Saturday, 3 January 2026

विष्णु देव ने बताई दुष्ट सिंधु की कहानी Hitanshu Jinsi Vighnaharta Ganesh Episode 742 PenBhakti

प्रभु के प्रत्येक अवतार का कोई कारण होता है महा गणाधीश अवतार का कारण था दुराचार असुर सम्राट सिंधु का अंत असुर राज चक्र पाणी और उनकी पत्नी उग्रा वो पुत्र प्राप्ति के लिए सूर्यदेव की तपस्या कर रहे थे तपस्या करते-करते रानी उग्र से ऐसी भूल हुई जिसके कारण उनकी तपस्या का जो फल छुपता लाने वाला था वो दूषित हो गया क्षमा महाराज क्षमा तपस्या करते करते अचानक मुझे क्षणिक आभास हुआ जैसे सूर्यदेव के स्थान पर स्वयं आप हूं किंतु ये ये उचित नहीं है रानी उग्र सूर्यदेव के तेज से प्रभावित थी और सूर्यदेव की कृपा भी उन पर हुई किंतु जो विचार दोष रानी उग्र से हुआ था उसका परिणाम तो समझ संसार को भुगतना था उनकी कोप में बालक रूप में कुटिलता और दुष्टता का पर्याय ही पनप रहा था प्रय स्वामी आप कुशल तो है स्वामी असहनीय पीड़ा हो रही है रानी की कोक में जो बालक पल रहा था उसका तेज भी उसी तेज के समान था जिससे रानी प्रभावित हुई थी जो अब उनकी पीड़ा का कारण बन रहा था बस प्रिय कुछ दिनों का ही कष्ट है उसके बाद हमारा य पुत्र आपकी कोख में नहीं हमारी गोद में होगा जो जन्म के पूर्व मुझे इतना कष्ट रा है वो कहीं मेरे दोष का दंड तो नहीं दंड ही है दंड ही है जिसे पाकर मां को भी सुख का अनुभव ना हो वो दंड ही है नहीं देवी नहीं अपने संतान के प्रति मन में ऐसे बुरे विचार मत लाइए प्रिय देखो हमने तपस्या की है ये उसी तपस्या का फल है जोय तुमसे अी तपस्या करवा रहा है अनिष्ट की आशंका अनिष्ट की आशंका ये यह उस तपस का भाग नहीं हो सकता यह उस तप का भाग नहीं हो सकता अब मैं इस पीड़ा को सहन नहीं कर सकती सह नहीं स प्र रुको प्रिय कर्मों का फल तो सबको भुगतना ही पड़ता है देवी उग्र की भूल संसार के लिए शूल बनने जा रहा [संगीत] था उसके उस दनीय तेज ने उसकी पीड़ा ने रानी से वो करवा दिया जिसकी कोई मां कल्पना भी नहीं कर सकती रुकिए प्रिय रुकिए अरे कहां जा रही है प्रिय रुक जाइए रुक जाइए प्रिय आप कहां जा रही है प्रिय अरे आप कहां जा रही है प्रिय रुक जाइए रुक जाइए प्रिय रुक जाइए नहीं नहीं प्रिय य उचित नहीं है प्रिय प्रिय और वहां सागर के जल में रानी ने अपने घर का त्याग कर दिया प्र स्वामी ये क्या हो गया स्वामी शांत हो जाओ प्र व हमारा भाग्य था अब उस पर शोक करने का कोई लाभ नहीं नहीं स्वामी ये तो माहा बाप हो गया अब मुझे जीने का कोई अधिकार नहीं कोई अधिकार नहीं नहीं प्रिय नहीं नहीं नहीं नहीं शिशु का क्रंदन [संगीत] राजन यह आपका पुत्र है आपके कर्मों का फल आप इसे त्याग नहीं [संगीत] सकते धन्यवाद समुद्र देव दोष मेरा है प्रभु मैं ही इसकी तेज को सह नहीं पाई हां देवी उग्रा इसमें सूर्यदेव का अपार तेज है किंतु माता-पिता होने के कारण यह आपका कर्तव्य है कि इसका उचित मार्गदर्शन हो और ध्यान रहे कि इसका तेज व्यर्थ ना होने पाए अवश्य समुद्र देव आपका य सुझाव हमारे लिए आदेश के समान है प्रभु एक और विनती है मेरी आपने मेरी संतान की रक्षा कर मुझे महापाप करने से बचाया है अब आप ही इसे इसका उचित नाम देने की कृपा करें समुद्र में इसका जन्म हुआ है इसलिए इसका नाम होगा [संगीत] सिंधु स्वामी जो सूर्यदेव के तेज से जन्मा जिसे समुद्र देव का आशीर्वाद प्राप्त हुआ वह मात्र अपनी माता के दोष के कारण कुटिल और पापी होने का उदाहरण बना नहीं प्रिय अपने भविष्य के निर्माण का उत्तरदाई तो व्यक्ति स्वयं होता है उसकी नियति उसके कर्म निर्धारित करते हैं और यही हुआ सिंधु के साथ माता-पिता के मार्गदर्शन के कारण वह पांव के एक अंगूठे पर खड़ा रहकर दो सहस्त्र वर्ष तक सूर्यदेव की तपस्या में लीन रहा ओम सूर्याय नमः ओ सूर्याय नमः ओम सूर्याय [संगीत] नमः ओम सूर्याय नमः और जब उसकी तपस्या उसके चरम पर पहुंची तो वह स शरीर उठकर आकाश में सूर्यदेव की ओर ही बढ़ने लगा ओम सूर्याय [संगीत] नमः ओम सूर्याय नमः ओम सूर्याय नमः ओम सूर्याय नमः ओम सूर्याय नमः ओ सूर्याय नम मेरे निकट आकर स्वयं को भस्म करने की आवश्यकता नहीं है मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूं सिंधु सिंधु का प्रणाम [प्रशंसा] सूर्यदेव मांगो क्या वरदान मांगते हो मैं अवश्य दूंगा सिंधु चाहता सम्मान देवताओं के [संगीत] समान अजय होने का वरदान चाहता है सूर्यदेव अजय होने के लिए मैं तुम्हें तीन बूंद अमृत से भरा यह कलश प्रदान करता हूं जिसे केवल तुम अपने कंठ में धारण कर सकते हो इसके प्रभाव से ना कोई देवता ना नाग ना गंधर्व ना मानव ना कोई जीव ना जंतु कोई नहीं ना दिन में ना संध्या ना ही रात्रि में अर्थात कोई भी किसी भी समय तुम्हारा वद नहीं कर सकेगा ती अर्थात तीनों लोग होंगे मेरे अधीन मेरे वरदान से प्राप्त शक्तियों का उपयोग जगत कल्याण के लिए करना पुत्र सम्मान वरदान भगवान तीन शब्द मुझे पूर्ण करेंगे दिव्य तेज तो जन्म से ही प्राप्त है और अब अपने इस वरदान से मैं बनूंगा भगवान अब एक और थे ऋषि गौतम और देवी अहिल्या भगवान के प्रति अपनी अटूट आस्था के कारण जो अच्छाई और धर्म का विस्तार करने का प्रयास कर रहे थे और दूसरी और था दुष्टता का पर्याय सिंधु जो अपने तेज और शक्ति के उन्माद में दुष्टता का ही विस्तार करने लगा अपने आप को भगवान घोषित कर उसने तीनों लोकों पर अपना अधिकार कर लिया फिर धीरे-धीरे उसने सभी प्रभु भक्तों को अपनी भक्ति करने पर विवश कर दिया और जिन्होंने यह स्वीकार नहीं किया उन्हें उस दुष्ट ने मृत्युदंड दे दिया तीनों लोकों पर विजय पाकर वह सभी से अपनी पूजा भी करवाने लगा भगवान सिंधु की भगवान सिंधु की जय भगवान सिंधु की जय तब ता के अनुरोध पर मैं उसे रोकने गया प्रणाम [हंसी] नारायण हो गया सम्मान जितना होना था अब सिंधु के साथ युद्ध में अपमान ही होगा ना नारायण वरदान की शक्ति से इतने उत्साहित हो सिंधु या वास्तव में मेरा सामना करने का साहस भी रखते हो मेरा साहस सह नहीं सकेंगे [संगीत] नारायण तुम्हारा वार तो मैंने रोक दिया सिं अब तुम मेरे प्रहार का सामना करो अवश्य स्वागत है किंतु साधारण अस्त्र व्यर्थ मत कीजिएगा करना है तो किसी असाधारण अस्त्र का ही प्रयोग कीजिए [संगीत] यह कैसे संभव है इसने प्रभु श्री हरि नारायण के सुदर्शन चक्र को धारण कैसे कर लिया मेरा सुदर्शन चक्र थाम कर उसे ार कर सके ऐसा असाधारण योद्धा तो मैंने कभी नहीं देखा सिंधु तुम युद्ध कौशल में अत्यंत निपुण हो जो आपका है व आपको लौटा आता है सिंधू किंतु बदले में वरदान चाहता है उचित है जो चाहते हो वह मांग लो वास कीजिए मेरे नजर में रक्षा कीजिए उसकी उचित है किंतु ऐसा तभी तक होगा जब तक तुम मेरा या मेरे किसी स्वरूप का अपमान नहीं करोगे स्कार है मुझे तथास्तु स्वामी यह क्या किया आपने आपको तो उस अधर्म के उपासक का अनुचित उद्देश्य ज्ञात था फिर भी आपने उसे उसके नगर की रक्षा करने का वरदान दिया दुष्टता का अति विश्वास सिंधु जैसे दुष्टों को ऐसे वरदान मांगने को प्रेरित करता है जिसके वह योग्य भी नहीं होते फिर वही वरदान उसका काल बन जाता है किंतु उसके काल का आगमन अभी नहीं हुआ था वह जिस पथ पर चल रहा था वो से उसके काल के मुख में ही ले जाने वाला था उस दुष्ट ने सभी ऋषि मुनियों और भक्तों को आतंकित कर उसे ऐसे ही यज्ञों की अनुमति दी थी जिसमें उसके नाम की आहुति दी जाए किंतु ऋषि गौतम यह सुनने के लिए तैयार नहीं थे अब एक मात्र वही शेष थे जिन्होंने सिंधु को चुनौती देने का साहस किया [संगीत] [संगीत] और [संगीत] सिंधु चाहता है सम्मान और आप कर रहे हैं अपमान तो दंड तो मिलेगा ना रता नहीं मैं ही तुम्हारी रक्षा कर सकता हूं इसलिए अब आहूति भी मेरे नाम की हो बोलो ओम सिंधुरा नमः ओम सूर्य देवाय नमः ओम श्री सूर्य देवाय नमः ओम सूर्य देवाय नमः जो ना समझे उसे समझाना आता है सिंधू अब ये यज्ञ भी रुकेगा और शीष भी झुकेगा भगवान सिंधु के सामने प्रभु महा गनाधिपति के नाम पर जो यज्ञ मैंने आरंभ किया है उसमें तुम कोई भी विघ्न नहीं डाल सकोगे सिध उसम तुम कोई भी विग्न नहीं डाल सकोगे सिध गगन भी डालूंगा और वो भुजाएं भी विलक कर दूंगा जो भगवान सिंधु का अपमान [संगीत] करेंगे [संगीत] [संगीत] [संगीत] जो हाथ होड़ा उती देने के लिए उठे हैं वो कट जाएंगे फिर कैसी आहुति और कौन सा यज्ञ ना रहेंगे हाथ ना होगी [प्रशंसा] [संगीत] आहुति ओम नमस्ते गण पतय त्वमेव प्रत्यक्ष [संगीत] तत्वम केवलम करता से त्वमेव केवलम रता [संगीत] सव केवलम ह ब्रह अवान चानम क्या हुआ सिंधु कहीं तुम्हे इस यज्ञ की अग्नि में अपनी चिता की अग्नि तो नहीं दिख गई महा गणाद पति को समर्पित इस यज्ञ की अग्नि किसी के भी प्रयास से बुझने वाली नहीं है और यदि किसी ने दुस्साहस किया तो वह स्वयं बुझ जाएगा बुझेगी अवश्य बुझेगी हर यज्ञ की अग्नि भी और सबके जीवन की ज्योति भी [संगीत] केवल वही बचेगा जो मेरा नाम जपेगा मेरे नाम की आ होती देगा मेरी पूजा करेगा अन्यथा जिसे अपने प्राण बचाने है उसे मेरा साम्राज्य छोड़कर जाना हो ये कहा ये किसी ने कलवा साम्राज्य अवश्य तुम्हारा है किंतु जीवा भी मेरी शब्द भी और भगवान भी मेरे हैं कोई अन्य उनका स्थान नहीं ले सकता असत्य को सत्य मानना भगवान के भक्तों को शोभा नहीं देता इसलिए मैं यह कदापि नहीं करूंगा तो उसके लिए तुम्हारे साम्राज्य से बाहर भी जाना पड़े तो मैं अवश्य जाऊंगा जाओ किंतु कहां जाओगे तीनों लोगों में मेरा ही साम्राज्य है त्री संध्या क्षेत्र जो तीनों लोगों से परे हैं वहां तुम्हारा क्या किसी का भी अधिकार नहीं मरघट का चुनाव मरने से पहले स्वयं कर लिया अच्छा है बहुत अच्छा है जाओ अपने शिष्यों को भी उस मृत्यु के अग्निकुंड तक लेके जाओ जिस किसी ने भी मेरे नाम का सोहा नहीं कहा मैं उसे सोहा कर दूंगा आदेश तुम्हारा नहीं मेरे प्रभु का मान्य है मुझे उनकी इच्छा से ही मैं त्रि संध्या क्षेत्र जा रहा किंतु मेरे जीवा पर आने वाले शब्द ध्यान से सुनना सिंधु यह इस ऋषि की वाणी है जो मात्र और मात्र अपने ईश्वर में विश्वास रखता है इसलिए चेतावनी देता हूं सिंधु अहंकार और क्रोध के विष का घोल जो तुम बना रहे हो वही एक दिन तुम्हारा विनाश करेगा विनाश [संगीत] करेगा [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] विष तो खुलेगा तुम्हारे और तुम्हारे शिष्यों के जीवन में तुम्हारे भगवान ने तुम्हें तुम्हारे काल के मुख में धकेला [संगीत] है [संगीत] हो यष सिंधु का प्रकोप इसी प्रकार बढ़ता रहा और ऐसे ही सभी के यज्ञ को और उस यज्ञ से समर्पित होने वाली आहुति को रोकता रहा हमें पुष्टि कैसे प्राप्त होगी फिर हमें देवता कौन स्वीकार करेगा निराशा भरी रात में भी आशा की चिंगारी छिपी रहती है हमें उसी चिंगारी से भक्ति और धर्म की ज्योति जलानी जिस प्रकार ऋषि गौतम के यज्ञ की अग्नि में प्रकट होकर प्रभु संकट मोचक महा गध पति ने जैसे उनकी रक्षा की वैसे ही वह सिंधु से हमारी भी रक्षा करेंगे किंतु गुरुदेव य हमने छिपकर यज्ञ किया तब भी उस दुष्ट सिंधु को ज्ञात हो ही जाएगा और वह हमारे यज्ञ में बाधा उत्पन्न करने अवश्य आए इस प्रकार हम महाग जी का आवाहन कैसे करेंगे यज्ञ और पाठ नहीं कर सकते किंतु प्रभु महा गणाधीश यज्ञ के समान होती है अब एक और ऋषि गौतम अपने शिष्यों के साथ मरुभूमि समान जल वनस्पति यहां तक कि सूर्य की किरणों से रिक्त निवास के लिए अत्यंत कठोर त्रिस क्षेत्र में जाने के लिए विवश हुए दूसरी ओर देवताओं ने पूर्ण भक्ति और निष्ठा से वो संकष्ट व्रत किया जिसे करने से प्रभु महा गणाधीश के साथ उनकी कृपा भी अवश्य मिलती है और यह दो घटनाएं श्री मयूरेश्वर गणेश के अवतार का कारण बनी हे परब्रह्म महा गधिचि उस दुष्ट सिंधु के प्रकोप के कारण हमारे लिए आपका यज्ञ करना आपके नाम का जाप करना और आपकी मूर्ति बनाना संभव नहीं इसलिए इस पवित्र सुपारी को आपका स्वरूप मानकर हमने संकष्टी रत रखा है कृपा कर हमारे इस व्रत को हमारी तपस्या को हमारे यज्ञ को स्वीकार करें और हम पर कृपा करें प्रभु कृपा करें हम पर नमस्ते ब्रह्म रूपाय विष्णु रूपाय ते नमः नमस्ते रुद्र रूपाय कर रूपाय ते नमः विश्वरूप स्वरूपाय नमस्ते ब्रह्मचारिणी भक्त प्रिय देवाय नमस्तुभ्यं विनायक ओ सिधि बुद्धि सहित महा गणपत [संगीत] नमः ओ [संगीत] [प्रशंसा] गजाननायुथम से मैं प्रसन्न हुआ भगवान की पूजा घोर तप या केवल यज्ञ आदि से ही नहीं होती मन को भक्ति से भरकर प्रभु को स्मरण करना ही पर्याप्त होता है हे प्रभु महा गनाधिपति जी यदि हमारी परीक्षा है तो इसमें उत्तीर्ण होने का सामर्थ्य भी आप ही हमें देंगे आज हमें दर्शन प्रदान कर आपने य सिद्ध कर दिया सार को उस अधर्मी सिंधु से छुटकारा दिलाने में अ आप ही हमारी सहायता करेंगे प्रभु उसकी दुष्टता के कारण महान ऋषि गौतम को त्रि संध्या क्षेत्र जाना पड़ा अब वही उसी त्रि संध्या क्षेत्र में गौतम ऋषि के आश्रम में ही मैं अपना दूसरा अवतार लूंगा और सिंधु के पापों का अंत करूंगा किंतु प्रभु त्रि संध्या क्षेत्र में ही क्योंकि जहां भक्त है भगवान वही रहते हैं आ संभल [संगीत] कर यहां भूमि पथरीले हैं यहां संभल कर चलना होगा ठीक है आ जाओ प्रभु त्रि संध्या क्षेत्र में क्या आप ऋषि गौतम और देवी अहिल्या के पुत्र के रूप में जन्म लेंगे मैं उन्हीं के आश्रम में आऊंगा वही उनकी छत्र छाया में रहूंगा किंतु मुझे जन्म तो वो माता देंगी जो बहुत समय से पुत्र सुख पाने की आशा में व्याकुल [संगीत] है मुझे वो जन्म देंगी जो बड़े उत्साह से मेरी प्रतीक्षा कर रही हैं जगत जननी देवी पार्वती मैं तो वर्षों से आपकी प्रतीक्षा में हूं प्रभु अब तो आपको मुझे आशीष देने आना ही [संगीत] [प्रशंसा] होगा प्रभु प्रभु प्रभु प्रभु किसी असुर का सामना करना हो तो प्रेत आगे है किसी शक्तिशाली योद्धा का सामना करना हो तो भी प्रेत आगे है आपकी और माता की सेवा करनी हो तो भी प्रेत आगे है किंतु प्रभु जिस प्रकार माता पार्वती मुझसे बालकों का पालना बनवा रही है उससे तो मैं थक गया हूं प्रभु मैं बनाता हूं तो माता कहती है अच्छा नहीं है जी माता पालने को अच्छे से सुसज्जित कीजिए जो आज्ञा माते किंतु प्रभु कैलाश में तो बालक है ही नहीं फिर व्यर्थ में पालने क्यों बनवा रही है माता क्या होने वाला है प्रभु माता यह सब क्यों करवा रही है पता नहीं इतने सारे पालन का वह क्या करने वाली है प्रभु जिसकी प्रतीक्षा मुझे है शीघ्र ही यहां उसकी किलकारी गूंजे गी और एक बात और प्रभु जब मैं पालने बना थक जाता हूं तो मुझसे खिलौने भी बनवा हैं मुझे माता की चिंता हो रही है [संगीत] प्रभु प्रेत जी हां मुझे ऐसे नहीं मुझे अति सुंदर खिलौने चाहिए शीघ्रता कीजिए प्रभु जितने खिलौने मुझे आते थे मैंने बना दिए पर वोह कहती है और बनाओ इससे उत्तम बनाओ अब क्या बनाऊं और किसके लिए बनाऊं प्रभु जी भर के अपनी ममता का आनंद लूंगी मैं मन भर के खेलूंगी उसके साथ प्रभु मैं जब भी अपने शिष्य को शिक्षा देने का कार्य कर रहा होता हूं प्रभु तो माता आश्रम में पहुंचकर उन्हें पकवान खिलाती है उनका दुलार करती है इससे मेरा कार्य अधूरा रह जाता है [संगीत] प्रभु प्रभु मैं कुछ समझ ही नहीं पा रहा हूं जब तक मेरा मन नहीं भरेगा उसका दुलार करूंगी जी भर के खिलाऊंगी उसे बताइए ना प्रभु माता के इस व्यवहार का क्या कारण है हा हा प्रभु बताइए ना मातृत्व से बड़ी कोई तपस्या नहीं यह उनकी तपस्या ही है और तप में जितना आनंद आता है उससे कहीं अधिक आनंद एक स्त्री को अपनी ममता में छर करने में आता है और वैसे देवी पार्वती पहली बार मातृत्व का अनुभव करने वाली है और यही कारण है कि वो इतनी आनंदित है और अब संसार के सामने देवी पार्वती का ममता भरा अद्भुत स्वरूप आने वाला [संगीत] है [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] मातृत्व एक कोमल अनुभूति ही नहीं वरन कठोर तपस्या भी है क्योंकि मां की तपस्या और त्याग ही संतान के उत्तम भविष्य का आधार है

No comments:

Post a Comment

ॐ जय शिव ओंकारा आरती Sawan Special Om Jai Shiv Omkara हर हर महादेव Pen Bhakti

[संगीत] [प्रशंसा] ओम जय शिवा ओंकार स्वामी जय शिवा प्रभु जय शिवा ओमकारा [संगीत] ओम जय शिवा ओंकार [संगीत] [संगीत] हंसते गरुड़ तन हर...