Wednesday, 7 January 2026

हिरण्यकश्यप ने विष्णु देव का अपमान किया Gagan Sankat Mochan Mahabali Hanuman 345 Pen Bhakti

[संगीत] [संगीत] मैं आ रहा हूं विष्णु [संगीत] [संगीत] शेषनाग कहां है तुम्हारा इष्ट विष्णु जिसकी सेवा में तुम दिन रात लगे रहते [संगीत] हो उस छलिया के धूर्त सेवक शेषनाग यदि मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं दिया तो तुम्हें बंदी बनाकर राज भवन ले जाऊंगा तुम्हारी त्वचा बहुत ही सुंदर और शीतल है और इसे मैं अपने राज दरबार में बिछा हंगा वैसे भी तुम यहां सैया ही बनकर बैठे हो उस कपटी विष्णु की हां शैया बना हूं मैं प्रभु विष्णु की किंतु प्रभु श्री हरि के चरणों की सेवा के असीम आनंद को तुम जैसे पापी नहीं समझ सकते दैत राज हां सेवक हो तो अपने स्वामी की चाटुकारिता तो करोगे ही अब शीघ्र बोलो कहां है तुम्हारा वह भगवान होने का ढोंग रचने वाला स्वामी प्रभु तो यही है तुम्हारे समक्ष [संगीत] मुझसे परिहास मत करो कहां है मेरे सामने तुम्हारा स्वामी वह तो यही है नेत्रों में पवित्रता और मन में श्रद्धा होगी तो तुम्हें अवश्य दिखाई दे जाएंगे किंतु तुम जैसे पापियों को भगवान के दर्शन कैसे हो सकते हैं दैत्य राज हिरण्य शप बस बहुत हो गया परिहास धूर्त शेषनाथ तुम्हें ज्ञात नहीं है मैं इसी क्षण तुम्हारा मान मर्दन कर सकता हूं बहु तले मसलकर मिटा सकता हूं तुम्हें यदि तुम अपनी भलाई चाहते हो तो इसी क्षण मेरे समक्ष शीश झुका कर मेरा सम्मान करो और अपने स्वामी की भाति पराजय स्वीकार करो अन्यथा परिणाम भोगने के लिए प्रस्तुत हो जाओ हिरण्य [संगीत] कपू तो तुम्हें अपनी पराजय स्वीकार है यदि अब तुमने पुन मेरे समक्ष अपना शीष उठाने का साहस किया तो मैं तुम्हारे शीष के सहस्त्र टुकड़े कर डालूंगा अवश्य तुम्हारे स्वामी को मेरे वरदान के बारे में ज्ञात हो गया होगा इसीलिए वह मेरे समक्ष नहीं आ रहा अर्थात उसे अपनी पराजय स्वीकार है तो अब उसके इस धाम पर मेरा अधिकार [हंसी] है मान मर्दन करना है उस देवराज इंद्र का जिसने मेरी अनुपस्थिति में मेरे पुत्र की हत्या करनी चाहिए देवराज इद्र तुम्हें भी अपनी करनी का फल भोगना पड़ेगा आ रहा है दैत्य राज महाबली हिरण्य का शप माता प्रभु श्री हरिनारायण ने कुछ क्यों नहीं किया दैत्य राज हिरण्य क शप उनके ही धाम में आकर उन नहीं क्या क्या नहीं बोला माता माता वो तो यही समझ रहे होंगे कि उनसे भयभीत होकर वह कहीं छुप गए हैं माता प्रभु नारायण ने उनके वरदान की मर्यादा का पालन करते हुए उनका विरोध नहीं किया वरदान की मर्यादा का पालन तो सबको करना ही होता है और अभी हिरण कश्यप के पाप का घड़ा भरा नहीं था उचित समय आने तक प्रभु को प्रतीक्षा करनी ही थी प्रभु के सामने ना आने पर अपनी विजय समझकर हिरण कश्यप स्वर्ग पर आक्रमण करने की ओर चल पड़ा तब तो देवों और असुरों में बड़ा संग्राम हुआ होगा माता जो हट धार्मिकता का त्याग कर परिस्थितियों के अनुसार अपने आप को ढाल लेता है वही विवेक श कहलाता है और यही देवराज इंद्र ने किया हिरण्य कश्यप के आक्रमण करने से पूर्व ही देवराज इंद्र ने अन्य देवताओं के साथ मिलकर उसके समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया अच्छा तो देवताओं ने भी वरदान का मान रखा माता हां पुत्र वे समझ गए थे कि जब प्रभु श्री हरिनारायण ने स्वयं ण कश्यप का सामना नहीं किया तो व सामना करते तो खुद का ही अहित कर लेते और इस प्रकार हिरण कश्यप को बिना युद्ध किए हुए ही स्वर्ग का सिंहासन प्राप्त हो [संगीत] [हंसी] गया स्वर्ग अब हमारा है हम असुरों का समस्त देवता हमारे दास है ब्रह्मदेव आपके वरदान की तो महिमा ही न्यारी [संगीत] है शीश झुकाओ मेरे समक्ष शीश [संगीत] झुकाओ इंद्रलोक पर विजय प्राप्त करने के पश्चात उसने समस्त पृथ्वी के राजाओं को अपने आधीन करने की योजना प्रकट कर दी और कोई भी राजा उसका सामना नहीं कर सका तो इस प्रकार दैत्य राज हिरण्य कश्यप ने तीनों लोगों पर विजय पा ली हां तीनों लोगों का सम्राट बन बैठा था हिरण्य कश्यप हनुमान एक बार यदि मनुष्य अपनी इच्छा का दास हो गया तो फिर उसकी इच्छाओं का अंत कभी नहीं होता जितनी उसकी इच्छाएं पूरी होती है उतनी ही उसकी इच्छाएं और बढ़ती जाती है हिण्य कश्यप भी इतने में शांत नहीं हुआ अब उसने स्वयं को ईश्वर घोषित कर दिया और उसे साक्षात ईश्वर मानने के लिए सबको बाध्य करने [हंसी] [संगीत] लगा यह देखो यह झुके हुए शीश देखो यह लज्जा से भरे हुए नेत्र पराजय से मलीन ये मुखड़े देखो इन्हें देखो समस्त देवता मेरे दास हैं पृथ्वी के बड़े-बड़े राजा बंदी हैं मेरे बड़े-बड़े धर्माधिकारी ऋषि मुनि अधीन है मेरे अब बताओ कौन है सर्वशक्तिमान जय शीराज हिरण कश्यप है सर्व शक्तिमान जय शीराज राज करना क्या चाहते हैं ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ रण कश सर्वशक्तिमान तो अब से अभी से किसके नाम का मंत्र गूंजेगा मंदिरों में किसकी पूजा होगी बताओ कौन है तुम्हारा प्रभु प्रभु श्री हरण कश्यप महाराज प्रभु श्री हरण कश्यप महाराज प्रभु श्री हरण कश्यप महाराज क [संगीत] महाराज [संगीत] अब से तीनों लोगों में पूजा होगी तो मात्र शक्तिमान हिरण्य कश्यप की अजय अमर ईश्वर प्रभु श्री हिरण्य कश्यप महाराज अब से मैं तुम सबका ईश्वर हूं मेरी पूजा करने वाले को ही इस पृथ्वी पर जीवित रहने का अधिकार होगा मैं उन्हें जीवन दान दूंगा अन्यथा उन्हें कष्ट दान मिलेगा जो ऐसा नहीं करेंगे मैं उन्ह जीवित नहीं छोडूंगा जो मेरी पूजा नहीं करेगा यह अधर्म है यह अन्याय है इस तरह बलपूर्वक किसी से पूजा नहीं करा सकते तुम अब बताओ कौन है तुम्हारा ईश्वर बताओ माता दैत राज हिरण्य क शप स्वयं को ईश्वर मान बैठे थे माता ईश्वर तो किसी पर शासन नहीं करते वह तो सबकी सहायता करते हैं हनुमान शक्ति और सत्ता का मत जब शीष पर चढ़ जाता है तो बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है और यदि किसी दुष्कर्मी के हाथों असीम शक्ति और सत्ता आ जाए तो वह स्वयं को सर्वोपरि समझने की भूल कर बैठता है ईश्वर मानने लगता है स्वयं को सदैव ध्यान रखना चाहिए शक्ति मिले सत्ता मिले या धन संपदा सब ईश्वर की देन समझकर अपनी सीमा में रहते हुए उसे विनम्रता पूर्वक स्वीकार करना चाहिए सत्य है माता हनुमान यह सदैव ध्यान रखेगा माता माता उसके पश्चात क्या हुआ दैत्य राज हिरण्य कश्यप को रोकने के लिए प्रभु श्री हरि ने कौन सा अवतार लिया हनुमान इस बार जो प्रभु श्री नारायण ने अवतार लिया था वह सबसे भयानक था परंतु उससे पूर्व मैं तुम्हें बताऊंगी भक्ति की महिमा भक्ति की शक्ति और यह कि ईश्वर के सच्चे भक्त कभी भी किसी से भी भयभीत नहीं होते अभी तक तुमने प्रभु की लीला के बारे में सुना अब एक भक्त की लीला के बारे में मैं तुम्हें बताऊंगी एक नन्हे से भक्त की लीला के बारे में न भक्त की लीला इसका अर्थ है आप मुझे प्रहलाद जी के बारे में बताने जा रही हैं शीघ्र बताइए ना माता प्रहलाद जी ने क्या किया था हनुमान एक और तो हिरण कश्यप सबको ईश्वर भक्ति त्याग कर स्वयं की पूजा और अर्चना कराने के लिए बलपूर्वक सबको बाध्य कर रहा था तो दूसरी ओर उसका ही पुत्र प्रहलाद प्रभु भक्ति में ली रहता था उस होनहार बालक ने छोटी सी आयु में ही समस्त वेदों का अध्ययन कर लिया था उसके मन में प्रभु हरि थे तो जिवा पर प्रभु हरि नारायण का नाम ओम नारायणाय नमः ओम नारायणाय नमः ओम नारायणाय नमः ओम नारायणाय नमः ओम नारायणाय नमः ओम नारायणाय नमः ओम नारायणाय नमः ओम नारायणाय नमः ओम नारायणाय नमः ओम नारायणाय नमः ओम नारायणाय नमः नारायण का नाम लेना अपराध है प्रतीत होता है राजकुमार प्रलाद बावले हो ग होर ओ नारायणाय नम राजकुमार प्रहलाद ऐसे नहीं सुनेंगे नारायणाय नमः राजकुमार प्रहलाद राजकुमार प्रलाद ओम नारायणाय नमः ओम नारायणाय नमः ओम नारायणाय नमः ओ नारायणाय नमः ओम नारायणाय नमः ओम नारायणाय नमः ओम नारायणाय नम अरे भ्राता अमर्क हां भ्राता शंड ये राजकुमार प्रहलाद क्या अनर्थ कर रहे हैं ये तो मुझे पहले से ही पता था ये बालक ऐसा ही है यदि प्रभु हिरण कश्यप को ये बात पता चल गई ना तो निश्चय वो हम दोनों को सूली पर चढ़ा देंगे यह नहीं तो गजरात के पाव तले कु चलवा देंगे भ्राता रोको इन्ह रोको हा मैं कुछ करता हूं [संगीत] [संगीत] प्रद प्रणाम गुरुदेव यशस्वी बाबा प्रणाम गुरुदेव आयुष्मान भवा आयुष्मान भवा प्रहलाद अनर्थ तो कर रहे थे परंतु देखो शिष्टाचार भी जानते हैं और इनको देखो देखो इनको हाथ जुला खड़े हैं हां भता शंड इन असभ्य ने तो हमें प्रणाम तक नहीं किया अरे मूर्खों कुछ सीखो कुछ सीखो अपने सहपाठी प्रल्हाद से समझे तुम लोग क्या सीखू इनसे यह त्रुटिपूर्ण मंत्र बोल रहे थे निर्णय नम के स्थान पर नारायण नमो बोल रहे थे [संगीत] राजकुमार क्या नारायण मंत्र सीखूं गुरु जी जिससे मुझे कारागार में डाल दिया जाए ओहो हमें ज्ञात है कि ये क्या बोल रहे थे और इनके बोलने का परिणाम क्या होगा हां हम तो ये कह रहे थे बस कि क्या तुम लोग को ये भी ज्ञात नहीं कि अपने गुरुजनों का सम्मान कैसे किया जाता है हैं अगर नहीं पता है तो सीखो सीखो अपने सपाठी प्रहलाद से [संगीत] मित्रों यहां [संगीत] आओ वेदों में गुरुदेव को ईश्वर से भी उच्च स्थान दिया गया है गुरुदेव का सम्मान करते हुए उन्हें प्रणाम करने से हमें उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है यह देखो ऐसे प्रणाम गुरुदेव प्रणाम गुरुदेव प्रणाम गुरुदेव आयुमान [संगीत] भ देखा प्रहलाद ने तुम लोगों को कितनी उत्तम शिक्षा दी है मैं तो पहले से ही जानता था कितना शिष्ट और अच्छा बालक है यह प्रल्हाद पुत्र प्रहलाद तुमने छोटी सी आयु में ही वेदों को कंठस्थ कर लिया है फिर मंत्र उच्चारण में त्रुटि क्यों कर रहे [प्रशंसा] थे नारायणाय नहीं हिरण आय है उचित शब्द हा पुत्र प्रहलाद ध्यान से एकाग्र होकर सुनो सही मंत्र है ओम हिर नमः क्षमा करें गुरुदेव परंतु सही मंत्र तो यही है ओम नारायणाय नमः प्रभु प्रभु प्रभु प्रभु क्षमा करें प्रभु हिरण्य का शप्पू जो हमारे कर्ण ऐसे मंत्र श्रवण कर रहे हैं क्षमा करें प्रभु क्षमा प्रहलाद किसने तुम्हें यह मंत्र सिखाया हां प्रहलाद जहां तक मुझे ज्ञात है हमने तो तुम्हें कभी यह मंत्र सिखाया ही नहीं क्या मैं जान सकता हूं तुमने यह मंत्र कब और कहां से ज्ञात हुआ यह तो मुझे ज्ञात नहीं कदाचित मेरे हृदय में यह जम से ही बसा हुआ था और फिर जो आपने मुझे वेद सिखाए हैं उनका सर भी तो यही है ओम नारायणाय नमः प्रभु प्रभु प्रभु प्रभु प्रहलाद यह वेदों का सार नहीं है देखो हमारी बात ध्यान से सुनो और सदैव उसे स्मरण रखो भ्राता अमर्क आप समझाओ इसे हा भ्राता शंड मैं समझाता हूं प्रहलाद को पुत्र प्रहलाद अभी तुम्हारे पिताजी आदरणीय दैत्य राज हिरण्य क शप तीनों लों के सम्राट हैं है ना सर्वशक्तिमान है सर्वोपरि है और जो सर्वोपरि होता है वही प्रभु होता है और उसी के नाम का जाप जपा जाता है ऐसा नहीं है क्यों नहीं है ऐसा गुरुजी वेदों में मैंने सीखा है कि प्रभु विष्णु ही जगत के स्रेष्टा एवं पालक है और वही सत्य में ईश्वर है यदि प्रहलाद ने महाराज के समक्ष नारायण मंत्र बोल दिया तो मृत्यु दंड निश्चित [हंसी] है बलपूर्वक या अत्याचार कर किसी के हृदय में स्थान नहीं बनाया जा [संगीत] सकता

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