पुत्र देवी सावित्री का तो ऐसा आत्मविश्वास था कि उनके सामने तो यमराज को भी झुकना पड़ा और उनके पति के प्राण लौटाने पड़े यमदेव को लौटा करर उन्होंने नियति को ही पलट दिया माता सावित्री की कथा तो रोचक भी है और प्रेरक भी मां मुझे उनकी पूरी कथा सुनाने की कृपा कीजिए ना अनेक वर्षों पहले मद्र देश में महाराज अश्वपति अपनी पत्नी रानी मालवी के साथ राज करती थी सुख समृद्धि की तो उन्हें कोई कमी नहीं थी किंतु उन्हें एक बहुत बड़ा दुख था संतान ना होने के कारण उनका कोई उत्तराधिकारी जो नहीं था तो राजा रानी दोनों ने पुत्र प्राप्ति की कामना से वेद माता गायत्री का योग्य आयोजित किया और फिर 13 वर्षों के निरंतर यज्ञ हवन के बाद दर्शन प्रदान [संगीत] कि र भ स्वा तत्स [संगीत] वितु भर्गो देवस्य धीमहि धियो योन प्रचोदयात ॐ भूर भुव स्वाहा जय मातेश्वरी जय मातेश्वरी महाराज अश्वपति महारानी मालवी मैं आपके अनुष्ठान से प्रसन्न आपको संतान की प्राप्ति अवश्य होगी किंतु आप पुत्र के नहीं एक पुत्री के माता पिता बनने का सौभाग्य प्राप्त करेंगे आपका राज भवन पुत्री की किल कायों से गूंज उठे पुत्र हो या पुत्री मां आपकी कृपा हमें हर रूप में स्वीकार है वृद्धावस्था का संबल हो यही सोचकर हम पुत्र की कामना कर रहे थे किंतु पुत्री वो तो स्वयं एक शक्ति है और व हमें भी शक्ति प्रदान करेगी जो नारी की शक्ति को समझते उसका सम्मान करते हैं उन्हें नियति कभी निराश नहीं करती संतान पुत्र या पुत्री गुणवान होना चाहिए तभी माता-पिता को सुख मिलता है इसीलिए मैं आपको आशीष ती असाधारण तेजस्विनी होगी आपकी पुत्री जिसमें देवी सरस्वती के समान ज्ञान होगा देवी दुर्गा का साहस और पराक्रम होगा और देवी माता लक्ष्मी के समान समृद्धि जो अपने सत् कर्मों से आपकी कुल की कीर्ति उज्जवल करेगी आपका मान आपकी प्रतिष्ठा बढ़ाएगी [प्रशंसा] और मात्र राजा रानी ही नहीं अपितु देवर्षि नारद भी उनकी पुत्री के जन्म की प्रतीक्षा में थे और जब वह शुभ घड़ी आई तो देवर्ष उस नवजात कन्या के दर्शन करने पहुंच गए नारायण नारायण प्रणाम देवर्ष प्रणाम देवशी नारायण नारायण ऐसी असाधारण तेजस्विनी का नामकरण तो मेरे द्वारा संभव नहीं है आप ही इसे नाम देने की कृपा करें यह कन्या आप दोनों के लिए माता के आशीष समान है तो क्यों ना माता के नाम से ही इसका नामकरण किया जाए राजन सरस्वती विद्या गायत्री सावित्री सभी माता के श्रेष्ठ नाम है इसमें से कोई सावित्री नारायण नारायण यही श्रेष्ठतम नाम होगा इस कन्या के लिए सावित्री सावित्री साी सावित्री सावित्री सावित्री और इस प्रकार देवर्ष के सुझाव पर उनका नाम सावित्री पड़ा बाल्यकाल से ही त्रिदेवियां के गुण माता सावित्री में थे ही अपने माता-पिता के समान भक्ति भाव उनमें कूट कूट कर भरा था बाली अवस्था से ही मां गायत्री के प्रति उनकी लगन भक्ति और समर्पण सर्वथा अन उठे थे और जब आयु बढ़ने पर वो एक युवती बनी तो उनका प्रत्येक एक दिन मां की उपासना से ही आरंभ होता था ॐ भूर भुव स्वः तस्त वितु वरेण्य भर्गो देवस्य धीमहि धियो योना [संगीत] प्रचोदयात [संगीत] तो महाराज और महारानी तो ऐसी पुत्री पाकर धन्य हो गए होंगे सभी दुखों और चिंताओं से मुक्त है ना मां धन्य तो थे वो किंतु चिंता मुक्त नहीं किंतु क्यों मां ऐसी तेजस्विनी पुत्री पाकर उन्हें भला किस बात की चिंता थी सूर्यदेव का असीम तेज किसी को भी उनकी ओर देखने तक में असमर्थ बना देते हैं जो योग्य होते हैं पुत्र वही उन्हें देख पाते हैं वही दुविधा महाराज अश्वपति और महारानी मालवी की थी उनकी पुत्री विवाह योग्य थी किंतु उनके समान उनके योग्य तेजस्वी वर कहां था कभी कल्पना भी नहीं की थी कि पुत्री का सर्वगुण संपन्न होना भी एक दुविधा उत्पन्न कर देगा पुत्री विवाह योग्य है लेकिन उसके लिए हमने अभी तक कोई योग्य व नहीं ढूंढा नाथ समय पर पुत्री का विवाह यदि माता-पिता ना करवाए तो वह पाप के भागी होते हैं बताइए ना नाथ हमारी सावित्री के लिए योग्य व कब ढूंढेंगे आप एक पिता के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण और कठिन कार्य होता है अपनी पुत्री के लिए योग्य वर चयन करना और अब तक ना तो कोई राजकुमार और ना ही कोई ऋषि पुत्र मिला है जो हमारी पुत्री सावित्री के योग्य हो और मेरी समझ में तो यह भी नहीं आता कि यदि वह मेरे समक्ष आ भी गया तो मैं उसे पहचानू कैसे तो आप ही बताइए नाथ कि उसके लिए हम किसी को कैसे ढूंढेंगे कैसे मिलेगा हमें हमारा [संगीत] जमाता रुको सखी समस्या का समाधान ऐसा होना चाहिए समस्या जड़ से ही समाप्त हो जाए ऐसे तुम इन मक्खियों को भगाओ तो एक जाएंगी तो 50 और आएंगी तो फिर हम क्या करें हर समस्या का समाधान समस्या में ही छिपा होता है बस उसे ढूंढने भर की [संगीत] देर पहले इन मक्खियों को गुड़ की मिठास से एक स्थान पर आकर्षित करो फिर अपने अनुसार इन्हें कहीं पर भी जाने पर विवश [संगीत] करो बस आपको तो अवसर मिलना चाहिए अपनी पुत्री की मनी मन सराना करने का ऐसी पुत्री सावित्री को देखकर मन मन मुस्कुराइए मत नाथ उसके लिए योग्य व ढूंढने का प्रयास कीजिए कितनी बुद्धिमान है हमारी पुत्री अब हमारी चिंता वही दूर करेगी विश्वास नहीं होता तो स्मरण कीजिए मां गायत्री ने क्या कहा था माता सरस्वती के समान बुद्धि होगी उसकी और उदाहरण तो आपने स्वयं देख ही लिया कितनी सरलता से उसने यह समस्या सुलझा मुझे विश्वास उस पर इसलिए अब मैं नहीं वो स्वयं अपनी बुद्धि से अपने योग्य वर ढूंढ [संगीत] लेगी और व जिसका भी चयन करेगी मैं वचन देता हूं ना नहीं कहूंगा तो क्या महाराज अश्वपति ने माता सावित्री को ही अपना वर ढूंढने का दायित्व सौंप दिया था हां पुत्र यह अनूठी घटना पहली बार घट रही थी जब एक कन्या अपने लिए योग्य वर को ढूंढने यात्रा पर निकल पड़ी थी माता सावित्री अपने पिता के कुछ मंत्रियों और सैनिकों के साथ आर्यावर्त का भ्रमण आरंभ कर चुकी [संगीत] [प्रशंसा] थी [संगीत] [प्रशंसा] पुष्पों की कोमलता को खड़क की कठोरता से नष्ट नहीं किया जाना चाहिए [संगीत] राजा प्रभु महादेव अपने भक्तों की सच्ची भक्ति के भूखे हैं आडंबर के नहीं और पवित्र भक्ति की कुछ ही बूंद उनके लिए भक्ति का सागर बन जाती है और आडंबर युग भक्ति का सागर भी उनके लिए कुछ भी नहीं देवी सावित्री आपने अनेकों राजाओं और राजकुमारों के प्रस्तावों को अस्वीकार कर दिया किंतु मैं मेरा मनोहर रूप मेरा मोहक व्यक्तित्व किसी को भी मंत्र मुक्त कर देता है आप मुझे मना नहीं कर सकेंगी क्षमा कीजिए शाल देश के राजकुमार सुंदर व्यक्तित्व का परिचित व्यक्ति के स्वभाव से होता है किसी की ओर मंत्र मुक्त उसकी मनोहर काया नहीं अपि तो उसका हृदय करता है और मुझे तो यह आभास हो रहा है कि आपको ज्ञात ही नहीं है कि उत्तम स्वभाव किसे कहते हैं श का इतना भी क्या नहीं है आपको अतिथि सम्मान में अपने स्थान से खड़े तक नहीं हुए [संगीत] आप जो मुझे भा जाता है उसको पा लेना मेरा स्वभाव है आपको तो मैं पाकर ही रहूंगा राजकुमारी सावित्री क्योंकि मेरी दृष्टि आप पर ही आकर रुक गई है [संगीत] राजकुमार पराया धन पराया राज और पराई स्त्री को कुदृष्टि से देखने वाले की सुंदर कायम उसके हृदय की कुरूपता छिपी होती है जो पार्की नेत्रों को स्पष्ट दिखाई देती है मनुष्य की सुंदरता बाहरी नहीं आंतरिक होनी चाहिए और आंतरिक सुंदरता के लिए हृदय और आत्मा का शुद्ध होना अनिवार्य है लोग अकारण मुख और कपड़ों को देखकर उन्हें सुंदर समझने लगते [संगीत] हैं मेरी दृष्टि मेरे नेत्र को क्या हुआ कई माह के भ्रमण के बाद उन्हें कोई योग्य वण नहीं मिला और यहां यहां उन्होंने शाल्व देश के राजकुमार को भी अस्वीकार कर दिया किंतु मां माता शाल्व देश की रानी है और हम उनसे भेंट करने उसी दिशा में जा रहे हैं तो फिर यह कैसे संभव हुआ धीरज रखो पुत्र शाल्व देश की कथा अभी समाप्त कहां हुई राजकुमारी जी हमें यात्रा करते करते न जाने कितने माह बीत गए अनेकों राजाओं और युवराज से भेंट करने के पश्चात शाल देश ही हमारा अंतिम पड़ाव था अब यदि हम आपके योग्य वर्ग का समाचार लिए बिना ही पहुंच गए तो महाराज और महारानी निराश हो जाएंगे आप चिंता मत कीजिए मंत्री व योग्यता राज भवनों तक सीमित नहीं होती और सच्चे योग्यता तो छिपाई नहीं छपती इसीलिए हमारे राज भवन पहुंचने तक अब सलता को स्वीकार मत कीजिए और मुझे माता गायत्री पर पूर्ण विश्वास है उनकी कृपा से इस यात्रा के अंत तक मुझे मेरे लिए योग्य वर अवश्य मिल [संगीत] जाएगा तेरे ी तेरे लाद तेरे रा तेरे रा त अरे मेरी ग अरे पूरी गटरी बई स की सारी लकड़िया ब व माता पिताजी भो के बैठे प्रतीक्षा कर चूहा जलाने के लिए लक व्यर्थ में विल होगा [संगीत] शम क्षमा कीजिए राजकुमार मेरी लकड़ से आप आहत तो नहीं होंगे चलिए अच्छा हुआ नहीं तो मैं स्वयं को क्षमा नहीं कर पाता आपको पता है जीवन में कुछ हो ना हो पर हमारे किसी कार्य से किसी अन्य को कोई क्ति नहीं पहुंच चाहिए आप चिंता मत कीजिए मैं अभी आपके बाप से हटा देता हूं मात पिता वहां बैठे प्रतीक्षा कर रहे और जलाने के लिए लकड़िया भी नहीं ी श लटना भी है मुझे र्म हो गया इस साधारण जीवन का इतना असाधारण प्रभाव क्यों हुआ है मुझ पर क्या यह मेरे लिए भविष्य का कोई संकेत है राजकुमारी सावित्री हमें शीघ्र यहां से प्रस्थान करना होगा रात्रि होने से पहले इस भूभाग को पार करना होगा आगे वन है और मार्ग अत्यधिक दुर्गम है जी मंत्री [संगीत] जी यहां तो कीचड़ ही कीचड़ है पूरा जल भराव है सैनिको आगे बढ़ उस वृत किसान की ठेलागाड़ी उस खीचड़ में थस गई आगे बढ़ और उसकी सहायता कीजिए इतना परोपकार भी अच्छा नहीं जिससे अपना ही जीवन संकट में पड़ जाए मैं बहाना बना देता हूं महाराज की आज्ञा है हम आपको अकेला नहीं छो सते इसलिए हमें क्षमा [संगीत] [संगीत] कीजिए बाबा आप चिंता मत कीजिए मैं आपकी सहायता करता हूं [संगीत] इसका र से बाहर आना बहुत ही कठिन लग रहा है जी मैं सहायता के लिए जाता [संगीत] हूं [संगीत] ओ इस लक्कड़ हारे की सूखी लकड़ियां तो जल में रही है वहां माता पिताजी भूके बैठे प्रतीक्षा कर रहे चूल्हा जलाने के लिए लकड़िया नहीं देखि आपकी लकड़ियां भीग रही है भीगी लकड़ियों से आपका चूल्हा कैसे जलेगा आपके माता-पिता को भोजन कैसे मिलेगा कभी कभी अपना स्वार छोड़कर ऐसा काम भी करना चाहिए जिसमें अन्य सभी का भला नियत हो मेरे माता-पिता ने मुझे यही शिक्षा दी है आज मेरी लकड़ियां भीग गई तो क्या कम से कम मेरा परिवार रूखा सुखा खाकर संतोष कर लेगा किंतु बाबा की गाड़ी नहीं निकली तो इनके परिवार को सप्ताह भर भूखा रहना पड़ेगा गांव वासियों को भी भूखा रहना पड़ेगा क्योंकि इनकी उगाई सब्जियों पर ही पूरा गांव निर्भर है इस लक्कड़ हारे का हृदय कितना विशाल हो जो दूसरों के सुखों के लिए अपने सुख का त्याग करें वो संसार को बहुत बड़ी सीख देता है और उस सीख पर तो अब मैं भी [संगीत] चलूंगी आप दोनों का बहुत बहुत धन्यवाद बाबा धन्यवाद हमारा नहीं प्रभु का कीजिए हम तो इनकी इच्छा के निमित मात्र है चलिए अन्यथा आपको देर हो जाएगी जो कार्य स्वयं करे और उसका श्रेय ईश्वर को ही दे उसकी महानता में भला क्या संदेह हो सकता [संगीत] है अरे राजकुमारी जी आपने य कष्ट क्यों किया मुझे दीजिए और आपने उस किसान की सहायता के लिए इतना कष्ट क्यों किया देवी मेरे माता पिता ने मुझे ईश्वर भक्ति का बहुत बड़ा पाठ सिखाया है उन्होंने कहा है पुत्र सत्यवान ईश्वर की सच्ची भक्ति उनके भक्तो के कष्ट हरने में है जो असहाय है उनकी सहायता करने में [संगीत] है और देखिए ना आपने भी श्वर की भक्ति की मेरी लकड़ को गीला होने से बचा लिया किंतु यह भार तो मेरा होना चाहिए ना आपका नहीं अब मुझे अपनी सहायता करने की अनुमति दीजिए आइए आइए राजकुमारी जी आइए देवी आइए इन लकड़ियों पर पाव रखकर आगे बढ़ जाइए [संगीत] [संगीत] राजकुमारी जी आप मुझे आज्ञा दीजिए क्योंकि अभी मैंने विलम किया तो मेरे वृद्ध माता पिता मेरी चिंता में विचलित हो जाएंगे आपका नाम सत्यवान है कहीं आप महाराज धूमकेतु के पुत्र सत्यवान तो नहीं आप मेरे पिताजी के नाम से परिचित है हां मैं महाराज धूम सेन का ही पुत्र हूं किंतु मेरे बाल्यकाल में मेरे माता-पिता दोनों ही दृष्टि हो बैठे और उसके बाद मेरे काका राज सिंहासन पर आरुण हो गए और फिर उनकी इच्छा हुई कि उन्हीं का पुत्र शाल देश का उत्तराधिकारी बने और उन्होंने हमें बाहर निकाल दिया [संगीत] किंतु वह राजकुमार तो राजपद के योग्य नहीं है अब व योग्य है कि अयोग्य है वह मैं नहीं जानता हूं पर हा अब वही राजपुत्र है और मेरे पिता एक लकड़हारे के पिता किंतु वह राजकुमार तो राजपद के योग्य नहीं है आपने उसके लिए कभी कोई प्रयास नहीं किया जीवन में हमें ज्ञात होना अति आवश्यक है कि धन समृद्धि पद इनसे भी अधिक कुछ महत्त्वपूर्ण होता है और मेरे माता-पिता तो मेरे लिए सर्वस्व है इसलिए राजपत की लालसा में ना तो मैं अपने माता-पिता की सेवा करने से चुकू और ना ही उन्हें किसी संकट में डालूंगा और वैसे भी जिस परिवार में प्रेम हो स्नेह हो वहां किसी राजपत की क्या आवश्यकता इसलिए हम सब बहुत प्रसन्न है और मेरे माता-पिता तो आज भी मुझे एक राजकुमार के समान ही मानते हैं मैं प्रतिदिन उनके स्नेह सागर में डोकर अपने आप को तृप्त कर लेता हूं और मुझे यह भी विश्वास है यदि मेरे कर्म अच्छे होंगे तो मुझे अवश्य मिलेगा जिसके मैं योग्य हूं देवी मैं कहीं कुछ अधिक तो नहीं भूल [संगीत] गया अच्छा देवी मुझे आज्ञा [संगीत] दीजिए फिर देवी सावित्री सत्यवान जी के निर्मल हृदय उनके पावन विचार और उनके निस्वार्थ सेवा के भाव से इतनी प्रभावित हुई कि उन्हें मन ही मन अपने पति के रूप में स्वीकार कर लिया उनके माता-पिता ने भी उनका चुनाव सुना और उन्होंने भी देवी सावित्री के इस निर्णय को सहर्ष स्वीकार कर लिया किंतु फिर किंतु क्या मां क्या आगे कोई अप घटना घटने वाली थी सत्यवान सर्वगुण संपन्न थे उनमें कोई कमी नहीं थी किंतु यह बात उनके भाग्य के बारे में नहीं कही जा सकती उसमें एक कमी थी जो उनके अन्य सभी गुणों को निरर्थक बना रही [संगीत] थी पुत्री सत्यवान के वचन सार्थक हो जिसके योग्य है व उसे मिलेगा लेकिन भले ही वह धन से समृद्ध नहीं है किंतु उसके पास संस्कारों की संपत्ति है इसलिए मुझे भी तुम्हारे निर्णय पर विश्वास है मैं अभी उसके माता-पिता के पास सत्यवान से तुम्हारे विवाह का प्रस्ताव भेजता हूं रुके महाराज अश्वपति प्रणाम देव प्रणाम देव नारायण नारायण सत्यवान के बारे में एक सत्य जानना आप सभी के लिए आवश्यक है ऐसा कौन सा सत्य है उसके विषय में जो मेरी दृष्टि से चिपा है निसंदेह निर्मल व्यक्तित्व है उसका जैसा अंतर है वैसा ही आचरण भी है पुत्री सावित्री के लिए प्रत्येक रूप से योग्य भी है किंतु एक चिंता का विषय भी वो अ उसके भाग्य में लंबा जीवन नहीं है सत्य तो यह है कि सत्यवान के पास केवल एक वर्ष की आयु ही शेष है [संगीत] पुत्री देवर्षी के मुख से निकले शब्द असत्य नहीं हो सकते इसलिए तुम्हें तुम्हारा निर्णय बदलना होगा हम तुम्हें इस विवाह की अनुमति नहीं दे सकते मां मां निर्णय कठिनाई को देखकर बदले नहीं जाते और जिसे मन से अपना मान लो उसका साथ उसके भाग्य को देखकर छोड़ा नहीं जाता और सत्यवान जी को तो मैं मन ही मन अपना पति मान चुकी हूं और एक स्त्री जब एक बार अपने मन मंदिर में किसी को स्थान दे देती है तो फिर वह स्थान किसी और को देना असंभव है किंतु पुत्री मेरा मन इस संबंध को स्वीकार नहीं कर सकता एक वर्ष के पश्चात क्या होगा यह सोचकर मेरा मन सिहर सा जाता है मैं तुम्हारा कन्यादान कैसे कर पाऊंगा यह जानते हुए कि तुम्हारा सौभाग्य एक वर्ष के बाद बिखर [संगीत] जाएगा पुत्री संसार में वह एक व्यक्ति नहीं है जो तुम्हारे योग्य होगा तुम एक बार फिर यात्रा पर जाओ इस बार तुम्हें सत्यवान से भी अधिक योग्य भ मिल जाएगा जो पुरुष अभिमान और स्वार्थ से रहित जो अपने माता-पिता की सेवा के लिए संपदा और ऐश्वर्य को त्याग कर एक सरल और साधारण जीवन को अपना सौभाग्य मानता हूं जो राज पुरुष होकर भी एक साधारण से जीवन में प्रसन्न जिसकी निष्ठा और सेवा भाव अनुपम ऐसे पुरुषार्थ से युक्त योग पुरुष और उनके अलावा और कौन है भला और कहां [संगीत] मिलेगा [संगीत] [संगीत] और यदि फिर भी आपको लगता है कि आपकी पुत्री के भाग्य में उनसे भी अधिक योग्य और कोई होगा और यदि है प तो मैं पूर्व में ही आपको बता चुकी हूं कि मैं मन से उनको अपना पति मान चुकी हूं उन्हीं को अपना सर्वस्य निछावर कर चुकी हूं तो यह मैं कैसे बदल सकती हूं किंतु पुत्री यह भी तो सत्य है कि वो अल्पायु है यह भी तो बदला नहीं जा सकता तुम इस दुर्भाग्य के योग्य नहीं हो पुत्री यदि मेरे कर्म अच्छे होंगे तो मुझे अवश्य मिलेगा जिसके मैं योग्य हूं मैंने तो निश्चित कर लिया है पिताश्री कि सत्यवान जी ही मेरे जीवन के आधार होंगे अब इसके लिए यदि मुझे नियती से भी लड़ना पड़े तो भी मैं पीछे नहीं हटूंगा [संगीत] धन वैभव पद प्रतिष्ठा एवं देह का सौंदर्य सच्ची संपत्ति नहीं है अपितु सद्गुणों से युक्त सुंदर मन ही सच्ची संपत्ति है
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