महाभारत अपि चे दसी पापे सर्वे पाप कृतम सर्वम ज्ञान पलवे नव वनम संतर तो तुम भी ज्ञान की नौका में बैठकर पाप के सागर को पार कर जाओ यह समझ लो पार्थ कि जैसे अग्नि सब कुछ जलाकर भस्म कर देती है वैसे ही ज्ञान की अग्नि कर्म फल की फल की प्राप्ति ना होने पर आने वाले क्रोध और उस क्रोध के सहारे आगे बढ़ने वाले मोह को जलाकर भस्म कर देती है हे पार्थ इस मंत्र को सदैव याद रखो कि संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाली ही कोई वस्तु है और ना ही कोई तत्व ज्ञान ही सर्वोत्तम है अञ श्रद्धा न संश आत्मा विनश्यति नायम लोको न पर संया मन जो अज्ञानी हैं जिनमें श्रद्धा भाव नहीं है जो बात बात पर शंका करते हैं संशय युक्त हैं वे तो नष्ट हो ही जाते हैं और उन्हें ना इस लोक में सुख मिलता है और ना ही परलोक में इसलिए हे भारत संशय को त्यागो और तुम्हारे भीतर जो मुनि बैठा है उसे जगाओ ज्ञान योगी बनो पार्थ जन योगी बनो और समझ लो कि ज्ञान की चरम सीमा ही कर्म सन्यास है आप कर्म सन्यास और कर्म योग दोनों ही की प्रशंसा कैसे कर सकते हैं केशव यह दोनों एक दूसरे को काटते नहीं बंधु और कल्याणकारी तो यह दोनों ही हैं किंतु इन दोनों में श्रेष्ठ है कर्म योग वह क्यों और व कैसे जो द्वेष और आकांक्षा से ऊपर उठकर कर्म करता है वो तो नित्य सन्यासी है ही और वह द्वों से रहित होकर सांसारिक बंधनों से मुक्त हो जाता है इसलिए जो कर्म सन्यास को कर्म योग से अलग समझता है वह तो मूर्ख है ही ज्ञानी ऐसा कभी नहीं समझते कर्म त्याग तो वास्तव में निहित स्वार्थ के त्याग का नाम है पार्थ इसलिए कर्म योग के बिना कर्म सन्यास की प्राप्ति हो ही नहीं सकती कर्मयोगी को तत्वों का ज्ञान होता है और उसका देखना न देखना सुनना ना सुनना चखना न चखना जागना न जागना लेना न लेना छोड़ना न छोड़ना और उसका हर कर्म लोक कल्याण के लिए होता है और इसीलिए वह पाप से बिल्कुल वैसे ही अलग रहता है जैसे कमल जल में रहकर भी जल से अलग रहता है ब्रह्मण य कर्माणि संगम तवा करोति लिप नस पापन पद्म पत्र इ वाम बसा हे धनंजय कर्म योगी कर्म फल को त्याग कर परम शक्ति को प्राप्त होता है और नौ द्वारों वाले शरीर रूपी घर में सुखी रहता है शरीर में यह नौ द्वार कहां से आ गए महाराज वासुदेव कृष्ण दो आंखों दो करणों दो [संगीत] नथनल्लूर ध्यान गया ही नहीं था संजय यदि मनुष्य ने सोचना छोड़ ना दिया होता महाराज तो वासुदेव कृष्ण को बताने की आवश्यकता ही क्यों होती नौ द्वार वाले इस घर से अब आगे चलो संजय वासुदेव कह रहे हैं मनुष्य के भ्रमित होने का कारण यह है पार्थ कि उसका अज्ञान उसके ज्ञान को ढक देता है और जब आत्म ज्ञान अज्ञान को नष्ट कर देता है तो ज्ञान उस परम तत्व को सूर्य की भांति प्रकाशित कर देता है और ज्ञानी इस नश्वर जीवन ही में परम सत्य को प्राप्त कर लेते हैं उन्हें जन्म पर जन्म नहीं लेना पड़ता वह इसी नश्वर जीवन में मोक्ष को प्राप्त कर लेते हैं तो हे यह नश्वर जीवन बहुत ही महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसके उपरांत तुम्हारा आत्मा तो अवश्य होगा किंतु तुम नहीं होगे तो इस नश्वर जीवन काल को अर्थपूर्ण और समाज के लिए कल्याणकारी बनाओ पार्थ ज्ञान प्रकाश है तो इस प्रकाश को प्राप्त करो और यदि तुमने ऐसा कर लिया तो इन भ्रमों में भटकने से बच जाओगे जिनमें आज भटक रहे हो और यदि भटकने से बच जाओगे पार्थ तो तुम्हें शांति मिलेगी हे धनंजय शांति का सीधा मार्ग मैं हूं जो मुझे हर यज्ञ का लक्ष्य हर लोक का स्वामी और हर प्राणी का हिताशी मानते हैं वही शांति पाते हैं यदि तुम मुझे अपना हिताशी समझते हो पार्थ तो मेरा कहा मानो और युद्ध करो क्योंकि यह युद्ध किए बिना तुम्हें शांति नहीं मिल सकती अपने धर्म से भागने का मार्ग शांति की प्राप्ति का मार्ग नहीं है पार्थ यह युद्ध तुम्हारा धर्म है तो अपने इस धर्म का पालन करो पार्थ और उसके परिणाम के विषय में ना सोचो कौन मरेगा या कौन जिएगा यह तुम्हारी समस्या नहीं है हे पांडव लोग जिसे सन्यास कहते हैं उसे तुम योग मानो और संशय द्वेष और आकांक्षा से मुक्त होकर युद्ध करो क्योंकि इन्हें त्यागे बिना तो कोई योगी हो ही नहीं सकता उ धरे आत्माना आत्मानम ना आत्मानम अवसाद आत्म वत मनो बंधु आत्म वरि परात्मन मनुष्य का यह कर्तव्य है कि वह अपना पतन न होने दे और स्वयं ही अपना उद्धार करे मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र भी है और अपना शत्रु भी जिसने अपने अहम अपने मन और अपनी इंद्रियों को अपने वश में कर लिया हो वह स्वयं ही अपना मित्र है और जो इनके वश में हो गया पार्थ वह स्वयं ही अपना शत्रु है जो शीत काल और ग्रीष्म काल सुख और दुख मान और अपमान में शांत रहे और संतुलन रखे वो जितेंद्रिय पुरुष सदैव परमात्मा में लीन रहता है किंतु हे पार्थ बहुत खाने वाले या बिल्कुल ही ना खाने वाले या अधिक सोने वाले या बिल्कुल ही ना सोने वाले को यह योग सिद्ध नहीं होता जीवन संतुलन का नाम है पार्थ और संतुलित ढंग से जीने वाले मनुष्य का योग उसके दुखों को हर लेता है जैसे वायु रहित स्थान पर दीपक की ज्योति निश्चल रहती है वैसे ही मोह रहित योगी भी निश्चल रहता है चंचल मन को मनमानी ना करने दो पार्थ उसे रोको और उसे अपने आत्मा का अधीन बनाओ तुम्हारी उलझनों का यही उपचार है मेरी ओर देखो पार्थ मेरी ओर देखो जिसे हर दिशा और हर वस्तु में केवल मैं ही दिखाई दूं वह तो कभी भटक ही नहीं सकता जो मुझे नहीं भूलता पार्थ मैं भी उसे नहीं भूलता वो तो सांसारिक जीवन व्यतीत करते हुए भी संसार से अलग और मेरे भीतर रहता है हे अर्जुन जो योगी सबके सुख दुख को अपना सुख दुख माने वही परम श्रेष्ठ है महाभारत महाभारत महाभारत [संगीत] महाभारत महा भार
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