महाभारत छ एक दो तीन चार पाच छ यह लीजिए महाराज आपकी गोटी मेरी समझ में नहीं आता कंक कि जब तुम चौसर में निपुण हो और महाराज युधिष्ठिर के साथ चौसर खेला करते थे तो गंधार नरेश से हार कैसे गए युद्ध ही की भाति द्यूत में हार जीत का कोई व्याकरण नहीं होता महाराज कभी-कभी उत्तम श्रेणी का खिलाड़ी भी हार जाता है परंतु मैंने तो सुना था कि गंधार नरेश ने कपट किया यदि उन्होंने कपट भी किया तो भी इंद्रप्रस्त नरेश तो हार ही गए और यदि उन्होंने कपट किया तो जेष्ठ कुरुवंश गंगापुत्र भीष्म ने उन्हें टोकना उचित नहीं समझा आचार्य द्रोण और कृपाचार्य भी मौनी रहे और स्वयं ज्येष्ठ पांडव पुत्र युधिष्ठिर ने भी यह प्रश्न नहीं उठाया इसलिए वहां जो कुछ हुआ उसे आप पांडवों के लिए छोड़ दीजिए महाराज आप पासे फें किए चलिए महाराज महाराज की जय हो कहो त्रिगत देश के सु शर्मा अपनी सेना लेकर आए और चरवाहों की हत्या करके पशु चर से अपनी गैया हका ले गए एक की चक के ना होने से सु शर्मा का इतना साहस हो गया कि अब वो ये समझने लगा कि मस देश में छत्री नहीं बसते हमारा रत तैयार किया जाए जो आज्ञा महाराज यदि आपकी आज्ञा हो तो मैं कुछ निवेदन करूं आज्ञा है मैंने भी एक ऋषि से धनुर विद्या सीखी है महाराज यदि आपकी आज्ञा हो तो मैं भी साथ चलूं अवश्य चलो कंक और हां महाराज आपका रसोया बल्लभ भी शस्त्र प्रयोग में निपुण है और अरिष नेमी तथा गंत भी उत्तम सैनिक हैं यदि इन तीनों को भी रथ मिल जाए तो महाराज की विजय निश्चित है यह क्या कह रहे हो कंक चरवा भला युद्ध कैसे कर सकता है या घुड़साल में रहने वाला घोड़ों की सेवा करने वाला योद्धा कैसे हो सकता है मैं ठीक कह रहा हूं महाराज स्वयं जेष्ठ कुंती पुत्र भी इन तीनों को सदैव अपने साथ रखते थे तो ठीक है हम भी तीनों को रखत देंगे चलो [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [संगीत] a [संगीत] [प्रशंसा] आम [प्रशंसा] [प्रशंसा] एक [संगीत] [संगीत] आ [प्रशंसा] [संगीत] बल्ल जाओ और त्रिगत नरेश को बंदी बना लो [प्रशंसा] [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] रुक जाओ अपने अपने शस्त्र नीचे रख दो नहीं तो तुम्हारे रेश का शी धर से अलग कर दूंगा महाराज की जय हो यह रहा आपका अपराधी मेरा प्रस्ताव यह है महाराज कि इसे क्षमा कर दें क्योंकि क्षमा सबसे उत्तम धर्म है क्या सम्रत युधिष्ठिर से क्षमा कर देते कंक उनकी ना पूछिए महाराज वह तो अपने अतिरिक्त सबको क्षमा करते रहते हैं जाओ तुम्हारा अपराध क्षमा करने योग्य तो नहीं था परंतु कं के अभिस्ता पर हम तुम्हें क्षमा करते हैं जाओ त्रिगत नरेश जाओ एक अश्व अभी विराट नगर की ओर प्रस्थान करें और चिंतित नगर वासियों को हमारी विजय का शुभ समाचार सुनाए हम सेना सहित यही विश्राम करेंगे महाभारत महाभारत महाभारत हो महाभारत [संगीत]
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