Thursday, 1 January 2026

महादेव ने पुत्री मनसा को कैलाश पर लाये Ishita Malkhan Vighnaharta Ganesh Ep 789 Pen Bhakti

[संगीत] तो तुम यहां पहुंच ही गए ना [संगीत] होश बहुत ढूंढा तुम्हें ना होश किंतु अच्छा हुआ कि तुम स्वयं ही यहां चले आए अब आ ही गए हो तो अशोक सुंदरी को यह ज्ञात हो जाएगा कि उसके लिए अधिक योग्य कौन है तुम या मैं जो भी घटनाए घटित होंगी उन घटनाओं में ही हमारे जीवन का उद्देश्य नित है [संगीत] हो नूश के तुनी के तो सभी बांड समाप्त हो गए यह अंतिम बाण ही शेष है अब तुम्हारे नाश का समय आ गया [संगीत] है [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [संगीत] स्मरण करो क्या कहा था मैंने तुम्हें उनका दंड मैं नहीं मेरे पति नश देंगे वही तुम्हारा वध [संगीत] करेंगे [संगीत] और हुंड की मृत्यु के बाद पुत्री अशोक सुंदरी और नहुष का शुभ विवाह हुआ विवाह के उपरांत नहुष और पुत्री अशोक सुंदरी की अनेको प्रतापी संताने हुई हु को प्रजा पति राजा की पृथ्वी प्राप्त हुई पुत्री अशोक सुंदरी चारों ओर प्रसन्नता का विस्तार करने का अपना धर्म निभाती रही जिसकी सभी पूजा करने लगे और जिसे देवी का स्थान प्राप्त हुआ अपने भ्राता का प्रणाम स्वीकार कीजिए दीदी माता हां पुत्र मुझे ज्ञात है कि अभी तुम्हारी जिज्ञासा शांत नहीं हुई अब तुम अपनी बहन ज्योति के बारे में जानना चाहते हो ज्योति का जन्म तो एक अन्य दिव्य घटना से संबंधित है व दिव्य घटना थी कार्तिकेय का जन्म भ्राता का जन्म तो पिता श्री के असीम तेज से हुआ था ना हां पुत्र और उसी ऊर्जा के एक अंश से पुत्री ज्योति का जन्म [संगीत] [प्रशंसा] हुआ प्रभु की उस असीम ज्योति से उत्पन्न होने के कारण इसका नाम ज्योति पड़ा पुत्र सभी भक्त अपने ईष्ट देव की पूजा दीपक प्रज्वलित करके करते हैं भक्तों के इसी प्रेम और इसी श्रद्धा के कारण पुत्री ज्योति को देवी स्थान प्राप्त हुआ प्रिय पुत्र ज्योति देवी नहीं उससे कहीं अधिक [संगीत] [प्रशंसा] है वह कैसे पिताश्री देवी ज्योति तो परम सत्य की परम शक्ति का प्रतिनिधित्व करती है जो हमारी बुद्धि और ज्ञान को जागृत करती है जब भी कोई दीपक प्रज्वलित होता तो ज्योति ही प्रकाशित होती है ज्योति भक्त और भगवान के संबंध का माध्यम बनती है क्योंकि ज्योति को प्रणाम करने के बाद ही भक्त भगवान की पूजा करते हैं ज्योति तो व जागृत कुंडलिनी शक्ति है जो अजना चक्र में वास करती है और ध्यान करते समय प्रकाश बिंदु के रूप में जिसका अनुभव होता है ज्योति अरूप रहकर उन सभी मंदिरों में पूजी जाती है जहां पुत्र कार्तिके की पूजा होती [संगीत] [संगीत] है दीदी ज्योति आपके इस अद्भुत रूप के दर्शन कर हम धन्य हुए [संगीत] किंतु अभी तो एक और का था शेष है ना माता तो अब बताने की कृपा कीजिए कि मंसा दीदी का जन्म कैसे हुआ पुत्री मंसा की कथा भी बहुत रोचक है क्योंकि उसका संबंध तो उस हलाहल से है जो समुद्र मंथन से उत्पन्न हुआ था समुद्र मंथन हलाहल विष मैं अपनी जिज्ञासा को रोक नहीं पा रहा हूं माता कृपया विस्तार से बताइए ना पुत्र सर्व ज्ञात है सागर मंथन से संसार को 14 दुर्लभ रत्न प्राप्त हुए किंतु यह रत्न इतनी सरलता से प्राप्त नहीं हुए उन्हें प्राप्त करने से पहले संसार को मंथन से एक भयंकर संकट का सामना करना पड़ा जो अपने प्रभाव से संपूर्ण सृष्टि को लील जाने वाला था वो था हलाहल नमय हलाहल विष जिसे स्वयं पिता श्री ने अपने कंठ में धारण किया और सृष्टि की रक्षा की थी हां पुत्र जगत पिता ने जगत की रक्षा के लिए उस विष को ग्रहण तो कर लिया किंतु उससे होने वाली पीड़ा उन्हें निरंतर कष्ट पहुंचा रही थी सभी की पीड़ा हरने वाले जगतपिता महादेव के लिए भी वह पीड़ा असहनीय हो उठती थी और उसके परिणाम स्वरूप सृष्टि को भी उसकी पीड़ा का प्रकोप सहना पड़ रहा था तब प्रभु अपने ध्यान से संसार की पीड़ा को स्वयं अपने ऊपर ही ले रहे थे जगत का कल्याण तो हो गया किंतु महादेव की पीड़ा का किसी को अनुमान नहीं था और नहीं इसका उपाय किसी के पास था किंतु महर्षि कश्यप प्रभु की पीड़ा को समझ गए और उन्होंने उसे दूर करने के लिए एक यज्ञ का आयोजन भी किया भगवान और भक्त एक दूसरे के पूरक है भगवान भक्त के कष्ट को और सच्चा भक्त भगवान के कष्ट को समझ सकता है महान भक्त ऋषि कश्यप को भगवान की पीड़ा का आभास हो गया था और तब उन्होंने भगवान की पीड़ा हरने का संकल्प लिया जिसके लिए वह मानसिक कल्पना करने लगे और उनकी कल्पना मूत रूप लेने [संगीत] लगी [संगीत] स्वाहा जब ऋषि कश्यप का यज्ञ अपने चरम पर पहुंच रहा था तो उनके मानस की कल्पना भी अपनी पूर्णता प्राप्त कर रही थी और दूसरी ओर वो घटनाक्रम भी घटित हो रहा था जिनके परिणाम स्वरूप कार्तिकेय का जन्म होने वाला था प्रभु के उस तेज से पुत्र कार्तिकेय का जन्म तो हुआ ही था किंतु उसके एक अंश का प्रवेश उस प्रतिमा में भी हुआ जो ऋषि कश्यप की मानस कल्पना से उत्पन्न हुई [संगीत] थी [संगीत] देवी आपका जन्म महादेव की कृपा से हुआ है हे ऋषिवर किंतु मैं कौन हूं और मेरा जन्म किस उद्देश्य से हुआ है आपका जन्म महादेव के तेज से हुआ है इसलिए आप महादेव की पुत्री और उनकी कृपा से आप मेरे मानस की कल्पना का मूर्त रूप है इसीलिए आपका नाम है मंसा म हे श्वर मुझे मेरा नाम देने के लिए कोटि कोटि धन्यवाद और अब आप मुझे मेरे जन्म का उद्देश्य बताने की और मार्ग दर्शन करने की कृपा कीजिए आप वो मनसा है जो कठिन तप कर असाधारण क्षमता प्राप्त कर और भोलेनाथ प्रभु महादेव की सहायक भ संसार में आप नाग माता के रूप में भी विख्यात हो सबको आपके विराट रूप के दर्शन प्राप्त [संगीत] होंगे देवी आपके जीवन में आने वाले महान उद्देश्य आपको महान और अद्भुत बनाएंगे जिनका ज्ञान समय आने पर आपको स्वयं होता जाएगा जिस प्रकार तपने के बाद सोना कुंदन बनता है उसी प्रकार आपको भी अपने कठोर तप से अपने भीतर अपार सामर्थ्य जागृत करना होगा तप ही एकमात्र साधन है जो आपको आपके उद्देश्य के निकट लेकर जाएगा किंतु आपका अंतिम उद्देश्य आपको एक लंबी यात्रा के बाद भी प्राप्त [संगीत] होगा ऋषि कश्यप के शब्दों में स्पष्ट संदेश था जिसे पुत्री मंसा ने स्वीकार किया ऋषिवर से आशीष प्राप्त कर उसी क्षण कठोर तप के लिए प्रस्थान [संगीत] किया [संगीत] और फिर शीघ्र वो समय भी आ गया जब पुत्री मनसा को उसके तप का फल भी मिला स्वयं स्वामी प्रभु महादेव उनके तप स्थल पर [संगीत] पहुंचे [संगीत] [संगीत] ओ नम शवा [संगीत] [प्रशंसा] आपका जन्म महादेव के तेज से हुआ इसीलिए आप महादेव की पुत्री है पुत्री मुझे क्षमा करना मैंने तप में बाधा उपन की नहीं पिता [संगीत] श्री आपके दर्शन पाकर ही तो मेरा तप पूर्ण हुआ है पिता श्री पुत्री तुम्हारी सरलता सहजता निष्ठा और तुम्हारे मधुर वचनों से मैं अति प्रसन्न हुआ तुम्हें यहां नहीं तुम्हें अपने पिता श्री के साथ कैलाश में होना चाहिए क्या तुम मेरे साथ कैलाश चलेगी तप ही एकमात्र साधन है जो आपको आपके उद्देश्य के निकट लेकर जाएगा कहो ना पुत्री क्या तुम मेरे साथ कैलाश चलोगे माता पिता के स्नेह से पूर्ण उनकी छत्रछाया से बढ़कर एक संतान के लिए और कुछ भी नहीं है पिता श्री आपके और माता पार्वती के साथ कैलाश पर निवास करना मेरे लिए केवल सौभाग्य ही नहीं अभी त परम वरदान होगा पिता [संगीत] श्री मैं अवश्य ही चलूंगी आपके साथ फिर तो कैलाश में दीदी मनसा का स्वागत बहुत धूमधाम से हुआ होगा ना [संगीत] नहीं दुर्भाग्यवश ऐसा कुछ नहीं हुआ क्यों मां ऐसा क्यों नहीं हुआ क्या बाधा थी उसमें मैं मैं बनी थी वो बाधा आओ पुत्री कैलाश में प्रवेश करो [संगीत] अद्भुत पिताश्री सर्वथा अद्भुत पुत्री आज से कैलाश ही तुम्हारा निवास है तुम्हारी मां पार्वती अभी पूजा में व्यस्त होंगी और यह मेरे ध्यान का समय है तब तक तुम भी समय का सदुपयोग करो कैलाश का भ्रमण कर यहां से परिचित हो जाओ उनकी पूजा और मेरे ध्यान के संपन्न होने पर मैं तुम्हारा परिचय कैलाश के अन वासियों से और तुम्हारी माता से कराऊंगा आप निश्चिंत रहे पिताश्री मैं मां को देखते ही पह जान [संगीत] लूंगी ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला ला [संगीत] [प्रशंसा] कौन है यह देवी जो इतनी स्वतंत्रता से कैलाश में भ्रमण कर रही है उस दिशा से कितनी पावन ऊर्जा का प्रवाह हो रहा [संगीत] है मां के आभास से कितना सुखद अनुभव हो रहा है मुझे और जब मां मुझे देखते ही स्नेह से अपने हृदय से लगाएंगी तो मुझे उस अपार सुख का अनुभव होगा जिससे मैं अब तक वंचित [संगीत] [संगीत] [संगीत] रही कौन है [संगीत] [संगीत] यहां [संगीत] [संगीत] [संगीत] [संगीत] रुक जाओ यही आगे मत [संगीत] बढ़ना कौन हो तुम जिसने कैलाश में मेरी आज्ञा टालने का अपनी मनमानी करने का दुस्साहस किया है उस दिन अपनी पुत्री को ही नहीं पहचान सकी मैं उस पर अपने शूल का प्रहार कर दिया माता आपको दीदी का परिचय ज्ञात नहीं था अतः एक अपरिचित को कैलाश में देखकर कैलाश की सुरक्षा हेतु ही आपने ऐसा किया होगा ना हां पुत्र किंतु उसके निरुत्तर रहने पर मैं तो अपनी पुत्री को और भी आहत करने के लिए तैयार [संगीत] थी विय दो अन्यथा मेरे क्रोध का सामना करो बताओ मुझे कौन हो तुम हमारी पुत्री हैय तेरे तेरे [संगीत] हमारी पुत्री हां प्रिय यह हमारी ही पुत्री [संगीत] है सा सा म सा ग स म ग प महि द म प नि स ग नि सा म ग प मध नि स ग सा मा पानी सार नि [संगीत] सा [संगीत] पुत्री [संगीत] पुत्री मैंने तुम्हें पहचाना नहीं पुत्री मुझे क्षमा कर [संगीत] दो नहीं माता भूल आपसे नहीं हुई है भूल तो मुझसे हुई है आपने मुझे इतना रोका मैं फिर भी नहीं रुकी मुझे आपसे भट जो करनी थी माता मेरी भूल को अपनी भूल बना लिया [संगीत] तुमने आपने मुझे पुत्री के रूप में स्वीकार कर लिया यह तो मेरे लिए परम हर्ष और सुख का कारण है आप दोनों की स्नेह वर्ष से आनंदित हूं आप दोनों की सेवा करूंगी और अपना जीवन धन्य करूंगी यह मेरा अधिकार है मां आप मुझे अपनी सेवा करने से नहीं रोकें आज का यह दिन सबसे सुखद दिन है मैं मैं तो बस यही कामना करती हूं माता कि मैं इसी प्रकार आप दोनों की छत्रछाया में रहूं आपकी इस पुत्री को और कुछ नहीं चाहिए माता और कुछ भी नहीं पुत्री अब तुम यहां पहुंच गई हो अब तुम सदैव यहीं रहोगी [संगीत] हमारे साथ उस दिन से पुत्री मंसा हमारे साथ कैलाश में ही वास करने लगी अपनी माता-पिता की सेवा को ही उसने अपना धर्म मान [संगीत] [संगीत] लिया पुत्री तुम मेरी और अपनी मां की सेवा में सदा तत्पर रहती हो तुमसे एक भी दिन कोई भूल नहीं होती क्यों भूलूंगी पिता श्री आप दोनों की सेवा करके ही तोत मुझे परम आनंद प्राप्त होता है और मैं इसी प्रकार आप दोनों की सेवा करके अपना जीवन सुखमय बनाती रहूंगी [संगीत] तुम्हारे भाग्य में अधिक समय सुख नहीं मेरी पुत्री इस बात का मुझे दुख [संगीत] है सदा हमारा ध्यान रखने वाली अपने माता-पिता की सेवा में समर्पित थी किंतु उसकी नियति तो कुछ और ही थी क्या माता ऐसा क्या करना था दीदी मंसा को एक बार वो मेरे केश में तेल लगाने आई मां मैं आपके केश में तेल लगाने आई हूं आज तुम अपनी मां की सेवा नहीं आज तुम्हारी मां तुम्हारी सेवा करेगी लाओ इसे मुझे दो और तुम स्वयं आकर बैठो आज मैं तुम्हारे केश में तेर लगाऊंगी नद तेरे नद तेरे नद मा अब से तो मैं आप ही से केश में तेल लगवाया करूंगी यह तो बहुत ही सुखमय अनुभूति है पुत्री एक मां के लिए इससे अधिक सुख की बात और क्या होगी कि वह अपनी पुत्री का दुलार करें और मैं तो तुम्हें सदैव प्रसन्न देखना चाहती हूं [संगीत] पुत्री माता यह क्या हो रहा है फूल मुरझा क्यों रहे हैं पुत्री यह सब तुम्हारे पिता की पीड़ा का प्रभाव है जिससे यह सब संकट उत्पन्न हो रहा है पुत्री स्वामी ने समुद्र मंथन से उत्पन्न हुए हलाहल का पान इस संसार की रक्षा के लिए किया था तभी से उनके कंठ में स्थित उस हलाहल के कारण उन्हें अत्यंत पीड़ा का अनुभव होता है और उन्होंने संसार की पीड़ा तो हर ली किंतु उनकी पीड़ा कोई नहीं हर सका किंतु सत्य तो यह है दिन जो सभी की पीड़ा हारते हैं आप उनकी पीड़ा हर कदाचित मेरे जीवन का परम उद्देश्य यही [संगीत] है पुत्री मंसा [संगीत] [संगीत] मंसा यह क्या कर रही [संगीत] है जकार चरी मानस योग का चत [संगीत] चोरी की [संगीत] श भगनी [संगीत] ताता कोई भी व्यक्ति कितना भी शक्तिशाली क्यों ना हो उसमें नियति द्वारा निर्धारित कार्य को रोक सकने का सामर्थ्य नहीं होता यही अटल सत्य

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