[संगीत] महाभारत सदा सुखी रहो द्रौपदी जेश गुरुवर गंगापुत्र भीष्म पितामह से आशीर्वाद ले दो सदा सौभाग्यवती रहो कुल गुरु कृपाचार्य जी से आशीर्वाद लो द्रोपदी अखंड सौभाग्यवती भव आओ आओ प्रणाम गुरुवर द्रोपदी से तो आपका दोहराना है यदि पुत्री मानि तब भी आपके आशीर्वाद की अधि कानी और पुत्र वधु मानि तब भी नहीं भाग्य मेरे वश में है पुत्री और ना ही सौभाग्य मेरे पास तो शस्त्रों और अस्त्रों के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है जो शस्त्र या अस्त्र चाहो ले लो नाना गुरुवर शस्त्र अस्त्र रहने दीजिए यह युद्ध करने थोड़ी आई है प्रणाम छोटी मां युग युग जियो मेरा प्रिय पुत्र दुर्योधन कहां है वे व्यस्त है अच्छा अच्छा चलो तुम ही उसकी ओर से अपनी भाभी का स्वागत कर लो प्रणाम द्रोपदी यह तुम्हारा देवर दुशासन है मुझे ठीक से देख लीजिए भाभी [हंसी] [संगीत] श्री आइए वासुदेव कृष्ण क्या आपके आशीर्वाद पर मेरा कोई अधिकार नहीं पिता मा मेरे पास तुम्हारे योग्य कोई आशीर्वाद है ही नहीं वासुदेव यह तो कंजूसी हुई पिता मा यदि बूंद समुद्र को कुछ देने की चेष्टा करे तो क्या यह छोटा मुह बड़ी बात नहीं हो जाएगी गिरधर वाद विवाद में किसी ब्राह्मण से जीतना सहज का नहीं है कृपाचार्य जी तो ठीक है आशीर्वाद लिए बिना ही चलते हैं चलिए दाऊ आप भी चले चलिए जब इन लोगों ने मुझे आशीर्वाद नहीं दिया तो आपको भी नहीं देंगे [संगीत] पधारिए प्रणाम आचार्य व [संगीत] प्रणाम कुलगुरु चक्रवर्ती भवा प्रणाम पितामह आयुष्मान भ प्रणाम पितामह आयुमान भव प्रणाम प्रणाम बलशाली रहो प्रणाम पिता म आयुष मन भव दिग्विजय [संगीत] भावा चिरंजीवी रहो गले नहीं लगोगे पुत्र मेरे वस्त्रों पर तो यात्रा की धूल है पिता मा आपके श्वेत वस्त्र मैले हो जाएंगे मेरे य श्वेत वस्त्र तो सदई ही तुम्हारे वस्त्रों की धूल के लिए व्याकुल रहते हैं पुत्र पिता मा पिता मा [संगीत] [संगीत] धन्य हस्तिनापुर हुआ धन्य राज ग्रह द्वार दीप आरती के जले हो स्वागत सत्कार हो स्वागत सत्कार राज लक्ष्मी नव वधु मंगल द्वारा चार पांडु सुतो संग द्रौपदी सबने की [संगीत] स्वीकार सबने की स्वीकार [संगीत] माता श्री वोह आ [संगीत] गए प्रणाम दीदी प्रणाम बड़ी मां अपनी छोटी मां और जेठानी द्रौपदी का स्वागत करो अपने ही घर में दीदी स्वागत की क्या आवश्यकता है आवश्यकता है कुंती आवश्यकता है वारणा वत की दुर्घटना के पश्चात मुझे ऐसा लगा था कि जैसे सारी हस्तिनापुर नगरी उजड़ गई हो पर अब जब तुम मेरे प्रिय पांडवों को लेकर आई हो तो शुभ ग मन पर हसनापुर में एक नया जीवन आ गया है इस नवीन जीवन का अभिनंदन है कुंती जैसी आपकी इच्छा दीदी तुम नहीं थी तो दुर्योधन के विवाह पर भी मेरा मन भटकता ही रहा कि तुम होती तो मेरे स्थान पर सारी देखभाल करती और मैं अनुभव करती कि जैसे सब कुछ स्वयं मैं ही कर रही हूं कुंती यह तुम्हारी पुत्र वधु काशी की राजकुमारी [संगीत] है युग युग जीयो सुखी रहो जीवन और सुहाग का आनंद भोग दीदी अपनी पुत्र वधु द्रौपदी से मिलिए सौभाग्यवती भव तुम्हारी गोद बच्चों से और मांग सिंदूर से भरी रहे चलो द्रोपदी अब जेश पिता श्री का भी आशीर्वाद ले लो आइए दीदी [संगीत] अपनी कुल वधु द्रौपदी का प्रणाम स्वीकार कीजिए सौभाग्यवती भा नेत्र हीनता का दुख आज सदैव से अधिक है पुत्री यदि आंखें होती तो आज मैं तुम्हें अपनी ओर से भी देखता और अनुज पांडु की ओर से भी तुम्हारे शुभागमन ने मुझे मेरे अनुज पुत्रों से मिलवाया है इसलिए मैं तुम्हारा ऋणी भी हूं और आभारी भी कहां है मेरे प्रिय अनुज पुत्र यदि मैं उन्हें देख सकता तो स्वयं उनके पास चलकर जाता और उन्हें अपनी छाती से लगा लेता हम तो आपके चरणों में है दता श्री चक्रवर्ती तुम लोग ना मेरे उस दुख का अनुभव कर सकते हो जो तुम्हें खोकर हुआ था और ना ही उस सुख का जो तुम्हें फिर पाकर हुआ है मैं तुम लोगों से लज्जित हू परंतु हो सके तो द्रौपदी के शुभागमन पर अपने इस नेत्रहीन तात और नेत्रहीन राजा को क्षमा कर दो ये आप क्या कह रहे ता श्री दुर्घटनाएं तो जीवन का अंश है उनके लिए तो आप उत्तरदाई नहीं हो सकते सुखी रहो सदैव सुखी रहो क्या आप मुझे इनसे मिलने का अवसर भी देंगे कि नहीं आर [हंसी] पुत्र नेत्रहीनों में सबसे बड़ा दोष यही होता है गांधारी कि यदि वो किसी वस्तु या व्यक्ति को जब पकड़ लेते हैं तो उसे छोड़ना ही नहीं चाहते क्या पता वो फिर कभी हाथ में आए या ना आए आंखों वाले तो दूरी नाप सकते हैं ना परंतु हम जैसों की वास्तविकता तो यही है ना कि जो हाथ में है बस वही है और इसके अतिरिक्त कुछ है ही नहीं जाओ पुत्री अपनी बड़ी मां के पास जाओ [संगीत] कुंती तनक अपनी आंखों से मुझे मेरी पुत्रवधू का मुखड़ा तो दिखलाओ रंग तो अग्नि जैसा है दीदी तब तो पूजनीय है और आंखें बड़ी बड़ी कमल जैसी अरे तुम पुत्र वधु लाई हो या पूजा की थाली [संगीत] भगवान तुम्हारे भाग्य के सारे दुख मुझे दे दे और मेरे भाग्य के सारे सुख तुम्हें अपने लिए कुछ नहीं बचाया आपने अनुज वधु यह कौन बोला था मेरे भ्राता वासुदेव का पुत्र कृष्ण हम लोगों के साथ आपको प्रणाम करने चलाया था आप तो मुझे भूल ही गई है बुआ कृष्ण जेष्ठ भ्राता बलराम भी आपको प्रणाम करने आया है महाराज और कोई आपको भूल भी जाए दाऊ परंतु मैं तो भूल ही नहीं सकता आप भूलने देते ही नहीं अपने अनुज पुत्र को मेरे पास लाओ कुंती आप यह ना भूलिए बुआ कि अनुष पुत्र तो मैं भी हूं संभवतः महारानी जी ने ज्येष्ठ पुत्र को अपने पास लाने का आदेश दिया होगा अच्छा दोनों को ही ले आओ आओ कृष्ण प्रणाम [संगीत] महाराज तुम दोनों में से गध कौन है गिरिधर तो मेरा अनुज ही है महारानी तो तुम इतने रूठे हुए से क्यों लग रहे हो पुत क्योंकि यह इनके भोजन का समय है महारानी जी मेरे भीम को भी भोजन में बड़ी रुचि है देख लिया हम लोग इतने बर्सों के पश्चात आए हैं पर बड़ी मां मुझे बिल्कुल नहीं भूली बड़ी मां आपके भोजन को नहीं भूली अजले भैया जी बड़ी मां मैंने तुम्हारे लिए अलग से खीर बनवाई है तभी मैं कहूं दौ कि आपके हृदय में भीमसेन के लिए इतना स्नेह क्यों है महाभारत महाभारत महा भारर महाभारत हो महा भार
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