्र किंतु तुम यह नहीं जानते कि मैं कितने दबाव में हूं पर तुम घबराओ मत मैं कल फिर युद्ध करूंगा और कल का युद्ध इतिहास सदैव याद रखेगा मित्र मैं तुम्हारे तुनीर का एक वाण हूं और जब भी चलूंगा तुम्हारे लक्ष्य की ओर ही चलूंगा तुम अपने अपमान को बारबार बीच में ना लाओ द्रोपति यह युद्ध तुम्हारे अपमान से बहुत बड़ा है इस पीड़ा को समझने का प्रयत्न करो कि हम इस रणभूमि में अपने पूर्वजों का लहू आर हैं तुम इसे अपने केशों के स्वाभिमान की रक्षा के लिए होने वाला युद्ध समझने की भूल ना करो पंचाली तुम्हारे केश अति सुंदर हैं बहुत बड़े हैं किंतु ना वोह हस्तिनापुर से अधिक सुंदर है और ना ही वो हस्तिनापुर से बड़े हैं पांचाली इसलिए अपने इन केशों में लगे हुए दुशासन के लहू को धो डालो रक्त धमनी में अच्छा लगता है धमनी से निकलकर वह शरणार्थी हो जाता है असाय अनाथ तो क्या मेरे अपमान का कोई अर्थ नहीं [संगीत] धनुर है प्रिय द्रौपदी है किंतु उतना नहीं जितना तुम समझ रही हो तुम द्रौपदी हो प्रे तुम हस्तिनापुर नहीं हो और यह कहकर मैं तुम्हारा महत्व कम नहीं कर रहा हूं मैं तो तुम्हें यह समझाने का प्रयत्न कर रहा हूं कि हस्तिनापुर एक सागर है और तुम उस सागर की एक बूंद तुम्हारे बिना वह सागर अधूरा है प्रिय और यही तुम्हारा महत्व है अपने अपमान को बीच में लाकर तुम अपना मूल्य कम ना करो अर्थात तुम कर्ण वद नहीं करोगे यह तुमसे किस ने कह दिया हस्तिनापुर की सुरक्षा के लिए कण वद आवश्यक है तुम केवल द्रौपदी ना बनी रहो प्रिय तुम हस्तिनापुर के स्वाभिमान का प्रतीक हो अपमान तुम्हारा नहीं हुआ था अपमान हुआ था हस्तिनापुर का मुझे तुम्हें दिया हुआ वचन याद है प्रिय वो सूत पुत करण कल का सूर्यास्त नहीं देखेगा महाभारत महाभारत महाभारत महाभारत महाभारत
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