महा [संगीत] भारत रथ रोकी अंगराज आइए अंगराज आप लोग यही प्रतीक्षा कीजिए आपको आश्चर्य तो अवश्य हो रहा होगा क यह देवकी पुत्र आपको कहां ले आया आपके स्थान पर यदि कोई और होता तो अवश्य आश्चर्य करता आप तो किसी के आश्चर्य की सीमा में समा ही नहीं सकते वासुदेव हे राधे आप एक उत्तम व्यक्ति हैं सत चरित्र आपने जिसे धर्म माना कभी उस धर्म का उल्लंघन नहीं किया तो फिर आप दुर्योधन जैसे अधर्मी के शिविर में क्या कर रहे हैं आप तो धर्म की एक एक परत का ज्ञान रखते हैं अंगराज आप तो यह सोच नहीं सकते कि दुर्योधन का मार्ग धर्म का मार्ग है सत्य का मार्ग है परंतु मेरे और दुर्योधन के संबंध का आधार ना धर्म है केशव और ना ही अधर्म इस संबंध का आधार स्नेह है वह मेरा मित्र है वह मेरा कृष्ण तो नहीं किंतु मैं उसका सुदामा अवश्य हूं क्षत्रियों के समाज ने मुझे केवल इसलिए नहीं स्वीकार किया ना कि मैं एक सूत पुत्र हूं परंतु दुर्योधन एक अकेला क्षत्रिय है जिसने कभी भी मेरे और उसके बीच इस विशेषण की दूरी नहीं रखी आज से बर्सों पहले जब हस्तिनापुर क्षत्रिय समाज के सामने द्रोणाचार्य और कृपाचार्य जैसे गुरु श्रेष्ठ मेरा अपमान कर रहे थे तो केवल दुर्योधन मेरी सहायता के लिए उठा उसने मुझे अंग का राजा बनाकर मुझे यह अधिकार दिलवाया कि मैं उस स्वाभिमानी कुंती पुत्र अर्जुन को ललकार सकू और य कारण है देवकी नंदन कि जब कभी उसका मुझे कोई दोष दिखाई देने लगता है तो मैं अपनी आंखें मूंद लेता हूं इस संसार में केवल दो ही ऐसे प्राणी है जिनसे मैं प्रेम करता हूं दुर्योधन और व देवी जिसने मुझे जन्म तो नहीं दिया परंतु वह मेरे लिए उस माता से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है जिसने मुझे जन्मत दिया परंतु जन् देते ही त्याग भी दिया मैं दुखी होता हूं तो इन्हीं दोनों को दुखी देखकर और सुखी भी होता हूं तो इन्ही दोनों को सुखी देखकर मेरे पास ना अपना कोई सुख है और ना ही कोई दुख मुझे स्वयं अपने जीवन से कोई लगाव नहीं किंतु मैं जब तक जीवित हूं मेरे हृदय में इन दोनों के अतिरिक्त किसी और के लिए कोई स्थान नहीं बन सकता यह ठीक है अंगराज कि कृतज्ञता का ऋण उतारना सहज नहीं सबसे भारी ऋण यही होता है परंतु फिर भी यदि बात सत्य और असत्य धर्म और अधर्म प्रकाश और अंधकार के बीच आन फसे तो क्या असत्य अधर्म और अंधकार का पक्ष लेकर भी यह ऋण उतारना उचित है क्या ऐसा ऋण उतारने से ऋणी ही रह जाना उचित नहीं है अंगराज यह तो मुझे ऋण लेते समय ही कह देना चाहिए था ना वासुदेव परंतु एक बार ऋणी हो गया तो ऋण झुकाने में आनाकानी नहीं करनी चाहिए परिणाम जो भी हो हां यह भी एक दृष्टिकोण हो सकता है परंतु आप यह क्यों नहीं सोचते अंगराज कि दुर्योधन उस क्रीड़ा में लज्जित हो चुका था और वह अपने लिए अर्जुन का एक प्रतिद्वंदी मोल लेना चाह रहा था ऐसा तो नहीं कि उसने अंग देश देकर आपको मोल ले लिया हो हे वासुदेव यदि उसने मुझे मोल भी ले लिया हो तब भी अपने को बेजा तो स्वयं मैं नहीं था ना कभी आप अपने जन्म अपनी पहचान के विषय में सोचते हैं क यदि सोचू भी तो मिलेगा क्या अर्थात आप नहीं जानते कि आप कौन है जानता तो नहीं किंतु अनुमान लगा सकता हूं मेरी माता अवश्य किसी आदरणीय परिवार की पुत्री होंगी कदाचित कोई राजकुमारी जिनका भवन गंगा तट पर होगा जभी तो मेरे जन्म लेते ही मुझे सहजता से गंगा में बहा दिया और मैं यह भी अनुमान लगा सकता हूं कि मेरी माता को अपने पुत्र से कहीं अधिक अपना यश प्रिय था उन्होंने अपने पुत्र को त्याग दिया और अपनी प्रतिष्ठा को संभाल के रख लिया और अपनी माता को खोजने के लिए आपका हृदय भी नहीं मचला जिस माता ने मुझे त्याग दिया हो उसे खोजकर मैं करूंगा क्या उसे पाकर भी मैं क्या करूंगा वासुदेव और संभवत मेरे जन्म के उपरांत किसी आदरणीय कुल में किसी महाराजा किसी दिग्विजय से उनका विवाह भी हो गया हो और अब वह ऐसे पुत्रों की माता हूं जिन्ह त्यागने की आवश्यकता ही ना पड़ी हो परंतु हे कृष्ण मुझे इस बात का दुख नहीं कि मैंने अपनी माता की ममता का स्वाद नहीं चखा मेरी माता का नाम राधा है वासुदेव और मैं उन्हीं के नाम से जाना जाता हूं राध किंतु आप अचानक मेरे अतीत की समाधि की ओर क्यों निकल गए मैं तो उधर कभी जाता ही नहीं वर्तमान की बात कीजिए वासुदेव वर्तमान की आपने ठीक ही अनुमान लगाया अंगराज आपकी माता एक बहुत आदरणीय परिवार की पुत्री हैं इसलिए जब आपका जन्म हुआ तो समाज की परिनिंदा से वे डर [संगीत] गई आज वे कई पुत्रों की माता हैं परंतु उनके हृदय में एक सन्नाटा है राधे उनका हृदय एक िक स्थान है एक रिक्त स्थान वे दिन रात अपने उस पुत्र के विषय में सोचती रहती है जो कवच कुंडल पहने हुए जन्मा था क्या आप यह कहना चाहते हैं कि मैं मैं सूद पुत्र नहीं हूं क्या आप यह कहना चाहते हैं कि मैं क्षत्र [संगीत] हूं क्या मेरा यह अनुमान भी ठीक है कि आप मेरी माता को जानते हैं हे वासुदेव क्या मेरी माता जीवित है क्या मैं उनके दर्शन कर सकता हूं मुझसे मेरा परिचय करवाइए वासुदेव मुझसे मेरा परिचय करवाइए [संगीत] हे दानवीर हे [संगीत] महारथी क्या आप को सहन कर पाएंगे सत्य का घाव अपमान के घाव से तो गहरा नहीं होता ना वासुदेव आपकी माता आपके अतिरिक्त पांच और महारथियों की माता हैं और वह पांचों महारथी ऐसे योद्धा हैं जिन्होंने आज तक पराजय का स्वाद नहीं चखा पांच [संगीत] मारती [संगीत] पांच आप कहीं कहीं पांडवों की बात तो नहीं कर रहे उनके अतिरिक्त ऐसे और कौन पांच योद्धा है कर्ण जिन्होंने पराजय का स्वाद ना चखा हो हां कुंती पुत्र हां मैं पांडवों की ही बात कर रहा हूं मेरी बुआ कुंती आपकी माता है और आप पांडवों के ज्येष्ठ भ्राता हैं और मेरे पिता मेरे पिता कौन है वासुदेव आपके यही इष्टदेव आपके पिता मैं सूर्य पुत्र हूं हां मेरे दुर्भाग्य की सीमाओं को क्या आप माप सकते हैं वासुदेव मैं सूर्य पुत्र करण राधे के नाम से जाना चाहता हूं मैं कुंती पुत्र करण राध के नाम से जाना चाहता हूं मैं कुलीन युधिष्ठिर शक्तिशाली भीम शूरवीर अर्जुन सुंदर नकुल और बुद्धिमान सहदेव का जेष्ठ भ्राता करण राधे के नाम से जाना जाता हूं सारा संसार मुझे सूत पुत्र कहता रहा और मैं सुनता रहा सुनता रहा मैं तनिक सोच वासुदेव तनिक सोचिए तनिक मेरी पीड़ा समझने का प्रयत्न कीजिए और इसका उपचार बताइए हे देवकी नंदन आप तो यह सब कुछ पहले से जानते रहे होंगे ना तो फिर आपने मुझे बताया क्यों नहीं बताया क्यों नहीं वासुदेव बताया क्यों नहीं और आज मुझे क्यों बता रहे हैं आप मैं तो पांडवों के लिए अपनी घृणा की पुंजी लिए जी रहा था और अपने को धनी समझ रहा था मैं धनी समझ रहा था आपने मुझे आपने मुझे यह सब कुछ बताकर मेरा मानसिक संतुलन क्यों बिगाड़ दिया मुझसे मेरी घृणा छीनकर मुझे निहत था क्यों कर दिया क्यों आपने ऐसा क्यों किया अब अब मैं अपने वाण की दिशा अर्जुन की ओर कैसे कर पाऊंगा हे मधुसूदन आपने ने तो मुझे युद्ध के आरंभ से पहले ही हरा दिया आपने ऐसा क्यों किया मधुसूदन क्यों किया हे मेरे प्रिय भ्राता कुंती पुत्र कर्ण मैंने ऐसा इसलिए किया कि मैं यह नहीं चाहता कि ज्येष्ठ पांडु पुत्र अपने अनुज के विरुद्ध युद्ध करें आप बुआ कुंती के विवाह के पहले जन्म ले चुके थे इसलिए नियमानुसार आप बुआ कुंती के पति महाराज पांडु के ज्येष्ठ पुत्र हैं आप ज्येष्ठ पांडव है कर्ण आप ज्येष्ठ पांडव [संगीत] हैं मेरे साथ चलिए कर्ण इंद्र प्रस्थ राज का मुकुट आपके सिर पर होगा आपके अनुज आपका चरण स्पर्श करेंगे सर्वश्रेष्ठ गदाधर भीम आपके सिर पर छत्र की छाया रखेंगे अर्जुन आपका सारथी होगा और स्वयं मैं नकुल और सहदेव के संग आपके रथ के पीछे चलेंगे स्वयं मैं कण हे प्रिय पांडव पुत्र धर्म पालन में आप युधिष्ठिर जैसे हैं धनुर धरी में आप अर्जुन जैसे हैं सौंदर्य में आप नकल जैसे हैं और योद्धा की शालीनता में आप सहदेव जैसे हैं मुझे तो आश्चर्य हो रहा है कि अब तक यह सब किसी ने देखा क्यों नहीं कि अब तक ने आपको पहचाना क्यों नहीं मेरे साथ चलिए अंगराज मेरे साथ चलिए मैं सारे संसार को आपके चरणों में डाल दूंगा सारे संसार को और इससे ऊपर यह कि आपको पांच भाई मिल जाएंगे और आपको अपनी माता मिल [संगीत] जाएगी आप जो कुछ कह रहे हैं वो सब ठीक है परंतु मैं दुर्योधन का ऋणी हूं आपने उस ऋण के विषय में तो कुछ कहा ही नहीं मैं आपके लिए भी अपने आप से झूठ नहीं बोल सकता केशव नहीं बोल सकता मैं जानता हूं कि पांडव तो आपकी कृपा के सुरक्षा छत्र के नीचे हैं मैं क्या युद्ध में तो उन्हें कोई भी नहीं हरा सकता और मैं यह भी जानता हूं केशव कि कौरव सेना की पराजय निश्चित है फिर भी फिर भी मैं दुर्योधन ही के ध्वज तले युद्ध करूंगा दुर्योधन के लिए मेरा आत्मविश्वास पराजय स्वीकार करने को भी तैयार है हे मधुसूदन अब जब यह जान लेने के बाद कि अर्जुन मेरा अनुज है मैं उसकी ओर उसके प्राण लेने वाले वाण तो नहीं भेज सकता ना फिर भी मैं युद्ध करूंगा अर्जुन से युद्ध करूंगा आप तो यह अच्छी तरह जानते थे ना कि मैं दुर्योधन की मित्रता को कभी नहीं त्याग फिर भी आपने मुझसे मेरे जन्म का रहस्य बताकर अर्जुन के प्राणों की रक्षा कर ली हे केशव यदि आपने ऐसा ना किया होता तो अच्छा होता तो अब आप मुझे एक वचन दीजिए कि मेरे वीर गदी को प्राप्त होने तक आप मेरे अनुज को यह नहीं बताएंगे यदि युधिष्ठिर को पता चल गया कि मैं उसका जेष्ठ भ्राता हूं तो वह अपने सिर पर मुकुट रखना कभी स्वीकार नहीं करेगा और राजा बनने योग्य तो मेरा अनुज युधिष्ठिर है यदि उसने मुझे यह मुकुट दे दिया तो मैं अंग देश के मुकुट का ऋण उतारने के लिए अपने मित्र दुर्योधन के सिर पर यह मुकुट रख दूंगा और यह उस मुकुट से बड़ा अन्याय होगा बड़ा अन्याय हे मधुसूदन अब हमारी भेंट रणभूमि में ही होगी तब तक के लिए मुझे आज्ञा दीजिए प्रणाम पश्चिम से सूरज युगे दिन बन जाए रात किंतु कभी ना मित्र से कण करेगा घात कण करेगा [संगीत] घात मार महाभारत महाभारत महाभारत हो महाभारत
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