[संगीत] मुझे वरदान दीजिए प्रभु कि मैं ऋषि वशिष्ठ को अपने पति के रूप में पाऊ आपको पत्नी रूप में ऋषि वशिष्ठ का सानिध्य अवश्य प्राप्त होगा किंतु इस जन्म में नहीं किंतु देवी मैं आपकी तपस्या और आपकी निष्ठा से अत्यंत प्रसन्न मैं आपको तीन अन्य वरदान भी देना चाहता हूं इसलिए आप अपनी इच्छा से तीन वरदान मांग लीजिए नारायण यह मेरा सौभाग्य है तो मुझे पहला वरदान दीजिए प्रभु कि संसार का प्रत्येक प्राणी जन्म से लेकर बाल्यकाल तक काम भावना से रहित हो मैं दूसरा वरदान य चाहती हूं प्रभु कि मैं अपने पति के सिवाय कभी किसी अन्य पुरुष को काम दृष्टि से और यदि कोई पर पुरुष कभी मुझे उस दृष्टि से देखने की ष्टता करे तो व काम भावना से रहित हो जाए और तीसरा वरदान प्रभु मेरा पति धर्म और मेरा सुहाग सदा अखंड रहे तथास्तु धन्यवाद प्रभु विचारों की शुद्धता से ही कोई प्राणी अच्छे कर्मों के लिए प्रेरित होता है और अच्छे कर्म उसके जीवन को सार्थक बनाते हैं इसलिए काम भावना से दूर रहने का वरदान मांगकर देवी संध्या ने ना केवल अपने स्वामी अपने अर्धांग ऋषि वशिष्ठ के प्रति अपने निष्ठा को सुनिश्चित किया अपितु जगत को भी धर्म कर्म के लिए प्रेरित किया यदि माता संध्या ने अपने जीवन का त्याग कर दिया तो फिर उन्होंने ऋषि वशिष्ठ का सानिध्य कैसे प्राप्त किया मां पुत्र त्याग के बिना प्रेम नहीं होता और प्रेम के बिना त्याग नहीं होता अपने प्रेम के लिए उनका त्याग तो अभी शेष था किंतु यदि मैं इस जन्म में ऋषि वशिष्ट का साथ नहीं पा सकती तो मुझे अभी इसी क्षण अपने प्राण त्यागने की अनुमति दीजिए देवी संध्या भक्ति और निष्ठा दोनों में ही आपने स्वयं को प्रमाणित किया है जिसके कारण आपकी आत्मा के साथ आपका यह शरीर भी दिव्य हो गया है इसे आप इतनी सरलता से नहीं त्याग सकती किंतु प्रभु मैं यदि अपने देह का त्याग नहीं करूंगी तो ऋषि वशिष्ठ की पत्नी बनने की अपनी इच्छा और आपके आशीर्वाद को कैसे पूर्ण करूंगी इसीलिए मुझे अनुमति दीजिए प्रभु अपनी इच्छा से देह त्याग करना मात्र परामर्श के लिए ही उचित है देवी किंतु उसके लिए भी आपको अग्नि परीक्षा देनी होगी यज्ञ की अग्नि में अपनी आहुति देने पर ही आप अपनी देह से मुक्त हो पाएंगी निकट ही ऋषि मेधा तिथि का आश्रम है जो पिछले 12 वर्षों से अपनी पुत्री कामना पूर्ण करने के लिए यज्ञ कर रहे हैं आप वहीं जाकर अपने भावी पति का ध्यान करते हुए स्वयं को उस यज्ञ की अग्नि में समर्पित कर दीजिए किंतु ध्यान रहे ना यज्ञ की गरिमा भंग हो और ना यज्ञ खंडित होने पाए इसीलिए स्वयं को भविष्य के रूप में ही समर्पित कीजिएगा मैं आपको आशीर्वाद देता हूं उसी यज्ञ की अग्नि से आपको नवीन जीवन प्राप्त होगा और आप का यह त्याग जगत के लिए भी कल्याणकारी होगा जो आज्ञा [संगीत] प्रभु ओ शांति परीक्ष शांति पृथ्वी शांति आप शांति औषध शांति शांति वनस्पति शांति विश्वे देवा शांति ब्रह्मा शांति सर्वम शांति शांति रे शांति सामा शांति रेग ओ शांति शांति [संगीत] [संगीत] शांति किसी भी यज्ञ की आहुति के दो भाग होते हैं उनमें से एक देवताओं को प्राप्त होता है और दूसरा पित्रों को आहुति के रूप में देवी संति भी दो भागों में बट गई देवताओं के नाम पर गए पहले भाग को सूर्यदेव ने अपने रथ के ऊपरी भाग पर स्थापित किया अर्थात वो प्रातः संध्या बनी और फिर पितरों को समर्पित भाग को सूर्यदेव ने अपने रथ के निचले भाग पर स्थापित किया और वह बनी संयम संध्या इस प्रकार श्री हरिनारायण के आशीष और वरदान के फल स्वरूप जगत को प्रात संध्या और संयम संध्या कालों की प्राप्ति हुई जो पूजा वंदन के लिए श्रेष्ठतम समय होते हैं और फिर ऋषि मेधातिथि के यज्ञ के फल स्वरूप देवी संध्या ने यज्ञ अग्नि से उनकी पुत्री बनकर जन्म [संगीत] लिया अपना अगला जन्म मिला और ऋषि मेघा तिथि ने उनका नाम रखा अरुंधति अर्थात जो अग्नि से उत्पन्न हुई हो और अग्नि के समान ही पवित्र भी हो अर्थात अभी भी उनकी प्रतीक्षा समाप्त नहीं हुई उनको विवाह हेतु आयु भी प्राप्त करनी थी हां पुत्र बाल्यावस्था में ही प्रभु ब्रह्मदेव के संकेत पर ऋषि मेघा तिथि अरुंधति को सूर्यलोक ले गए जहां व सूर्यदेव की पत्नी माता सावित्री के साथ रही और वहां समय समय पर माता गायत्री और माता सरस्वती देवी की उपस्थिति रहती थी इन्हीं माताओं का सानिध्य पाकर माता अरुंधती ने उनसे संस्कार प्राप्त [संगीत] किया इस प्रकार स्वयं महादेवी हों से संस्कार और शिक्षा प्राप्त करते करते वह वहां सूर्यलोक में बड़ी हुई और फिर वो समय आ ही गया [संगीत] माता यह सब क्या है पुत्री अब तुम्हारी इच्छा पूर्ण होने का समय आ गया है यह सब उसी की सामग्री है आपको पत्नी रूप में ऋषि वशिष्ठ का सानिध्य अवश्य प्राप्त होगा ऋषि मेघा तिथि के साथ स्वयं त्रिदेव ऋषि वशिष्ठ के पास तुम्हारे विवाह का प्रस्ताव लेकर गए थे और ऋषिवर ने उत्तर दिया हां जहां एक और तीन महादेविया वधु का श्रृंगार कर रही थी वही स्वयं त्रिदेव वर को तैयार कर रहे थे और उसी अभिषेक के जल से गोमती शिप्र महानदी सरयु आदि नदियों का उद्गम हुआ और इस प्रकार स्वयं त्रिदेव और त्रि देवियों ने ऋषि वशिष्ठ और देवी अरुंधति का विवाह संपन्न [संगीत] करवाया ऋषिवर मैं आपको और अपनी पुत्री को सूर्य के समान प्रकाशमान और संपूर्ण त्रिलोक में कहीं भी जाने वाला विमान भेंट करता हूं मेरा आशीर्वाद है कि आपको और ऋषि वशिष्ठ को संसार में अत्यंत ही ऊंचा स्थान प्राप्त हो नारायण के वरदान के अनुसार मैं ऋषि वशिष्ठ को सात कल्पों की आयु प्रदान करता हूं इस प्रकार इतनी लंबी यात्रा और अनेक कष्टों के बाद उनका तप पूर्ण हुआ हां मां उनके देह त्यागने और पुनर्जन्म से तो यही सीख मिलती है कि कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं होता किंतु उसके लिए अथक परिश्रम और त्याग अवश्य करना होता है फिर लक्ष्य ही नहीं उससे भी अधिक सफलता प्राप्त होती है मां दिव्यता की श्रेष्ठतम उदाहरण है देवी अरुंधति इसलिए तो उन्हें स्वयं ब्रह्म ऋषि वशिष्ठ की पत्नी बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ सौभाग्य किसका था इसका निर्णय होना तो अभी शेष ही था क्योंकि यदि ऋषि वशिष्ठ ब्रह्म ऋषि है तो देवी अरुंधति की दिव्यता उनसे भी अधिक है और उनसे ही क्या त्रिदेव भी उनकी दिव्यता से प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाए वो कैसे मां इसका प्रमाण तो स्वयं त्रिदेव ने ही दे दिया [संगीत] था प्रभु आज आप सब अचानक आज हमारा सौभाग्य है कि आप जैसी दिव्य ऋषि पत्नी के आश्रम में आने का प्रयोजन बना कैसा प्रयोजन प्रभु देवताओं के मुख से आपकी दिव्यता की प्रशंसा सुनकर हम स्वयं को रोक नहीं पाए हम कोतुहल वश वही परखने आ गए यह तो परम सौभाग्य है मेरा किंतु एक विनती है स्वामी कभी भी लौटते होंगे इसलिए मुझे उनके लिए जल लेकर आना है इसलिए आप सबको कुछ समय प्रतीक्षा करनी [संगीत] होगी माता अरुंधती ने त्रिदेव को प्रतीक्षा करने के लिए कह दिया हां पुत्रा उनके लिए तो अपने स्वामी के प्रति उनके स्नेह उनकी निष्ठा और सेवा से अधिक महत्त्वपूर्ण और कुछ नहीं था शत्री देवों को भी इसका आभास था तो उन्होंने भी देवी अरुंधति की सहायता करने का निर्णय लिया लाइए देवी आप हमें इस पात्र को भरकर लाने की अनुमति [संगीत] दीजिए [संगीत] [संगीत] यह कैसे संभव है यह पात्र और क्यों नहीं भर रहा है हमें पुन प्रयास करना चाहिए क्षमा करें देवी हम तीनों की संयुक्त शक्ति मिलकर भी इस पात्र को पूरा नहीं भर पाएगी आपसे निवेदन है कृपा करके आप अपनी शक्ति से इस पात्र को पूरा भर प्रभु जब आप तीनों त्रिदेव की शक्ति से यह पात्र नहीं भरा तो मैं यह भला कैसे कर सकूंगी माता आप जैसी धर्म निष्ठ कर्तव्य परायण स्त्री के लिए कुछ भी असंभव नहीं है हम आपसे निवेदन करते हैं कि एक बार प्रयास कीजिए मेरे पास तो एक ही शक्ति है मेरे पति धर्म [संगीत] की [संगीत] [संगीत] हे गुरु माता आप धन्य हैं यह तो उसका प्रमाण है कि आपकी शक्ति सत्य में दिव्य है क्या आप हमें शिष्य रूप में स्वीकार करेंगी [संगीत] आप तो स्वयं त्रिदेव है सर्वोच्च ईश्वर मैं भला आपको क्या ज्ञान दे सकती हूं प्रभु देवी ज्ञान और अभिमान परस्पर विरोधी है जहां ज्ञान है वहां अभिमान नहीं होता और जहां अभिमान होता है वहां पर ज्ञान नष्ट हो जाता है कभी-कभी गुरु भी अपने शिष्य से सीखते हैं माता-पिता अपनी संतान से और भगवान अपने भक्तों से और आप तो गुरु माता है ब्रह्म ऋषि वशिष्ठ की अर्धांगिनी इसीलिए हमें अपने शिष्यों के रूप में स्वीकार कीजिए माता नारायण ने सत्य कहा अब आपको हमें अपना शिष्य बनाने में संकोच नहीं करना चाहिए जैसी अब त्रिदेव की इच्छा इस प्रकार त्रि देवों ने यह प्रमाणित किया कि किसी भी साधवी का सत्कर्म किसी भी शक्ति से अधिक शक्तिशाली होता है तो क्या यही कारण है कि माता अरुंधति को सप्त ऋषियों के साथ स्थान मिला है उसका यह कारण नहीं तब वह स्थान कब और कैसे मिला मां ऐसा तब हुआ जब आश्रम का पूर्ण दायित्व देवी अरुंधति को सौंपकर ऋषि वशिष्ठ 12 वर्ष के तप के लिए सप्तर्षियों के साथ हिमालय चले गए किंतु दुर्भाग्यवश उनके प्रस्थान के कुछ ही समय बाद पृथ्वी पर एक महा अकाल का संकट छा [संगीत] गया माते माते मुझे जल दीज माते मुझे जल दीज माते माते मुझे जल दीजिए मुझे प्यास लगी है माते माते मुझे जल दीजिए [संगीत] पुत्र माता आप चिंता ना करें हम इसका ध्यान [संगीत] रखेंगे स्वामी आश्रम का दायित्व मुझे सौप कर गए हैं मेरी निगरानी में मेरे आश्रम वासी इतने कष्ट में नहीं रह सकते यदि मुझ में मेरी धर्म परायणता में मेरे सत् कर्मों में मेरे अस्तित्व में वह शक्तियां है जो आपने दी थी हे त्रिदेव तो यह अकाल अवश्य मिटेगा और जब तक ऐसा नहीं होगा जब तक प्रकृति पुन नहीं खिलखिला तब तक [संगीत] नमः शिवाय ओम नमः शिवाय एक और तो देवी अरुंधती का जाप चलता रहा दूसरी ओर उस अकाल का प्रकोप बढ़ता रहा यहां तक कि जल के अभाव में आश्रम में सभी मूर्छित हो चुके थे देवी का कंठ भी प्यास के कारण सूख चुका था किंतु वो अनेक वर्षों तक दृढ़ता से जाप करती [संगीत] रही नम [संगीत] शिवाय नम शयम [संगीत] शिवा बिक्षा देही बन देही कोई है इस आश्रम में इस भूखे की सहायता करो देवी इस वृद्ध ऋषि को सहायता चाहिए कृपा करो देवी देवी मुझे अंजल दो एक लाचार षि आपके र पर है कोई है तो मेरी पुकार सुनो मेरी सहायता करो अन्यथा मैं कहीं और आश्रय ढूंढने पर विव हो जाऊगा कोई नहीं इस आश्रम में जो इस ृ ऋषि की पुकार सुने तो चित है मैं जाता हूं [संगीत] रुक जाइए [संगीत] ऋषिवर प्रणाम ब्राह्मण देवता आइए आपका स्वागत है आइए [संगीत] ऋषिवर आइए ब्राह्मण देवता [संगीत] देवी एक कैसी तपस्या है जो इतना विलम हो गया क्षमा कीजिए ऋषिवर मैं तब में लीन थी मुझे तो यह भी ज्ञात नहीं कि मेरे आश्रम में सभी आश्रम वासी अकाल में त्रस्त होकर मूर्छित हो चुके हैं तू एक साधारण ब्राह्मण के लिए अपना तप क्यों भंग किया देवी ऐसे तब का क्या लाभ जब कोई आपके द्वार से भूखा लौट जाए आपको मैं यदि ऐसे ही जाने देती तो मेरा तब तो ऐसे ही भंग हो जाता स्वामी की अनुपस्थिति में सभी धर्मों के निर्वाह का दायित्व मुझ पर है वो तप में लीन है और मैं अतिथि सत्कार का धर्म ना निभाओ तो उनकी साधना को भी ठेस पहुंचेगी किंतु ऋषिवर अकाल के इस अवस्था में मेरा आश्रम अन्य जल से रिक्त है दुर्भाग्यवश मैं आपको अधिक कुछ नहीं दे सकती देवी देवी चिंता मत कीजिए भूखे के लिए तो एक ाना ही पर्याप्त होता [संगीत] है [संगीत] मात्र कुछ बद्री बीज शेष है यहां हे ब्राह्मण देवता आज तो मात्र ये सूखे बद्री के बीज शेष है चिंता मत करो देवी जहा नक वि भोजन नहीं वहा यही पर्याप्त होगा आप न् पखा दीजिए मैं इन्हीं का भोजन कर [संगीत] लूंगा देवी विचित्र है ना प्रभु और उनसे भी विचित्र है उनकी लीला अपने भक्तों के साथ कितना अन्याय करते हैं कितना कष्ट देते अपने भक्तों को कभी भु कम कभी अकाल कभी महामारी नहीं प्रभु तो दया निधान है उनकी लीला के पीछे का रहस्य हम भले ही समझ ना सके किंतु वो अपने भक्तों को इसलिए कष्ट देते हैं जिससे कि हम में कष्टों को सहन करने की शक्ति उत्पन्न हो जैसे कि यह बीज अग्नि में भूनकर ही लाभकारी बनते हैं उसी प्रकार प्रभु हमारी परीक्षा लेकर हमें सबल बनाते हैं [संगीत] [संगीत] नम शिवाय और माता अरुंधती का यह प्रवचन वर्ष त चलता रहा और प्रकृति पुनः लहलहा उठी 12 वर्ष हां पुत्र माता इसी प्रकार प्रवचन देती रही और प्रभु वृद्ध ऋषि रूप में उसी प्रकार मां के शब्दों के मोती बटोर रहे उनसे ज्ञान प्राप्त करते रहे और फिर एक दिन आया जब ऋषि वशिष्ठ भी [संगीत] नमय हे प्रभु सृष्टि का संताप हरने के लिए महाकाल को दूर करने के लिए आपका कोटि कोटि [संगीत] धन्यवाद स्वामी स्वामी आ गए [संगीत] प्रणाम स्वामी आपका स्वागत [संगीत] [संगीत] है पधारिए स्वामी प्रणाम प्रभु अपने आश्रम में आपके दर्शन पाकर मैं धन्य हो गया धन्य तो मैं भी हूं आपके आश्रम में आकर देवी आपने पुनः प्रमाणित कर दिया कि आप अनंत ज्ञान की धनी है इसलिए आपको ब्रह्म ऋषि महर्षि वशिष्ठ की अर्धांगिनी बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ प्रभु मेरी प्रतिष्ठा तो इन्हीं के कारण है मेरा सौभाग्य है कि मेरा विवाह देवी अरुंधति के साथ हुआ मेरा साथ पाने के लिए इन्होंने ना केवल कठोर तप किया अपितु आपके दिए हुए वरदान के कारण सप्त कल्प की दीर्घायु भी मुझे इन्हीं के कारण प्राप्त हुई इनकी महिमा इनकी प्रतिष्ठा मुझसे कहीं अधिक है प्रभु प्रभु विनय ज्ञानी पुरुष का आभूषण है मेरे पति का विनय संवाद उन की महानता की पहचान है जो मुझसे सदा अधिक थी और रहेगी देवी आपकी सरलता आपकी निष्ठा और अपने धर्म और अपने स्वामी के प्रति आपका समर्पण ये सभी आपके आभूषण है और यह सब आपको आपके स्वामी से अधिक महान बनाते हैं सत्य तो यह भी है कि कभी-कभी भगवान की महत्ता भक्त के बाद आती है क्योंकि भगवान की शक्ति तो भक्त के साथ होती ही होती है और साथ में उसकी भक्ति की शक्ति उसे और शक्ति प्रदान करती है और देवी अरुंधति आप महर्षि वशिष्ठ की अर्धांगिनी होने के कारण उनके समस्त तप ज्ञान और पुण्य की भागीदार हैं आपकी तपो शक्ति आपके स्वामी से कहीं अधिक है जैसे देवी पार्वती की तपो शक्ति मुझसे इस संसार में प्रत्येक नारी की तपो शक्ति उनके पति से कहीं अधिक है और देवी आपने मुझे जो ज्ञान प्रदान किया उसकी गुरु दक्षिणा के रूप में मैं आपको अंतरिक्ष में उस तारे का स्थान देता हूं जो सप्त ऋषि मंडल में ऋषि वशिष्ठ के निकट [संगीत] होगा विवाह के उपरांत यदि पति पत्नी एक साथ अरुंधति तारे के दर्शन करेंगे तो का जीवन सदा सुख में रहेगा पवित्र सम्मान प्रेम और विश्वास से परिपूर्ण रहेगा इस प्रकार अरुंधति तारा विवाहित जीवन में सुख और निष्ठा का प्रतीक बना देवी अरुंधति ने जिस प्रकार अपने दृढ़ निश्चय और अपनी तपस्या से गुरु वशिष्ट को पाने का संघर्ष किया वह भगीरथ जी के समान है जिन्होंने इतने कष्ट सकर माता गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए उदम किया और फिर देवी अरुंधति ने अपने कर्म से स्वयं महर्षि वशिष्ठ से भी उच्च स्थान प्राप्त कर लिया यह तो हमारा परम सौभाग्य है मां कि हमें ऐसी परम साधवी माता अरुंधति के दर्शन प्राप्त होंगे मैं तो अब उनके दर्शन पाने के लिए अत्यंत तत्पर हूं तब तुम्हें अब अधिक प्रतीक्षा नहीं करनी होगी पुत्र क्योंकि अब हम ऋषि वशिष्ठ और देवी अरुंधति के आश्रम के अत्यंत निकट पहुंच चुके [संगीत] हैं माता अरुंधती ध्यान में लीन है मुझे सावधानी से भीतर जाना चाहिए कहीं मेरी से उनका ध्यान भंग ना हो [संगीत] जाए हे गौरी पुत्र गणेश हे माता लक्ष्मी हमारे आश्रम में आपका स्वागत [संगीत] है आप दोनों को मेरा प्रणाम मुझे क्षमा करें मेरे आगमन से आपका ध्यान भंग हो गया यह क्या कह रहे हैं महादेव और गौरी के नंदन आपका आगमन तो शुभता लेकर आता है आपके आने से मेरा ध्यान भंग नहीं हुआ अभी तो मेरे ध्यान का फल मुझे मिला है मेरे आश्रम के कण कण में आनंद उल्लास और शुभता का संचार हो गया है मैं तो धन्य हो गई और आप अकेले नहीं आप तो माता लक्ष्मी के साथ पधारे हैं इससे मेरा आनंद दुगना हो गया है आइए पधारिए देवी अरुंधति संतान की मनोकामना के साथ मैंने एक संकल्प भी लिया था गणेश को पुत्र रूप में पाकर मेरी मनोकामना तो पूर्ण हुई तो अब मुझे अपना संकल्प भी पूरा करना है मेरा संकल्प है तीन श्रेष्ठ साधवी हों के हल्दी कुमकुम सत्कार का क्या आप मुझे उसकी अनुमति देंगी के द्वारा मेरा हल्दी कुमकुम का सत्कार होगा इससे बड़ा सौभाग्य भला और क्या होगा मेरा गौरी मा जय जय मां गौरी जय मां गौरी मां यह लीजिए [संगीत] माता [संगीत] [संगीत] [संगीत] धन्यवाद देवी अरुंधति अब मेरी इच्छा है इसी प्रकार देवी सुमती और देवी सावित्री के शुभ दर्शन प्राप्त हो अवश्य होंगे माता आप शीघ्र देवी सुमति के आश्रम की ओर प्रस्थान कीजिए जो यही निकट ही है प्रणाम उत्तम कर्मों और उत्तम विचारों से संपूर्ण व्यक्तित्व उज्जवल हो जाता है ऐसे उज्जवल व्यक्तित्व वाले मनुष्य समस्त जगत के सम्मान के पात्र होते हैं
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