Wednesday, 7 January 2026

हनुमान जी ने काल देव से कौन सा प्रश्न पूछा Ishant Mahabali Hanuman Episode 264 Pen Bhakti

[संगीत] कालदेव को मेरे पिताश्री को मुक्त करना ही होगा मैं पुनः जाके उन्हें मनाऊंगा जो भी करना है शीघ्र करें हनुमान 11 दिवस के पश्चात आपके पिता की आत्मा यहां से चली जाएगी फिर आप उन्हें नहीं ढूंढ पाएंगे तराज जी मैंने मेरी मां को वचन दिया है और उनके वचन की पूर्ति के लिए मुझे कुछ भी करना पड़े मैं करूंगा मैं पिताश्री को वापस लेकर ही जाऊंगा प्रणाम प्रेतराज जी प्रणाम हनुमान [संगीत] तुम्हारे पिता अब जीवित नहीं हो सकते इसे तुम तुम्हारा भाग्य समझकर स्वीकार कर लो और लौट जाओ ऐसा मत कहिए कालदेव हनुमान की विन तुम्हारी विनती प्रार्थना या किसी तर्क का कोई अर्थ नहीं है क्योंकि काल समस्त भावनाओं से परे है काल के सिंहासन विचार भू और यह लाल ध्वज की मर्यादा इसीलिए स्थिर है क्योंकि काल अपने नियमों का पालन कठोरता से करता है नियम है तो यम है उचित है कालदेव मैं यहां से लौट जाऊंगा मैं आपसे कोई तर्क नहीं करूंगा मैं आपसे कोई युद्ध भी नहीं करना चाहता लौट जाऊंगा मैं किंतु आपसे मुझे मृत्यु से संबंधित कुछ प्रश्नों के उत्तर चाहिए तुम होते कौन हो मुझसे प्रश्न पूछने वाले कालदेव मैं वो हूं जिसके पिता को आपने अ समय ही मृत्यु दे दी वह पुत्र कालदेव के कुछ नियम जानना चाहता है बस मैं कुछ ही प्रश्न पूछूंगा फिर लौट जाऊंगा हनुमान तुम्हारे प्रश्न का उत्तर देने के लिए बाध्य नहीं हूं मैं क्यों कालदेव आप भयभीत हो रहे हैं एक बालक के प्रश्नों का उत्तर देने से पीछे हट रहे हैं आप एक छोटी सी चुनौती का सामना नहीं कर पा रहे हैं आप काल को भय नहीं लगता सब भयभीत होते हैं काल से भय भी भयभीत हो जाता है काल से मैं दूंगा तुम्हारे प्रश्नों के उत्तर किंतु स्मरण रहे हनुमान प्रश्नों के उत्तर पाकर तुम्हें लौट जाना होगा मेरे प्रश्नों के उचित उत्तर प्राप्त हो जाने के पश्चात मैं यहां से लौट जाऊंगा वैसे भी तुम अधिक समय तक नहीं रुक पाओगे क्योंकि पृथ्वी लोक पर तुम्हारे पिता की देह भी अधिक समय तक सुरक्षित नहीं रह पाएगी तो हमारी सेना सज्जित हो गई सेना तो सज्जित हो गई है काकाश्री किंतु हमें ध्यान रखना होगा वो वानर कुंजर रिक्षा बड़े योद्धा हैं और रिक्षा का पुत्र सुग्रीव युद्ध कला में सबसे अधिक निपुण है तो सबसे पहले हम उन्हीं को नियंत्रण में करेंगे तभी हम केसरी की देह को वहां से ले जा सकेंगे ऐसा ही होगा काका श्री हम अपने छल बल और माया से उन्हें उलझा जाएंगे फिर वे वानर हमें रोक नहीं [हंसी] पाएंगे तो चलो बास कसर प्रतिशोध की अग्नि में केसरी की देह को भस्म कर देंगे हम प्रतिशोध लेंगे प्रतिशोध लेंगे प्रति की जय राज महा वाकली की जय जयति महाराज वाकली की जय रपति महाली की ये ध्वनि सुन रहे हैं आप राक्षस प्रतीत होते हैं सैनिकों सावधान हो जाओ तुम सब राक्षस इस ओर ही आ रहे हैं यह वही राक्षस है जो यहां से भाग कर गए थेली की महारानी अंजना और आप सब केसरी जी के निकट ही रहिएगा व केसरी जी की दे को नष्ट करना चाहते हैं हम ऐसा नहीं होने देंगे महाराज हनुमान के मित्र है हम हम उन राक्षसों का दटकर सामना करेंगे हा चलो हा च चलो हम भी य करेंगे राक्षस सेलो उधर हनुमान कालदेव के समक्ष अ खड़ा है और उधर मेरा परिवार एवं प्रजा मेरी देह को बचाने के लिए प्राण प्रण से लगे हुए [संगीत] हैं सब मुझे बचाने के लिए किसी भी प्रकार का संकट लेने को तैयार है केसरी जी आप बड़े भाग्यवान है जो आपको ऐसा पुत्र ऐसा परिवार एवं ऐसी प्रजा मिली है जब एक बड़ा समूह किसी अच्छे का के लिए एकजुट होकर प्रयास करती है तो प्रकृति भी उसके अनुकूल हो जाती है मुझे पूर्ण विश्वास है कि हनुमान आपको यहां से मुक्त करा लेंगे कालदेव को मना लेंगे व हनुमान शीघ्र पूछो क्या पूछना चाहते हो मेरे पास अधिक समय नहीं है तुम्हारे लिए समय तो मेरे पास भी नहीं है कालदेव किंतु आपसे पूछने के लिए प्रश्न मैंने अवश्य सोच लिए हैं कालदेव मेरा प्रथम प्रश्न यह है कि आत्मा क्या हो आत्मा परम ब्रह्म परमात्मा का अंश होता है जब यह देह में होता है तब यह कर्मों के अनुसार सुख दुख का अनुभव करता है देह से मुक्त होते ही यह समस्त कामनाओं एवं लोभ मोह आदि विकारों से परे हो जाता है और मोक्ष की स्थिति में यह पुनः परमात्मा से मिल जाता है इसका कोई रूप कोई आकार नहीं होता सनातन है अविनाशी है यह परम ब्रह्म परमात्मा की वो ऊर्जा है जिससे जीवन संभव [संगीत] है कालदेव मृत्यु के पश्चात आत्मा कहां चली जाती है उनका वास कहां होता है मृत्यु के पश्चात आत्मा का वास उसके कर्मों के अनुसार निर्धारित होता है सत्कर्म और सदाचरण करने वाले मनुष्य की आत्मा उच्च लोकों में वास करती है जैसे यम के लोक में स्वर्ग की प्राप्ति होती है उनका वास शिव लोक भगवान नारायण का गौ लोक श्री लोक ब्रह्म लोक आदि में होता है और यदि उनका पुनर्जन्म होता है तो उन्हें उच्च योनि जैसे राजा का घर आदि प्राप्त होता है दुष्कर्म और दुरा चरण करने वाले मनुष्य की आत्मा निम्न लोकों में भटकती है जैसे यम लोक में नर्क की प्राप्ति होती है जहां उन्हें अपने दुष्कर्म का दंड भोगना पड़ता है उन्हें भूत लोग प्रेत लोग पिशाच लोक और कभी-कभी जिन्हें किसी अन्य लोक की प्राप्ति नहीं हो पाती है उन्हें पृथ्वी लोक में ही भटकना पड़ता है उनका पुनर्जन्म भी निम्न योनि में होता है एक आत्मा का दूसरी आत्मा से क्या संबंध होता है समस्त आत्माएं उस एक ब्रह्म की अक्षय ऊर्जा का अंश होने के कारण एक दूसरे से जुड़े रहते हैं किंतु अपने कर्मों के अनुसार उनका एक दूसरे से संबंध निर्धारित होता है आत्मा और आत्मा के संबंध में ना कोई बड़ा छोटा होता है ना कोई दुर्बल और शक्तिशाली पुण्यात्मा का संबंध पुण्यात्मा से जुड़ता है और पापा आत्मा पापा आत्मा को प्रिय होती है समस्त आत्माओं का एक ही लक्ष्य होता है अपनी अपनी कर्म गति पूर्ण करके अंततः उस परम ब्रह्म परमात्मा में मिल जाना किसी भी जीवधारी का जन्म और मृत्यु का निर्धारण कैसे होता है किसी भी जीवधारी के जन्म और मृत्यु का निर्धारण स्वयं ब्रह्मदेव के विधान के अनुसार होता है किंतु किस क्षण जीवधारी की मृत्यु होनी है इसका निर्धारण कैसे होता है शवास की अवधि के निर्धारण से कालदेव श्वास की गणना कौन करता [प्रशंसा] है कालदेव मेरे प्रश्न का उत्तर दीजिए श्वास की गणना करने का कार्य किनका है प्रत्येक जीवधारी की श्वास की गणना करने का कार्य त्रिदेव ने शनिदेव के अधीन किया है तो क्या कालदेव आपने मेरे पिता श्री को मृत्यु देते पूर्ण शनिदेव से तो पूछा ही होगा मेरे पिता के शेष स्वांसों के बारे में कि उनकी शवास पूर्ण हो गई है य शेष है अनुमान तुम इस प्रकार का कोई प्रश्न नहीं कर सकते हो मुझसे मेरे पिता श्री की मृत्यु से जुड़ा हुआ है यह प्रश्न एक पुत्र को इसका उत्तर जानने का अधिकार है बताइए ना कालदेव क्या आपने पूछा था शनिदेव से मेरे पिता श की शेष बारे में नहीं पूछा मैंने शनिदेव से क्योंकि मुझे उनसे कुछ पूछने की आवश्यकता नहीं थी आक्रमण आक्रमण रे ही क्षेत्र में तुम्ह आकर मारेंगे राक्षसों जिसने भी आगे बढ़ने की हिम्मत की उसका अ निश्चित [संगीत] है केसरी पर उठने वाले सारे हाथ तोड़ दूंगा मैं हाथ तोड़ोगे तुम यही भूल की थी केसरी ने मेरे पिता का हाथ उखाड़ दिया वही प्रतिशोध लेने में आया हूं तुम मुझे रोक नहीं पाओगे अच्छा तो तुम ही हो वाश कासर हां हां वानर राज कुंजर राक्षसों के परम शत्रु हनुमान और उसके पिता से प्रतिशोध लेने का इतना अच्छा अवसर मैं कैसे छोड़ सकता हूं उसके पिता को समाप्त करके पुत्र तो स्वयं ही टूट जाएगा और इस पुत्र को हम समाप्त कर देंगे अच्छा चुपके से आ रहे हैं महाराज की और मित्रों मारो मारो मित्रों और मारो बस के ना जाने पाए आओ राक्षसों मेरा सामना करो भले ही मैं अभी राक्षसी नहीं किंतु शक्ति अब भी है मुझ में मैं भी आती हूं मार्जरी का अंजना रुक जाओ हमें केसरी जी की भी रक्षा करनी होगी और जोर से मित्र अब लगता है माया का प्रयोग करना पड़ेगा मुझे [संगीत] अब होगी केसरी की दे मेरे अधिकार में हनुमान अब पूरा होगा मेरे भ्राता के वध का प्रतिशोध बड़ा ही अनर्थ हो रहा है इधर हनुमान कालदेव को मनाता रह जाएगा और उधर यदि यह राक्षस मेरी देह को नष्ट करने में सफल हो गए तो हनुमान मुझे मुक्त कराने के पश्चात भी असफल रह जाएगा उसका सारा का सारा प्रयास व्यर्थ हो जाएगा हनुमान किसे अकाल मृत्यु देनी है और किसे नहीं इसका विशेष अधिकार मेरे अधीन है शनिदेव हो या त्रिदेव मुझे किसी से कुछ पूछने की या किसी से अनुमति लेने की कोई आवश्यकता नहीं है अकाल मृत्यु अर्थात असमय मृत्यु किंतु अका मृत्यु कालदेव किसी को भी नहीं दी जा सकती इसका भी तो कोई आधार होगा पितृ दोष के कारण होती है अकाल मृत्यु प्राणी के दुष्कर्म के परिणाम स्वरूप भी बनता है अकाल मृत्यु का योग तो आप यह बताइए क्या मेरे पिता श्री के भाग्य में ऐसा कोई योग बन गया था अच्छा तो तुम मुझे प्रश्नों में उलझा करर मेरे कार्य को अनुचित सिद्ध करना चाहते हो कुंजर मैंने कहा था ना तुम मुझे रोक नहीं पाओगे मेरा कार्य हो गया चलो मेरे शूरवीर सोच क्या रहे हैं कालदेव बता बताइए क्या मेरे पिता श्री के भाग्य में अकाल मृत्यु का कोई योग बन गया था कदाचित आपके पास इसका उत्तर नहीं है ठीक है मैं शनिदेव से ही पूछ लेता हूं वे न्याय के देवता है कर्मों के आधार पर न्याय देना एवं दंड देना उनका ही कार्य है हनुमत करते प्रश्न निरंतर कालदेव हो गए निरुत्तर आंजनेय सद इच्छा पावन भरे भाव से शनि आवा हे न्याय के देवता शनि देव हनुमान को आपकी सहायता की आवश्यकता है कृपया दर्शन दे दर्शन दे शनिदेव दर्शन दे दर्शन [संगीत] दे प्रणाम शनिदेव शनिदेव कृपया मेरी शंका का समाधान कीजिए आप मुझे यह बताइए क्या मेरे पिताश्री के कर्मों के आधार पर उनके भाग्य में काल दंड का योग बन गया था हनुमान तुम्हारे पिता महाराज केसरी के जीवन की शवास अभी शेष उन्होंने तो जीवन भर सदैव सत्कर्म ही किए अतः उनकी शवास कम करने का कोई आधार नहीं बनता इसका अर्थ यह हुआ चित्रगुप्त जी कि मेरे पिता श्री के भाग्य में अकार मृत्यु का कोई योग नहीं था तो क्या आपके लेखा जोखा में कोई त्रुटि हो गई थी पुत्री तुम तुम ठीक तो हो ना [संगीत] स्वामी नहीं स्वामी आ

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