[संगीत] हृदय में जैसे प्रेम शत्रुता ईर्षा और ऐसे अनेक भाव वास करते हैं उसी प्रकार हृदय में भय भी वास करता है यह भय ही है जो आपकी उन्नति या अधोगति का कारण बनता है कैसे जिसके हृदय में पाप कर्म का भय ना हो वह सदा अधोगति के मार्ग पर चलता है और जिसके हृदय में पाप कर्मों का भय हो वह सदा उन्नति और पुण्य के मार्ग पर चलता है भय बुरा नहीं भय है कि नहीं यह बुरा है और भय किस बात का है यह महत्त्वपूर्ण है वंश के यश का भय आपको हर वह कार्य करने से रोकेगा जिससे वंश का नाम खराब हो प्रेमी और मित्रों को खो देने का भय आपको सदैव उनके प्रति निष्ठावान बनाए रखेगा गुरु का भय आपको सदैव आज्ञाकारी और स्वाध्याय बनाए रखेगा अर्थात भय वो अस्त्र है जिससे आप चाहे तो स्वयं को विकास की सीढ़ी चढ़ा सकते हैं या फिर स्वयं को निष्ठुर बना सकते हैं भय से भय मत करो भय उस दृष्टिकोण से करो जिससे आप भय को देखते [संगीत] हो युद्ध का पहला [संगीत] दिन युद्ध प्रारंभ करने की आज्ञा है [संगीत] धर्मराज नहीं माधव अभी [संगीत] [संगीत] नहीं महा सातम स्यम उद्ध जस्ट ये युधिष्ठिर हमारे समक्ष क्यों खड़ा है क्य खड़ा है अरे भत है [हंसी] वो हमारी सेना को देख के कदाचित भयभीत हो गया है ये यर इसे सत्य का ज्ञात हो गया है इस युद्ध में इसे विजय नहीं मिल पाएगी शश रे वो छलिया जिस जिस युद्ध के लिए हमें भत कर रहा था व युद्ध प्रारंभ होने से पहले ही समाप्त होने जा रही [हंसी] [संगीत] [संगीत] है प्रणिपात [संगीत] पितामह श पात [संगीत] आचार्य मम मस्तित और उन सबको भी प्रणिपात जो आयु में ज्ञान में अनुभव में मुझसे बड़े और मैं उन सबका अभिनंदन करता हूं जो एक योद्धा होने का कर्तव्य निभाने के लिए इस कुरुक्षेत्र में पधारे [संगीत] हैं मैंने सदैव अपने बड़ों से सीखा है कि कोई भी कार्य आरंभ करने से पूर्व बड़ों का आशीर्वाद अनिवार्य है और मैं अपने सभी भ्राता की र से आचार्य द्रोण के साथ सभी बड़ों से आशीर्वाद देने की प्रार्थना करता हूं आयुष्यमान [संगीत] तुम्हें अपने पराक्रम का फल प्राप्त हुई [संगीत] दृष्टि एक और पितामह है जिन्होंने मुझे जीवन का मूल्य समझाया और दूसरी और कुरुद जिनकी दी हुई शिक्षा ने अर्जुन से धवन जय [संगीत] बनाया कैसे कैसे कैसे प्रहार कर पाऊंगा [संगीत] [संगीत] मैं [संगीत] कैसे कैसे प्रहार कर पाऊंगा [संगीत] इनको [संगीत] कैसे क्या हुआ पार्क मेरी आपसे विनती है माधव मेरे रथ को दोनों सेनाओं के मध्य में ले [संगीत] चलिए संजय जी महाराज संजय अपनी दिव्य दृष्टि से देखकर बताओ कुरुक्षेत्र की युद्ध में तत्पर मेरे पुत्रों पर पांडवों के सेना के मध्य क्याक हो रहा है जो आज्ञा [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] महाराज गांडीवधारी राजकुमार अर्जुन के सारथी वने वासुदेव श्री कृष्ण से राजकुमार अर्जुन रथ को दोनों सेनाओं के मध्य में ले जाने की आग्रह कर रहे हैं महाराज परंतु क्यों पार्थ यह समय तो दूसरे पक्ष की सेना को तहस नहस कर देने का है फिर क्यों तुम रथ को दोनों सेनाओं के मध्य में ले जाने की विनती कर रहे हो युद्ध से पूर्व मैं दोनों सेनाओं का निरीक्षण करना चाहता हूं क्या तो वही अर्जुन हो पार्थ जिसे लक्ष्य संधान के समय पेड़ से बंधी चिड़िया की आंख के अतिरिक्त और कुछ नहीं दिखाई देता था और आज वही अर्जुन पूरी रण भूमि का निरीक्षण करना चाहता है बड़ी विचित्र बात है हां माता व प्रिया कास्ट के बनी थ परंतु जिनसे मैं युद्ध करने वाला हूं वो रक्त अस्थि और मास से बने मनुष्य हैं जिनम प्राण है और सबसे बड़ी बात उनमें मेरे संबंध बसे हैं यु आरंभ होने से पूर्व मैं यह देख लेना चाहता हूं कि किसके वत से धर्म की स्थापना होगी और किसकी मृत्यु से मन में अधर्म का अनुभव [संगीत] होगा और इस इस युद्ध के पश्चात मैं क्या पाने वाला हूं और क्या होने वाला तुम एक योद्धा हो अर्जुन और तुम यहां अधर्म का बलिदान लेने आए हो या स्वयं को धर्म पर बलिदान देने के लिए और एक बलिदानी क्या पाएगा क्या खोएगा उसकी गणना नहीं करता बात मेरे बलिदान की नहीं है माधव इस में सहस्त्र के प्राण ताव पर लगे हैं और मैं यह निश्चित करना चाहता हूं कि कुरुक्षेत्र में मैं अधर्म का नाश करने जा रहा हूं या फिर धर्म की हानि भी करने जा रहा हूं नाश और निर्माण की शक्ति केवल विधाता के पास होती है पाक मनुष्य विनाश या विध्वंस नहीं करता मनुष्य तो केवल ईश्वर का निमित मात्र होता है निमित होकर यदि वह विनाश और विद्वंस का उत्तरदायित्व स्वयं पर ले तो उससे केवल अहंकार का जन्म होता है पार्थ जो यह मानता है कि वह कुछ नहीं कर रहा उसी के हाथों महान कार्य संपन्न होते हैं परंतु मैं तुम्हारी कामना अवश्य पूर्ण करूंगा पर्थ क्योंकि बलिदान भी एक प्रकार का दान होता है और जिस दान को देने से पूर्व हाथ कांपे वह दान फलदाई नहीं [संगीत] होता आओ पार्थ मैं तुम्हें युद्ध भूमि के मध्य ले चलता [संगीत] हूं आओ पात मैं तुम्हें युद्ध भूमि के मध्य ले चलता [संगीत] हूं जदा जदा र मस ला निर भवति भारत [संगीत] [संगीत] यदा यदा धर्मस्य लाने भवती [संगीत] भत अनम धर्मस्य तदा मानम [संगीत] श्रीज जिस प्रकार तुम कर्तव्य और कर्म के मध्य खड़े हो उसी प्रकार तुम अब दोनों सेनाओं के मध्य खड़ [संगीत] हो करो क्या निरीक्षण करना चाहते [संगीत] हो क्या हुआ पार ऐसा कौन सा भाव है जो तुम्हारे मन को विचलित कर रहा है ऐसा कौन सा प्रश्न है जिसका उत्तर तुम्हें नहीं मिल रहा यदि पूछोगे नहीं तो उसका समाधान कैसे पाओगे पार्थ मैं जानता हूं तुम यही सोच रहे हो ना कि क्या यह युद्ध अनिवार्य है क्या इतने योद्धाओं का वध इतने जनों की हानि अनिवार्य है क्या यह सब कल्याण के लिए है या नहीं अना पात यही विचार मेरे मन को विचलित किए जा रहे हैं माधव क्या वास्तविकता में यह युद्ध अनिवार्य है क्या राज्य धारा संपत्ति यह सब पाने के लिए अपनों का वध करना धर्म है क्या एक योद्धा का यही कर बताइए उत्तर दीजिए [संगीत] माधव उत्तर तुम्हें अवश्य मिलेगा पर्त के इस युद्ध में धर्म की ओर कौन है और अधर्म की ओर कौन मैं तुम्हें अवश्य दिखाऊंगा यह है वह हस्तिनापुर युवराज दुर्योधन जिसे रक्त रंजित करने की कल्पना मात्र से तुम्हारा मन डोल रहा है पार्थ यह वही युवराज दुर्योधन है जिसकी कूद दृष्टि सदा तुम्हारे परिवार पर डोलती आई है पार्थ स्मरण है पार्थ यह वही है जिसने पांचाली को भरी सभा में वैश्या सिद्ध करके अपनी जंगा पर बैठने का निमंत्रण दिया था दासी द्रोपदी आकर मेरी ंगा में बैठो और कैसे पवित्र याज्ञ सेनी को भरी सभा में ने मलीन करने का प्रयास किया था वस्त्र हरण करो इस दासी द्रौपदी का और यह तुम्हारे मातुल गांधार राज शकुनी इन्होंने जब शकुन मनाया केवल तुम्हारे परिवार के अनिष्ट का शकुन मनाया पार तुम इन्ह मातुल कहते हो मातुल का अर्थ है जिसे मां के तुल्य समझा जाए और तुम्हारे इन्ही मामा ने तुम्हारी माता को व्रत के लाक्षा ग्रह की अग्नि में भस्म करने का प्रयास किया पार्त और वह जो ऊंची दृष्टि करके खड़ा मध्यान [संगीत] दुशासन स्मरण करो पार्थ कैसे वह द्रौपदी को उसके केशों से खींच कर भरी सभा में लाया था [संगीत] कैसे याज्ञ सेनी को भरी सभा में निर्वस्त्र करने का प्रयास किया था इसने क्या तुम यह सब भूल रहे हो बात ये है महामहिम भीष्म द्रोणाचार्य थामा जब यह अधर्म हो रहा था तो यह सब मौन रहे यह वह अत्याचार वह अधर्म मौन रहकर देखते [संगीत] रहे स्मरण करो वो वनवास व अज्ञातवास जिसने तुम्हें तुम्हारा पौरुष त्याग कर बह नल्ला बनने को विवश किया स्मरण करो उन प्रतिज्ञा को जो तुम पांचों ने वनवास जाते समय ली थी 13 वर्ष पश्चात हम फिर लौटेंगे और इस बार आज्ञा नहीं हम अपना अधिकार लेंगे मैं प्रतिज्ञा लेता हूं के पांचाली के अपमान पर अठस करने वाले इन 100 कोरों को मैं अपने इन हाथों से यमला भेज दूंगा ये मत समझना कि वर में हम विश्राम करेंगे दुर्योधन हर पल प्रतिशोध की अग्नि में जलेंगे और जब लौटेंगे तो इतने बाण बरसेंगे अंधकार छ जाएगा हस्तिनापुर के भविष्य पर महायुद्ध होगा जिस प्रतिशोध के लिए तुम सबने 13 वर्ष तपस्या की आज उस प्रतिशोध की अग्नि क्षीण हो गई है जिन अस्त्रों को तुमने इस युद्ध के लिए सहेजा क्या उन अस्त्रों को संधान करने का संकल्प तुम्हारा हृदय त्याग चुका है पार्थ क्या अब तुम्हें यह युद्ध अनिवार्य प्रतीत नहीं होता [संगीत] पार्थ
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